1 अयोध्या का सूनापन FREE 2 अग्निदेव का वरदान FREE 3 शिव का आगमन और नामकरण FREE 4 गुरुकुल गमन और भाई का प्रेम ₹0 5 विश्वामित्र का क्रोध ₹0 6 ताड़का वध और अहिल्या उद्धार ₹0 7 पुष्प वाटिका - प्रथम मिलन ₹0 8 शिव धनुष भंग ₹0 9 परशुराम का क्रोध ₹0 10 चारों भाइयों का विवाह ₹0 11 राज्याभिषेक की घोषणा और अशुभ संकेत ₹0 12 कोप भवन और दशरथ का वचन ₹0 13 राम का महात्याग ₹0 14 दशरथ का देहांत और भरत का दुख ₹0 15 चित्रकूट में भरत मिलाप ₹0 16 दण्डक वन में प्रवेश और विराधासुर का वध ₹0 17 शरभंग, सुतीक्ष्ण और पंचवटी की ओर ₹0 18 पंचवटी में कुटिया और शूर्पणखा का आगमन ₹0 19 खर-दूषण से भयंकर युद्ध ₹0 20 रावण का प्रतिशोध और मारीच की माया ₹0 21 स्वर्ण मृग और सीता हरण ₹0 22 राम का विलाप और जटायु का बलिदान ₹0 23 कबंध राक्षस का वध और शबरी से भेंट ₹0 24 हनुमान से भेंट और सुग्रीव से मित्रता ₹0 25 बाली का वध और सुग्रीव का राज्याभिषेक ₹0
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अग्निदेव का वरदान

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Funtel
21 Mar 2026

सूत्रधार: अयोध्या के इतिहास में आज का दिन स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने वाला है। महाराज दशरथ की विनती स्वीकार कर, महान तपस्वी ऋषि श्रृंगी अयोध्या पधार चुके हैं। सरयू नदी के पावन तट पर एक विशाल यज्ञशाला का निर्माण किया गया है। पूरी नगरी वेद मंत्रों के उच्चारण से गूंज रही है। यह केवल एक यज्ञ नहीं, बल्कि रघुकुल के भविष्य की नींव है।

हवन कुंड की ज्वाला आकाश को छू रही है। महाराज दशरथ और उनकी तीनों रानियाँ अत्यंत श्रद्धा के साथ आहुति दे रहे हैं।

ऋषि श्रृंगी: (गंभीर और मंत्रमुग्ध स्वर में) ॐ... स्वाहा! हे अग्निदेव! महाराज दशरथ की पुकार सुनिए। इक्ष्वाकु वंश को उनका उत्तराधिकारी प्रदान कीजिए। ॐ... स्वाहा!

दशरथ: (हाथ जोड़कर, कांपते स्वर में) हे देवताओं! मेरे तप में यदि कोई कमी रह गई हो, तो मुझे क्षमा करें। परंतु मेरी प्रजा को अनाथ न छोड़ें। मेरी सूनी गोद भर दें प्रभु।

सूत्रधार: तभी, यज्ञ कुंड की अग्नि का रंग बदल गया। लपटें और तेज़ हो गईं, और उस प्रचंड प्रकाश के बीच से एक दिव्य आकृति प्रकट हुई। साक्षात अग्निदेव अपने हाथों में स्वर्ण पात्र लिए प्रकट हुए।

अग्निदेव: (गूंजती हुई, भारी आवाज़) महाराज दशरथ!

दशरथ: (अचंभित होकर) साक्षात अग्निदेव! प्रभु, आपको मेरा शत-शत प्रणाम।

अग्निदेव: उठो राजन। मैं तुम्हारी भक्ति और ऋषि श्रृंगी के तप से प्रसन्न हूँ। देवताओं ने तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली है।

दशरथ: मैं धन्य हुआ प्रभु! मैं धन्य हुआ!

अग्निदेव: यह स्वर्ण पात्र लो दशरथ। इसमें देवताओं द्वारा निर्मित दिव्य 'पायस' (खीर) है। यह आरोग्यवर्धक और पुत्र प्रदान करने वाला है। इसे अपनी रानियों में उचित रूप से वितरित कर दो। तुम्हारे घर चार तेजस्वी पुत्रों का जन्म होगा, जो अधर्म का नाश करेंगे।

दशरथ: (पात्र लेते हुए) आपका यह उपकार मैं जन्म-जन्मांतर तक नहीं भूलूंगा प्रभु।

सूत्रधार: अग्निदेव अंतर्ध्यान हो गए। महाराज दशरथ उस पात्र को अपने सीने से लगाए, दौड़ते हुए रनिवास की ओर भागे। उनके पैरों में आज तरुणाई लौट आई थी। वे सीधे महारानी कौशल्या के कक्ष में पहुंचे, जहाँ सुमित्रा और कैकेयी भी उपस्थित थीं।

दशरथ: (सांस फूलते हुए, अत्यंत उत्साह में) कौशल्या! कैकेयी! सुमित्रा! देखो! देवों का आशीर्वाद! हमारी तपस्या सफल हुई। अग्निदेव ने स्वयं यह प्रसाद दिया है।

कौशल्या: सच स्वामी? क्या हमारा आंगन अब गूंजेगा?

दशरथ: हाँ देवी, हाँ! अब विलंब नहीं। आओ।

सूत्रधार: महाराज दशरथ ने अत्यंत प्रेम और न्याय के साथ उस दिव्य खीर का विभाजन किया।

दशरथ: कौशल्या, तुम पटरानी हो। यह आधा भाग तुम ग्रहण करो।

कौशल्या: स्वामी की जो आज्ञा।

दशरथ: और प्रिय कैकेयी, यह शेष भाग का आधा हिस्सा तुम्हारे लिए।

कैकेयी: (प्रसन्न होकर) आपकी कृपा है महाराज।

दशरथ: (इधर-उधर देखते हुए) सुमित्रा? तुम कहाँ हो?

सुमित्रा: (पीछे से, धीमे स्वर में) मैं यहाँ हूँ महाराज।

दशरथ: अरे, खीर तो समाप्त हो गई... नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।

सूत्रधार: महाराज दशरथ संकोच में पड़ गए। लेकिन रघुकुल की रानियों का प्रेम अद्भुत था। इससे पहले कि राजा कुछ कहते, महारानी कौशल्या आगे आईं।

कौशल्या: सुमित्रा, मेरी बहन। तुम निराश क्यों होती हो? मेरे भाग में से यह हिस्सा तुम लो।

कैकेयी: और सुमित्रा, मैं पीछे क्यों रहूँ? मेरे भाग में से भी यह हिस्सा तुम लो। तुम हम दोनों को प्रिय हो।

सुमित्रा: (भावुक होकर) दीदी... कैकेयी... आप दोनों का यह प्रेम ही मेरे लिए सबसे बड़ा प्रसाद है।

दशरथ: (गदगद होकर) धन्य है यह रघुकुल, जहाँ माताओं में इतना प्रेम है! जहाँ माताओं में ऐसा त्याग है, वहां जन्म लेने वाली संतानों में कितना प्रेम होगा! ग्रहण करो सुमित्रा।

सूत्रधार: तीनों रानियों ने वह दिव्य खीर ग्रहण की। अयोध्या की हवाओं में एक सुखद परिवर्तन आ गया। समय का चक्र घूमा, ऋतुएं बदलीं, और वह शुभ घड़ी आ पहुंची जिसकी प्रतीक्षा पूरी सृष्टि कर रही थी।

चैत्र मास... शुक्ल पक्ष... नवमी तिथि।

मध्य दोपहर का समय था, न बहुत धूप थी, न ठंड। अचानक, आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। गंधर्व दुंदुभि बजाने लगे।

दशरथ: (कक्ष के बाहर, व्याकुलता से टहलते हुए) सुमंत! क्या कोई समाचार आया? मेरा हृदय बहुत ज़ोर से धड़क रहा है।

सुमंत: धैर्य रखें महाराज। शुभ समाचार किसी भी क्षण...

सूत्रधार: तभी, रनिवास से एक नवजात शिशु के रोने की आवाज़ गूंजी। वह आवाज़, जो दशरथ के लिए सबसे मधुर संगीत थी।

दासी: (दौड़ते हुए आती है) महाराज! बधाई हो महाराज! महारानी कौशल्या ने एक अद्भुत बालक को जन्म दिया है! उसका तेज सूर्य के समान है!

दशरथ: (अश्रुपूर्ण नेत्रों से) पुत्र? मेरा पुत्र? सुमंत! पूरी अयोध्या को सजा दो! खजाने खोल दो! आज दशरथ सबसे बड़ा धनी है!

सूत्रधार: अभी दशरथ का हर्ष थमा भी नहीं था कि दूसरा समाचार आया। कैकेयी ने एक पुत्र को जन्म दिया। और सुमित्रा ने दो तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया। एक नहीं, चार-चार सूर्यों का उदय रघुकुल में हुआ।

परंतु, कौशल्या के कक्ष में जो बालक था... वह कोई साधारण शिशु नहीं था। उसके होंठों पर एक मंद मुस्कान थी, और सांवले सलोने रूप में जैसे ब्रह्मांड का सौंदर्य सिमट आया था।

उस दिव्य बालक के दर्शन के लिए स्वयं महादेव कैलाश से आने वाले हैं।

कैसा होगा वह अद्भुत क्षण? जानने के लिए सुनिए, रामायण, अगला एपिसोड...

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