सूत्रधार: यह कथा है भारतवर्ष की उस पावन नगरी की, जिसे देवताओं ने स्वयं अपने हाथों से सवारा मानो। अयोध्या! सरयू नदी के तट पर बसी यह नगरी धन-धान्य से परिपूर्ण है। इक्ष्वाकु वंश के महाराज दशरथ के राज में प्रजा को कोई दुख नहीं है।
किंतु, विडंबना देखिए... जिस राजा के खजाने मोतियों से भरे हैं, उसकी अपनी झोली खाली है। जिस आंगन में पूरी अयोध्या उत्सव मनाती है, वही आंगन एक किलकारी सुनने को तरस रहा है।
रात्रि का तीसरा प्रहर है। राजमहल के दीप बुझ चुके हैं, लेकिन महाराज दशरथ की आँखों में नींद नहीं है।
दशरथ: (स्वगत, गहरी सांस लेते हुए) सब व्यर्थ है... यह राज-पाट, यह वैभव... सब व्यर्थ है। आज दर्पण देखा मैंने। मेरे केश अब श्वेत हो रहे हैं। यह झुर्रियां गवाह हैं कि मेरा समय रेत की तरह फिसल रहा है। हे विधाता! क्या रघुकुल का गौरव मेरे साथ ही चिता में जल जाएगा? क्या कोई नहीं होगा जो मुझे 'पिता' कहकर पुकारे?
कौशल्या: (स्नेह और चिंता भरे स्वर में) महाराज?
दशरथ: (चौंककर) कौशल्या... तुम? जागी हो अभी तक?
कौशल्या: जब स्वामी की आँखों में आंसू हों, तो पत्नी को नींद कैसे आ सकती है? चलिए, शयन कक्ष में चलिए। विश्राम कीजिए।
दशरथ: विश्राम मेरे भाग्य में नहीं है कौशल्या। आज नगर भ्रमण पर मैंने एक निर्धन को अपने बच्चे को कंधे पर बैठाकर ले जाते देखा। वह निर्धन होकर भी मुझसे अधिक धनवान था। उसकी गोद भरी थी, और मेरी... मेरी यह मखमल की सेज मुझे कांटों जैसी चुभती है।
कौशल्या: (भर्राई आवाज़ में) स्वामी, स्वयं को इतना दोष न दें। यह पीड़ा केवल आपकी नहीं, मेरी भी है। पर मुझे विश्वास है, हमारे पूर्वजों का पुण्य व्यर्थ नहीं जाएगा। हमें धैर्य रखना होगा।
दशरथ: (दृढ़ता से) नहीं कौशल्या। धैर्य की सीमा अब टूट चुकी है। कल सूर्योदय होते ही मैं कोई निर्णय लूंगा। या तो यह जीवन रहेगा, या यह सूनापन।
सूत्रधार: अगली सुबह, राजदरबार में महाराज का आगमन हुआ।
द्वारपाल: (ऊंची आवाज़ में) सावधान! महाराजाधिराज दशरथ पधार रहे हैं!
सुमंत: महाराज की जय हो! आज के राज-काज का आरंभ करने की आज्ञा दें।
दशरथ: (गंभीर स्वर में) सुमंत! आज कोई राज-काज नहीं होगा।
सुमंत: (हैरानी से) क्षमा महाराज? क्या कोई अनहोनी हुई है?
दशरथ: अनहोनी तो वर्षों से हो रही है सुमंत। अब उसे होनी में बदलने का समय आ गया है। रथ तैयार करो! हम अभी, इसी क्षण कुलगुरु वशिष्ठ के आश्रम जाएंगे। मेरे मन की व्यथा का उपचार अब केवल गुरुदेव ही कर सकते हैं।
सुमंत: जैसी आज्ञा महाराज!
सूत्रधार: तेज गति से रथ दौड़ता हुआ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचा।
दशरथ: गुरुदेव! दशरथ का प्रणाम स्वीकार करें।
गुरु वशिष्ठ: (शांत और गंभीर) आयुष्मान भव राजन! तुम्हारे आने का प्रयोजन मैं जानता हूँ। तुम्हारा चेहरा तुम्हारे हृदय का हाल कह रहा है।
दशरथ: (भावुक होकर) गुरुदेव! मैंने धर्म की रक्षा की, कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाया। फिर मुझे यह भिक्षा क्यों नहीं मिलती? मैं पुत्र-हीन हूँ गुरुदेव... मुझे इस नरक से निकालिये। मुझे मार्ग दिखाइये, अन्यथा मैं प्राण त्याग दूंगा।
गुरु वशिष्ठ: शांत हो जाओ दशरथ। अधीरता क्षत्रिय को शोभा नहीं देती। और निराश न हो... क्योंकि विधि का विधान अब तुम्हारे पक्ष में है।
दशरथ: (आशा के साथ) क्या कहा आपने?
गुरु वशिष्ठ: हाँ। तुम्हारे तप का फल मिलने का समय आ गया है। तुम्हें 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' करना होगा। और इस महान यज्ञ के लिए तुम्हें स्वयं ऋषि श्रृंगी को आमंत्रित करना होगा।
दशरथ: ऋषि श्रृंगी?
गुरु वशिष्ठ: हाँ। वे महान तपस्वी हैं। उनके द्वारा संपन्न यज्ञ से तुम्हें एक नहीं... चार तेजस्वी पुत्रों की प्राप्ति होगी। ऐसे पुत्र, जिनका यश तीनों लोकों में गूंजेगा।
दशरथ: (अत्यधिक प्रसन्नता में) चार पुत्र? गुरुदेव! आपने मुझे नया जीवन दिया है। मैं आज ही... अभी ऋषि श्रृंगी के पास जाऊंगा। (भावुक होते हुए) अयोध्या अब अनाथ नहीं रहेगी! अयोध्या अब सूनी नहीं रहेगी!
सूत्रधार: गुरु वशिष्ठ की वाणी ने महाराज दशरथ के अंधेरे जीवन में आशा का दीपक जला दिया था। एक पिता का सपना सच होने वाला था। लेकिन नियति ने इन पुत्रों के भाग्य में क्या लिखा था, यह कोई नहीं जानता था।
यज्ञ की तैयारी शुरू होने वाली है। क्या देवता दशरथ की पुकार सुनेंगे? जानने के लिए सुनिए, रामायण, अगला एपिसोड...
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