By Sanjay Kamble
काफी रात हो गई थी आसमान बरसाती बादलों से घीरा हुआ था । हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी शेखर हर रोज की तरह अपनी टॅक्सी लेकर सवारी छोड़ने के लिए जा रहा था। शहर से कुछ दूर एक बंगले के पास उसकी टॅक्सी रूक गई। सवारी उतारकर वो दुबारा अपनी टॅक्सी लेकर शहर की ओर चलने लगा। तकरीबन १ :३० बजे होंगे। शहर काफी दुर था, तभी नदी के उपर बने पुल पर एक लड़की अपने भारी-भरकम सुटके के साथ कुछ कर रही थी। उठा रही थी या घसीटकर ले जाने की कोशिश कर रही थी पता नहीं। उसे देखकर शेखर ने टॅक्सी रोकते हुए कहा। " हैलो मॅडम, कहा जाना है आपको।" शेखर की आवाज सुनकर वो लड़की थोड़ी हड़बड़ई । " जी...गॅलेक्सी अपार्टमेंट चलेंगे " उस लड़की ने पता बताय। वो अपना ट्रॅव्हलबॅग उठा कर टॅक्सी में रखने की कोशिश कर रही थी पर वो काफी भारी होने के कारण उसे परेशानी हो रही थी। " रूकीये मॅडम... मैं रखता हूं। " इतना कहकर शेखर टॅक्सी से उतरा और बॅग उठाने लगा , बॅग तो काफी भारी था । बॅग टॅक्सी की पिछली डिक्की में रखकर शेखर ने मजाक में कहा। " अरे मॅडम, सारा सामान एक ही बॅग में रखने के बजाय एक और बॅग में रख लिया होता तो आपको परेशानी नहीं होती, और मुझे भी।" और हंसकर वो अपनी सीट पर बैठ गया। वो लड़की भी पिछली सीट पर बैठ गई। शेखर ने टॅक्सी शुरू कर चलाने लगा और उनका सफर शुरू हुआ। " मॅडम इतनी रात के कहासे आ रही हैं आप। मतलब कहीं घूमने गयी थी क्या ?" " घुमने गई नहीं थी, बल्कि आई हूं। नौकरी की तलाश में..।" " मतलब आप यहां की नहीं है ?" " जी नहीं," " कोई बात नहीं। वैसे इस शहर में आपका कोई रिश्तेदार या दोस्त ?" " हां एक दोस्त है, मतलब था, नहीं है।" " था....? है......? मतलब आप कहना क्या चाहती हो। क्या आपका उसके साथ झगड़ा हो गया है । या दोस्ती थी पर अब आपको उसके साथ दोस्ती नहीं रखनी। मतलब धोखा दिया क्या उसने ? " शेखर की बात सुनकर वो लड़की हल्के से मुस्कुराते हुए बोली। " कुछ ऐसा ही समझो, पर मुझे धोखा देने वाले को मै नहीं छोड़ती...." उस लड़की की बातें सुनकर शेखर ने पुछा, " काफी गुस्से वाली लगती हो आप। वैसे धोखा देने वाले के साथ करती क्या हैं..?, " " मैं जब छोटी थी करीब आठ साल की तब बाकी बच्चों की तरह मुझे भी अंधेरे से काफी डर लगता था। हम सब बच्चे मिलकर आस-पड़ोस के पेड़ की इमलीयां, आम तोड़ने जाते थे, काफी मजा आता था। ऐसे ही एक दिन मेरे पड़ोस वाले लड़के ने धोखे से मुझे एक खाली पड़े बंगले के अंधेरे कमरे में बंद कर दिया था। मैं काफी डर गई थी, मैं खुब रोई, चिखती रही पर वो मुझे बंद करके जा चुका था। मैं किसी तरह वहां से निकली, पर उसे कुछ नही कहा,।" उसकी बात सुनकर शेखर हंसकर बोला। " लड़का थोडा शरारती था क्या ? बचपन होता ही ऐसा है। मजाक मस्ती भरा। क्या आज भी उसके साथ आपकी दोस्ती है ?" " नहीं...." " इतनी भी क्या नाराजगी। बचपना समझ कर भुल जायीये और दुबारा उससे दोस्ती कर लिजिए।" " अब उसकी जरूरत नहीं। क्यों की एक दिन स्कूल बस से घर आते वक्त मैंने उसे दरवाजे से धक्का देकर नीचे गिरा दिया।" उसकी बात सुनकर शेखर थोड़ा नाराज़ हो गया। " इतना गुस्सा ठीक नहीं, अगर वो लड़का किसी गाड़ी के नीचे आता तो...?" शेखर की बात सुनकर वो लड़की गुस्सैल आवाज में बोली। " सही कहा, उसी में वो लड़का मारा गया।" इतना कहकर वो ठहाका मारकर हंसने लगी। पर उसकी अजीब बात सुनकर शेखर का दिल घबरा गया था और गुस्सा भी आने लगा। अब एक अजीब गंभीर सा माहौल बन गया था। शेखर बीना कुछ बोले चुपचाप गाड़ी चला रहा था तो वो लड़की सामने वाले आईने से लगातार शेखर को घुरे जा रही थी। " तुम्हें डर तो नहीं लग रहा है ना...?" सन्नाटे को चीरती उस लड़की की आवाज सुनकर शेखर थोड़ा हड़बड़ा गया। " ड...डर.. ? किस बात का डर..? भला म... मैं क्यों डरने लगा...?" " सही कहा। तुम्हें डर क्यों लगेगा. वो भी एक लड़की से...? एक कमजोर, अकेली लड़की तुम्हारा क्या उखाड़ सकती है। " उस लड़की की वो बात सुनकर शेखर चुप रहा। अब उस लड़की की वो बातें शेखर का सरदर्द कर रही थी। शेखर की खामोशी देख दुबारा उसने कहा। " सही कहा ना मैंने। तुम यहीं सोच रहे हो ना...? रात के दो बजने को है, काली रात, सुनसान सड़क आसपास ना कोई मदत के लिए आने वाला। और ऐसे में एक अकेली कमजोर लड़की तुम्हारा क्या बिगाड़ेगी.?" शेखर खामोश रहा। वो बात बढ़ाना नहीं चाहता था। इसकी खामोशी देखकर उस लड़की ने आईने में शेखर की तरफ देखते हुए कहा। " उसे भी यही लगा था... " ना चाहते हुए भी शेखर ने उसे पूछा। " उसे.... किसे..?" " वहीं मेरा दोस्त, जिसके भरोसे मै इतनी दुर आई नौकरी के लिए आई थी.. बेचारे ने सोचा था एक अकेली कमजोर लड़की है, वो भी अनजान शहर, ना कोई पहचान वाला ना कोई पुछने वाला, मेरा क्या बिगाड लेगी..। उसके साथ कुछ भी कर लेता हूं। लेकिन.... " इतना कहकर वो धीरे से मुस्कुराई और चुप होकर टॅक्सी की आधी खुली खिड़की से बाहर रात के अंधेरे में डुबे उस सुनसान इलाके को देखने लगी। टॅक्सी के अंदर लगे शिशे से उस लड़की को देखते हुए शेखर सोचने लगा। ' मुझे तो ये लड़की पागल लगती है , अपने दोस्त का क्या किया होगा इसने। मार डाला होगा। इतनी भारी सुटकेस मैं क्या लेकर जा रही है। कहीं अपने दोस्त को मारकर उसकी लाश को तो नहीं ले जा रही। अब समझ में आ गया, ये नदी के पुल पर ये भारी-भरकम बॅग नीचे फेंकने के लिए खड़ी थी। गलती से मेरी नज़र पड़ी और उसका प्लान फेल हो गया। दिल कर रहा है इसे सिधा पुलिस स्टेशन लेकर जाऊं। पर ये इतनी शातिर लग रही है की उस दोस्त के खुन के इल्ज़ाम में कहीं मुझे ना फंसा दे।' शेखर का परेशान चेहरा देखकर वो बोली। " कुछ परेशान लग रहें हों पर तुम्हें डरने की जरूरत नहीं, " इतना कहकर वो उस आईने से शेखर को ताड़ने लगी। " चलो मेरी अपार्टमेंट आ गयी, यहां से आगे वाले गेट से अंदर लो।" उस लड़की की आवाज सुनकर शेखर होश में आ गया। सामने एक अपार्टमेंट थी, थोड़ी पुरानी होने के बावजूद कुछ कुछ कमरों में लोग रह रहे थे। गेट पर कोई वॉचमैन नहीं था और गेट भी आधा टुटा हुआ था। शेखर ने टॅक्सी रोकी। वो लड़की नीचे उतरी और पीछे डीक्की खोलकर अपना वो भारी-भरकम बॅग निकालने लगी पर वो उसके बस की बात नहीं थी। न चाहते हुए भी शेखर ने उसके बॅग डिक्की से नीकाल कर जमीन पर पटक दिया । " अरे क्या कर रहे हो, जरा धीरे रखो।" " ऐसे बोल रही हो जैसे बॅग के अंदर सामान नहीं बल्कि कोई जींदा इन्सान हो।" इतना कहकर शेखर अजीब से मुस्कुराया। शेखर की तरफ थोडा नाराज होकर देखा और बोली " मेरे मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई है, जरा आपका मोबाइल देंगे।" उस लड़की ने बड़ी सरलता से मोबाइल मांगा अब ना चाहते हुए शेखर ने उसे अपना मोबाइल देकर टॅक्सी में बैठ गया। कुछ कदम दूर जाकर पता नहीं वो किसके साथ बात कर रही थी। बात खत्म हो गई और वो चलते चलते शेखर के पास आ गई। " आपका बहुत बहुत शुक्रिया, एक ओर मदत करेंगे।" " जी कहीं ये" " मेरे रूममेट फोन उठा नहीं रहे और इतना भारी बॅग मैं तिसरी मंजिल तक नहीं ले जा सकती। " कोई और चारा शेखर के पास नहीं था। वो भारी भरकम बॅग लेकर शेखर एक एक मंजिला तय करते तिसरी मंजिल तक पहुंचा। वो लड़की एक कमरे के पास रूक गई। शेखर ने भी बॅग दरवाजे के पास रखकर कुछ दुर खड़ा हो गया। उस लड़कीने बेल बजाई। के तभी शेखर ने देखा की सिढीयां चढ़ते हुए एक इंस्पेक्टर और दो कॉन्स्टेबल उसकी तरफ आ रहे हैं। शेखर अब बुरी तरह से उस लड़की के जाल में फंस चुका था। पुलिस को आता देख दरवाजे के पास खड़ी वो लड़की मन ही मन मुस्कुरा रही थी। पुलिस वाले ने शेखर के पास आकर कहा। "चलो दिवार के पास खड़े हो जाओ।" शेखर इतना डर गया था की उसके हाथ पैर जम गए थे। सिर्फ एक पल में उसका बदन पसीना पसीना हो गया था। एक कॉन्स्टेबल ने बॅग की चेन खिंचकर खुला कर दिया अंदर का नजारा देख इन्स्पेक्टर ने अपने सीर से टोपी निकाल कर हाथ में ली के तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई। एक पच्चीस साल का लड़का दरवाजे के अंदर खड़ा था। उसे देखते ही पुलिस ने कहां। " अब लाश भी मिल गयी, अब थाने चलकर बताओ की अपनी दोस्त को कैसे और क्यों मारा।" इन्स्पेक्टर की बात सुनकर शेखर ने डरी सहमी नज़रों से उस खुली बॅग को देखा तो उसमें उसी लड़की की लाश थी जीसे वो यहां तक लेकर आया था। उसने आसपास देखा तो वो लड़की कहीं नजर नहीं आ रही थी। तभी इन्स्पेक्टर ने शेखर से कहा। "पुलिस की मदद करने के लिए शुक्रिया, तुम्हारी वजह से आज इस कातिल को पकड़ पाये। इसपर चार लड़कियों की हत्या का शक था पर उन लड़कियों की लाशे इसने गायब की थी। तुम्हारी वजह से पहली बार लाश पुलिस के हाथ लग गई। तुम्हारा फोन आते ही हम झट से निकले। और हां तुम्हें कोई परेशानी हमारी तरफ से नहीं होगी।" तब शेखर को याद आया उस लड़की ने उसके मोबाइल से अपने रूममेट को नहीं बल्कि पुलिस को को फोन किया था। वो भी शेखर की ही आवाज में। शेखर की जान में जान आ गई। पुलिस उस मुजरिम को गाड़ी में डालकर ले गई शेखर भी अपनी टॅक्सी में बैठ कर घर के लिए निकला। अब वो दुबारा उसी पुल से गुजरने लगा । डर के मारे बदन कांप रहा था। के तभी सामने वाले आईने में वो लड़की टॅक्सी की पिछली सीट पर बैठी नजर आई। और एक आवाज गुंज उठी। "मदद के लिए शुक्रिया, वैसे किराया नहीं लोगे।" और एक अजीब सी मुस्कराहट रात के सन्नाटे में गुंजने लगी। समाप्त।
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