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प्यासा कौवा और घड़े का पानी

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एक तपती दुपहरी में प्यास से बेहाल एक कौवे की कहानी — जिसने अपनी हुषारी से असंभव को संभव कर दिखाया।

तपती गर्मी का मौसम

गर्मियों के दिन थे। सूरज आसमान में आग बरसा रहा था। पेड़ों के पत्ते मुरझाने लगे थे। ज़मीन की मिट्टी फटने लगी थी। तालाब, झरने, और छोटे कुएँ सब सूख गए थे।

उस गाँव में सब जीव-जंतु पानी के लिए परेशान थे। लोग अपनी-अपनी झोपड़ियों में बैठे रहते थे। जानवर पेड़ों की छाँव में बैठकर हाँफ रहे थे। पक्षी आसमान में उड़ते-उड़ते किसी बादल की तलाश में थे।

उसी इलाके में एक छोटा-सा कौवा रहता था। उसका नाम था — कालू। कालू अपने काले चमकीले पंखों, तेज़ चोंच, और चालाक आँखों के लिए जाना जाता था।

कालू सुबह से एक पेड़ की डाली पर बैठा था। उसकी जीभ सूख रही थी। गला रेत जैसा हो गया था। प्यास से वह बेहाल था।

"मुझे पानी चाहिए... कहीं भी, थोड़ा-सा भी पानी..."

पानी की तलाश में उड़ान

कालू ने ठान ली कि वह पानी ढूँढ़कर ही रहेगा। उसने अपने पंख फड़फड़ाए और आसमान में उड़ने लगा।

वह पहले तालाब के पास गया। पर तालाब बिल्कुल सूखा। तल में कुछ कीचड़ और सूखी मिट्टी पड़ी थी।

फिर वह नदी की तरफ़ उड़ा। नदी का पाट तो था, पर पानी का नामो-निशान नहीं। बस गोल-गोल पत्थर और सूखी रेत।

कालू ने एक खेत के पास का कुआँ देखा। पर वह भी सूखा। नीचे झाँककर देखा — कुछ नहीं।

वह आगे, और आगे — दूर तक उड़ता गया। उसकी हिम्मत टूटने लगी थी। पंख थक गए थे। प्यास और बढ़ गई थी।

"क्या मैं प्यास से ही मर जाऊँगा?" — उसके मन में यह भयानक सवाल आया।

एक उम्मीद की किरण

तभी — दूर से — उसे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया। वह एक छोटे-से बागीचे के बीच रखी हुई एक चीज़ थी। कालू ने आँखें बारीक़ कीं।

"वह तो एक घड़ा है!"

उसकी जान में जान आई। वह जल्दी से उस तरफ़ उड़ा। बागीचे में पहुँचकर उसने पाया — हाँ, वहाँ एक मिट्टी का घड़ा रखा हुआ था। वह माली ने अपने पौधों को पानी देने के लिए रखा होगा। पर माली शायद कहीं चला गया था।

कालू उछलते हुए घड़े के पास गया। उसकी आँखों में चमक थी। प्यास भुलाकर वह घड़े के मुँह पर बैठा।

घड़े के अंदर झाँककर देखा — और उसका चेहरा गिर गया।

एक नई समस्या

घड़े में पानी तो था, पर बहुत कम। पानी का स्तर घड़े के तले के पास, बहुत नीचे। और घड़े का मुँह सँकरा। कालू ने अपनी चोंच घड़े के अंदर डाली, पर पानी तक नहीं पहुँची। चोंच और पानी के बीच कई इंच की दूरी थी।

"हाय! इतनी मेहनत के बाद भी पानी मेरे होठों से दूर!"

कालू ने कई बार चोंच डाली, पर हर बार वही नतीजा। उसने घड़े को धक्का देने की कोशिश की कि शायद टूटकर पानी बाहर आ जाए। पर घड़ा भारी था और उसकी ताकत कम।

उसने घड़े को टेढ़ा करने की कोशिश की। पर एक छोटा कौवा एक बड़े मिट्टी के घड़े को कैसे झुका सकता है? घड़ा एक इंच भी नहीं हिला।

कालू थककर घड़े के बगल में बैठ गया। उसकी आँखों में निराशा के आँसू आए।

"क्या यहाँ तक आकर भी मैं पानी नहीं पी सकूँगा?"

हार मानने से पहले

पर कालू एक हुषार कौवा था। उसकी आँखें अभी भी सोच रही थीं। उसने कहा —

"मैं हार मानूँगा नहीं। ज़रूर कोई रास्ता होगा। बस सोचना होगा।"

उसने आसपास नज़र दौड़ाई। बागीचे की मिट्टी पर बहुत सारे छोटे-छोटे कंकड़ बिखरे हुए थे। वे साधारण कंकड़ थे — किसी के काम के नहीं। पर अचानक — कालू के दिमाग़ में एक चमक आई!

"रुक! कंकड़! अगर मैं ये कंकड़ घड़े में डालूँ, तो... पानी ऊपर आ जाएगा! जैसे ही कंकड़ नीचे जाएँगे, पानी का स्तर ऊपर उठेगा!"

उसने यह बात अपनी अनुभव से सोची थी। उसने एक बार बारिश के पानी से भरे एक बर्तन में पत्थर गिरते देखे थे। हर पत्थर के साथ पानी थोड़ा-थोड़ा ऊपर आता था।

उसकी जान में फिर जान आ गई।

कंकड़-कंकड़ की मेहनत

कालू ने तुरंत काम शुरू किया। वह ज़मीन पर उड़ा, एक छोटा कंकड़ अपनी चोंच में दबाया, और घड़े के मुँह तक उड़ा। वहाँ उसने उस कंकड़ को घड़े में गिरा दिया।

"छप्पाक!"

कंकड़ घड़े में गिरा। पानी का स्तर थोड़ा-सा ऊपर आया। पर बहुत-बहुत थोड़ा। शायद आधा सेंटीमीटर।

कालू ने नीचे आँख डाली। पानी अभी भी बहुत नीचे था। पर उसकी हिम्मत बढ़ी।

"एक कंकड़ से इतना ऊपर आया। तो दस-बीस से कितना आएगा? चलो, और मेहनत करते हैं!"

उसने एक के बाद एक — कंकड़ ले-ले कर घड़े में डालने शुरू किए। उसकी चोंच थोड़ी-थोड़ी देर में दर्द करने लगी। पर वह नहीं रुका। वह उड़कर ज़मीन पर जाता, कंकड़ उठाता, घड़े पर लाता, गिराता।

"छप्पाक! छप्पाक! छप्पाक!"

एक बार में एक कंकड़। पानी थोड़ा-थोड़ा ऊपर आ रहा था।

धैर्य की परीक्षा

एक घंटा बीता। शायद और भी ज़्यादा। कालू थक गया था। उसकी पीठ में दर्द था। पंख दर्द कर रहे थे। चोंच थक गई थी। पर वह नहीं रुका।

उसने पच्चीसवाँ कंकड़ डाला। फिर पचासवाँ। फिर सौ! वह गिनती भूल गया। बस काम करता रहा।

"मुझे पीना है। बस। मुझे पीना है।"

एक मधुमक्खी पास से उड़ती हुई गुज़री। उसने पूछा — "कौवा भाई, तुम क्या कर रहे हो? इतने सारे कंकड़ क्यों डाल रहे हो?"

कालू ने थकी आवाज़ में जवाब दिया, "मधुमक्खी बहन, मैं प्यासा हूँ। पानी अंदर है पर पहुँच नहीं रहा। इन कंकड़ों से पानी ऊपर आएगा।"

मधुमक्खी हँसी। "बेचारे, तुम तो तब तक मर जाओगे जब तक पानी ऊपर आएगा! छोड़ दो ये काम।"

पर कालू ने मना किया। "नहीं बहन, मैं हार नहीं मानूँगा। चाहे रात तक मेहनत करनी पड़े। मैं रुकूँगा नहीं।"

मधुमक्खी सिर हिलाकर उड़ गई।

विजय का क्षण

दोपहर बीत गई। शाम होने लगी। सूरज पश्चिम की तरफ़ झुक गया। कालू अभी भी काम कर रहा था।

एक... दो... तीन... और कंकड़।

"छप्पाक!"

उसने नीचे झाँका — और अचानक उसकी आँखें चमक उठीं! पानी अब घड़े के मुँह से सिर्फ़ थोड़ा ही नीचे था! वह कोशिश कर सकता था!

उसने अपनी चोंच घड़े में डाली — और हाँ! चोंच पानी तक पहुँच गई!

एक मीठी, ठंडी, ताज़ी पानी की बूँद उसकी चोंच के अंदर गई। उसने धीरे-धीरे, चूँट-चूँट कर पानी पीना शुरू किया।

हर एक चूँट उसके सूखे गले को राहत दे रहा था। हर एक चूँट उसके थके शरीर में जान भर रहा था। हर एक चूँट उसकी कई घंटों की मेहनत का इनाम था।

उसने जी भर के पानी पीया। फिर उड़कर पास के पेड़ पर बैठा। उसने एक लंबी, सुखद साँस ली।

"मेहनत का फल हमेशा मीठा होता है।"

मधुमक्खी की वापसी

थोड़ी देर बाद वही मधुमक्खी फिर पास से गुज़री। उसने देखा कौवे को पेड़ पर आराम से बैठे हुए। पास में घड़ा कंकड़ों से लगभग भरा हुआ। और घड़े के मुँह तक पानी।

"अरे! तुम ने सच में कर दिखाया!"

कालू ने हँसते हुए कहा, "हाँ बहन। अगर मैंने हार मान ली होती, तो प्यास से मर जाता। पर मैंने नहीं मानी। और देखो — पानी भी मिल गया, और एक नई बात भी सीखी।"

"क्या सीखी?"

"यही — कि कोई भी समस्या असंभव नहीं होती। बस उसे हल करने का रास्ता ढूँढ़ना पड़ता है। कभी ज़ोर से नहीं — हुषारी से। कभी एक झटके में नहीं — धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा।"

मधुमक्खी ने प्रशंसा की और उड़ गई। पूरे बाग़ में यह बात फैल गई — "देखो, कौवे ने अपनी हुषारी से क्या कमाल कर दिखाया!"

कहानी का सबक

प्यारे बच्चों, इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?

  • हार मत मानो। कोई भी समस्या आए, उसे हल करने का रास्ता ज़रूर होता है। बस सोचना पड़ता है।
  • हुषारी ताक़त से बड़ी होती है। कौवा अपनी ताक़त से घड़ा नहीं तोड़ सकता था, पर अपनी समझदारी से उसने पानी पाया।
  • धैर्य रखो। एक कंकड़ से पानी थोड़ा ही ऊपर आता है। पर कई कंकड़ों से बहुत ऊपर। बड़े काम छोटे-छोटे कदमों से होते हैं।
  • दूसरों की बातें सुनकर हार मत मानो। मधुमक्खी ने कहा था "छोड़ दो", पर कालू ने नहीं माना। और देखो, क्या नतीजा निकला।

तो जब कभी कोई गणित का सवाल कठिन लगे, या होमवर्क पूरा करना मुश्किल लगे, या खेल में हार रहे हों — तो प्यासे कौवे को याद करो। एक कंकड़ डालो। फिर दूसरा। फिर तीसरा। पानी ज़रूर ऊपर आएगा!

॥ धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ॥

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प्यासा कौवा और घड़े का पानी

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