राजा छत्र सिंह : रत्नावती बेटा, आज बाज़ार मत जाना। दरबार में बहुत ज़रूरी काम है, मैं देर से आऊंगा।
रत्नावती : लेकिन पिताजी, माँ ने चंदन का इत्र मँगवाया था। और दाई काकी भी साथ होंगी मेरे। आप चिंता मत करो।
राजा छत्र सिंह : अच्छा ठीक है, लेकिन शाम ढलने से पहले वापस आ जाना। और मीरा को साथ लेकर जाना।
नैरेटर : भानगढ़ के राजा छत्र सिंह अपनी बेटी रत्नावती को बेहद प्यार करते थे। रत्नावती सोलह साल की थी और जितनी सुंदर थी उतनी ही समझदार भी। उस सुबह रत्नावती अपनी सहेली मीरा के साथ बाज़ार निकल पड़ी। भानगढ़ का बाज़ार उस वक्त पूरी तरह जीवंत था। व्यापारियों की आवाज़ें, घोड़ों की टापें, बच्चों की हँसी — सब मिलकर एक अलग ही दुनिया बनाते थे।
मीरा : राजकुमारी जी, वो चंदन के इत्र की दुकान तो आगे है। पहले वहाँ चलते हैं।
रत्नावती (हँसते हुए) : हाँ मीरा, और हाँ — मुझे राजकुमारी मत बोला करो यहाँ। यहाँ बस रत्ना हूँ मैं।
मीरा (मुस्कुराते हुए) : जैसी आपकी आज्ञा... रत्ना जी।
नैरेटर : दोनों हँसते हुए इत्र की दुकान की तरफ बढ़ रही थीं। बाज़ार की भीड़ में एक आदमी एक खंभे की आड़ में खड़ा था। काले कपड़े। झुकी हुई पीठ। आँखें जो हर तरफ घूमती थीं लेकिन जब रत्नावती पर टिकीं तो रुक गईं। यह सिंधु सेवड़ा था। भानगढ़ की पहाड़ियों की आड़ में रहने वाला तांत्रिक जिसका नाम सुनकर लोग रास्ता बदल लेते थे।
सिंधु सेवड़ा (धीरे से, खुद से) : इतने सालों में इतनी सुंदर चीज़ नहीं देखी। यह मेरी होनी चाहिए। होगी भी।
नैरेटर : सिंधु सेवड़ा वहाँ से चला गया लेकिन उसकी आँखें अभी भी रत्नावती के पीछे थीं। उस रात भानगढ़ की पहाड़ियों में उसकी कुटिया में आग जलती रही। खोपड़ियाँ, काले धागे, जड़ी-बूटियाँ — सब कुछ सामने था। वो घंटों मंत्र पढ़ता रहा। जंगल में सियार रोते रहे। और आखिरकार भोर से पहले उसे अपनी योजना मिल गई।
सिंधु सेवड़ा (रात को कुटिया में, आग के सामने) : वशीकरण। चंदन के इत्र में मंत्र। जैसे ही वो उसे लगाएगी — उसका मन मेरे काबू में होगा। राजकुमारी हो या देवी — कोई मेरे जादू से नहीं बच सकता।
नैरेटर : अगले दिन सुबह होते ही सिंधु सेवड़ा उस इत्र की दुकान पर पहुँच गया जहाँ रत्नावती अक्सर आती थी। दुकानदार ने उसे देखा तो पैरों तले ज़मीन खिसक गई। लेकिन उसमें इनकार करने की हिम्मत नहीं थी।
दुकानदार (घबराते हुए) : आइए... आइए गुरुजी। क्या... क्या चाहिए आपको।
सिंधु सेवड़ा : वो चंदन के इत्र की शीशी जो राजकुमारी के लिए रखी है। लाओ।
दुकानदार (काँपते हुए) : जी... जी गुरुजी।
नैरेटर : सिंधु ने वो शीशी उठाई। उस पर अपना सबसे शक्तिशाली वशीकरण मंत्र फूँका। सात काले धागे बाँधे। और फिर शीशी वापस रख दी जैसे कुछ हुआ ही ना हो। उसके होठों पर एक टेढ़ी मुस्कान थी।
सिंधु सेवड़ा : अब बस इंतज़ार है।
नैरेटर : सिंधु दुकान के बाहर भीड़ में छिपकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद रत्नावती और मीरा दुकान पर आईं।
मीरा : राजकुमारी जी वो चंदन का इत्र यहीं मिलेगा ना।
रत्नावती : हाँ मीरा, माँ ने यहीं से मँगवाया था पिछली बार।
दुकानदार (डरे हुए, जबरदस्ती मुस्कुराते हुए) : जी जी राजकुमारी जी... यह लीजिए।
नैरेटर : दुकानदार ने काँपते हाथों से शीशी आगे बढ़ाई। रत्नावती ने शीशी उठाई। और तभी उसके चेहरे पर एक अजीब भाव आया।
रत्नावती (शीशी सूँघते हुए, धीरे से) : मीरा... यह खुशबू अजीब है। चंदन के साथ कुछ और भी है। कुछ जला हुआ सा।
मीरा : क्या राजकुमारी जी।
रत्नावती (शीशी ध्यान से देखते हुए) : मीरा! इस शीशी पर काले धागे बँधे हैं। सात काले धागे।
मीरा (घबराते हुए, धीरे से) : राजकुमारी जी... यह तो काला जादू लगता है।
रत्नावती (तेज़ आवाज़ में) : फेंको इसे!
नैरेटर : रत्नावती ने शीशी ज़मीन पर दे मारी। काँच टूटा। इत्र बाहर बहा। और तभी भाग्य ने एक ऐसा खेल खेला जिसकी सिंधु सेवड़ा ने कल्पना भी नहीं की थी। वो इत्र एक नुकीले पत्थर से टकराया और उछलकर सीधे उस इंसान पर जा गिरा जो भीड़ में छिपकर खड़ा था। खुद सिंधु सेवड़ा पर। अपने ही वशीकरण का इत्र उसके चेहरे और कपड़ों पर गिरा। उसने एक भयावह चीख मारी।
सिंधु सेवड़ा (चीखते हुए, तड़पते हुए) : नहीं! नहीं!! यह क्या हुआ! यह मेरे ऊपर... नहीं!!
नैरेटर : तांत्रिक का शरीर लड़खड़ाया। जैसे किसी ने भीतर से आग लगा दी हो। वो ज़मीन पर गिरा। हाथ पाँव छटपटाने लगे। भीड़ में चीखें उठीं। लोग भागे। दुकानें बंद हो गईं। देखते ही देखते उस गली में सन्नाटा छा गया। और तब उस ज़मीन पर तड़पते हुए सिंधु सेवड़ा ने अपनी आखिरी साँसों में जो कहा वो सुनकर आसपास के बचे हुए लोगों की भी रूह काँप गई।
सिंधु सेवड़ा (मरती हुई आवाज़ में, श्राप देते हुए) : रत्नावती... तूने आज मुझे हराया। लेकिन यह तेरी आखिरी जीत होगी। सुन मेरा श्राप — इस भानगढ़ के हर इंसान की मृत्यु होगी। और मरने के बाद भी उनकी आत्माओं को मोक्ष नहीं मिलेगा। ये सब यहीं भटकेंगे इन्हीं खंडहरों में सदियों तक। जो भी यहाँ रात को आएगा वो इन आत्माओं का होकर रह जाएगा।
नैरेटर : और इतना कहते ही सिंधु सेवड़ा की साँस रुक गई। मीरा रत्नावती का हाथ थामे खड़ी थी। दोनों का रंग उड़ा हुआ था।
मीरा (काँपते हुए) : राजकुमारी जी... यह क्या हो गया। यह श्राप... क्या सच में।
रत्नावती (डरी हुई लेकिन खुद को संभालते हुए) : चलो मीरा। पिताजी को बताना होगा यह सब।
नैरेटर : रत्नावती और मीरा जल्दी से महल की तरफ चल पड़ीं। लेकिन उस दिन के बाद से भानगढ़ में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। पहले छोटी-छोटी मुसीबतें आईं। खेतों की फसलें बिना किसी वजह के सूखने लगीं। कुओं का पानी कम होने लगा। मवेशी बीमार पड़ने लगे। लोग परेशान थे।
पुजारी (राजा के दरबार में, चिंतित होकर) : महाराज, मंदिर में पूजा करते वक्त अजीब सी बेचैनी होती है। दीये अपने आप बुझ जाते हैं। घंटियाँ बिना छुए बजती हैं। नगर पर कोई भारी संकट आने वाला है।
राजा छत्र सिंह (गंभीरता से) : हवन करवाओ। पूरे नगर में विशेष पूजा होगी। किसी को भी घबराने की ज़रूरत नहीं।
नैरेटर : राजा ने हवन करवाए। ब्राह्मणों ने पूजाएँ कीं। मंदिरों में रात दिन दीये जलाए गए। लेकिन जैसे उस नगर की किस्मत पर मुहर लग चुकी थी और कोई भी उसे बदल नहीं सकता था।
रत्नावती (रात को अपने कमरे में, मीरा से) : मीरा मुझे डर लग रहा है। उस तांत्रिक ने जो श्राप दिया था वो मुझे भूला नहीं। कहीं वाकई कुछ अनहोनी ना हो जाए।
मीरा : राजकुमारी जी आप डरिए मत। पिताजी हैं ना। और भगवान भी हैं। कोई बुराई इस नगर का कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
नैरेटर : मीरा ने यह बात दिल से कही थी। लेकिन उसी रात दूर से युद्ध के नगाड़े सुनाई देने लगे। दुश्मन की फौज ने अँधेरे में आकर भानगढ़ पर हमला बोल दिया था।
सेनापति (घबराते हुए राजा के पास दौड़ते हुए) : महाराज! दुश्मन आ गया! चारों तरफ से घिर गए हैं हम! पूरब से भी पश्चिम से भी हज़ारों सैनिक हैं!
राजा छत्र सिंह (उठते हुए, तलवार उठाते हुए) : घबराओ नहीं! हर सैनिक अपनी जगह खड़ा रहे! भानगढ़ की रक्षा करो! मरना मंज़ूर है लेकिन झुकना नहीं!
नैरेटर : महल में हड़बड़ी मच गई। रत्नावती और मीरा अपने कमरे से बाहर आईं।
मीरा (रोते हुए, रत्नावती का हाथ खींचते हुए) : राजकुमारी जी भाग जाइए! यहाँ से भाग जाइए!! आप राजघराने की इकलौती बेटी हैं आपको बचना होगा!
रत्नावती (दृढ़ता से) : नहीं मीरा। मैं अपने लोगों को छोड़कर नहीं जाऊँगी। यह मेरा राज्य है, मेरी प्रजा है। मैं यहीं लड़ूंगी।
नैरेटर : रत्नावती ने भी हथियार उठाया और घोड़े पर सवार होकर अपने सैनिकों के साथ मैदान में उतरी। लेकिन दुश्मन की फौज बहुत बड़ी थी। एक-एक करके सैनिक गिरते गए। राजा छत्र सिंह शहीद हुए। और उस रात रत्नावती भी नहीं बची। जब सुबह हुई तो भानगढ़ नहीं था। वो नगर जहाँ कभी बाज़ारों में रौनक थी, मंदिरों में शंख बजते थे, बच्चे गलियों में खेलते थे — वो सब राख हो गया था। तांत्रिक का श्राप सच हो गया था।
नैरेटर : यह कहानी थी सैकड़ों साल पहले की। लेकिन भानगढ़ की कहानी वहाँ खत्म नहीं हुई। आज भी राजस्थान के अलवर जिले में वो खंडहर खड़े हैं। और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने उस जगह के बाहर एक बोर्ड लगाया है जिस पर लिखा है — सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले इस क्षेत्र में प्रवेश सख्त मना है। यह कहानी है आज से कुछ साल पहले की। दिल्ली में रहने वाले तीन दोस्त — अर्जुन, विक्रम और नेहा — एक weekend trip पर भानगढ़ आए थे।
अर्जुन (उत्साह में) : यार विक्रम देखो कितना शानदार है यह किला। दिन में देखो तो बस एक पुराना खंडहर लगता है।
विक्रम : हाँ यार। लेकिन तुमने वो बोर्ड देखा ना। शाम के बाद अंदर नहीं जाना।
नेहा (हँसते हुए) : अरे यह सब tourists को डराने के लिए लगाया होगा। ऐसी कोई चीज़ नहीं होती। चलो अंदर चलते हैं।
नैरेटर : तीनों दिनभर किले में घूमते रहे। तस्वीरें लीं, हँसे, बोले। शाम होते होते बाकी tourists चले गए लेकिन ये तीनों रुके रहे। अर्जुन ने अपना कैमरा निकाला।
अर्जुन : यार शाम की रोशनी में इसकी photos और अच्छी आएंगी। बस थोड़ी देर और रुकते हैं।
विक्रम : ठीक है लेकिन अँधेरा होने से पहले निकलना होगा।
नैरेटर : लेकिन कब शाम ढली और कब अँधेरा हो गया पता ही नहीं चला। तीनों बातों में खो गए थे। अचानक नेहा को लगा कि दूर एक कोने में कुछ हिला।
नेहा (धीरे से) : अर्जुन... विक्रम... वो देखो। उस दीवार के पास। कुछ है।
अर्जुन (हँसते हुए) : अरे यार बिल्ली होगी कोई। या हवा से पत्ते हिले होंगे।
नैरेटर : लेकिन नेहा की आँखें वहीं टिकी रहीं। वो आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। अर्जुन ने अपना कैमरा उस दिशा में किया और zoom in किया। और फिर उसके हाथ से कैमरा गिरते-गिरते बचा।
अर्जुन (घबराकर, धीरे से) : विक्रम... वो... वो इंसान नहीं है।
विक्रम : क्या मतलब।
अर्जुन (काँपते हुए) : उसके पाँव ज़मीन पर नहीं हैं।
नैरेटर : तीनों एक-दूसरे को देखने लगे। तभी दूर से एक आवाज़ आई। एक औरत की आवाज़। वही आवाज़ जो उन खंडहरों में सदियों से बंद थी।
अजनबी आवाज़ (दूर से, धीमी लेकिन साफ) : रुक जाओ। यह हमारी जगह है। चले जाओ यहाँ से। वरना यहीं रह जाओगे।
नेहा (चीखते हुए) : भागो!
नैरेटर : तीनों वहाँ से भागे। विक्रम का पाँव एक पत्थर में अटका और वो गिर पड़ा। अर्जुन और नेहा उसे उठाने के लिए रुके। तभी उन्हें महसूस हुआ कि कोई उनके पीछे-पीछे आ रहा है। पाँव के नीचे से ज़मीन ठंडी हो गई थी। हवा बंद हो गई थी। और वो आवाज़ अब और करीब थी।
अजनबी आवाज़ (और करीब से, धीरे-धीरे) : जाने नहीं दूँगी। यह नगर मरा नहीं। हम मरे नहीं।
नैरेटर : तीनों किसी तरह किले के मुख्य दरवाज़े तक पहुँचे और बाहर निकल गए। बाहर आते ही हवा वापस चलने लगी। ठंडक कम हुई। लेकिन तीनों की साँसें अभी तक नहीं थमी थीं। विक्रम ज़मीन पर बैठ गया।
विक्रम (हाँफते हुए) : वो... वो क्या था। मैंने खुद देखा। वो चीज़ हमारे पीछे आ रही थी।
नेहा (काँपते हुए) : मुझे नहीं पता। लेकिन मैं दोबारा कभी वहाँ नहीं जाऊँगी।
अर्जुन (कैमरा देखते हुए, चेहरा सफेद पड़ते हुए) : यार... मेरे कैमरे में जो photo है... उसमें वो आकृति साफ दिख रही है। और उसके पीछे और भी हैं। बहुत सारी। जैसे पूरा नगर अभी भी वहाँ हो।
नैरेटर : विक्रम और नेहा ने वो photo देखी। एक पुरानी ध्वस्त दीवार के सामने दस-बारह धुँधली आकृतियाँ खड़ी थीं। धुँधली लेकिन साफ। उनमें से एक आकृति किसी राजसी कपड़ों में थी। और उसका चेहरा कैमरे की तरफ था। जैसे वो जानती हो कि उसकी तस्वीर ली जा रही है।
नेहा (फुसफुसाते हुए) : वो photo delete कर दो अर्जुन। अभी।
अर्जुन : हाँ। हाँ कर देता हूँ।
नैरेटर : अर्जुन ने photo delete की। या कम से कम उसे ऐसा लगा। रात को जब तीनों hotel पहुँचे और अर्जुन ने अपना camera bag खोला तो उसके हाथ थम गए। कैमरे की memory card उसी photo पर open हो रही थी। जो photo उसने delete की थी वो अभी भी वहाँ थी। और इस बार उस आकृति की जगह photo में सिर्फ एक sentence लिखा था। जैसे किसी ने धुंध में उँगली से लिखा हो।
नैरेटर : लिखा था — 'तुम यहाँ आए थे। अब हम वहाँ आएंगे।'
kaun kaun padh raha hai?
nice story
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