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डायन की बाग़ और एक छोटी-सी चोरी

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Funtel
12 ghante pehle

एक भले व्यापारी की एक छोटी-सी चोरी, और एक डायन का बहुत बड़ा सौदा — जिसकी कीमत एक पूरी ज़िंदगी ने चुकाई।

एक छोटा-सा घर, एक बड़ा सपना

बहुत पुरानी बात है। एक छोटे-से गाँव के किनारे एक नौजवान दम्पति रहता था। पति का नाम था अनिल, और पत्नी का नाम था माधवी। दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते थे। उनका छोटा-सा घर, छोटी-सी आँगन, और एक बहुत बड़ी चाहत — कि कब उनकी गोद में एक नन्हा-सा बच्चा आए।

सालों बीत गए। पर बच्चा नहीं आया। माधवी हर शाम मंदिर जाती। अनिल हर सुबह सूरज को हाथ जोड़ता। पर कुछ नहीं हुआ।

आख़िर एक दिन — बहुत प्रार्थना के बाद — माधवी की आँखों में चमक आई। वो माँ बनने वाली थी।

दोनों ख़ुशी से नाचने लगे। पूरा गाँव बधाई देने आया।

पर माधवी की एक अजीब-सी आदत हो गई। उसे बार-बार एक ही चीज़ की भूख लगती। न रोटी, न खिचड़ी, न मिठाई। बस एक ख़ास हरी सब्ज़ी की।

डायन की हरी बागवानी

उस सब्ज़ी का नाम था रापुन्ज़ी। ये सिर्फ़ एक ही जगह उगती थी — गाँव के बाहर एक बड़ी-सी पत्थर की दीवार वाले बाग़ में।

उस बाग़ में सबसे हरी, सबसे ताज़ा रापुन्ज़ी थी। कतार में पंक्तियाँ। चमकती पत्तियाँ। एक भी कीड़ा नहीं।

पर वो बाग़ किसी आम इंसान का नहीं था। वो बाग़ था डायन घौरा का।

घौरा एक बुरी डायन थी। उसके बाल काले, आँखें हरी, और हाथ की उंगलियाँ लंबी। वो बहुत समय से अकेली रहती थी। किसी से बात नहीं करती। पूरे गाँव के लोग उसके बाग़ के पास भी नहीं फटकते।

"डायन के बाग़ से कुछ चुराना — तो ये पाप है।" बूढ़े-बुज़ुर्ग कहते। "कुछ भी चुराओ — पकड़ी जाओगी। और एक बार पकड़ी, तो बाहर ज़िंदा नहीं निकलोगी।"

माधवी की भूख

एक रात माधवी ने अनिल से कहा —

"अनिल, मुझे रापुन्ज़ी की भूख इतनी ज़बरदस्त है कि मैं बिना उसके मर जाऊँगी।"

अनिल चौंका। "पर माधवी, वो तो डायन के बाग़ में ही उगती है।"

"मुझे पता है। पर अब मुझसे रहा नहीं जा रहा। बस एक मुठ्ठी। बस इतनी।"

अनिल ने उसकी आँखों में आँसू देखे। उसका दिल पिघल गया।

"ठीक है। आज रात मैं जाऊँगा। पर बस एक बार।"

पहली चोरी

उस रात आसमान में हल्के बादल थे। चाँद की रोशनी बहुत कम थी। अनिल चुपचाप घर से निकला। डायन के बाग़ की दीवार पर पहुँचा।

दीवार ऊँची थी, पर एक तरफ़ पत्थर ढीले थे। वो धीरे-धीरे चढ़ा। ऊपर से देखा — पूरा बाग़ चाँदनी में तैर रहा था। हर पंक्ति में रापुन्ज़ी हरी-भरी।

उसने कूदकर बाग़ में क़दम रखा। दबे पाँव एक पंक्ति के पास गया। एक मुठ्ठी रापुन्ज़ी तोड़ी। अपनी जेब में रखी। और तेज़ी से वापस दीवार पर चढ़कर निकल गया।

घर आकर उसने पत्नी को रापुन्ज़ी दी। माधवी ने जल्दी से धोकर खाई। उसके चेहरे पर पहली बार बरसों बाद इतनी ख़ुशी थी।

"अनिल, बहुत मीठी है। बहुत स्वादिष्ट।"

पर अगले ही दिन उसकी भूख दस गुना बढ़ गई।

"अनिल, मुझे और चाहिए। एक मुठ्ठी काफ़ी नहीं थी।"

अनिल ने सिर हिलाया। पर पत्नी की आँखों में फिर वही दर्द। वो टाल नहीं सका।

दूसरी रात — और एक काली परछाई

दूसरी रात अनिल फिर बाग़ में गया। पर इस बार जब वो रापुन्ज़ी तोड़ने लगा, तो उसके पीछे एक काली-सी परछाई खड़ी हो गई।

"मेरा बाग़, मेरी रापुन्ज़ी। तू कौन है, जो दो रातों से मेरी सब्ज़ी चुरा रहा है?"

आवाज़ ठंडी, पत्थर जैसी।

अनिल काँप उठा। पीछे मुड़ा। डायन घौरा खड़ी थी।

"मा... माफ़ कीजिए माई। मेरी पत्नी गर्भ से है। उसे आपकी रापुन्ज़ी की बहुत भूख है। मैं ने सोचा एक मुठ्ठी ले लूँ। पर वो एक मुठ्ठी से नहीं भरी। इसलिए मैं फिर आ गया।"

घौरा कुछ देर चुप रही। फिर हँसी — पर वो हँसी ख़ुशी की नहीं थी।

"तुम्हारी पत्नी को मेरी रापुन्ज़ी चाहिए? ठीक है। ले जाओ। जितनी चाहिए, उतनी ले जाओ। पर एक शर्त है।"

"क्या शर्त, माई?"

"जब तुम्हारी पत्नी को बच्चा होगा — मुझे दे देना। मैं उसे अपनी बच्ची की तरह पालूँगी।"

अनिल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"नहीं माई! ऐसा कैसे हो सकता है?"

"तो फिर वापस अपनी पत्नी के पास जा। और बता उसे — कि उसके पति में इतनी हिम्मत नहीं कि एक छोटा-सा सौदा कर ले।"

घौरा की हरी आँखों में एक तेज़ चमक थी।

अनिल ने सोचा — माधवी की हालत बहुत बुरी है। बिना रापुन्ज़ी के वो ज़िंदा भी रह पाएगी या नहीं, पता नहीं। उसका मन डर से भर गया।

"ठीक है माई। मैं वादा करता हूँ।"

घौरा मुस्कुराई।

"बस। तो ले जा अब, जितनी चाहिए। मैं अपनी कीमत वसूल लूँगी।"

एक नन्ही बच्ची का जन्म

कुछ महीने बाद माधवी ने एक बहुत प्यारी बच्ची को जन्म दिया। उसके बाल सोने जैसे चमकते। उसकी आँखें नीली। उसकी मुस्कान चाँद जैसी।

पर उसी रात — जैसे ही बच्ची का पहला रोना सुनाई दिया — दरवाज़े पर डायन घौरा आ खड़ी हुई।

"मेरा वादा! बच्ची मुझे दो।"

माधवी ने चिल्लाकर बच्ची को सीने से लगाया। अनिल ने सब कुछ बताया।

माधवी के पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई।

"अनिल! तूने ये क्या किया? मेरी बच्ची को क्यों बेच दिया?"

अनिल रोने लगा। पर वादा वादा था। डायन वहाँ अड़ी रही।

"बच्ची मुझे दो। आज नहीं तो कल मैं जादू से भी ले जाऊँगी। बेहतर है ख़ुद दो।"

माधवी ने अपनी नन्ही बच्ची को आख़िरी बार चूमा। आख़िरी बार माथे पर हाथ फेरा।

"मेरी बच्ची, माँ हमेशा तेरे पास रहेगी। चाहे तू कहीं भी रहे।"

डायन ने बच्ची को गोद में लिया। उसका नाम रखा — रापुन्ज़ेल। और हवा में ओझल हो गई।

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