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चंद्रकांता

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Funtel
21 Mar 2026

क्रूरसिंह ने जाहिर में अपने बाप के मरने का भारी मातम (गम) किया और बारह रोज के वास्ते अलग बिस्तर जमाया। दिन भर तो अपने बाप को रोता पर रात को नाजिम के साथ बैठ कर चंदरकांता से मिलने तथा तेजसिंह और वीरेंद्रसिंह को गिरफ्तार करने की फिक्र करता इन्हीं दिनों वीरेंद्रसिंह ने भी शिकार के बहाने विजयगढ़ की सरहद पर खेमा डाल दिया था, जिसकी खबर नाजिम ने क्रूरसिंह को पहुँचाई और कहा - 'ीरेंद्रसिंह जरूर चंद्रकांता की फिक्र में आया है, अफसोस | इस समय अहमद न हुआ नहीं तो बड़ा काम निकलता | खैर, देखा जाएगा ।' वह कह क्रूरसिंह से विदा हो बालादवी (टोह लेने के लिए गश्त करना) के वास्ते चला गया। तेजसिंह वीरेंद्रसिंह से रुखसत हो विजयगढ़ पहुँचे और मंत्री के मरने तथा शहर भर में गम छाने का हाल ले कर वीरेंद्रसिंह के पास लौट आए। यह भी खबर लाए कि दो दिन बाद सूतक निकल जाने पर महाराज जयसिंह क्रूर को अपना दीवान बनाएँगे। 2208 - दिखो, क्रूर ने अपने बाप को मार डाला। अगर राजा को भी मार डाले तो ऐसे आदमी का क्या काना ।! तेजसिंह - सच है, वह नालायक जहाँ तक भी होगा राजा पर भी बहुत जल्द हाथ फेरेगा, अस्तु अब मैं दो दिन चंद्रकांता के महल में न जा कर दरबार ही का हाल-चाल लूगा। हाँ, इस बीच में अगर मौका मिल जाए तो देखा जाएगा।! वीरेंद्रसिंह - 'सो सब कुछ नहीं, चाहे जो हो, आज मैं चंद्रकांता से जरूर मुलाकात करूँगा ।! तेजसिंह - “आप जल्दी न करें, जल्दी ही सब कामों को बिगाड़ती है।' वीरेंद्र - 'जो भी हो, मैं तो जरूर जाऊँगा।' तेजसिंह ने बहुत समझाया मगर चंद्रकांता की जुदाई में उनको भला-बुरा क्या सूझता था, एक न मानी और चलने के लिए तैयार हो ही गए। आखिर तेजसिंह ने कहा - 'खैर, नहीं मानते तो चलिए, जब आपकी ऐसी मर्जी है तो हम क्या करें। जो कुछ होगा देखा जाएगा।! शाम के वक्‍त ये दोनों टहलने के लिए खेमे के बाहर निकले और अपने प्यादों से कह गए कि अगर हम लोगों के आने में देर हो तो घबराना मत। टहलते हुए दोनों विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए। कुछ रात गई होगी, जब चंद्रकांता के उसी नजरबाग के पास पहुँचे जिसका हाल पहले लिख चुके हैं। रात अँधेरी थी इसलिए इन दोनों को बाग में जाने के लिए कोई आश्चर्य न करना पड़ा, पहरे वालों को बचा कर कमंद फेंका और उसके जरिए बाग के अंदर एक घने पेड़ के नीचे खड़े हो इधर-उधर निगाह दौड़ा कर देखने लगे। बाग के बीचो-बीच संगमरमर के एक साफ चिकने चबूतरे पर मोमी शमादान जल रहा था चंद्रकांता, चपला और चंपा बैठी बातें कर रही थीं। चपला बातें भी करती जाती थी और इधर-उधर तेजी के साथ निगाह भी दौड़ा रही थी। चंद्रकांता को देखते ही वीरेंद्रसिंह का अजब हाल हो गया, बदन में कँपकंपी होने लगी, यहाँ तक कि बेहोश हो कर गिर पड़े। मगर वीरेंद्रसिंह की यह हालत देख तेजसिंह पर कोई प्रभाव न हुआ, झट अपने ऐयारी बटुए से लखलखा निकाल सूघा दिया और होश में ला कर कहा - देखिए, दूसरे के मकान में आपको इस तरह बेसुध न होना चाहिए। अब आप अपने को सँभालिए और इसी जगह ठहरिए, मैं जा कर बात कर आऊँ तब आपको ले चलूँ।' यह कह कर उन्हें उसी पेड़ के नीचे छोड़, उस जगह गए जहाँ चंद्रकांता, चपला और चंपा बैठी थीं। तेजसिंह को देखते ही चंद्रकांता बोली - क्‍यों जी इतने दिन कहाँ रहे? क्या इसी का नाम मुरव्वत है? अबकी आए तो अकेले ही आए। वाह, ऐसा ही था तो हाथ में चूड़ी पहन लेते, शर्मिंदा होकर की डींग क्‍यों मारते हैं। जब उनकी मुहब्बत का यही हाल है तो मैं जी कर क्‍या करूँगी?” कह कर चंद्रकांता रोने लगी, यहाँ तक कि हिचकी बाँध गई। तेजसिंह उसकी हालत देख बहुत घबराए और बोले - “बस, इसी को नादानी कहते हैं। अच्छी तरह हाल भी न पूछा और लगी रोने, ऐसा ही है तो उनको लिए आता हूँ।' यह कह कर तेजसिंह वहाँ गए जहाँ वीरेंद्रसिंह को छोड़ा था और उनको अपने साथ ले चंद्रकांता के पास लौटे। चंद्रकांता वीरेंद्रसिंह के मिलने से बड़ी खुश हुई, दोनों मिल कर खूब रोए, यहाँ तक कि बेहोश हो गए मगर थोड़ी देर बाद होश में आ गए और आपस में शिकायत मिली मुहब्बत की बात करने लगे। अब जमाने का उलट-फेर देखिए । घूमता-फिरता टोह लगाता नाजिम भी उसी जगह आ पहुँचा और दूर से इन सभी की खुशी भरी मजलिस देख कर जल मरा। तुरंत ही लौट कर क्रूरसिंह के पास पहुँचा। क्रूरसिंह ने नाजिम को घबराया हुआ देखा और पूछा - क्यों, क्या बात है जो तुम इतना घबराए हुए हो?! नाजिम - है क्‍या, जो मैं सोचता था वही हुआ। यही वक्‍त चालाकी का है, अगर अब भी कुछ न बन पड़ा तो बस तुम्हारी किस्मत फूट गई, ऐसा ही समझना पड़ेगा। क्रूरसिंह - तुम्हारी बातें तो कुछ समझ में नहीं आती, खुलासा कहो, क्या बात है?! 82 खुलासा बस यही है कि वीरेंद्रसिंह चंद्रकांता के पास पहुँच गया और इस समय बाग में हँसी के कहकहे उड़ रहे हैं। यह सुनते ही क्रूरसिंह की आँखों के आगे अँधेरा छा गया, दुनिया उदास मालूम होने लगी, कहाँ तो बाप के जाहिरी गम में वह सर मुड़ाए बरसाती मेढक बना बैठा था, तेरह रोज कहीं बाहर जाना हो ही नहीं सकता था, मगर इस खबर ने उसको अपने आपे में न रहने दिया, फौरन उठ खड़ा हुआ और उसी तरह नंग-धड़ंग औंधी हॉडी-सा सिर लिए महाराज जयसिंह के पास पहुँचा । जयसिंह क्रूरसिंह को इस तरह आया देख हैरान हो बोले - 'क्रूरसिंह, सूतक और बाप का गम छोड़ कर तुम्हारा इस तरह आना मुझको हैरानी में डाल रहा है।' क्रूरसिंह ने कहा - महाराज, हमारे बाप तो आप हैं, उन्होंने तो पैदा किया, परवरिश आप की बदौलत होती है। जब आपकी इज्जत में बट्टा लगा तो मेरी जिंदगी किस काम की है और मैं किस लायक गिना जाऊँगा?! जयसिंह - (गुस्से में आ कर) 'क्रूरसिंह। ऐसा कौन है जो हमारी इज्जत बिगाड़े?! क्रूरसिंह - एक अदना आदमी । जयसिंह - (दाँत पीस कर) जल्दी बताओ, वह कौन है, जिसके सिर पर मौत सवार हुई है?' क्रूरसिंह - “वीरेंद्रसिंह।' जयसिंह - उसकी क्‍या मजाल जो मेरा मुकाबला करे, इज्जत बिगाड़ना तो दूर की बात है। तुम्हारी बात कुछ समझ में नहीं आती, साफ-साफ जल्द बताओ, क्या बात है? वीरेंद्रसिंह कहाँ हैं?' क्रूरसिंह- “आपके चोर महल के बाग में।' यह सुनते ही महाराज का बदन मारे गुस्से के काँपने लगा। तड़प कर हुक्म दिया - “अभी जा कर बाग को घेर लो, मै कोट की राह वहाँ जाता हूँ।' बयान - 8 वीरेंद्रसिंह चंद्रकांता से मीठी-मीठी बातें कर रहे हैं, चपला से तेजसिंह उलझ रहे हैं, चंपा बेचारी इन लोगों का मुँह ताक रही है। अचानक एक काला कलूटा आदमी सिर से पैर तक आबनूस का कुंदा, लाल-लाल आँखें, लंगोटा कसे, उछलता-कूदता इस सबके बीच में आ खड़ा हुआ । पहले तो ऊपर से नीचे के नीचे दाँत खोल तेजसिंह की तरफ दिखाया, तब बोला - खबरी भई राजा को तुमरी सुनो गुरु जी मेरे ।' इसके बाद उछलता-कूदता चला गया। जाती दफा चंपा की टाँग पकड़ थोड़ी दूर घसीटता ले गया, आखिर छोड़ दिया। यह देख सब हैरान हो गए और डरे कि यह पिशाच कहाँ से आ गया, चंपा बेचारी तो चिल्ला उठी मगर तेजसिंह फौरन उठ खड़े हुए और वीरेंद्रसिंह का हाथ पकड़ के बोले - 'चलो, जल्दी उठो, अब बैठने का मौका नहीं।' चंद्रकांता की तरफ देख कर बोले - हम लोगों के जल्दी चले जाने का रंज तुम मत करना और जब तक महाराज यहाँ न आएँ इसी तरह सब-की-सब बैठी रहना ।' चंद्रकांता - 'इतनी जल्दी करने का सबब क्या है और यह कौन था जिसकी बात सुन कर भागना पड़ा?! तेजसिंह - (जल्दी से) 'अब बात करने का मौका नहीं रहा ।' यह कह कर वीरेंद्रसिंह को जबरदस्ती उठाया और साथ ले कमंद के जरिए बाग के बाहर हो गए। चंद्रकांता को वीरेंद्रसिंह का इस तरह चला जाना बहुत बुरा मालूम हुआ। आँखों में आँसू पर चपला से बोली - यह क्या तमाशा हो गया, कुछ समझ में नहीं आता। उस पिशाच को देख कर मैं कैसी डरी, मेरे कलेजे पर हाथ रख कर देखो, अभी तक धड़धड़ा रहा है। तुमने क्या ख्याल किया?! चपला ने कहा - कुछ ठीक समझ में नहीं आता। हाँ, इतना जरूर है कि इस समय वीरेंद्रसिंह के यहाँ आने की खबर महाराज को हो गई है, वे जरूर आते होंगे।' चंपा बोली - “न मालूम मुए को मुझसे क्या दुश्मनी थी?! चंपा की बात पर चपला को हँसी आ गई मगर हैरान थी कि यह क्‍या खेल हो गया? थोड़ी देर तक इसी तरह की ताज्जुब भरी बातें होती रहीं, इतने में ही बाग के चारों तरफ शोरगुल की आवाजें आने लगीं। चपला ने कहा - (रंग बुरे नजर आने लगे, मालूम होता है बाग को सिपाहियों ने घेर लिया | बात पूरी भी न होने पाई थी कि सामने महाराज आते हुए दिखाई पड़े । देखते-ही-देखते सब-की-सब उठ खड़ी हुईं। चंद्रकांता ने बढ़ कर पिता के आगे सिर झुकाया और कहा - 'इस समय आपके एकाएक आने... ।' इतना कह कर चुप हो रही। जयसिंह ने कहा - 'कुछ नहीं, तुम्हें देखने को जी चाहा इसीलिए चले आए | अब तुम भी महल में जाओ, यहाँ क्‍यों बैठी हो? ओस पड़ती है, तुम्हारी तबीयत खराब हो जाएगी ।' यह कह कर महल की तरफ रवाना हुए। चंद्रकांता, चपला और चंपा भी महाराज के पीछे-पीछे महल में गईं । जयसिंह अपने कमरे में आए और मन में बहुत शर्मिंदा हो कर कहने लगे - देखो, हमारी भोली-भाली लड़की को क्रूरसिंह झूठ-मूठ बदनाम करता है। न मालूम इस नालायक के जी में क्या समाई है, बेधड़क उस बेचारी को ऐब लगा दिया, अगर लड़की सुनेगी तो क्‍या कहेगी? ऐसे शैतान का तो मुँह न देखना चाहिए, बल्कि सजा देनी चाहिए, जिससे फिर ऐसा कमीनापन न करे।” यह सोच हरीसिंह नाम के एक चोबदार को हुक्म दिया कि बहुत जल्द क्रूरसिंह को हाजिर करे। हरीसिंह क्रूरसिंह को खोजता हुआ और पता लगाता हूआ बाग के पास पहुँचा जहाँ वह बहुत से आदमियों के साथ खुशी-खुशी बाग को घेरे हुए था। हरीसिंह ने कहा - चलिए, महाराज ने बुलाया है।' 5 घबरा उठा कि महाराज ने क्‍यों बुलाया? क्‍या चोर नहीं मिला? महाराज तो मेरे सामने महल में चले गए ] हरीसिंह से पूछा - “महाराज क्या कह रहे हैं?' उसने कहा - अभी महल से आए हैं, गुस्से से भरे बैठे हैं, आपको जल्दी बुलाया है।' यह सुनते ही क्रूरसिंह की नानी मर गई। डरता-काँपता हरीसिंह महाराज के पास पहुँचा। महाराज ने क्रूरसिंह को देखते ही कहा - क्यों बे क्रूर। बेचारी चंद्रकांता को इस तरह झूठ-मूठ बदनाम करना और हमारी इज्जत में बट्टा लगाना, यही तेरा काम है? यह इतने आदमी जो बाग को घेरे हुए हैं अपने जी में क्या कहते होंगे? नालायक, गधा, पाजी, तूने कैसे कहा कि महल में वीरेंद्र है।' मारे गुस्से के महाराज जयसिंह के होंठ काँप रहे थे, आँखें लाल हो रही थीं। यह कैफियत देख क्रूरसिंह की तो जान सूख गई, घबरा कर बोला - 'मुझको तो यह खबर नाजिम ने पहुँचाई थी जो आजकल महल के पहरे पर मुकरर है।' यह सुनते ही महाराज ने हुक्म दिया - बुलाओ नाजिम को ।' थोड़ी देर में नाजिम भी हाजिर किया गया। गुस्से से भरे हुए महाराज के मुँह से साफ आवाज नहीं निकलती थी। टूटे- फूटे शब्दों में नाजिम से पूछा - “क्यों बे, तूने कैसी खबर पहुँचाई?! उस वक्‍त डर के मारे उसकी क्‍या हालत थी, वही जानता होगा, जीने से नाउम्मीद हो चुका था, डरता हुआ बोला - 'मैंने तो अपनी आँखों से देखा था हुजूर, शायद किसी तरह भाग गया होगा।! जयसिंह से गुस्सा बर्दाश्त न हो सका, हुक्म दिया - 'पचास कोड़े क्रूरसिंह को और दो सौ कोड़े नाजिम को लगाए जाएँ। बस इतने ही पर छोड़ देता हूँ, आगे फिर कभी ऐसा होगा तो सिर उतार लिया जाएगा। क्रूर तू वजीर होने लायक नहीं है।' अब क्या था, लगे दो तर्फी कोड़े पड़ने । उन लोगों के चिललाने से महल गूँज उठा मगर महाराज का गुस्सा न गया। जब दोनों पर कोड़े पड़ चुके तो उनको महल के बाहर निकलवा दिया और महाराज आराम करने चले गए, मगर मारे गुस्से के रात-भर उन्हें नींद न आई। क्रूरसिंह और नाजिम दोनों घर आए और एक जगह बैठ कर लगे झगड़ने | क्रूर नाजिम से कहने लगा - तिरी बदौलत आज मेरी इज्जत मिट्टी में मिल गई। कल दीवान होंगे, यह उम्मीद भी न रही, मार खाई उसकी तकलीफ मैं ही जानता हूँ, यह तेरी ही बदौलत हुआ।' नाजिम कहता था - मैं तुम्हारी बदौलत मारा गया, नहीं तो मुझको क्‍या काम था? जहन्नुम में जाती चंद्रकांता और वीरेंद्र, मुझे क्या पड़ी थी जो जूते खाता |! ये दोनों आपस में यूँ ही पहरों झगड़ते रहे। अंत में क्रूरसिंह ने कहा - 'हम तुम दोनों पर लानत है अगर इतनी सजा पाने पर भी वीरेंद्र को गिरफ्तार न किया।' नाजिम ने कहा - इसमें तो कोई शक नहीं कि वीरेंद्र अब रोज महल में आया करेगा क्‍योंकि इसी वास्ते वह अपना डेरा सरहद पार ले आया है, मगर अब कोई काम करने का हौसला नहीं पड़ता, कहीं फिर मैं देखूँ और खबर करने पर वह दुबारा निकल जाए तो अबकी जरूर ही जान से मारा जाऊँगा।' क्रूरसिंह ने कहा - तब तो कोई बा तरकीब करनी चाहिए जिससे जान भी बचे और वीरेंद्रसिंह को अपनी आँखों से महाराज जयसिंह महल में देख भी लें।' बल सोचने के बाद नाजिम ने 333 महाराज शिवदत्तसिंह के दरबार में एक पंडित जगन्नाथ नामी हैं जो रमल भी बहुत अच्छा हैं। उनके रमल फेंकने में इतनी तेजी है कि जब चाहो पूछ लो कि फलाँ आदमी इस समय कहाँ है, क्या कर रहा है या कैसे पकड़ा जाएगा? वह फौरन बतला देते हैं। उनको अगर मिलाया जाए और वे यहाँ आ कर और कुछ दिन रह कर तुम्हारी मदद करें तो सब काम ठीक हो जाए। चुनारगढ़ यहाँ से बहुत दूर भी नहीं है, कुल तेईस कोस है, चलो हम तुम चलें और जिस तरह बन पड़े, उन्हें ले आएँ।' आखिर क्रूरसिंह ने बहुत-से हीरे-जवाहरात अपनी कमर में बाँध, दो तेज घोड़े मँगवा नाजिम के साथ सवार हो उसी समय चुनारगढ़ की तरफ रवाना हो गया और घर में सबसे कह गया कि अगर महाराज के यहाँ से कोई आए तो कह देना कि क्रूरसिंह बहुत बीमार हैं। बयान - 9 वीरेंद्रसिंह और तेजसिंह बाग के बाहर से अपने खेमे की तरफ रवाना हुए। जब खेमे में पहुँचे तो आधी रात बीत चुकी थी, मगर तेजसिंह को कब चैन पड़ता था, वीरेंद्रसिंह को पहुँचा कर फिर लौटे और अहमद की सूरत बना क्रूरसिंह के मकान पर पहुँचे। क्रूरसिंह चुनारगढ़ की तरफ रवाना हो चुका था, जिन आदमियों को घर में हिफाजत के लिए छोड़ गया था और कह गया था कि अगर महाराज पूछें तो कह देना बीमार है, उन लोगों ने एकाएक अहमद को देखा तो ताज्जुब से पूछा - कहो अहमद, तुम कहाँ थे अब तक?! नकली अहमद ने कहा - 'ें जहन्नुम की सैर करने गया था, अब लौट कर आया हूँ। यह बताओ कि क्रूरसिंह कहाँ है?” सभी ने उसको पूरा-पूरा हाल सुनाया और कहा - “अब चुनारगढ़ गए हैं, तुम भी वहीं जाते तो अच्छा होता।' अहमद ने कहा - हाँ मैं भी जाता हूँ, अब घर न जाऊँगा। सीधे चुनारगढ़ ही पहुँचता हूँ ।' यह कह वहाँ से रवाना हो अपने खेमे में आए और वीरेंद्रसिंह से सब हाल कहा । बाकी रात आराम किया, सवेरा होते ही नहा-धो, कुछ भोजन कर, सूरत बदल, विजयगढ़ की तरफ रवाना हरा नंगे सिर, हाथ-पैर, मुँह पर धूल डाले, रोते-पीटते महाराज जयसिंह के दरबार में पहुँचेगा । इनकी हालत देख कर सब हैरान हो गए। महाराज ने मुंशी से कहा - पूछो, कौन है और कया कहता है?' तेजसिंह ने कहा - हुजूर मैं क्रूरसिंह का नौकर हूँ, मेरा नाम रामलाल है। महाराज से बागी होकर क्रूरसिंह चुनारगढ़ के राजा के पास चला गया है। मैंने मना किया कि महाराज का नमक खा कर ऐसा न करना चाहिए, जिस पर मुझको खूब मारा और जो कुछ मेरे पास था सब छीन लिया। हाय रे, मैं बिल्कुल लुट गया, एक कौड़ी भी नहीं रही, अब क्या खाऊँगा, घर कैसे पहुँचूँगा, लड़के-बच्चे तीन बरस की कमाई खोजेंगे, कहेंगे कि रजवाड़े की क्या कमाई लाए हो? उनको क्या दूँगा। दुह्ाई महाराज की, दुह्मई-दुहाई ।।' बड़ी मुश्किल से सभी ने उसे चुप कराया। महाराज को बड़ा गुस्सा आया, हुक्म दिया - 'क्रूरसिंह कहाँ है?' चोबदार खबर लाया - “बहुत बीमार हैं, उठ नहीं सकते।' रामलाल (तेजसिंह) बोला - दुहाई महाराज की। यह भी उन्हीं की तरफ मिल गया, झूठ बोलता है। मुसलमान सब उसके दोस्त हैं। दुहाई महाराज की | खूब तहकीकात की जाए।! महाराज ने मुंशी से कहा - तुम जा कर पता लगाओ कि क्या मामला है?! थोड़ी देर बाद मुंशी वापस आए और बोले - महाराज क्रूरसिंह घर पर नहीं है, और घरवाले कुछ बताते नहीं कि कहाँ गए हैं।' महाराज ने कहा - जरूर चुनारगढ़ गया होगा। अच्छा, उसके यहाँ के किसी प्यादे को बुलाओ।' हुक्म पाते ही चोबदार गया और बदकिस्मत प्यादे को पकड़ लाया। महाराज ने पूछा - 'क्रूरसिंह कहाँ गया है?' प्यादे ने ठीक पता नहीं दिया। राम लाल ने फिर कहा - दुहाई महाराज की, बिना मार खाए न बताएगा।! महाराज ने मारने का हुक्म दिया। पिटने के पहले ही उस बदनसीब ने बतला दिया कि चुनारगढ़ गए हैं। महाराज जयसिंह को क्रूर का हाल सुन कर जितना गुस्सा आया बयान के बाहर है। हुक्म दिया - () क्रूरसिंह के घर के सब औरत-मर्द घंटे भर के अंदर जान बचा कर हमारी सरहद के बाहर हो जाए। (2) उसका मकान लूट लिया जाए। (3) उसकी दौलत में से जितना रुपया अकेला रामलाल उठा ले जा सके ले जाए, बाकी सरकारी खजाने में दाखिल किया जाए। (4) रामलाल अगर नौकरी कबूल करे तो दी जाए। हुक्म पाते ही सबसे पहले रामलाल क्रूरसिंह के घर पहुँचा । महाराज के मुंशी को जो हुक्म तामील करने गया था, रामलाल ने कहा - पहले मुझको रुपए दे दो कि उठा ले जाऊँ और महाराज को आशीर्वाद करूँ। बस, जल्दी दो, मुझ गरीब को मत सताओ।' मुंशी ने कहा - अजब आदमी है, इसको अपनी ही पड़ी है। ठहर जा, जल्दी क्‍यों करता है।' नकली रामलाल ने चिल्लाकर कहना शुरू किया - 'दुहाई महाराज की, मेरे रुपए मुंशी नहीं देता।' कहता हुआ महाराज की तरफ चला। मुंशी ने कहा - 'लो,लो जाते कहाँ हो, भाई पहले इसको दे दो ।' रामलाल ने कहा - हत्त तेरे की, मैं चिल्‍लाता नहीं तो सभी रुपए डकार जाता ।! इस पर सब हँस पड़े। मुंशी ने दो हजार रुपए आगे रखवा दिया और कहा - ले, ले जा।! रामलाल ने कहा - वाह, कुछ याद है। महाराज ने कया हुक्म दिया है? इतना तो मेरी जेब में आ जाएगा, मैं उठा के क्या ले जाऊँगा?! मुंशी झुँसला उठा, नकली रामलाल को खजाने के संदूक के पास ले जा कर खड़ा कर दिया और कहा - उठा, देखें कितना उठाता है?! देखते-देखते उसने दस हजार रुपए उठा लिए। सिर पर, बटुए में, कमर में, जेब में, यहाँ तक कि मुँह में भी कुछ रुपए भर लिए और रास्ता लिया। सब हँसने और कहने लगे - “आदमी नहीं, इसे राक्षस समझना चाहिए।! महाराज के हुक्म की तामील की गई, घर लूट लिया गया, औरत-मर्द सभी ने रोते-पीटते चुनारगढ़ का रास्ता पकड़ा।

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