एक भोले ब्राह्मण और तीन चालाक ठगों की कहानी — जिसने हम सबको सिखाया कि बार-बार सुनी गई बात भी झूठ हो सकती है, और अपनी आँखों पर भरोसा करना कितना ज़रूरी है।
एक छोटे-से गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। उसका नाम था — मित्रशर्मा। मित्रशर्मा बहुत धर्मनिष्ठ, ईमानदार, और सरल इन्सान था। पर उसमें एक कमी थी — वह बहुत भोला था। दूसरों पर तुरंत विश्वास कर लेता।
एक दिन उसके मन में आया कि एक यज्ञ करना चाहिए। यज्ञ के लिए एक स्वस्थ, सुंदर बकरी की ज़रूरत थी। वह पास के बड़े गाँव गया, जहाँ बकरी मिलती थी।
उस गाँव में वह एक चरवाहे के पास गया। उसने एक मोटी, स्वस्थ, सफ़ेद बकरी ख़रीदी। थोड़े दाम में, क्योंकि उसके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे।
"बहुत बढ़िया बकरी!" — उसने सोचा। "इससे यज्ञ अच्छी तरह होगा।"
उसने बकरी को अपने कंधे पर रखा। एक हाथ उसकी टाँगों पर, ताकि वह गिरे नहीं। और घर की तरफ़ चल पड़ा।
उसी रास्ते पर — जंगल के किनारे — तीन ठग बैठे थे। ये तीनों कुख्यात ठग थे। वे लोगों को धोखा देकर उनकी चीज़ें छीन लेते। उनके नाम थे — कालू, बालू, और चालू। तीनों एक से बढ़कर एक चालाक।
उन्होंने मित्रशर्मा को आते देखा। उसके कंधे पर बकरी। उनकी आँखें चमक उठीं।
"देखो! यह बकरी कितनी मोटी है। अगर हम इसे पा लें, तो आज की दावत हो जाएगी!"
"पर ब्राह्मण साधारण नहीं लगता। उसे सीधे बकरी देने को नहीं कहेंगे। और छीनना भी ख़तरनाक — पकड़े गए तो जेल।"
"फिर क्या करें?"
कालू ने एक चालाक मुस्कान दी। "मेरे पास एक उपाय है। ध्यान से सुनो।"
उसने अपनी योजना बताई — एक झूठ को बार-बार दोहराने की योजना। बालू और चालू ने सुनकर ज़ोर-ज़ोर से हँसा।
"ब्राह्मण इस झूठ को सच मान लेगा! बकरी हमारी हो जाएगी!"
तीनों ने अपनी जगहें तय कीं। कालू पहली जगह — जंगल के शुरू में। बालू बीच में। चालू अंत में।
मित्रशर्मा बकरी को कंधे पर रखे चलता आ रहा था। बकरी थोड़ी भारी थी। पर वह घर पहुँचने को उत्सुक था।
तभी — एक पेड़ के नीचे से — कालू निकल कर आया। वह सीधा मित्रशर्मा के पास आया। बहुत हैरान चेहरा बनाया।
"ब्राह्मण देव! आप यह क्या कर रहे हो?"
मित्रशर्मा ने रुककर देखा। "क्या? मैं तो बस अपने घर जा रहा हूँ। यज्ञ के लिए बकरी ले जा रहा हूँ।"
कालू ज़ोर से हँसा। फिर अचानक गंभीर हो गया।
"बकरी? कौन-सी बकरी? आप तो कंधे पर एक कुत्ता ले जा रहे हो!"
"क्या?" मित्रशर्मा हँसा। "तुम क्या बात कर रहे हो? यह तो बकरी है। मैंने अभी ख़रीदी।"
कालू ने सिर हिलाया। "ब्राह्मण देव! आप तो विद्वान हैं। बकरी और कुत्ते में फ़र्क नहीं समझते? यह स्पष्ट कुत्ता है। उसकी पूँछ देखो, मुँह देखो — कुत्ता है यह। आप एक ब्राह्मण होकर कंधे पर कुत्ता ले जा रहे हो? यह तो अशुभ है!"
मित्रशर्मा हक्का-बक्का। उसने अपने कंधे की तरफ़ देखा।
"पर मेरी आँखों से तो बकरी ही दिख रही है... तुम क्या बात कर रहे हो?"
"मैं ग़लत नहीं कह रहा। आप ज़रूर थक गए हैं। ध्यान से देखिए।"
मित्रशर्मा ने बकरी को घुमाकर देखा। मिमियाहट सुनी। हाँ, बकरी ही थी।
"नहीं भाई, यह तो बकरी ही है। तुम कुछ ग़लत समझ रहे हो।"
कालू ने मन में हँसते हुए कहा — "ठीक है। पर लोग हँसेंगे। जैसा आप ठीक समझो।"
और वह चला गया।
मित्रशर्मा अपनी राह पर आगे बढ़ा। पर अब उसके मन में थोड़ा संदेह था। "अजीब बात! यह आदमी इतने यक़ीन से कह रहा था। पर मेरी बकरी तो साफ़ दिख रही है..."
थोड़ी देर बाद वह जंगल के बीच पहुँचा। वहाँ — बालू एक पेड़ के पीछे से निकला। वह दौड़ा-दौड़ा आया।
"ब्राह्मण देव! रुको रुको! क्या आप पागल हो गए हो? कंधे पर कुत्ता क्यों ले जा रहे हो? यह बहुत बड़ा पाप है!"
मित्रशर्मा एकदम चौंका। "क्या? यह कुत्ता? पर यह तो बकरी है!"
बालू ने अपनी आँखें मलीं। "बकरी? आप मज़ाक कर रहे हो ना? यह एक कुत्ता है। काला, लंबा, पूँछ भी कुत्ते जैसी। बकरी कहाँ?"
"पर मैं बकरी ख़रीदकर ला रहा हूँ! एक चरवाहे से ख़रीदी मैंने!"
बालू ने कहा — "ब्राह्मण देव! वह चरवाहा आपको ठग गया। आपको कुत्ता बेच गया, बकरी कहकर! और आपने ध्यान से नहीं देखा। अब आप यज्ञ करोगे — एक कुत्ते से! यह घोर पाप है। आपका सारा पुण्य चला जाएगा।"
मित्रशर्मा घबरा गया। "क्या? पर मैंने तो ध्यान से देखा था..."
"ध्यान से देख कर ही ग़लती हुई होगी। अब घर पहुँचने से पहले फिर से देखिए।"
बालू ने सिर हिलाते हुए कहा — "मैं तो बस आपको सावधान करने आया हूँ। बाक़ी आपकी मर्ज़ी।"
और वह चला गया।
मित्रशर्मा अब और भी ज़्यादा संदेह में था। उसने बकरी को घुमाकर देखा। फिर भी बकरी ही दिखी। पर उसका मन हिलने लगा।
"दो लोगों ने कहा... क्या यह सच कुत्ता है? पर मेरी आँखों को बकरी क्यों दिख रही?"
थोड़ी और देर चलने के बाद — वह जंगल के अंत में पहुँचा। वहाँ — चालू खड़ा था। उसने मित्रशर्मा को देखकर अपना मुँह छिपा लिया, मानो किसी अप्रिय चीज़ से बचना चाहता हो।
"छि छि छि! ब्राह्मण देव! दूर हटो दूर! आप अपवित्र हो गए हो!"
मित्रशर्मा रुका। "क्या? क्यों?"
"आप एक कुत्ते को कंधे पर लेकर चल रहे हो! ब्राह्मण होकर कुत्ते के स्पर्श से अशुद्ध हो गए हो! अब तो आपको गंगा में जाकर शुद्धि करनी पड़ेगी।"
"पर — यह तो बकरी है!"
चालू ने ज़ोर से हँसा। "बकरी? यह कुत्ता है, स्पष्ट कुत्ता! क्या आप अंधे हो? या कोई बेवक़ूफ़ बना रहा है आपको? देखो भाई, मैं तो हट रहा हूँ। मुझे अशुद्ध नहीं होना है।"
और वह दूर हट गया।
अब मित्रशर्मा के मन की हिम्मत टूट गई। तीन-तीन लोगों ने एक ही बात कही — कुत्ता! क्या मेरी आँखें ग़लत हैं? क्या मैं भ्रम में हूँ?
उसने सोचा — "तीन लोग एक साथ ग़लत नहीं हो सकते। शायद वह चरवाहा सच में ठग था। शायद उसने मुझे कुत्ता बेच दिया। और मेरी आँखें मुझे धोखा दे रही हैं।"
उसके मन में गहरा डर बैठ गया। "अगर मैं कुत्ते से यज्ञ कर दूँ, तो मेरा सारा पुण्य ख़त्म! भगवान का अपमान होगा!"
उसने तुरंत बकरी को कंधे से उतारा। उसे ज़मीन पर रखा। फिर पीछे हट गया।
"नहीं नहीं! मैं इस अशुद्ध कुत्ते को घर नहीं ले जाऊँगा! जो भी इसे ले जाए, ले जाए।"
वह जल्दी से वहाँ से भाग गया। नहाने के लिए, शुद्ध होने के लिए, अपने पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए।
तीन ठग पेड़ों के पीछे छुपे थे। वे यह सब देख रहे थे। जैसे ही ब्राह्मण चला गया, वे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
"वाह! क्या योजना थी! बस तीन बार झूठ बोलना — और बकरी हमारी!"
"देखो — एक झूठ अगर तीन बार दोहराया जाए, तो लोग सच मान लेते हैं!"
तीनों ने मिलकर बकरी उठाई। अपने ठिकाने ले गए। उस रात उनकी मस्त दावत हुई।
मित्रशर्मा रो-रो कर अपने गाँव की ओर लौटा। उसने बहुत सारा पैसा खर्च करके बकरी ख़रीदी थी, और अब वह "कुत्ता" था। उसका दिल टूटा हुआ था।
रास्ते में उसे एक बूढ़ा साधु मिला। साधु को मित्रशर्मा का चेहरा उदास दिखा।
"बेटा, क्या हुआ? तुम इतने उदास क्यों हो?"
मित्रशर्मा ने पूरी बात सुनाई। तीन लोगों ने उसे बताया कि वह कुत्ता ले जा रहा है। उसने डरकर बकरी छोड़ दी।
साधु ने चौंककर पूछा — "तुम्हें क्या सच में लग रहा था कि वह कुत्ता है? या तुम्हारी आँखों में बकरी ही दिख रही थी?"
"बाबा, मेरी आँखों में तो बकरी ही दिख रही थी। पर तीन लोगों ने एक ही बात कही — मैं उन पर विश्वास करने लगा।"
साधु ने गहरी साँस ली।
"बेटा, तुम बहुत बड़े धोखे में पड़ गए। वो तीन ठग थे। उन्होंने एक झूठ को तीन बार दोहराकर तुम्हें फँसाया। उन्होंने जान-बूझकर तुमसे बकरी छुड़वाई।"
मित्रशर्मा को धक्का लगा। "ओह! मैंने अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं किया! दूसरों की बातें सुनकर अपनी समझ छोड़ दी!"
साधु ने कहा — "बेटा, यह आज की एक बड़ी सीख है तुम्हारे लिए। याद रखो —
"एक झूठ अगर बार-बार दोहराया जाए, तो वह सच लग सकता है। पर वह सच नहीं होता।
"दूसरों की बातों से ज़्यादा अपनी आँखों पर भरोसा करो।
"अगर तीन लोग भी एक ही बात कहें, फिर भी पहले अपनी आँखों से जाँचो।"
मित्रशर्मा ने साधु को धन्यवाद दिया। उस दिन से उसने अपनी समझ पर ज़्यादा भरोसा करना सीखा।
प्यारे बच्चों, इस कहानी से हम क्या सीखते हैं?
तो जब कभी तुम्हें कोई कहे कि "देखो, यह ऐसा है, वैसा है" — और तुम्हारी आँखें कुछ और कहें — तो रुक जाओ। एक बार ख़ुद से जाँच करो। पूछो, सोचो, समझो। फिर फ़ैसला करो। दूसरों की बातों में आकर अपनी सच्चाई मत खोओ!
॥ अपनी आँखें ही सबसे बड़ी गवाह हैं ॥
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