नैरेटर: "पिछले भाग में आपने देखा... कालिंदी ने अन्याय के कारण आत्महत्या की और गाँव को श्राप दिया। सावित्री ने गाँव को उस श्राप से बचाया, कालिंदी को सम्मान दिलाया और उसका मंदिर बनवाया। दिल्ली लौटते वक्त सावित्री की मुलाकात बस में स्वयं कालिंदी से होती है। कालिंदी उसे चेतावनी देती है कि कोई उसकी शक्तियों को बांध रहा है और गाँव पर फिर से अंधेरा छाने वाला है। गाँव में खोपड़ियाँ मिलती हैं। एक पुजारी का कत्ल हो जाता है। अचानक मंदिर में कालिंदी की मूर्ति टूट जाती है और एक भयानक हँसी गूँजती है। सब डर जाते हैं कि क्या यह सच में कालिंदी है या कोई और? जंगल में वही अग्नि यज्ञ शुरू होता है।"
अब आगे
[SFX: तेज ठंडी हवा ... फिर मंदिर की भारी घंटी की 'टंग... टंग...' की आवाज]
रात का तीसरा पहर। गाँव के बीचों-बीच बना कालिंदी का मंदिर अब नया और भव्य है। नई मूर्ति स्थापित की जा चुकी है। मंदिर में जलते दीयों की लौ अचानक नीली पड़ने लगती है।
[SFX: पत्थर के चटकने की तीखी आवाज — “कड़क...!”]
कालिंदी की पत्थर की मूर्ति के गाल पर एक दरार पड़ती है। मूर्ति की आँख के कोने से गाढ़ा लाल खून की एक बूंद धीरे-धीरे नीचे गिरती है।
नैरेटर (गहरी और भारी आवाज): “क्या कभी ऐसा हो सकता है कि जिस रक्षक को गाँव ने भगवान बनाया... वही रक्षक एक दिन उनका काल बन जाए? क्या भक्ति और आतंक के बीच की लकीर मिटने वाली है?”
सावित्री दिल्ली से वापस गाँव लौट आई है। वह बस स्टैंड से पैदल ही मंदिर की ओर जा रही है। गाँव का माहौल उसे बदला-बदला सा लग रहा है। लोग उसे देखकर मुस्कुरा तो रहे हैं, पर उनकी आँखों में एक अनजाना डर है। सावित्री मंदिर के पास पहुँचती है। नई मूर्ति को देखकर वह सोचती है, "मूर्ति तो बहुत सुंदर बनी है, पर बस में कालिंदी ने मुझसे जो कहा था... वो चेहरा, वो आवाज मुझे सोने नहीं देती। 'वो आएगा और सब तबाह कर देगा'... आखिर कौन आने वाला है?"
सूरज की पहली किरण के साथ गाँव वाले मंदिर में जमा हैं। मंदिर में आरती की तैयारी हो रही है। सावित्री गाँव वालों से बातें कर रही है।
एक औरत: “जब से कालिंदी माँ का मंदिर बना है, गाँव में खुशहाली लौट आई है।”
दूसरी औरत: “हाँ, अब हमारी बहु-बेटियों को किसी का डर नहीं।”
सावित्री मुस्कुरा रही है। उसे लगता है कि उसकी मेहनत रंग लाई। लेकिन तभी बाहर से चीखने-चिल्लाने की आवाजें आती हैं।
[SFX: एक दिल दहला देने वाली औरत की चीख — “नहीं... मेरा बच्चा!”]
पूरा गाँव रघु के घर की ओर दौड़ता है। कमरे के भीतर का मंजर खौफनाक है। रघु की पत्नी जमीन पर बैठी छाती पीटकर रो रही है। उसकी गोद में उसका तीन महीने का बच्चा है—बिल्कुल सफेद पड़ा हुआ, बेजान।
सावित्री (घबराकर): "क्या हुआ रघु? कल शाम तो बच्चा बिल्कुल ठीक था।"
रघु (कांपती आवाज में): "पता नहीं सावित्री जी... रात को दूध पीकर सोया था, पर सुबह उठा ही नहीं। डॉक्टर कह रहे हैं कि इसके शरीर में खून की एक बूंद भी नहीं बची। जैसे किसी ने सारा खून सोख लिया हो।"
सावित्री बच्चे के पास झुकती है और उसकी गर्दन पर देखती है। वहाँ दो छोटे नीले निशान हैं। जैसे किसी ने उसे काटा हो।
[SFX: खिड़की का अपने आप धड़ाम से खुलना]
सावित्री की नजर फर्श पर पड़ती है। खिड़की से लेकर पालने तक... गीली मिट्टी के नन्हे और सुर्ख लाल पैरों के निशान बने हैं।
बूढ़ा ग्रामीण (काँपते हुए): “ये वही निशान हैं... वही खौफ! कालिंदी माँ नाराज हो गई हैं। हमने मंदिर बनाया, उनकी पूजा की, फिर भी वो हमारे बच्चों को मार रही हैं!”
गाँव में अफरा-तफरी मच जाती है। लोग कालिंदी के मंदिर की तरफ नफरत और डर भरी नजरों से देखने लगते हैं। सावित्री चिल्लाती है, "नहीं! कालिंदी ऐसा नहीं कर सकती! उसने कसम खाई थी कि वो रक्षक बनेगी।" लेकिन गाँव वाले अब सुनने को तैयार नहीं थे।
उसी वक्त सावित्री मंदिर के पुराने पुजारी को ढूंढने निकलती है, जो मंदिर की मूर्ति टूटने के बाद से गायब है। वह गाँव के बाहर पुराने खण्डहरों और श्मशान की ओर जाती है। उसे वहाँ कोई नहीं मिलता, पर जमीन पर उसे वही खोपड़ियाँ मिलती हैं जिनका जिक्र गाँव वालों ने किया था। सावित्री को महसूस होता है कि कोई उसका पीछा कर रहा है। वह पीछे मुड़ती है, पर वहाँ कोई नहीं होता। बस एक डरावनी सरसराहट सुनाई देती है। उसे अहसास होता है कि गाँव में पुजारी का गायब होना कोई इत्तेफाक नहीं है। कोई उसे सच्चाई बताने से रोक रहा है।
दूसरी ओर, ठाकुर धर्मवीर अपनी हवेली की बालकनी में खड़ा होकर गाँव का मंजर देख रहा है। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान है। वह अपने हाथ में पकड़ी एक पुरानी चांदी की डिब्बी को सहलाता है। उस डिब्बी के भीतर से किसी के सिसकने की आवाज आ रही है।
धर्मवीर (धीमी आवाज में): "रो मत... अभी तो खेल शुरू हुआ है। तेरी माँ को गाँव वालों ने देवी बनाया है न? अब वही गाँव वाले उसे पत्थर-पत्थर करके तोड़ देंगे।”
सावित्री अपनी खिड़की से दूर जंगल की तरफ देखती है, जहाँ एक पहाड़ी पर आग की लपटें उठ रही हैं। वहाँ कोई मंत्र पढ़ रहा है... एक ऐसी आवाज जो बरसों पुरानी है।
सावित्री (स्वयं से): "यह कालिंदी नहीं है... कोई और है जो कालिंदी के नाम पर मौत का खेल खेल रहा है।"
तभी मंदिर की तरफ से एक जोर का धमाका होता है।
[SFX: एक बहुत बड़ा धमाका — 'धूम!']
मंदिर का विशाल घंटा बिना किसी के छुए बजने लगता है—'टन... टन... टन!'
गाँव वाले मंदिर की तरफ भागते हैं और देखते हैं कि कालिंदी की मूर्ति की आँखों से काला गाढ़ा तरल (आँसू के रूप में) बह रहा है। आसमान में बिजली कड़कती है। सावित्री को मंदिर की छत पर एक साया दिखाई देता है।
नैरेटर: “क्या यह कालिंदी का दुःख है... या गाँव के विनाश का संकेत?”
सावित्री चिल्लाती है: "कौन हो तुम? क्यों कर रहे हो यह सब?"
तभी एक भयानक हँसी पूरे गाँव में गूँजती है और वह साया गायब हो जाता है।
मंदिर के घंटे की गूँज धीरे-धीरे कम होती है, लेकिन कालिंदी की मूर्ति की आँखों से वह काला तरल (आँसू) अभी भी बह रहा है। गाँव के लोग मशालें और कुल्हाड़ियाँ लेकर मंदिर के बाहर जमा हैं।
गाँव वाला 1: "हटाओ इस मूर्ति को! हमें नहीं चाहिए ऐसी देवी जो हमारे ही बच्चों का खून पी जाए!"
गाँव वाला 2: "सावित्री ने हमें धोखा दिया! उसने एक डायन को मंदिर में बिठा दिया!"
सावित्री भीड़ के सामने खड़ी होती है, उसकी आँखों में आंसू हैं पर आवाज में दृढ़ता है।
सावित्री: "रुक जाइए! आप लोग जो देख रहे हैं वो सच नहीं है। कालिंदी ने कसम खाई थी, वो रक्षक है। ये आँसू गवाही दे रहे हैं कि वो दुखी है, वो हमें मार नहीं रही!"
भीड़ नहीं मानती। तभी एक पत्थर मंदिर की मूर्ति की तरफ फेंका जाता है। पत्थर मूर्ति को लगने ही वाला होता है कि अचानक एक तेज बर्फीली हवा चलती है और वह पत्थर हवा में ही रुककर चकनाचूर हो जाता है। सब सन्न रह जाते हैं।
गाँव के दूसरे छोर पर, लक्ष्मी अपने कमरे में सो रही है। वह सात महीने की गर्भवती है। खिड़की से ठंडी हवा अंदर आ रही है।
[SFX: फर्श पर 'छपाक-छपाक' चलने की आवाज] लक्ष्मी की नींद खुलती है। वह दीया जलाती है और देखती है कि दरवाजे से उसके बिस्तर की ओर गीली मिट्टी के लाल पैरों के निशान बढ़ रहे हैं। वह चीखना चाहती है, पर उसकी आवाज गले में ही फंस जाती है। दीवार पर एक परछाई नाच रही है। वह परछाई कालिंदी जैसी दिख रही है। लक्ष्मी को लगता है कि उसका अंत आ गया है। वह अपने पेट को पकड़कर कोने में दुबक जाती है।
लक्ष्मी: "नहीं... माँ कालिंदी... मेरे बच्चे को छोड़ दो... मुझे मार दो पर इसे छोड़ दो!"
तभी एक खौफनाक घटना घटती है। लक्ष्मी की खिड़की के बाहर एक काला धुएं जैसा साया उभरता है। वह साया सीधे लक्ष्मी के पेट की ओर झपटता है। तभी, दीवार पर नाच रही कालिंदी की परछाई अचानक दीवार से बाहर निकलती है। वह एक सुरक्षा कवच जैसा बना लेती है। कालिंदी की रूह उस अदृश्य साये से लड़ने लगती है। कमरे में बर्तन गिरने लगते हैं, चीजें हवा में उड़ने लगती हैं।
[SFX: एक चीख जो इंसानी नहीं है] कालिंदी की रूह उस हमलावर साये को खिड़की से बाहर धकेल देती है। जैसे ही वह साया गायब होता है, कालिंदी की परछाई लक्ष्मी के माथे पर हाथ फेरती है और गायब हो जाती है। लक्ष्मी बेसुध होकर गिर पड़ती है।
धर्मवीर अपनी हवेली में अकेला है। वह अपनी चांदी की डिब्बी को मेज पर रखता है। डिब्बी के अंदर से एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज आ रही है।
धर्मवीर (अकेले में मुस्कुराते हुए): "रो मत कालिंदी के बच्चे... अभी तो तुझे और भी बच्चों का खेल खत्म करना है। जितना तू गाँव में तबाही मचाएगा, उतनी कालिंदी बदनाम होगी। गाँव वाले खुद उस मंदिर को श्मशान बनाएंगे, और मेरा पाप हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।"
सुबह सावित्री लक्ष्मी के घर पहुँचती है। लक्ष्मी होश में है पर बहुत डरी हुई है। गाँव वाले भी वहां जमा हैं।
लक्ष्मी: "सावित्री जी, कालिंदी आई थी! उसके पैरों के निशान यहाँ थे। उसने... उसने मुझे डराया।"
गाँव वाले: "देखा! अब लक्ष्मी के बच्चे की बारी है। सावित्री, अब भी तुम उसे रक्षक कहोगी?"
सावित्री कमरे का मुआयना करती है। उसे फर्श पर लाल पैरों के निशान मिलते हैं। लेकिन उसकी नजर खिड़की के पास गिरी एक तांत्रिक भस्म पर पड़ती है। सावित्री समझ जाती है कि कालिंदी उसे मारने नहीं, बल्कि किसी 'दूसरी शक्ति' से बचाने आई थी। पर गाँव वाले नफरत में अंधे हो चुके हैं।
सावित्री लक्ष्मी के घर से बाहर निकलती है। गाँव वाले उसे ताने दे रहे हैं। तभी सावित्री की नजर गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठे एक साये पर पड़ती है। वह पुराना पुजारी है, जो महीनों से गायब था। उसके कपड़े फटे हुए हैं और चेहरा धूल से भरा है।
सावित्री उसके पास दौड़ती है।
सावित्री: "पंडित जी! आप कहाँ थे? देखिए गाँव में क्या हो रहा है! लोग कालिंदी को कातिल मान रहे हैं।"
पुजारी की आँखें लाल हैं, जैसे वह हफ्तों से सोया न हो। वह सावित्री का हाथ पकड़ता है, उसके हाथ बर्फ जैसे ठंडे हैं।
पुजारी: "सावित्री... बहुत देर हो गई। संतुलन टूट चुका है। जो तुम देख रही हो, वो कालिंदी नहीं है... वो कालिंदी का बच्चा है।"
सावित्री चौंक जाती है।
पुजारी: "धर्मवीर ने उस बच्चे की रूह को अपनी तांत्रिक माया में कैद कर लिया है। वो उसी मासूम रूह से बच्चों की जान ले रहा है ताकि कालिंदी बदनाम हो जाए।"
ठाकुर धर्मवीर वहीं से गुजर रहा था, तभी उसकी नज़र पुजारी और सावित्री पर पड़ती है।
धर्मवीर: "पुजारी वापस आ गया? कोई बात नहीं। अब तक तो गाँव वालों के मन में जहर घुल चुका है। अब चाहे पुजारी सच बोले या खुद कालिंदी... ये गाँव वाले किसी की नहीं सुनेंगे।"
सावित्री पुजारी को लेकर मंदिर पहुँचती है ताकि सच सबको बता सके। मंदिर में जमा गाँव वालों की भीड़ है, जिनके हाथों में जलती हुई मशालें हैं। नफरत की आग उनकी आँखों में साफ दिख रही है।
सावित्री (चिल्लाकर): "रुक जाइए! अनर्थ मत कीजिए! पुजारी जी मिल गए हैं, इनके पास सच है! कालिंदी हमें मार नहीं रही, उसे मजबूर किया जा रहा है!"
लेकिन भीड़ पर सावित्री की बात का कोई असर नहीं होता। ठाकुर धर्मवीर भीड़ के पीछे खड़ा एक कुटिल मुस्कान के साथ तमाशा देख रहा है।
गाँव वाला 1: "बहुत हुआ सावित्री! पुजारी पागल हो गया है और तुम उस डायन की तरफदार! आज ये मंदिर नहीं बचेगा!"
जैसे ही एक ग्रामीण अपनी जलती हुई मशाल मंदिर के मुख्य द्वार की ओर फेंकता है, पूरा वातावरण अचानक बदल जाता है।
[SFX: बादलों के गरजने की भयानक आवाज और तेज हवा का बवंडर]
वह मशाल हवा में ही रुक जाती है, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे पकड़ लिया हो। अगले ही पल, मशाल की आग का रंग पीला से गहरा नीला हो जाता है। बवंडर इतना तेज है कि लोग अपनी जगह से हिल नहीं पा रहे।
तभी, मंदिर के भीतर से एक ऐसी चीख गूँजती है जो इंसानी नहीं है। यह किसी बच्चे के रोने और एक औरत के विलाप का मिश्रण है।
पुजारी (कांपते हुए): "देखो! वो जाग रही है... लेकिन ये वो कालिंदी नहीं जिसे तुम जानते थे। ये उसकी ममता का रौद्र रूप है!"
सबकी नजरें मंदिर के शिखर पर जाती हैं। वहाँ सफेद धुएं के बीच कालिंदी की रूह प्रकट होती है। लेकिन इस बार उसका स्वरूप भयावह है। उसकी आँखें अंगारे की तरह लाल हैं और उसके बाल हवा में नागिनों की तरह लहरा रहे हैं। उसके ठीक बगल में एक छोटा, धुंधला साया खड़ा है—उसका बच्चा। उस बच्चे के गले में एक काली तांत्रिक जंजीर बंधी है, जिसका दूसरा सिरा हवा में कहीं गायब हो रहा है।
सावित्री (हैरानी से): "वो जंजीर! पुजारी जी, वो बच्चा जंजीर से बंधा है! कोई उसे खींच रहा है!"
कालिंदी की रूह अपने बच्चे को बचाने के लिए हाथ बढ़ाती है, लेकिन जैसे ही वह उसे छूने की कोशिश करती है, बच्चे की रूह चीख पड़ती है और कालिंदी को एक बिजली का झटका लगता है। यह देखकर कालिंदी का दुःख प्रलयकारी क्रोध में बदल जाता है।
[SFX: मंदिर के पत्थरों के चटकने की आवाज - "कड़क... कड़क..."]
अचानक, मंदिर की जमीन से लाल रंग का पानी (खून जैसा) उबलकर बाहर आने लगता है। गाँव वाले डर के मारे अपनी मशालें छोड़कर पीछे भागने लगते हैं। कालिंदी की मूर्ति के भीतर से फिर वही भयानक हँसी गूँजती है, जो अब पूरे गाँव की गलियों में प्रतिध्वनित हो रही है।
धर्मवीर (मन ही मन): "यही तो मैं चाहता था। अब कालिंदी और गाँव वालों के बीच सिर्फ मौत का रिश्ता बचेगा।"
कालिंदी की रूह नीचे खड़े गाँव वालों की ओर देखती है और अपना हाथ हवा में लहराती है। देखते ही देखते, गाँव वालों के हाथों में मौजूद मशालें अपने आप जल उठती हैं और उनके घरों की ओर उड़ने लगती हैं। गाँव में हाहाकार मच जाता है।
सावित्री: "नहीं! कालिंदी, रुको! ये गाँव वाले नासमझ हैं!"
कालिंदी सावित्री की ओर देखती है। उसकी आँखों में एक पल के लिए दर्द झलकता है, जैसे वह कहना चाह रही हो— "मेरे बच्चे को बचाओ", लेकिन अगले ही पल वह काली जंजीर बच्चे को झटके से खींच लेती है और दोनों हवा में विलीन हो जाते हैं।
जाते-जाते कालिंदी की आवाज पूरे गाँव में गूँजती है: "न्याय नहीं... तो शांति नहीं!"
[SFX: मंदिर का विशाल घंटा एक आखिरी बार जोर से बजता है और बीच से दो टुकड़ों में फट जाता है]
आसमान से खून जैसी बारिश होने लगती है।
नैरेटर: “प्रतिशोध की चिंगारी अब ज्वाला बन चुकी है। धर्मवीर की जंजीरों में फंसी है कालिंदी की ममता। क्या सावित्री उस जंजीर के दूसरे सिरे तक पहुँच पाएगी, या पूरा गाँव कालिंदी के इस तांडव में भस्म हो जाएगा?”
[एपिसोड 1 समाप्त]
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