बुर्ज में पहली बार किसी "और" की आवाज़ गूँजी। और रापुन्ज़ेल का दिल — पहली बार — किसी अजनबी पर भरोसा करने को तैयार हुआ।
अगली शाम राजकुमार आदित्य फिर वहाँ पहुँचा। डायन घौरा अपने काम से बहुत दूर थी। बुर्ज सुनसान।
राजकुमार बुर्ज के पाद में जाकर खड़ा हुआ। उसने डायन की आवाज़ का बिल्कुल अंदाज़ लगाकर पुकारा —
"रापुन्ज़ेल! रापुन्ज़ेल! अपनी सुनहरी जुल्फ़ें मेरी ओर फेंक!"
ऊपर रापुन्ज़ेल बैठी थी। उसने सोचा — माँ कुछ जल्दी आ गईं। उसने अपने लंबे बाल खिड़की से नीचे लटकाए।
राजकुमार आदित्य ने उन्हें पकड़ा, और धीरे-धीरे चढ़ने लगा। उसके मन में डर था। पर जिज्ञासा डर से ज़्यादा थी।
जब वो खिड़की पर पहुँचा — और अंदर आया — रापुन्ज़ेल ने जो देखा, उसे यक़ीन नहीं हुआ।
एक नौजवान। उसकी उम्र में। हरी आँखें नहीं — बादामी। काले चोगे में नहीं — सादी राजसी पोशाक में। हाथ में डायन की जादुई छड़ी नहीं — एक चमकती तलवार।
रापुन्ज़ेल पीछे हटी। पर डरी नहीं।
"तुम कौन हो?" उसने धीरे से पूछा। "तुम मेरी माँ नहीं हो।"
राजकुमार आदित्य ने हाथ जोड़े। एक क़दम पीछे हट गया।
"देवी, मैं डर पैदा करने नहीं आया। मेरा नाम आदित्य है। मैं इस इलाक़े का राजकुमार हूँ। दो दिन से तुम्हारी आवाज़ सुन रहा हूँ। उस आवाज़ ने मुझे यहाँ खींच लाया।"
रापुन्ज़ेल ने उसे ध्यान से देखा। उसकी आँखें साफ़ थीं। उसके चेहरे पर कोई बेईमानी नहीं।
"तुम्हें मैंने पहले कभी नहीं देखा।"
"देवी, मेरे मुल्क में कोई इतना सुरीला नहीं गाता। मुझे लगा, ये बुर्ज में कोई सुनहरी पंछी रहता है।"
रापुन्ज़ेल हल्की हँसी।
"पंछी नहीं। मेरा नाम रापुन्ज़ेल है।"
दोनों खिड़की के पास बैठ गए। रापुन्ज़ेल ने पहली बार किसी "बाहर वाले" से बात की। आदित्य ने उसे बाहर की दुनिया की कहानियाँ सुनाईं।
"देवी, बाहर तो बहुत कुछ है। बड़े-बड़े बाज़ार। नाच-गाने। मेले। समंदर। पहाड़। लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, बातें करते हैं।"
रापुन्ज़ेल की आँखों में चमक आई।
"और बच्चे? बच्चे क्या करते हैं?"
"बच्चे खेलते हैं। दौड़ते हैं। मिलकर हँसते हैं। बारिश में नाचते हैं।"
रापुन्ज़ेल ने आहें भरीं।
"मैंने तो बारह साल इसी कमरे में बिताए। बस एक बार मेरी माँ ने मुझे नीचे ज़मीन पर पैर रखने दिया। पर वो भी बस एक छोटे-से बाग़ में।"
"माँ?" आदित्य चौंका। "क्या वो बूढ़ी डायन तुम्हारी माँ है?"
रापुन्ज़ेल ने हाँ कहने की कोशिश की। पर रुक गई।
"वो कहती हैं कि वो मेरी माँ हैं। पर मेरे मन में हमेशा शक रहा है। मेरी आँखें उनसे अलग हैं। मेरा मन उनसे अलग है।"
आदित्य कुछ देर सोचता रहा। फिर धीरे से कहा —
"रापुन्ज़ेल, अगर वो तुम्हारी माँ होतीं, तो वो तुम्हें इस तरह बंद नहीं करतीं। बाहर की दुनिया देखने नहीं देतीं। ये सब डायनों की चालाकी है। बच्चे चुराकर पालना। एक दिन उन बच्चों की जादुई शक्ति से अपना बुढ़ापा रोकना।"
रापुन्ज़ेल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"आ-आदित्य... तुम क्या कह रहे हो?"
"मुझे पूरा यक़ीन है। हम राजमहल में ऐसी कई कहानियाँ सुनते हैं। किसी न किसी डायन ने किसी न किसी ग़रीब के घर से बच्ची चुराई।"
रापुन्ज़ेल की आँखों से आँसू बहने लगे।
"तो मेरी असली माँ कहाँ हैं?"
"पता नहीं देवी। पर इतना तय है — वो तुम्हारी राह कहीं देख रही होंगी।"
रापुन्ज़ेल ने अपने आँसू पोंछे। उसके चेहरे पर अब डर नहीं था। बस एक चाहत — सच जानने की।
"आदित्य, मुझे यहाँ से निकालो।"
आदित्य ने सिर हिलाया। "देवी, मैं अकेले तुम्हें नहीं ले जा सकता। अगर डायन ने पकड़ लिया, तो वो तुम्हें मार डालेगी, और मुझे भी।"
"फिर?"
"मैं हर शाम आऊँगा। तुम्हारे लिए रेशम के तार लाऊँगा। तुम उन्हें जोड़कर एक रस्सी बनाओ। जब रस्सी पूरी हो जाएगी — हम उससे नीचे उतरेंगे। डायन को कुछ पता नहीं चलेगा।"
"और कितने दिन में रस्सी पूरी होगी?"
"बीस दिन। बस।"
रापुन्ज़ेल मुस्कुराई। पहली बार किसी ने उसे एक उम्मीद दी।
"ठीक है। हम बीस दिन की मेहनत करेंगे।"
आदित्य खिड़की पर आया। नीचे उतरने को तैयार हो गया।
"रापुन्ज़ेल, एक बात याद रखना। डायन को कोई संकेत नहीं देना। चेहरे पर ख़ुशी नहीं। आँखों में चमक नहीं। बिल्कुल वैसे ही व्यवहार करना, जैसे रोज़ करती हो।"
"वादा।"
आदित्य ने उसका हाथ चूमा। फिर रापुन्ज़ेल के बालों से नीचे उतर गया।
उस दिन से एक नया चलन शुरू हुआ। हर सुबह डायन घौरा रापुन्ज़ेल से मिलने आती। रापुन्ज़ेल वैसे ही व्यवहार करती।
"नमस्ते माँ। आपकी सेहत कैसी है?"
"ठीक हूँ, बेटा। कोई परेशानी?"
"नहीं माँ। सब ठीक है।"
शाम को डायन के जाते ही — आदित्य आता। हाथ में रेशम के लाल, हरे, नीले तार लेकर। दोनों मिलकर उन तारों को बँटते। एक मज़बूत रस्सी बनाते।
हर रात कुछ हाथ रस्सी बढ़ती जाती। और दोनों की दोस्ती भी।
आदित्य ने एक दिन कहा —
"रापुन्ज़ेल, मेरे राज्य में आओगी। मेरी माँ तुम्हें बहुत प्यार करेंगी।"
रापुन्ज़ेल ने सिर हिलाया।
"आदित्य, पहले मुझे अपनी असली माँ खोजनी है। फिर मैं तय करूँगी।"
"बिल्कुल। हम साथ खोजेंगे।"
उस रात डायन ने एक बात नोटिस की। रापुन्ज़ेल कुछ ज़्यादा ख़ुश थी। उसकी आँखों में एक नई चमक थी।
"क्या बात है, बेटा? आज कुछ हुआ?"
"नहीं माँ, कुछ नहीं।"
पर डायन को शक हो गया। और शक के साथ — एक भयानक गुस्सा।
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