सूत्रधार: अयोध्या आज इंद्रपुरी से भी अधिक सुंदर लग रही है। घर-घर में मंगलाचार हो रहे हैं। गलियों में इत्र छिड़का गया है और हर द्वार पर तोरण सजे हैं। देवता भी आकाश से फूलों की वर्षा कर रहे हैं। कारण? रघुकुल में एक नहीं, चार पुत्रों का जन्म हुआ है।
लेकिन, इन उत्सवों के बीच राजमहल के द्वार पर एक अद्भुत घटना घटी। एक जटाधारी साधु, जिसके हाथ में डमरू और त्रिशूल था, 'अलख निरंजन' पुकारता हुआ आ पहुंचा। यह कोई साधारण साधु नहीं, बल्कि स्वयं महादेव थे, जो अपने आराध्य के बाल रूप के दर्शन को आए थे।
साधु (शिव): (गूंजती हुई, रहस्यमयी आवाज़) नारायण... नारायण! मैया, भिक्षा दे!
कौशल्या: (दासी से) दासी, जाओ, महात्मा को स्वर्ण मुद्राएं और भोजन दे आओ।
साधु (शिव): न सुवर्णा चाहिए, न भोजन मैया। यह साधु तो केवल दर्शन का प्यासा है। सुना है तेरे आंगन में सूर्य उतरा है? मुझे उस ललना (बालक) का मुख दिखा दे मैया।
कौशल्या: (संकोच में, स्वगत) इस साधु का रूप कितना विचित्र है। गले में सर्प, शरीर पर भस्म... कहीं मेरे कोमल शिशु को इसकी नज़र न लग जाए या यह डर न जाए। (प्रकट) महात्मा, बालक अभी बहुत छोटा है। वह सो रहा है। आप भिक्षा लेकर प्रस्थान करें।
साधु (शिव): (हंसते हुए) मैया, जिसे देखने के लिए योगिजन युगों तक समाधि लगाते हैं, उसे तू 'छोटा' कह रही है? वह सो नहीं रहा, वह तो मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। यदि दर्शन नहीं मिले, तो यह जोगी यहीं धूनी रमाएगा।
सूत्रधार: तभी, पालने में लेटे बालक ने ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। माता कौशल्या ने उसे चुप कराने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह चुप न हुआ। अंततः, विवश होकर कौशल्या बालक को गोद में लेकर द्वार पर आईं।
जैसे ही साधु की दृष्टि बालक पर पड़ी, बालक का रोना थम गया। और... उसने मुस्कुरा दिया।
साधु (शिव): (भाव-विभोर होकर) जय हो! ब्रह्म का सगुण रूप... जय हो! मैया, तेरा यह लाल साधारण नहीं है। यह जगत का आधार है।
सूत्रधार: महादेव अपने इष्ट के दर्शन पाकर कृतार्थ हो गए और आशीर्वाद देकर कैलाश लौट गए। अयोध्या में दिन बीतते गए। ११वें दिन, नामकरण संस्कार का शुभ मुहूर्त आया। गुरु वशिष्ठ राजमहल पधारे।
दशरथ: गुरुदेव, मेरे इन चारों कुमारों का नामकरण करें। इनके लिए ऐसे नाम चुनें जो इनके गुणों के अनुरूप हों।
गुरु वशिष्ठ: राजन, तुम्हारे ये पुत्र वेदों का सार हैं। मैं अपनी मति अनुसार इनके नाम रखता हूँ।
(थोड़ा रुककर)
गुरु वशिष्ठ: कौशल्या का यह पुत्र, जो आनंद का सागर है, जिसके स्मरण मात्र से योगियों को विश्राम (रमण) मिलता है... यह पूरे जगत में 'राम' के नाम से जाना जाएगा।
दशरथ: राम! अति सुंदर नाम है गुरुदेव।
गुरु वशिष्ठ: और कैकेयी का यह पुत्र, जो विश्व का भरण-पोषण करने की क्षमता रखता है, जो धर्म का भार उठाएगा... इसका नाम 'भरत' होगा।
दशरथ: भरत... अद्भुत!
गुरु वशिष्ठ: सुमित्रा के इस तेजस्वी पुत्र में शुभ लक्षणों का वास है। यह राम का अनन्य सेवक और आधार बनेगा, इसलिए इसका नाम 'लक्ष्मण' होगा।
और सुमित्रा का यह दूसरा पुत्र, जो शत्रुओं का नाश करने वाला होगा, जिसके सामने कोई शत्रु ठहर नहीं पाएगा... इसका नाम 'शत्रुघ्न' होगा।
सूत्रधार: राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। चारों भाइयों के नाम घोषित होते ही जयकारों से आकाश गूंज उठा। लेकिन, रनिवास में एक नई समस्या उत्पन्न हो गई। सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण ने दूध पीना छोड़ दिया और दिन-रात रोते रहते। वैद्य और हकीम हार गए, पर कोई रोग पकड़ में न आया।
अंत में गुरु वशिष्ठ को बुलाया गया।
गुरु वशिष्ठ: (मुस्कुराते हुए) सुमित्रा, तुम व्यर्थ ही चिंतित हो। लक्ष्मण को कोई रोग नहीं है। इसे राम के पालने में लेटा दो।
सुमित्रा: क्या? राम के पास?
गुरु वशिष्ठ: हाँ। यह राम की छाया है। यह राम के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता।
सूत्रधार: जैसे ही लक्ष्मण को राम के बगल में लेटाया गया, चमत्कार हुआ। लक्ष्मण चुप हो गए और खिलखिलाने लगे। राम ने अपना नन्हा हाथ लक्ष्मण के ऊपर रख दिया।
सुमित्रा: (हैरानी और खुशी से) गुरुदेव, यह तो अद्भुत प्रेम है!
गुरु वशिष्ठ: यह प्रेम आज का नहीं, युगों पुराना है सुमित्रा। राम और लक्ष्मण एक ही प्राण हैं, बस शरीर दो हैं।
सूत्रधार: इस प्रकार चारों भाई चंद्रमा की कलाओं के समान बढ़ने लगे। उनकी बाल-लीलाओं ने पूरे महल को मोहित कर लिया। ठुमक-ठुमक कर चलना, तोतली बोली बोलना... महाराज दशरथ तो मानो सुध-बुध ही खो बैठे थे।
लेकिन समय पंख लगाकर उड़ता है। नन्हें राजकुमार अब किशोर हो चले थे। उनकी शिक्षा का समय निकट आ रहा था। वह समय, जब उन्हें पिता की गोद से निकलकर गुरु के कठोर अनुशासन में जाना होगा।
क्या कोमल राजकुमार गुरुकुल के कठोर नियमों को सहन कर पाएंगे?
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