लाइब्रेरी की उस गुमसुम कोने वाली टेबल पर रात के ग्यारह बज चुके थे, और सांची मेहता की चौथी कॉफ़ी की प्याली अब आधी ठंडी हो चुकी थी।
उसके सामने इकोनॉमिक्स की वो किताब खुली थी जिसे पिछले दो घंटे से वो किसी और के लिए पढ़ रही थी — खुद के लिए नहीं। कल सुबह उसके इकोनॉमिक्स के टीचिंग असिस्टेंट के तौर पर पहली बड़ी क्लास थी, और प्रोफ़ेसर देशपांडे ने साफ़ कह दिया था — "जो भी फ़र्स्ट-ईयर लड़का इस कोर्स में फ़ेल होने की कगार पर है, उसे एक्स्ट्रा सेशन्स देना तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी, सांची।"
उसने नाक के ऊपर खिसक आए चश्मे को अंगुली से ऊपर सरकाया और एक लम्बी साँस छोड़ी। बीस साल की उम्र में, साहित्य और संगीत में डबल मेजर करते हुए, साथ में पार्ट-टाइम TA की जॉब — सब कुछ एक साथ चलाना आसान नहीं था। लेकिन हर महीने अपने हॉस्टल का किराया और मम्मी के घर बेंगलुरु में कुछ पैसे भेजने के लिए, यही सब करना ज़रूरी था।
"सांची, यार, अब तू बंद कर ये पढ़ाई।" मीरा की आवाज़ टेबल के पार से आई। सांची की रूममेट और सबसे अच्छी दोस्त, मीरा कपूर, उसके सामने वाली कुर्सी पर लापरवाही से बैठी अपने फ़ोन में स्क्रॉल कर रही थी। "लाइब्रेरी बंद होने वाली है और तेरी आँखें पांडा जैसी दिख रही हैं।"
"बस पाँच मिनट," सांची ने बिना नज़र उठाए कहा।
"तू पिछले पैंतालीस मिनट से 'बस पाँच मिनट' कह रही है।"
सांची ने हँसते हुए मीरा की तरफ़ देखा। "ठीक है, ठीक है। पैक करती हूँ।"
तभी लाइब्रेरी का भारी दरवाज़ा एक ज़ोर के झटके से खुला और उसके साथ ही एक तीखी आवाज़ गूँजी — "एक्सक्यूज़ मी, यहाँ कोई सांची मेहता नाम की लड़की है?"
सांची ने सिर उठाया। मीरा के होंठ खुले के खुले रह गए।
दरवाज़े पर जो लड़का खड़ा था, उसे कैम्पस में पहचानना मुश्किल नहीं था। छह फ़ीट से थोड़ा ऊँचा, चौड़े कंधे, क्रिकेट टीम की हुडी पहने हुए, गहरे काले बाल जो थोड़े बिखरे हुए थे जैसे अभी-अभी प्रैक्टिस से आया हो। उसके चेहरे पर वो आत्मविश्वास था जो सिर्फ़ उन्हीं लोगों के पास होता है जिन्हें ज़िंदगी ने कभी "ना" नहीं सुनाई।
अर्जुन राठौर। उर्फ़ AJ। वेस्टब्रिज क्रिकेट टीम का कप्तान। फ़ास्ट बॉलर। और कैम्पस का वो लड़का जिसके आगे-पीछे आधे कॉलेज की लड़कियाँ घूमती थीं।
सांची को उसके बारे में बस इतना ही पता था, और इतना ही काफ़ी था।
"ओ माय गॉड," मीरा फुसफुसाई। "वो AJ है। AJ राठौर लाइब्रेरी में? रात ग्यारह बजे? तुझे ढूँढ रहा है?"
"शायद ग़लती से," सांची ने धीरे से कहा, अपनी कॉफ़ी की प्याली को ऐसे पकड़ते हुए जैसे वो कोई ढाल हो।
AJ की नज़र पूरे हॉल में घूमी और फिर सीधे उनकी टेबल पर आकर रुक गई। उसके होंठ एक तरफ़ हल्की सी मुस्कान में मुड़े और वो तेज़ क़दमों से उनकी तरफ़ बढ़ा।
"हाय। सांची मेहता?"
सांची ने सिर हिलाया। "हाँ।"
"अरे, बढ़िया।" वो टेबल के पास आकर रुका और दोनों हाथ हुडी की जेबों में डाल लिए। "मैं अर्जुन राठौर हूँ। प्रोफ़ेसर देशपांडे ने भेजा है।"
सांची ने एक पल के लिए अपनी पलकें झपकाईं। "किसलिए?"
"इकोनॉमिक्स के एक्स्ट्रा क्लासेज़ के लिए। तुम मेरी ट्यूटर हो।"
"माफ़ कीजिए, क्या?"
उसकी मुस्कान थोड़ी और चौड़ी हुई। "ट्यूटर। आप मेरी इकोनॉमिक्स की ट्यूटर हो। प्रोफ़ेसर ने कहा कि आज ही आपसे मिलकर शेड्यूल फ़िक्स कर लूँ।"
सांची को लगा जैसे किसी ने उसके चेहरे पर ठंडा पानी फेंक दिया हो। प्रोफ़ेसर देशपांडे ने सुबह ज़रूर कहा था कि "एक स्टूडेंट है जो फ़ेल हो रहा है" — लेकिन AJ राठौर? कैम्पस का सबसे फ़ेमस लड़का? जिसे शायद ज़िंदगी में कभी कोई एक भी सब्जेक्ट पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी होगी?
उसके अंदर कुछ चिढ़ने लगा।
"प्रोफ़ेसर ने मुझे सुबह बताया था कि किसी फ़र्स्ट-ईयर स्टूडेंट को मदद चाहिए," उसने धीमी, सपाट आवाज़ में कहा। "लेकिन आप तो थर्ड-ईयर में हैं।"
"रिपीट कर रहा हूँ कोर्स," AJ ने बेपरवाही से कहा, जैसे ये कोई बड़ी बात ही न हो। "दो बार फ़ेल किया। तीसरी बार में नहीं किया तो टीम से बाहर हो जाऊँगा।"
"दो बार?"
"हाँ।" अब उसकी मुस्कान थोड़ी सी बेबाक हो गई। "तो जो भी हो, अब तुम्हारे ऊपर है कि मुझे पास करवाओ।"
मीरा अब अपनी कुर्सी पर सीधी हो गई थी, इस पूरी बातचीत को ऐसे देख रही थी जैसे ये कोई नेटफ़्लिक्स शो हो।
सांची ने अपनी कॉफ़ी की प्याली नीचे रखी और AJ की तरफ़ देखा। उसकी आँखें भूरी थीं — हल्की, सुनहरी सी। और उन आँखों में जो लापरवाही थी, वो उसे और चिढ़ा रही थी।
"मिस्टर राठौर," उसने धीरे से कहा, "इकोनॉमिक्स कोई आसान सब्जेक्ट नहीं है जो दो-तीन एक्स्ट्रा क्लासेज़ में निकल जाए। माइक्रो, मैक्रो, गेम थ्योरी, इकोनोमेट्रिक्स के बेसिक्स — ये सब आपको समझने पड़ेंगे। और अगर आप दो बार फ़ेल कर चुके हैं, तो साफ़ है कि आपने पहले कभी सीरियसली कोशिश नहीं की।"
"वाओ।" AJ की भौंहें ऊपर उठ गईं। "तुम बहुत डायरेक्ट हो।"
"मैं ईमानदार हूँ।"
"वही तो कह रहा हूँ।" उसने एक कुर्सी खींची और बिना पूछे बैठ गया। टेबल के पार से उसकी आँखें सीधे सांची की आँखों में टिक गईं। "तो क्या तुम मुझे पढ़ाओगी, या मुझे प्रोफ़ेसर को बता दूँ कि तुमने मना कर दिया?"
सांची का जबड़ा कस गया। ये धमकी थी, चाहे जैसे भी बोला हो।
"प्रोफ़ेसर मुझे एक्स्ट्रा स्टाइपेंड दे रहे हैं इस काम के लिए," उसने ठंडी आवाज़ में जवाब दिया। "इसलिए मैं हाँ कहूँगी। लेकिन मेरे शर्तों पर।"
उसकी मुस्कान वापस लौट आई। "शर्तें? सुनाओ।"
"हफ़्ते में दो सेशन्स। मंगलवार और गुरुवार। शाम सात से नौ। यहीं, लाइब्रेरी की स्टडी रूम 3 में। तुम वक़्त पर आओगे। फ़ोन साइलेंट पर। मैं जो होमवर्क दूँगी, अगली क्लास तक पूरा।"
"और अगर मैं देर से आऊँ?"
"तो मैं चली जाऊँगी। और तुम्हें फिर से प्रोफ़ेसर से बात करनी पड़ेगी।"
AJ ने एक पल के लिए उसे देखा, फिर हँस पड़ा। "तुम सच में सीरियस हो।"
"बिलकुल।"
"ठीक है, मेहता। डील।" उसने हाथ बढ़ाया।
सांची ने एक पल के लिए उस हाथ को देखा — मज़बूत, लंबी उँगलियाँ, हथेली पर क्रिकेट बॉल पकड़ने से बने हल्के निशान। फिर उसने झिझकते हुए अपना हाथ बढ़ाया।
उसका हाथ AJ के हाथ में जैसे ही पहुँचा, सांची को एक हल्की सी लहर अपनी कलाई से ऊपर तक दौड़ती महसूस हुई। ये क्या था? उसने तुरंत हाथ खींच लिया।
AJ ने नज़र नहीं चुराई, लेकिन उसके होंठों के कोने में एक हल्की सी मुस्कान दिखी जैसे उसने भी कुछ नोट किया हो।
"मंगलवार," उसने कहा। "शाम सात।"
"वक़्त पर," सांची ने दोहराया।
वो उठा, हुडी की जेबों में हाथ डाले हुए, और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। आधे रास्ते में रुककर पीछे मुड़ा।
"और मेहता?"
"हाँ?"
"तुम जो ज़बान चलाती हो ना — मुझे पसंद आई।"
और इससे पहले कि सांची कुछ जवाब दे पाती, वो लाइब्रेरी से बाहर निकल चुका था।
एक पूरी मिनट तक टेबल पर सन्नाटा रहा।
फिर मीरा ने धीरे से कहा — "सांची।"
"हाँ?"
"तेरा चेहरा लाल हो रहा है।"
"नहीं हो रहा।"
"हो रहा है।"
"मीरा, चुप कर।"
मीरा हँस पड़ी, इतनी ज़ोर से कि लाइब्रेरियन ने दूर से उन्हें घूरकर देखा।
"यार, ये तो रियल लाइफ़ रोमांस नॉवेल का प्लॉट है। तू और AJ राठौर। हर मंगलवार और गुरुवार। बंद कमरे में।"
"ये ट्यूटोरियल है, मीरा। और लाइब्रेरी की स्टडी रूम्स में काँच के दरवाज़े हैं।"
"तो? डायलॉग के लिए तो जगह बहुत है।"
"मीरा।"
"ओके, ओके।" मीरा ने अपना फ़ोन उठाया, फिर अचानक रुकी। "वैसे — गुरुवार को म्यूज़िक डिपार्टमेंट का ओपन माइक है। आरव परफ़ॉर्म कर रहा है।"
सांची के चेहरे का रंग बदला।
आरव वर्मा। संगीत डिपार्टमेंट का सबसे टैलेंटेड गिटारिस्ट। शांत, गहरा, थोड़ा शायराना। पिछले एक साल से सांची उसके साथ कॉलेज के एनसेम्बल में परफ़ॉर्म करती थी, और पिछले एक साल से ही वो उससे एक भी पूरा वाक्य ठीक से नहीं बोल पाई थी।
"उसकी गर्लफ़्रेंड भी आएगी," मीरा ने अब धीमे से कहा।
सांची ने जल्दी से अपनी आँखें नीचे कर लीं और किताब बंद करने लगी।
"मीरा, चलें?"
"यार, सॉरी। मैं बस —"
"चलें।"
लाइब्रेरी से बाहर निकलते वक़्त सांची की आँखों के सामने दो चेहरे एक साथ घूम रहे थे — एक आरव का, चुप, संगीत में डूबा हुआ — और एक AJ का, बेबाक मुस्कान वाला।
दोनों एक-दूसरे से ज़मीन-आसमान का फ़र्क थे।
और दोनों ही, किसी न किसी तरह, अब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा थे।
(अगला एपिसोड जल्द ही)
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