एक बारह साल की लड़की, एक ऊँचा बुर्ज जिसमें न दरवाज़ा है, न सीढ़ी। और एक ऐसी डायन, जो "माँ" कहलाना पसंद करती थी।
रापुन्ज़ेल बढ़ती गई। डायन घौरा ने उसे अपने जादुई घर में रखा। बच्ची को अच्छा खाना दिया, साफ़ कपड़े दिए, खेलने को खिलौने दिए।
पर एक बात कभी नहीं दी — सच।
"माँ, मेरी असली माँ कौन हैं?" रापुन्ज़ेल पूछती।
"मैं ही हूँ बेटा। मैंने तुझे जन्म दिया। तेरी असली माँ मैं ही हूँ।"
"पर हमारी आँखें इतनी अलग हैं?"
"हर माँ-बेटी अलग होती हैं। तू पूछताछ बंद कर। और जा, अपने बाग़ में खेल।"
रापुन्ज़ेल ने सिर हिलाया। पर उसके मन में हमेशा एक सवाल रहा।
उसके बाल बहुत तेज़ी से बढ़ते थे। ये उसकी एक ख़ासियत थी। डायन जानती थी कि ये जादुई बाल हैं। हर महीने एक हाथ। एक साल में बारह हाथ। बारह साल में — ज़मीन से पैर तक के बाल।
जब रापुन्ज़ेल बारह साल की हुई — डायन के मन में एक डर पैदा हुआ।
"ये लड़की अब बड़ी हो रही है। एक दिन इसे सच पता चल जाएगा। फिर ये मुझसे भाग जाएगी।"
उसने एक बहुत ही ऊँचा बुर्ज ढूँढा — जंगल के बीच में, इतना दूर कि कोई इंसान वहाँ कभी न पहुँच पाए। उस बुर्ज में बस एक छोटी-सी खिड़की थी, और कोई दरवाज़ा नहीं। न ज़मीन से ऊपर जाने की सीढ़ी।
एक दिन डायन रापुन्ज़ेल को घुमाने ले गई।
"बेटा, आज मैं तुझे एक नई जगह दिखाऊँगी।"
"कौन-सी, माँ?"
"एक बहुत ख़ास घर। जहाँ तू अब रहेगी।"
डायन ने अपनी जादू की छड़ी हिलाई। हवा घूमी। और अगले ही पल वो दोनों उस ऊँचे बुर्ज की चोटी पर खड़े थे।
रापुन्ज़ेल ने नीचे देखा। बहुत नीचे एक हरा जंगल। पेड़ों की चोटियाँ बहुत छोटी-छोटी दिख रहीं। उसका सिर घूम गया।
"माँ, हम यहाँ कैसे रहेंगे? कोई सीढ़ी तो है ही नहीं!"
डायन मुस्कुराई। "बेटा, तेरे बाल ही हमारी सीढ़ी हैं।"
डायन ने रापुन्ज़ेल को एक नया कमरा दिखाया। बुर्ज के अंदर एक ख़ुशनुमा छोटा-सा कमरा। एक बिस्तर, एक खिड़की, एक छोटी-सी मेज़, और एक आईना।
"बेटा, अब से तू इसी बुर्ज में रहेगी। ये दुनिया से दूर है। बाहर बहुत बुरे लोग हैं — चोर, डाकू, जादूगर। मैं तुझे उनसे बचाने के लिए ये कर रही हूँ।"
"पर मैं अकेले कैसे रहूँगी, माँ?"
"मैं हर रोज़ आऊँगी। तेरे लिए खाना, कपड़े, किताबें — सब कुछ लाऊँगी।"
"पर सीढ़ी?"
"बेटा, जब मैं नीचे से पुकारूँगी — 'रापुन्ज़ेल, रापुन्ज़ेल, अपनी सुनहरी जुल्फ़ें मेरी ओर फेंक' — तो तू अपने लंबे बाल इस खिड़की से नीचे लटका देना। मैं उन्हीं से चढ़ आऊँगी।"
रापुन्ज़ेल ने दुख से सिर हिलाया।
"ठीक है, माँ।"
डायन ने अपनी छड़ी हिलाई। एक झटके में वो खिड़की से बाहर हो गई। नीचे उतर गई।
उसी दिन से रापुन्ज़ेल उस ऊँचे बुर्ज में बंद हो गई। एक भी इंसान — डायन के सिवा — उसके पास कभी नहीं आया।
दिन बीतते गए। रापुन्ज़ेल बहुत अकेली थी। पर उसका मन बहुत साफ़ था। वो हर रोज़ अपनी छोटी-सी खिड़की पर बैठती। बाहर के पंछियों से बातें करती। हवा से बातें करती। चाँद से बातें करती।
और हर शाम वो गाती। उसकी आवाज़ इतनी मीठी थी, इतनी सुरीली, कि जंगल के पंछी अपनी आवाज़ चुप कर देते। हिरण आकर बुर्ज के नीचे खड़े हो जाते। पेड़ अपनी पत्तियाँ हिलाना बंद कर देते।
हर शाम वो एक ही गीत गाती —
"पंछी आते हैं, उड़ जाते हैं।
हवा आती है, ले जाती है।
मैं ही ठहरी एक कोने में बंद,
मेरी कब आएगी, मुक्ति की पल?"
उसी जंगल से कई कोस दूर एक राज्य था। उस राज्य के राजकुमार का नाम था आदित्य। राजकुमार आदित्य घोड़े पर सवार होकर अक्सर जंगल में शिकार के लिए निकलता।
एक शाम वो थक गया था। अपने घोड़े को एक पेड़ से बाँधकर बैठ गया। उसने पानी पिया।
तभी हवा में एक आवाज़ आई।
एक मीठी, सुरीली आवाज़। एक लड़की का गीत। उसके पूरे जीवन में उसने ऐसी आवाज़ नहीं सुनी थी।
राजकुमार ने पानी की प्याली नीचे रखी।
"ये कौन गा रहा है?"
उसने आवाज़ की दिशा में चलना शुरू किया। पेड़ों के बीच से, झाड़ियों के बीच से, बहुत आगे। आख़िर में वो एक खुली जगह पर पहुँचा।
उसके सामने एक बहुत ऊँचा पुराना बुर्ज खड़ा था। आसमान को छूने वाला। एक अकेली खिड़की उसके सबसे ऊपर। और उसी खिड़की से वो आवाज़ आ रही थी।
राजकुमार ने पुकारा — "कौन है ऊपर? तू बहुत प्यारा गा रही है!"
पर आवाज़ रुक गई। फिर एक ख़ामोशी।
राजकुमार ने बहुत देर रुककर देखा। पर खिड़की से कोई बाहर नहीं झाँका। वो वापस लौट गया।
पर उसके मन में वो आवाज़ जम गई। उस रात नींद नहीं आई।
अगले दिन फिर वो जंगल में आया। बुर्ज से दूर एक झाड़ी में छुपकर बैठ गया। शाम तक इंतज़ार किया।
शाम होते ही — वही गीत फिर शुरू हुआ।
राजकुमार ने ध्यान से सुना। पर वो ख़ुद को नहीं दिखाया। वो बस छुपकर देखता रहा।
तभी जंगल के दूसरी तरफ़ से किसी की आवाज़ आई।
"रापुन्ज़ेल! रापुन्ज़ेल! अपनी सुनहरी जुल्फ़ें मेरी ओर फेंक!"
राजकुमार ने देखा। एक काले चोगे वाली डायन बुर्ज के पाद में खड़ी थी।
ऊपर खिड़की से लंबे, सुनहरे बाल नीचे लटकाए गए। बहुत-बहुत लंबे। ज़मीन तक।
डायन ने उन्हें पकड़ा। और उन्हीं बालों के सहारे ऊपर चढ़ गई।
राजकुमार की आँखें फट गईं।
"वाह! क्या ये राज़ है उस आवाज़ का?"
उसने मन में ठान लिया — कल मैं भी उन्हीं बालों से ऊपर जाऊँगा।
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