एक बातूनी कछुए और उसके दो वफ़ादार हंस दोस्तों की कहानी — जिसने हम सबको सिखाया कि कभी-कभी चुप रहना सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।
एक हरे-भरे जंगल के बीच में एक खूबसूरत तालाब था। उसका पानी इतना साफ़ था कि नीचे की मिट्टी और कंकड़ साफ़ दिखाई देते थे। तालाब के आसपास हरी घास, फूल, और पेड़।
उस तालाब में अनेक प्राणी रहते थे। पर इनमें तीन ख़ास थे — दो हंस और एक कछुआ। उनकी एक अनोखी दोस्ती थी।
दोनों हंसों के नाम थे — चित्रांग और विचित्रांग। वे सुंदर, सफेद, गर्व से भरे हुए। उनकी गर्दनें लंबी, पंख चमकीले, चोंच पीली। दिनभर वे आसमान में उड़ते, और रात को तालाब के पास आराम करते।
कछुए का नाम था — कम्बुग्रीव। वह छोटा, हरा-भूरा, मज़बूत खोल वाला। पर कम्बुग्रीव की एक बड़ी आदत थी — वह बहुत बातूनी था!
दिनभर वह बात करता रहता। किसी ने पूछा हो या न पूछा हो — वह बातें शुरू कर देता। एक बात ख़त्म करते ही दूसरी। दूसरी ख़त्म करते ही तीसरी।
हंसों को कम्बुग्रीव की बातूनी आदत थोड़ी अजीब लगती। पर वे उसे बहुत प्यार करते। वह दिल का अच्छा था। उदार, खुशदिल, सबको हँसाने वाला।
हर शाम तीनों एक साथ बैठते। हंस अपने दिन की बातें बताते — कहाँ-कहाँ उड़े, क्या-क्या देखा। कम्बुग्रीव अपनी बातें बताता — तालाब में क्या हुआ, कौन-कौन आया, कौन गया।
"तुम कितना बोलते हो, मित्र!" विचित्रांग कभी हँसकर कहता।
"क्या करूँ! बातें मेरी ज़ुबान पर ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाती हैं। रोकूँ कैसे?"
तीनों हँसते।
एक साल — बारिश नहीं हुई। पूरे इलाके में सूखा पड़ गया। सूरज दिन-रात चमकता रहा। बादल कहीं नज़र नहीं आए। नदियाँ सूखने लगीं। तालाब भी।
तीनों दोस्तों के तालाब का पानी भी कम होने लगा। पहले एक हाथ नीचे चला गया। फिर दो। फिर तीन। पानी का रंग गंदला हो गया। मछलियाँ मरने लगीं। पौधे सूखने लगे।
हंस तो आसानी से उड़कर दूसरे तालाब जा सकते थे। पर कम्बुग्रीव? कछुआ इतनी दूर कैसे जाएगा? उसकी छोटी टाँगों से कितना ही चलेगा? और तेज़ रास्ते में कोई शिकारी पकड़ ले तो?
एक रात तीनों दोस्त बैठे थे। चाँदनी रात। पर तालाब का पानी कम हो रहा था। यहाँ अब बहुत दिन नहीं रह सकते थे।
कम्बुग्रीव ने धीमे से कहा — "मित्रों, तुम चले जाओ। अपनी जान बचाओ। मैं तो यहीं रह जाऊँगा। मेरी क़िस्मत में जो होगा।"
उसकी आँखों में आँसू थे।
चित्रांग ने ज़ोर से सिर हिलाया। "यह कैसी बात है, मित्र? हम तुम्हें छोड़ कर कैसे जाएँगे? सच्चे दोस्त संकट में अकेला नहीं छोड़ते।"
विचित्रांग ने भी कहा — "हम कोई न कोई रास्ता निकालेंगे। तुम्हें भी अपने साथ ले चलेंगे।"
तीनों ने पूरी रात विचार किया। कम्बुग्रीव को कैसे ले जाएँ? वह उड़ नहीं सकता। ज़मीन पर दौड़ नहीं सकता। तालाब के बाहर पानी नहीं।
आख़िर सुबह — चित्रांग ने एक उपाय सुझाया।
"मित्र! एक तरीक़ा है। हम एक मज़बूत लकड़ी ढूँढेंगे। उसके दोनों सिरों को हम दोनों — मैं और विचित्रांग — अपनी चोंच में पकड़ लेंगे। बीच में तुम — कम्बुग्रीव — अपने दाँतों से लकड़ी पकड़ोगे। हम उड़ेंगे — तुम्हें हवा में लटका कर ले जाएँगे। एक नए तालाब में पहुँचा देंगे।"
कम्बुग्रीव की आँखें ख़ुशी से चमक उठीं। "वाह! क्या बढ़िया उपाय है! चलो, करते हैं!"
विचित्रांग ने रुककर कहा — "पर मित्र, एक शर्त है।"
"क्या शर्त?"
"रास्ते में — पूरे रास्ते में — तुम्हें अपना मुँह बिल्कुल नहीं खोलना है। एक शब्द भी नहीं बोलना। न नीचे देखकर कुछ कहना। न ऊपर देखकर। न हम से बात करना। बस लकड़ी को मज़बूती से दाँतों में पकड़े रहना।"
"क्योंकि अगर तुम मुँह खोलोगे," — चित्रांग ने जोड़ा — "तो लकड़ी छूट जाएगी। और तुम नीचे गिरकर मर जाओगे।"
कम्बुग्रीव ने एकदम मान लिया। "बिल्कुल! मैं अपना मुँह नहीं खोलूँगा। मैं वादा करता हूँ। एक शब्द भी नहीं बोलूँगा।"
पर हंसों के मन में संदेह था। वे जानते थे कम्बुग्रीव कितना बातूनी है। उससे चुप रहना — यह सबसे मुश्किल काम था।
"वादा पक्का?" चित्रांग ने पूछा।
"बिल्कुल पक्का!"
उन्होंने एक मज़बूत, सीधी लकड़ी ढूँढ़ी। वह एक हाथ लंबी थी। हल्की पर मज़बूत।
दूसरी सुबह तीनों ने अपनी यात्रा शुरू की। चित्रांग ने लकड़ी का एक सिरा अपनी चोंच में पकड़ा। विचित्रांग ने दूसरा सिरा। कम्बुग्रीव ने बीच में लकड़ी को अपने मज़बूत दाँतों से पकड़ा।
दोनों हंसों ने अपने पंख फड़फड़ाए। और — उड़ान भरी!
हवा में! कम्बुग्रीव हवा में लटका हुआ! पहली बार उसने अपने तालाब को ऊपर से देखा। पेड़, पहाड़, खेत, गाँव — सब छोटे लग रहे थे।
"वाह! क्या नज़ारा है!" — उसने मन ही मन कहा। पर कुछ बोला नहीं। वादा याद था।
हंस तेज़ी से उड़ रहे थे। नया तालाब बहुत दूर था। कई मील का सफ़र। पर कम्बुग्रीव शांत था। मुँह बंद। दाँत लकड़ी पर मज़बूत।
कुछ देर बाद वे एक गाँव के ऊपर से गुज़रे। नीचे — खुले मैदान में — कुछ बच्चे खेल रहे थे। उन्होंने ऊपर देखा।
"देखो! देखो! दो हंस उड़ रहे हैं!"
"और बीच में — क्या यह कछुआ है? हवा में?"
"यह तो अद्भुत है! दो हंस एक कछुए को कैसे ले जा रहे हैं?"
बच्चे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगे। एक ने कहा — "कितने मूर्ख कछुए को! उड़ नहीं सकता तो हंसों के साथ ले जा रहा है!"
दूसरा बोला — "नहीं नहीं! हंस मूर्ख हैं! इस कछुए को ले जाने में क्या तुक है?"
तीसरा — "अरे! यह बातूनी कछुआ ज़रूर है! दूसरे तालाब में जाकर वहाँ भी सबको परेशान करेगा!"
कम्बुग्रीव यह सब सुन रहा था। उसके अंदर ग़ुस्सा भर गया। "कौन कहता है मैं मूर्ख हूँ? मेरे दोस्त इतने अच्छे हैं! वे मुझे बचा रहे हैं! इन बच्चों को कितनी समझ नहीं!"
उसका मन बार-बार कह रहा था — "जवाब देना है! इन्हें सबक सिखाना है!"
पर उसे वादा याद आया — मुँह नहीं खोलना। दाँत मज़बूती से लकड़ी पर रखे।
"पर ये कितने ग़लत बोल रहे हैं!"
एक बच्चा फिर बोला — "यह कछुआ कितना बेकार है। मूर्ख! कमज़ोर! उड़ नहीं सकता! रेंगता है!"
कम्बुग्रीव की सहनशक्ति टूट गई। उसने सोचा — "अब मैं इन बच्चों को बताता हूँ कि मैं कौन हूँ! मैं इनसे अधिक बुद्धिमान हूँ!"
और — एक पल के लिए, सिर्फ़ एक पल के लिए — वह वादा भूल गया। उसने अपना मुँह खोला और चिल्लाया —
"ओ बच्चों! तुम सब मूर्ख हो! मैं —"
पर वह पूरी बात नहीं कह पाया।
जैसे ही उसने मुँह खोला, उसके दाँत लकड़ी से छूट गए। और वह — सीधे — हवा से नीचे गिरने लगा।
"बचाओ! बचाओ!"
दोनों हंस अचानक रुक गए। उन्होंने नीचे देखा। पर कुछ नहीं कर सकते थे। कम्बुग्रीव हवा से तेज़ी से नीचे गिर रहा था।
"धम्म!"
वह ज़मीन पर गिरा। उसका खोल टूट गया। उसकी जान वहीं चली गई।
बच्चे डर गए। वे भागकर अपने माँ-बाप के पास गए और बताया।
दोनों हंस ऊपर आसमान में चक्कर लगाते रहे। उन्हें बहुत दुख हुआ। उनकी आँखों में आँसू थे।
"बेचारा कम्बुग्रीव!" चित्रांग ने रोते हुए कहा। "अगर वह बस थोड़ी देर और चुप रह सकता, तो हम उसे नए तालाब में पहुँचा देते। पर अपनी ज़ुबान पर क़ाबू नहीं रख पाया।"
विचित्रांग ने कहा — "हमने उसे बताया था। बार-बार बताया था। पर वह नहीं सुना। अपनी पुरानी आदत — बातूनीपन — आख़िरकार जान ले गई।"
दोनों हंसों ने कम्बुग्रीव की मिट्टी में अंतिम विदाई दी। और भारी मन से अपने रास्ते आगे बढ़े।
प्यारे बच्चों, इस दुखद लेकिन शिक्षाप्रद कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब अगली बार कोई तुम्हें कुछ कहे जो तुम्हें बुरा लगे — जैसे कोई दोस्त मज़ाक उड़ाए, या कोई गलत बात कहे — तो रुक जाओ। दस गिनो। शांत रहो। हर चीज़ का जवाब देना ज़रूरी नहीं। कभी-कभी सबसे बड़ा जवाब — चुप्पी होती है!
॥ बोलने से पहले सोचो — चुप्पी सबसे बड़ी ताक़त ॥
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