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ऐतिहासिक व जीवनी

महाराणा प्रताप — मेवाड़ का सिंह

Funtel
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कुम्भलगढ़ की एक चट्टान पर 9 मई 1540 को एक बच्चे ने जन्म लिया — महाराणा प्रताप। उनके सामने पीढ़ियों की विरासत थी, और उनके चारों ओर अकबर का बढ़ता साम्राज्य। चित्तौड़ की राख, उदयपुर की नई बुनियाद, गोगुन्दा का राज्याभिषेक, और फिर 18 जून 1576 की वह सुबह — हल्दीघाटी की संकरी घाटी, जहाँ चेतक नामक एक घोड़े ने अपने स्वामी की जान बचाई और स्वयं बलिदान दे दिया। भामाशाह जी का सम्पूर्ण कोष, झाला मन्ना का त्याग, जंगल के कठिन वर्ष, घास की रोटी, और फिर एक-एक करके हर क़िले की वापसी। दीवेर का युद्ध, कुम्भलगढ़ की पुनर्प्राप्ति, और चावंड में अंतिम शिविर। यह कहानी है उस राणा की — जो जीवन भर झुके नहीं। 30 अध्यायों में, सरल हिंदी में, मेवाड़ की मूल मर्यादा के साथ।

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जन्म और कुम्भलगढ़
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राजपूत बचपन और प्रशिक्षण
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मेवाड़ का संकट और चित्तौड़ का संघर्ष
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चित्तौड़ का तीसरा साका
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हल्दीघाटी का युद्ध — प्रथम पहर
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मानसिंह से सीधी टक्कर
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जंगल का जीवन और घास की रोटी
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अकबर के निरंतर आक्रमण और गुरिल्ला रणनीति
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दीवेर का युद्ध
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चावंड — नई राजधानी का जन्म
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अमरसिंह जी का उदय
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पारिवारिक जीवन — रानियाँ और संतानें
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जनसामान्य का प्रेम
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अकबर का अंतिम प्रयास
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अंतिम वर्षों का संघर्ष
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चावंड में अंतिम शिविर
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19 जनवरी 1597 — देहावसान
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विरासत — एक नाम जो अमर रहा
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