एक चालाक लोमड़ी और एक घमंडी कौवे की कहानी — जिसने हम सबको सिखाया कि चापलूसी के मीठे बोल अक्सर कड़वी सच्चाई छिपाए होते हैं।
एक छोटे-से गाँव के पास एक घना जंगल था। उस जंगल के एक बड़े पेड़ पर एक कौवा रहता था। उसका नाम था — काला। काला साधारण कौवा था, पर उसमें एक बड़ी कमी थी — उसे अपनी आवाज़ पर बहुत घमंड था।
दरअसल, उसकी आवाज़ बहुत साधारण थी — "काँव-काँव" — जैसी और कौवों की होती है। पर काला अपने आप को बड़ा गायक समझता। वह सोचता कि उसकी आवाज़ कोयल जैसी मीठी, बुलबुल जैसी रसीली, और मोर जैसी सुरीली है।
एक सुबह काला अपनी आवाज़ की प्रशंसा कर रहा था। पेट में भूख जोर मार रही थी। पर खाना ढूँढ़ना ज़रूरी था।
"पहले कुछ खा लूँ। फिर सारा दिन गाने में बिताऊँगा।"
वह उड़ कर गाँव की तरफ़ गया। एक घर की खिड़की के पास एक मेज़ पर — एक बड़ा-सा रोटी का टुकड़ा रखा हुआ था। ताज़ा, गर्म, सुगंधित।
"वाह! क्या भाग्य है!"
उसने धीरे से उस रोटी को अपनी चोंच में दबाया और उड़ गया। घर वालों को कुछ पता नहीं चला।
काला उड़ता-उड़ता जंगल के अपने पेड़ पर पहुँचा। एक मज़बूत डाल पर बैठा। अपनी चोंच में रोटी अभी भी दबी हुई थी।
"वाह! आज तो दावत होगी! कितनी बड़ी रोटी है। बहुत देर तक खाऊँगा।"
पर एक समस्या थी — रोटी इतनी बड़ी थी कि एक झटके में निगली नहीं जा सकती थी। उसे टुकड़े-टुकड़े करके खाना पड़ेगा। काला सोच रहा था — कहाँ से शुरू करूँ?
तभी — पेड़ के नीचे — एक चालाक प्राणी दिखाई दिया।
उस जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी। उसका नाम था — चित्रा। चित्रा बहुत बुद्धिमान, चालाक, और चापलूस थी। वह दूसरों को मीठी बातों में फँसाकर उनसे काम निकालने में माहिर थी।
उस सुबह चित्रा भी भूखी थी। पूरा दिन कुछ हाथ नहीं आया था। वह जंगल में टहल रही थी।
तभी उसकी नाक में एक स्वादिष्ट ख़ुशबू आई। ताज़ी रोटी की महक!
"कहाँ से आ रही है यह सुगंध?"
उसने ऊपर देखा। पेड़ की डाल पर — एक कौवा बैठा था। उसकी चोंच में एक बड़ी रोटी।
चित्रा के मुँह में पानी आ गया। उसकी आँखें चमक उठीं।
"वो रोटी मुझे चाहिए! पर ऊपर पेड़ पर तो मैं चढ़ नहीं सकती। और कौवा अगर देखेगा कि मैं कुछ करने जा रही हूँ, तो उड़ जाएगा।"
उसने थोड़ी देर सोचा। फिर उसकी आँखों में एक चालाक चमक आई।
"चापलूसी से क्या नहीं हो सकता! मीठे बोल से तो पत्थर भी पिघल जाते हैं। चलो आज़माते हैं।"
चित्रा पेड़ के नीचे आई। बहुत मीठी, प्यारी आवाज़ में बोली —
"अरे वाह! कितना सुंदर पंछी! क्या रंग है — काला, चमकीला, जैसे रात का आकाश!"
काला ने नीचे झाँका। उसने लोमड़ी को देखा। उसके मन में थोड़ा संदेह आया — "लोमड़ी? वह तो चालाक होती है। मुझे सावध रहना चाहिए।"
पर लोमड़ी ने अपनी मीठी बातें जारी रखीं —
"पंछी राजा! मैं आज बहुत भाग्यशाली हूँ कि आप जैसे सुंदर जीव को देख पाई। आप तो जंगल के सम्राट हैं। आपकी सुंदरता का तो कोई जवाब नहीं!"
काला ने मन में सोचा — "वाह! मेरी सुंदरता को पहचाना। यह लोमड़ी समझदार है।"
उसका सीना फूल गया। पूँछ की पंख फैला ली।
"मैं रोज़ इस पेड़ के पास से गुज़रती हूँ," — चित्रा ने आगे बढ़ाया, "बस यही उम्मीद से कि शायद आपकी एक झलक देख पाऊँ। आज भगवान ने सुन ली। मैं धन्य हुई!"
काला अब और भी ख़ुश हो गया था। वह अपनी रोटी भूल गया था। अहंकार से उसका सीना फूला हुआ था।
चित्रा ने अब अपनी असली चाल चली। उसने एक लंबी साँस ली, मानो किसी मधुर सपने में खो रही हो। फिर बोली —
"पर सबसे बड़ी बात तो यह है — मैंने सुना है कि आपकी आवाज़ इतनी मधुर है कि सारा जंगल मंत्रमुग्ध हो जाता है। लोग कहते हैं — पंछी राजा का गाना सुनकर तो कोयल भी शर्मा जाती है। बुलबुल अपनी आवाज़ बंद कर देती है। मोर अपने पंख समेट लेता है।"
काला यह सुनकर पागल हो गया। उसकी आँखें चमकने लगीं।
"हाँ हाँ! तुम बिल्कुल सच कह रही हो! मेरी आवाज़ की तो प्रशंसा सब करते हैं!"
"पर हाय!" — चित्रा ने चेहरा उदास किया, "मेरा भाग्य ऐसा है कि मैंने आज तक आपकी सुरीली आवाज़ नहीं सुनी। आप एक गाना गा सकते हैं? बस एक गाना? मेरी ज़िंदगी सफल हो जाएगी!"
काला तो जैसे आसमान में उड़ रहा था। उसकी सारी सावधानी हवा हो गई। उसने सोचा भी नहीं — "अगर मैं चोंच खोलूँगा, तो रोटी गिर जाएगी।"
उसने तुरंत अपनी चोंच खोली। एक बड़ी, गहरी, गौरव से भरी "काँ-व-व!" निकालने लगा।
पर अभी आधी आवाज़ ही निकली थी कि — रोटी का टुकड़ा उसकी चोंच से छूटकर नीचे गिर गया!
"धम्म!"
रोटी सीधे चित्रा लोमड़ी के पंजों में गिरी।
चित्रा ने एक तेज़ झपट्टा मारकर रोटी उठाई। उसने एक कौर खाया। फिर मुँह उठाकर ऊपर देखा। उसके चेहरे पर अब चापलूसी की मुस्कान नहीं थी। अब एक चालाक, विजयी हँसी थी।
"धन्यवाद, मूर्ख कौवे!" — चित्रा ने कहा।
काला हक्का-बक्का। उसकी समझ में आया कि उसे फँसा लिया गया।
"क्या? तुम तो अभी मुझे सुंदर कह रही थीं! मेरी आवाज़ की तारीफ़ कर रही थीं!"
चित्रा ज़ोर से हँसी। "अरे मूर्ख! मेरा एक भी शब्द सच नहीं था। तुम्हारी आवाज़ — काँव-काँव — हर कौवे की होती है। तुममें कुछ भी ख़ास नहीं। मैंने बस तुम्हें फँसाने के लिए ये बातें कहीं। और तुम घमंड में आकर फँस गए।"
"अब यह रोटी मेरी। और अगली बार जब कोई तुम्हारी इतनी तारीफ़ करे — तो थोड़ा सोचना। प्रशंसा के पीछे कोई स्वार्थ छुपा हो सकता है।"
और रोटी मुँह में दबाकर चित्रा वहाँ से चली गई।
काला पेड़ की डाल पर बैठा रह गया। उसकी आँखों में आँसू थे। पेट में भूख। दिल में पछतावा।
"मैं कितना मूर्ख था! एक चालाक लोमड़ी की मीठी बातों में आ गया। मेरा घमंड ही मेरा दुश्मन बना। अगर मैंने सीधा-साधा खाना खाया होता, तो आज मेरा पेट भरा होता। पर अहंकार में आकर मैंने अपनी मेहनत की कमाई गँवा दी।"
उसने अपने आप से वादा किया —
"आज से, जब भी कोई मेरी अधिक तारीफ़ करेगा, मैं सावधान हो जाऊँगा। प्रशंसा अच्छी है — पर नकली प्रशंसा से भी बड़ा कोई धोखा नहीं।"
तभी एक बूढ़ा उल्लू पास के पेड़ पर बैठा। उसने सब कुछ देखा था। उसने काले को कहा —
"बेटा, मैं देख रहा था सब कुछ। तुम्हारा दर्द समझता हूँ। पर एक बात याद रखना —
"जो आदमी तुम्हारे मुँह पर बहुत तारीफ़ करता है, उसका पीछे कोई न कोई स्वार्थ ज़रूर छुपा होता है। सच्चे प्रशंसक थोड़ा कहते हैं, पर वह कथन सच होता है। चापलूसों की भीड़ ज़्यादा होती है — पर उनकी बातों का कोई मूल्य नहीं।
"दूसरी बात — घमंड हमेशा पतन का कारण बनता है। अगर तुम अपनी आवाज़ पर इतना गर्व नहीं करते, तो लोमड़ी की चापलूसी तुम्हें छू नहीं पाती।
"और तीसरी बात — जब कोई कुछ माँगे, तो पूछो — क्यों? कौन? सीधे हाँ कहने से पहले सोचो।"
काले ने उल्लू को धन्यवाद दिया। उस दिन से उसने अपना घमंड त्याग दिया। और जब कभी कोई उसकी अति-प्रशंसा करता, वह सावधान हो जाता।
प्यारे बच्चों, काले कौवे और चित्रा लोमड़ी की इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब कभी कोई दोस्त, अनजान व्यक्ति, या साथी तुम्हारी अति-प्रशंसा करे — "तुम तो सबसे बेहतरीन हो", "तुम जैसा कोई नहीं" — तो थोड़ा रुक जाओ। एक बार सोचो — क्या यह सच है? या कोई स्वार्थ छुपा है? यह सावधानी ही समझदारी की निशानी है!
॥ चापलूसी से बचो, अपनी कमाई की रक्षा करो ॥
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