आपको लगता है कि आप किसी को बदलने की कोशिश नहीं कर रहे। आप बस "समझा" रहे हैं। ये वही चीज़ है, बस उसका शरीफ़ नाम है।
बदलने की कोशिश हमेशा साफ़-साफ़ नहीं दिखती।
वो चिल्लाने में दिखती है, ये तो सबको पता है। पर वो और भी बहुत जगहों पर छुपी रहती है, और वहाँ हमें लगता है कि हम कुछ अच्छा कर रहे हैं।
इस अध्याय में हम उन जगहों को पहचानेंगे।
सात शक्लें
एक : समझाना।
"मैं बस उसे समझाना चाहता हूँ कि उसने ग़लत किया।"
ग़ौर कीजिए — इसमें एक शर्त छुपी है। आप तब तक शांत नहीं होंगे जब तक वो मान न ले।
यानी आपकी शांति उसके फ़ैसले पर टिकी है। और वो फ़ैसला उसका काम है।
दो : साबित करना।
किसी ने आपके बारे में ग़लत राय बना ली। और अब आप सालों से उस राय को ग़लत साबित करने में लगे हैं — काम से, कामयाबी से, दिखाकर।
जिस आदमी को आप ग़लत साबित करने के लिए मेहनत कर रहे हैं, वो आपकी ज़िंदगी चला रहा है। भले वो पंद्रह साल से आपसे मिला भी न हो।
तीन : सलाह देना जो माँगी नहीं गई।
ये सबसे प्यारी वाली शक्ल है। इसमें नीयत सच में अच्छी होती है।
पर अगर सामने वाला वो सलाह नहीं मान रहा और आप बार-बार दे रहे हैं — तो अब वो मदद नहीं रही। अब वो कब्ज़ा है।
चार : उम्मीद रखना और बताना नहीं।
ये हमारे यहाँ सबसे आम है।
आप चाहते हैं कि वो अपने आप समझ जाए। बिना कहे। और जब वो नहीं समझता, तो आपको बुरा लगता है।
पर आपने कभी कहा नहीं। आप एक ऐसी परीक्षा ले रहे थे जिसका पर्चा आपने कभी दिया ही नहीं।
पाँच : मूड ठीक करने की ज़िम्मेदारी उठाना।
घर में कोई ग़ुस्से में है, और पूरा घर उसके आस-पास दबे पाँव चल रहा है।
आप उसका मूड ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं — चाय बनाकर, बात बदलकर, हँसाकर।
उसका मूड उसका काम है। और जो आदमी दूसरों के मूड की चौकीदारी करता है, वो कभी आराम नहीं कर पाता।
छह : मन में बहस करना।
वही रात दो बजे वाली बातचीत। पूरी दलील, पूरा जवाब, और सामने वाला सो रहा है।
ये सबसे ज़्यादा वक़्त खाने वाली शक्ल है, और सबसे कम पकड़ में आने वाली — क्योंकि ये किसी को दिखती नहीं।
सात : इंतज़ार करना कि वो बदलेगा।
"बस थोड़ा वक़्त और। शादी के बाद सुधर जाएगा। बच्चा होने के बाद समझ जाएगा। नौकरी लगने के बाद ठीक हो जाएगा।"
ये सबसे लंबी वाली है। लोग इसमें दस-बीस साल लगा देते हैं।
क़ीमत क्या है
ये सब बेकार है, ये तो साफ़ है। पर बेकार होना सबसे बड़ी बात नहीं है।
सबसे बड़ी बात ये है कि ये महँगा है।
तीन चीज़ें ख़र्च होती हैं :
वक़्त। हिसाब लगाइए कि पिछले हफ़्ते आपने कितने घंटे किसी के बारे में सोचने में लगाए — ऐसे किसी के जिसने आपकी तरफ़ शायद एक बार भी नहीं सोचा।
ताक़त। मन में बहस करने से आदमी उतना ही थकता है जितना असली बहस से। शरीर को फ़र्क़ नहीं पता चलता।
और सबसे महँगी चीज़ — आपका अपना ख़ाना।
जिस वक़्त आप उनके ख़ाने में मेहनत कर रहे थे, उस वक़्त आपका अपना काम रुका हुआ था।
वो पढ़ाई। वो हुनर। वो सेहत। वो रिश्ता जो सच में आपका था।
ये असली नुक़सान है, और ये चुपचाप होता है।
एक बात जो चुभेगी
दूसरों को बदलने की कोशिश में एक छुपा हुआ आराम है।
जब तक समस्या उनकी है, तब तक आपको कुछ नहीं करना पड़ता।
"मेरी ज़िंदगी ठीक नहीं है क्योंकि मेरे पापा ऐसे हैं।"
"मेरा काम नहीं बन रहा क्योंकि बॉस समझता नहीं।"
"मैं आगे नहीं बढ़ पा रहा क्योंकि लोग मुझे मौक़ा नहीं देते।"
इनमें से हर एक बात आंशिक रूप से सच हो सकती है।
और हर एक आपको एक जगह पर बिठाए रखती है — क्योंकि अगर वजह बाहर है, तो कोशिश करने का कोई मतलब नहीं बनता।
तो कभी-कभी हम दूसरों को बदलने की कोशिश इसलिए करते रहते हैं क्योंकि उससे अपना सामना नहीं करना पड़ता।
ये मानना मुश्किल है। पर जो मान लेता है, उसकी आधी लड़ाई वहीं ख़त्म हो जाती है।
एक लाइन में
बदलने की कोशिश सात शक्लों में आती है — समझाना, साबित करना, बिन माँगी सलाह, चुपचाप उम्मीद, मूड संभालना, मन में बहस, और इंतज़ार।
आज ये करो
सातों शक्लें पढ़िए और अपनी दो सबसे बड़ी वाली चुनिए। हर एक के आगे एक नाम लिखिए — वो इंसान जिसके साथ आप ये सबसे ज़्यादा करते हैं।
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