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मंजुलिका

F
Funtel
21 Mar 2026

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के पास बसा है एक छोटा सा गांव — मुरदिया।

शांत, सीधा-सादा गांव... लेकिन एक राज़ छुपाए हुए...

गांव के कोने में एक पुरानी हवेली है — टूटी-फूटी, वीरान...

दरवाज़े टेढ़े, दीवारों पर जाले, और खामोशी...

कहा जाता है, 1941 में, इसी हवेली की सामने वाले तालाब के ब्रिज से मंजुलिका को धक्का दे दिया गया था।

और तब से, मंजुलिका का साया… कभी हवेली की खिड़की में… तो कभी उस टूटे हुए ब्रिज पर दिखाई देता है।

"कई लोगों ने उसे देखा… लेकिन जिसने भी उसे देखा — अगली सुबह उसकी लाश उसी तालाब में तैरती मिली।"

—-------

"हल्की ठंडी हवा चल रही थी, झींगुरों की आवाज़ आ रही थी, और कहीं दूर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी। चाय की एक पुराने ठेले पर लालटेन की हल्की रोशनी टिमटिमा रही थी। चारों दोस्त — अर्जुन, रागिनी, अंकित और मीनल — गर्म चाय के कुल्हड़ हाथ में लिए हुए बेंच पर बैठे थे ।"

अर्जुन ने चाय की चुस्की लेते हुए, हल्की गंभीरता में कहा :
"अरे तुमने सुना? आज सुबह फिर एक लाश मिली है उसी तालाब में… वही ब्रिज के पास।"

रागिनी (थोड़ा चिढ़ते हुए):
"हा मैंने पढ़ा अख़बार में. पुलिस को कुछ करना ही नहीं है… हर चीज़ को ‘मंजुलिका का साया’ कहकर टाल देते हैं।

मीनल (सिर हिलाते हुए, हँसी में):
"सीरियसली यार! कौन सी सदी में जी रहे हैं हम लोग? आज भी लोग भूत-प्रेत, आत्मा इन सब चीज़ों पर यकीन करते हैं… कितना अंधविश्वास है, सब अनपढ़ों की बातें हैं।"

तभी पास से एक बूढ़ा आदमी — झुकी हुई कमर, गहरी झुर्रियों वाला चेहरा, और धँसी हुई आँखें — धीरे-धीरे ठेले के पास आता है।

तभी उस ठेले के पास एक बूढ़ा आदमी आता है... जिसकी कमर ज़मीन की तरफ झुकी हुई है... चेहरा झुर्रियों से भरा हुआ... और आँखें? जैसे अंदर समा गई हों… वो उन चार दोस्तों की तरफ देखते हुए केहता है

बूढ़ा : "हँसी उड़ाना आसान है, बाबू… पर उस हवेली में सिर्फ दीवारें नहीं हैं… वहाँ एक कहानी आज भी अधूरी है...

एक आत्मा है... जो अब भी इंतज़ार कर रही है… अपने धोखेबाज़ प्यार से हिसाब बराबर करने का।"

रागिनी (थोड़ा सन्न रहकर, धीरे से):
"कौन सी आत्मा काका...? क्या हुआ था उस हवेली में?"

काका एक गहरी सांस लेते हैं…लालटेन की टिमटिमाती लौ उनके चेहरे को रहस्यमय अंदाज़ में उजागर कर रही थी। बेहद धीमी, लेकिन भारी आवाज़ में उन्होंने बोलना शुरू किया…

बूढ़ा : "साल था... 1941. मंजुलिका उस गांव की सबसे खूबसूरत लड़की थी। उसकी आवाज़ में ऐसी मिठास थी... जैसे कानों में घंटियों की मधुर सी आवाज़ घुल जाए। और चेहरा? जैसे चाँद खुद ज़मीन पर उतर आया हो...

मंजुलिका को कृष्णा से प्यार हो गया था … दोनों एक-दूजे के बिना रह नहीं सकते थे। और एक-दूसरे में ही अपनी दुनिया देखते थे।

लेकिन किस्मत को शायद ये मंज़ूर नहीं था…… समाज ने उन्हें एक नहीं होने दिया।

मंजुलिका की शादी बचपन में ही तय हो चुकी थी… घरवाले ज़िद पर अड़े थे, और समाज तो जैसे दुश्मन बन गया था।

एक दिन, मंजुलिका ने कृष्णा से कहा —
'अगर साथ जी नहीं सकते… तो कम से कम साथ मर तो सकते हैं…'

कृष्णा ने भी हामी भर दी।

दोनों ने रात चुनी… हवेली के सामने वाला पुराना ब्रिज, और नीचे बहता गहरा तालाब।"

"मंजुलिका ने कृष्णा का हाथ थामा… और आंखों में आंसू लेकर मंजुलिका ने तालाब में छलांग लगा दी।

पर...

कृष्णा वहीं के वही खड़ा रहा। ना उसने छलांग लगाई, ना उसे रोका… बस चुपचाप खड़ा होकर देखता रहा…और फिर बोला — ‘चलो जान छूटी… बहुत परेशान कर रही थी।’

और दो दिन बाद ...

कृष्णा की लाश उसी तालाब में तैरती मिली।

चेहरा नीला पड़ा था…

"कहते हैं… मंजुलिका की आत्मा लौट आई थी।

प्यार में मिली बेवफाई का बदला लेने।

अब हर दिन… उसका साया ब्रिज पर दिखता है…

सफेद साड़ी, गीले बाल… और लाल डबडबाई आँखें।

और जिसने भी उसे देखा…

अगली सुबह उसकी लाश तालाब में मिलती है।

अर्जुन (हँसते हुए):
"यार… क्या स्टोरी सुनाई काका ने! मतलब सीरियसली — इतनी डिटेल, इतनी फीलिंग…अगर ये मूवी बनती ना, तो थिएटर में सीट से चिपक जाते सब। पूरा first-day-first-show वाला हिट होता!"

मीनल (हँसते हुए):
"सच में! एकदम जबरदस्त स्टोरी थी, हॉरर, थ्रिलर, सस्पेंस, प्यार सबकुछ था और वो आत्मा भी! और जिस तरह काका ने बताया… हर सीन मेरे दिमाग में विज़ुअल बन रहा था।Netflix पर आता तो मैं binge-watch कर डालती!

अंकित:
"और इस स्टोरी का प्लॉट... उफ्फ! भाई सच में — ऐसा लगा जैसे Conjuring और DDLJ की शादी हो गई हो! एक तरफ भूत... दूसरी तरफ इश्क़! वो मंजुलिका का ब्रिज वाला सीन ना... सुनते-सुनते मेरी चाय ठंडी हो गई! काका ने ऐसा डायलॉग मारा कि मैंने तो कुल्हड़ नीचे रख दिया — 'चलो जान छूटी...' [smirks] अबे ये कौन बोलता है भूतिया ब्रेकअप के बाद?"

रागिनी (हँसते हुए):
"तुम सब सीरियसली मान भी गए काका की डरावनी प्रेम कहानी को? मतलब... प्यार, धोखा, ब्रिज, आत्मा — और फिर क्लाइमैक्स में ‘चलो जान छूटी’? काका को Oscar दिलवा दो कोई!

Honestly — कहानी solid थी, entertainment full-on था। लेकिन भूत-प्रेत? C’mon guys… वो सब तो सिर्फ overactive imagination है।

मुझे तो लग रहा है काका Netflix binge करके आए हैं!"

मीनल (हँसते हुए): guys listen, चलो तो फिर आज मीटिंग फिक्स करते हैं मंजुलिका के साथ!"

काका धीरे से खड़े होते हैं...उनकी आँखों में चेतावनी... साफ़ झलक रही थी।चारों दोस्तों की ओर देखते हुए... काका ने सख्त लहजे में कहा —
"मज़ाक उड़ाओ बेटा, बहुतों ने हँसी उड़ाई थी... फिर वही हँसी... उनकी चीख में बदल गई। लेकिन एक बात अच्छी तरह से याद रखना उस हवेली के अंदर जाने का सोचना भी मत …

जो वहाँ गया, वो… कभी लौट के नहीं आया।"

अर्जुन (थोड़ा शरारती अंदाज़ में):
"बस यही तो देखना है, काका… कहीं मंजुलिका हमें भी पसंद ना कर ले!"

मीनल (काका की नकल करते हुए):
"सावधान बच्चा... हवेली जाग रही है..."
(सब फिर से हँसते हैं)

काका (गुस्से में):
"हँसो… लेकिन याद रखना, डर का मज़ाक जब हकीकत बनता है ना… तो हँसी सबसे पहले गायब होती है।"

अर्जुन (दोस्तों की तरफ देख कर):
"चलो! मंजुलिका को खुद बता देते हैं कि हम डरते नहीं — और झूठी कहानियों पर यकीन नहीं करते!"

अंकित:
"और अगर सच में भूत मिला, तो सबसे पहले मैं वीडियो बना के वायरल करूंगा!"

रागिनी:
"और अगर कुछ हुआ ना… तो याद रखना अर्जुन, तुम ही लीडर थे इस प्लान के!"

"चारों दोस्त बाइकों तक पहुँचते हैं। अर्जुन और अंकित बाइक स्टार्ट करते हैं। मीनल और रागिनी पीछे बैठती हैं। फिर दोनों बाइक्स अंधेरे रास्ते पर हवेली की ओर निकल पड़ती हैं… पीछे सिर्फ उड़ती धूल और सन्नाटा रह जाता है।"

काका ने उन्हें दूर से जाते हुए देखा, उनकी आँखों में डर साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था... और होंठों पर एक फुसफुसाहट के साथ उन्होंने कहा "अब इनमें से कौन लौटेगा… कौन नहीं… ये अब सिर्फ और सिर्फ मंजुलिका तय करेगी…"

रात करीब 12:15 का वक्त था। चांद बादलों के पीछे छिपा हुआ था। हवेली की तरफ जाने वाली पगडंडी पर चारों दोस्त — अर्जुन, रागिनी, मीनल और अंकित — बाइक रोककर पैदल चलने लगे। हवा में ठंडक बढ़ रही थी, और पुराने पीपल के पेड़ की डालियाँ सरसराती हुई उनके सिर के ऊपर झुक रही थीं।

क्या आप कभी किसी ऐसी जगह जाना चाहेंगे जहां आप जानते हैं कि आपसे पहले जो भी कोई गया कुछ ना कुछ अपना खोकर ही वापस आया और वहां का कुछ अपने साथ में लेकर आया

अंकित, रागिनी, अर्जुन और मीनल चारो दोस्त अब हवेली के सामने खड़े थे

"तो यही है वो राजविलास हवेली," अर्जुन ने मोबाइल की टॉर्च जलाई और टूटी-फूटी हवेली की ओर इशारा किया। "भूतों की संसद!"

"ये दरवाज़ा तो खुद कह रहा है — अंदर आओ, हम तैयार हैं," अंकित ने चुटकी ली।

मीनल (ने हँसते हुए कहा): शायद मंजुलिका इंतज़ार कर रही हो… नए मेहमानों के लिए," ।

"कसम से, मुझे यहां कुछ अजीब सा फील हो रहा है," रागिनी ने गर्दन घुमाकर पीछे देखा। "ये हवा… ये खामोशी… कुछ गड़बड़ है।"

अर्जुन: "Relax Ragini,", "डर तुम्हारे दिमाग का गेम है… कोई मंजुलिका-वंजुलिका नहीं होती।"

जैसे ही उन्होंने हवेली के गेट को धक्का दिया, लकड़ी का पुराना दरवाज़ा एक तेज़ चरमराहट के साथ खुला।और एक ठंडा हवा का झोंका अंदर से बाहर आया।

हवेली के अंदर सब कुछ धूल और बदबू में लिपटा हुआ था। छत से मकड़ी के जाले लटक रहे थे, दीवारों पर फटी हुई तस्वीरें और फर्श पर टूटी चूड़ियाँ बिखरी पड़ी थीं। हवा में एक अजीब सी गंध थी — जैसे भीगी मिट्टी और कुछ सड़ा हुआ।

अर्जुन ने झुककर एक चूड़ी उठाई।

अर्जुन: "ये देखो," "कहीं ये मंजुलिका की ही तो नहीं?"

रागिनी: "इतनी ठंडी हवा चल रही है... और ये महक," "जैसे कोई यहां... अब भी है।"

तीनों इधर-उधर देखने लगते हैं। अचानक अंकित बिना कुछ कहे एक कोने की ओर बढ़ता है। बाकी तीनों को महसूस भी नहीं होता कि वह कब नजरों से ओझल हो गया।

रागिनी (घबरा कर): “अरे... अंकित कहाँ गया?”

मीनल (चारों ओर देखती है):

“अभी तो यहीं था... अर्जुन?”

अर्जुन (आवाज़ लगाते हुए):

“अंकित! ओए अंकित!” - (Echo VOICE)

आवाज़ें हवेली की दीवारों से टकरा कर लौटती हैं। तीनों अब तेज़ी से अलग-अलग कमरों में झाँकते हैं। तभी एक पुराना दरवाज़ा खुद-ब-खुद चरमराकर खुलता है।

अंदर एक छोटा कमरा है… और वहाँ, कोने में बैठा अंकित दिखता है। वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा है, जैसे किसी अदृश्य ताकत से लड़ रहा हो।

रागिनी (हक्का-बक्का):“अंकित!! हम यहीं हैं!”

मीनल दरवाज़े की ओर बढ़ती है — लेकिन तभी… उसी क्षण, पीछे से किसीकी आवाज आती है —

अंकित: “क्या हुआ? तुम लोग यहाँ क्यों रुके हो?”

तीनों चौंककर पीछे मुड़ते हैं — और वहीं, उनके पीछे खड़ा है अंकित, सामान्य, बिल्कुल ठीक हालत में।

वे फिर से कमरे की तरफ देखते हैं — अंदर कोई नहीं है। वो खाली है। अर्जुन की साँस अटक जाती है।

मीनल:“जो अभी-अभी कमरे में चिल्ला रहा था… वो अगर अंकित नहीं था… तो कौन था?”

तीनों सन्न थे। कहीं दूर से… एक हँसी की आवाज़ आ रही थी

परदे अपने आप हिलने लगते हैं…


अर्जुन (धीरे, कांपती आवाज़ में):

“Guys… यहाँ कोई है… मैंने किसी को चलते देखा… वो यहीं था… अभी-अभी…”

वो पलटता है — और तभी उसके ठीक पीछे, करीब दस फीट की दूरी पर, सफेद साड़ी पहने एक औरत खड़ी दिखाई देती है। चेहरा अंधेरे में छिपा है, बाल भीगे हुए हैं, और उसके पैरों से पानी टपक रहा है।

अर्जुन उसे घूरता रह जाता है — वो औरत धीरे-धीरे मुस्कुराती है, जैसे वो अर्जुन को पहचानती हो।

तभी एक फुसफुसाती हुई आवाज़ हवा में गूंजती है —

“कृ...कृष्णा…” (इको में)

अर्जुन की टॉर्च एक झटके में बंद हो जाती है। पूरा गलियारा अंधेरे में डूब जाता है। उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं।

अर्जुन (घबराकर चिल्लाता है):

“ब-भागो! वो… वो यहाँ है! मंजुलिका!!”

बाकी तीनों दौड़कर उसके पास आते हैं। अर्जुन पसीने से भीगा हुआ काँप रहा है। उसके चेहरे पर डर की गहरी परछाईं थी…।

रागिनी (हाथ पकड़कर):

“क्या हुआ अर्जुन? तूने क्या देखा?”

अर्जुन (धीरे, जैसे खुद से बुदबुदा रहा हो):

“वो…वो… मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी… जैसे… जैसे वो मुझे जानती हो…”

रात थी... मगर सन्नाटा वैसा नहीं था जो रोज़ होता है। अर्जुन की खिड़की के बाहर खड़ा पीपल का पेड़ हरकत में था — जैसे कोई उस पर झूला झूल रहा हो।

अंदर कमरे में, अर्जुन की आँखें खुली थीं। वो सोया नहीं था। दो दिन से उसे नींद नहीं आई थी। क्योंकि हर बार जब वो आँखें बंद करता... उसे वही चेहरा दिखता। सफेद साड़ी, लाल डबडबाई आंखें, और वो मुस्कान — जो आत्मा से ज़्यादा किसी जुर्म की गवाह लगती थी।

आज भी कुछ बदला नहीं था। खिड़की से एक फुसफुसाहट आई — “कृ...ष्णा...”

अर्जुन ने देखा, अलमारी के पास वही आकृति फिर खड़ी थी। वो चीखा, लेकिन आवाज़ गले में अटक गई। और फिर — अंधेरा।

अगली सुबह, गांव के लोगों को तालाब के पास भीड़ लगी दिखी। पुलिस की जीप, फोटोग्राफर, और सफेद चादर के नीचे एक नीला पड़ा चेहरा — अर्जुन।

रिपोर्ट में लिखा गया: "घबराहट और मानसिक अस्थिरता की वजह से आत्महत्या।"

रागिनी देर तक उस रिपोर्ट को देखती रही। फिर उसने उसे फाड़ दिया।

“वो मर नहीं सकता... कम से कम ऐसे नहीं,” उसने बुदबुदाते हुए अपने फोन में नंबर डायल किया। “विक्रम, अर्जुन चला गया है... और मुझे सच जानना है।”


मुरदिया गांव एक बार फिर उसी डर में डूबा हुआ था। हवेली के आसपास कोई नहीं भटकता। चाय की दुकानें समय से पहले बंद हो जातीं, और गांववालों की जुबान पर फिर वही नाम चढ़ा था — मंजुलिका।

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