उनका छोड़ो, अपना देखो
आप अपनी ज़िंदगी की आधी ताक़त उन चीज़ों पर ख़र्च कर रहे हैं जो कभी आपके हाथ में थीं ही नहीं — और सबसे बड़ी वाली है, दूसरे लोग। यह किताब एक सादी लकीर पर टिकी है : दुनिया में हर चीज़ दो ख़ानों में आती है — उनका काम और मेरा काम। बीस अध्यायों में — बदलने की कोशिश की सात शक्लें, कंट्रोल का भ्रम, लोगों की राय, वो जो आपको पसंद नहीं करता, परिवार, दोस्त जो छूट गए, दफ़्तर, तुलना, सीमा बनाना, अपना हिस्सा उठाना, माफ़ी का इंतज़ार छोड़ना, बड़े बच्चे, और वो सबसे ज़रूरी फ़र्क़ — असहजता में छोड़ना, पर नुक़सान में निकलना। हर अध्याय के अंत में एक लाइन का निचोड़ और एक छोटा काम, साथ में 21 दिन का अभ्यास। रोज़मर्रा की हिंदी में, असली भारतीय हालात के उदाहरणों के साथ।
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