नैरेटर : ये कहानी है माया और उसकी जुड़वां बेटियों की... पाँच साल पहले एक ऐसी घटना घटी जिसने उनके पूरे जीवन को झकझोर कर रख दिया।
शारदा के पति रमेश की अचानक मौत की खबर आई। बताया गया कि वो किसी दुर्घटना में मारे गए… लेकिन ना तो कोई शव मिला, और ना ही अंतिम संस्कार हो सका।
बेटियाँ हमेशा इस बात को लेकर परेशान रहतीं थी—एक सवाल ऐसा था, जिसने उनके ज़हन में स्थायी जगह बना ली थी...
"अगर पापा की एक्सीडेंट में मौत हुई थी, तो फिर उनका शव कहाँ गया?"
शीतल : [soft, emotional tone] "मां... पापा को गए पाँच साल हो गए..." [long pause, strained voice] "लेकिन आज भी ऐसा लगता है... जैसे उनकी मौत के पीछे कोई... कोई बड़ा रहस्य छुपा है..." [shaky voice, questioning, breathy] "आख़िर क्या हुआ था उनके साथ...? तुम हमें बताती क्यों नहीं हो, मां...?" [short pause, voice cracks slightly] "हर रात सोचता हूँ... कहीं कुछ छुपाया तो नहीं गया..." [choking up, deeply emotional tone] "मेरा मन... ये मानने को तैयार ही नहीं होता कि पापा... इस दुनिया में नहीं रहे..." [voice drops, whispering] "ऐसा लगता है... जैसे वो अभी दरवाज़े से आ जाएंगे..."
माया : [low voice, emotional, slightly stern] “बेटा… मन वही मानता है जो उसे अच्छा लगता है।” [pause, sighs, voice cracks slightly] “पर ज़िंदगी में हर सच मीठा नहीं होता है…” [trembling voice, gently avoiding eye contact] “कुछ बातें ऐसी होती है जो… वक़्त आने पर ही बताई जाती हैं।” [trying to smile, emotional softness] “अब ये सब छोड़… तेरा टिफ़िन रखा है। कॉलेज पहुँच कर एक मैसेज कर देना… बस इतना कि ठीक से पहुँच गयी।”
शीतल : हम्ममम।
नैरेटर : अपने पिता की मृत्यु की बात को लेकर शीतल का मन हमेशा बेचैन सा रहता था। वो अनामिका के साथ कॉलेज गई लेकिन जब घर आई तब भी उसके दिमाग में यही सब बातें घूम रही थी। इसी वजह से उसे रात को ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी, रात के लगभग बारह बजे होंगे, तभी किचन से किसी के चलने-फिरने की आवाज़ आई।
शीतल: "इतनी रात को किचन में कौन है? माँ तो सो गई थीं, अनामिका भी यहीं है…कौन है वहा?"
नैरेटर :
शीतल के इतना कहते ही कुछ देर के लिए खामोशी छा गई... लेकिन तभी वही खटपट की आवाज़ फिर से आने लगी. वो चौंक गई। धीरे-धीरे बिस्तर से उठी और दबे पांव किचन की तरफ बढ़ी। अंधेरे में सिर्फ उसकी धड़कनों की आवाज़ साथ चल रही थी।जैसे ही उसने किचन के पास पहुंचकर झांका — उसे एक परछाईं मेन गेट की तरफ बढ़ती दिखाई दी।
शीतल (धीमे में, चौक कर): "क... कौन हो सकता है ये?"
डरते-डरते वो दरवाज़े की ओर बढ़ी और झांककर देखा...तो सामने उसकी माँ, अपने हाथों में एक थाली लिए, बाहर जा रही थीं। थाली को काले कपड़े से ढक रखा था। लेकिन...लेकिन जैसे ही शीतल ने ध्यान से देखा... उसकी आंखें चौड़ी हो गईं। उस थाली से... खून की बूंदें टपक रही थीं। गहरे लाल रंग की मोटी बूंदें... जो फर्श पर गिरते ही फैल रही थीं।
शीतल (मन में, कांपती सोच): "ये… खून है? लेकिन मां क्यों... थाली में क्या है? ये... ये तो कुछ और ही है… "
डर के मारे उसका शरीर पीछे को झटका खा गया। साँसें तेज़ हो गईं। वो खुद को दीवार से सटा कर छुप गई और सांस रोक ली… शीतल छुपकर देख रही थी…— माँ, उस थाली को संभाले, बिना एक शब्द बोले, धीरे-धीरे बाहर निकलीं... और बेहद सावधानी से दरवाज़ा बंद कर दिया।
शीतल (कन्फ्यूज) : "माँ… इतनी रात को… वो भी खून टपकती थाली लेकर… कहाँ जा रही हैं?" "ये कोई साधारण बात नहीं है... कुछ तो है, कुछ बहुत गड़बड़ है। क्या ऐसा कुछ है जो माँ सालों से हमसे छुपा रही हैं?"
[pause]
"वरना कौन माँ अपने ही बच्चों से छिपकर... आधी रात को ऐसे किसी अंधे रास्ते पर निकलेगी… और वो भी... एक खून से भरी थाली के साथ?"
[धड़कनें तेज़ होती हैं — SFX: धक-धक]
"पता नहीं क्यों, लेकिन मेरा दिल कह रहा है… ये सब… पापा की मौत से जुड़ा है। हाँ… यही है। अब और नहीं… मुझे सच जानना होगा!"
नैरेटर :
शीतल ने तुरंत अपना स्कार्फ सिर पर ओढ़ा, चेहरे को ढका... और दबे पांव घर से बाहर निकल गई।
गली में दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ था… सिर्फ कुत्तों की हल्की भौंक सुनाई दे रही थी। उसने देखा — उसकी माँ अगले मोड़ तक पहुँच चुकी थी। शीतल ने अंधेरे में खुद को दीवारों से चिपकाकर छिपते-छिपाते उसका पीछा शुरू किया। हर कदम पर उसका दिल धड़क रहा था —गांव की कच्ची सड़कों से होती हुई, उसकी माँ अब पुराने खंडहर की ओर बढ़ रही थी।
शीतल (खुद से धीमे से) :"आखिर माँ… खंडहर की तरफ क्यों जा रही है? आधी रात, खून टपकती थाली... और अब ये खंडहर...यह सब कुछ… बहुत डरावना है… लेकिन ऐसा क्या है वहां पर?"
नैरेटर :
शीतल खंडहर के पास एक सूखे पेड़ के पीछे चुपचाप छिपकर खड़ी हो गई। उसने देखा — उसकी माँ ने जो थाली अपने हाथों में पकड़ी हुई थी, उसे लेकर वो खंडहर के जंग लगे दरवाज़े के पास पहुँची। फिर उसने दरवाज़ा धीरे से थोड़ा सा खोला और थाली को अंदर सरका दिया। थाली ज़मीन पर खिसकती हुई भीतर गई… उसके बाद माँ ने दरवाज़ा जल्दी से बंद किया और तेज़ कदमों से बिना पीछे देखे वहाँ से निकल गई।
शीतल (खुद से धीमे से कन्फ्यूज) :
"ये माँ ने क्या किया...? थाली अंदर... किसके लिए सरकाई?" "अब तो मुझे पूरा यकीन हो गया है — माँ हमसे कुछ बहुत बड़ा छुपा रही हैं।
ये कोई आम बात नहीं है…" "मुझे अंदर जाना ही होगा… मुझे खुद देखना होगा… सच क्या है!"
नैरेटर :
शीतल ने गहरी सांस ली… और हिम्मत जुटाकर खंडहर का दरवाज़ा धीरे से खोला। जैसे ही वो अंदर दाखिल हुई —एक तेज़, सड़ी हुई बदबू ने उसका दम घोंट दिया। कमरे में लाशों की गंध पसरी हुई थी।
उसका सिर चकराने लगा, आँखें जलने लगीं। वो एक पल को रुकी… कुछ समझ ही नहीं पा रही थी।
और तभी — खंडहर के अंदर से एक अजीब, गहराई से आती डरावनी आवाज़ गूंजी।
[SFX: धीमी गुर्राहट – “घ्र्ररर…”]
शीतल का दिल ज़ोर से धड़कने लगा। आँखें कुछ देख नहीं पा रही थीं, लेकिन उसे महसूस हुआ कि कुछ भारी सा उसकी तरफ बहुत तेज़ी से आ रहा है।
अगले ही पल — एक झटके से किसी ने बाहर से उसका हाथ पकड़ा और पूरी ताकत से खींचकर उसे खंडहर से बाहर ले आया।
दरवाज़ा पीछे से ज़ोर से बंद हो गया। वो गिरते-गिरते बची… और सामने देखा — उसकी माँ थी।
माया (गुस्से में) : दिमाग खराब हो गया है क्या तेरा। आखिर तू करने क्या गई थी उस खंडहर में, अगर जरा सी भी चुक हो जाती ना तो खत्म कर देता वह तुझे।
शीतल (डरी हुई) : कौन मां, कौन खत्म कर देता मुझे और आखिर तुम यहां पर करने क्या आई थी। मैंने देखा तुम्हें, तुमने खंडहर का दरवाजा खोलकर वह थाली अंदर रखी और फिर दरवाजा बंद कर दिया लेकिन आखिर किसके लिए तुमने वह सब किया। और मैं जानती हूं यह तुमने पहली बार नहीं किया। बताओ मां मुझे सच जानना है, क्या ये सब पापा की मौत से जुड़ा हुआ है। बोलो मां।
माया (घबराई हुई) : मैं अभी तुझे कुछ नहीं बता सकती। रात का पहर है और ये खंडहर का इलाका है। यहां पर ज्यादा देर रुकना ठीक नहीं है। तू घर चल उसके बाद बात करते हैं।
नैरेटर : माया शीतल को घर लेकर आई। वो शीतल को कुछ भी बताना नहीं चाहती थी लेकिन शीतल अब पीछे नहीं हट सकती थी। वो हर उस राज को जानना चाहती थी जो उसके पिता के मौत के बाद उससे छुपाया गया।
"बोलो माँ… मुझे बच्चा मत समझो। क्या छुपा रही हो मुझसे? आधी रात को खून टपकती थाली लेकर खंडहर जाना… ये सब क्या है?"
माया :""मत पड़ इस सब में बेटी… ये सब बहुत खतरनाक हैं… मैं नहीं चाहती तू उस अंधेरे के पास भी जाए…
शीतल (सीरियस) : अगर यह खतरनाक है तो आखिर तुम यह सब कर ही क्यों रही हो और आखिर कौन है वहां जिसके लिए तुम ऐसा कर रही हो। बोलो, किसके लिए कर रही हो तुम यह सब।
नैरेटर : शीतल ने जैसे ही यह कहा तो माया की आंखों में आंसू आ गए।
माया (आंखों में आंसू) : यह सब मैं बस तेरे पिता को बचाने के लिए कर रही हूं बेटी। एक यही तरीका है उन्हें जिंदा रखने का, अगर एक दिन भी चूक हुई तो वह तेरे पिता को खा जाएगा।
शीतल (शॉक्ड) : क्या, इसका मतलब पापा जिंदा है तो तुमने मुझे और अनामिका को यह क्यों कहा कि पांच साल पहले पापा एक दुर्घटना में मारे गए। कहां हैं पापा, मुझे भी उनसे मिलना है।
माया (आंखों में आंसू) : कोई उनसे नहीं मिल सकता बेटी। वह कहने को जिंदा है लेकिन उनकी सांसे उसके हाथों में हैं। मैं नहीं जानती कैसे मैं तेरे पिता को वापस लेकर आऊंगी। ऐसा कौन सा तरीका है जिससे वो उसके चंगुल से बाहर निकल पाएंगे। पिछले पांच सालों से मैं बस तेरे पिता को बचाने का तरीका ढूंढ रही हूं लेकिन कोई तरीका मुझे समझ नहीं आ रहा।
शीतल (परेशान) : मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा मां। आखिर तुम क्या कहना चाहती हो। अगर पापा जिंदा है तो मैं भी उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करूंगी लेकिन तुम मुझे बताओ तो सही कि आखिर पापा है कहां और क्यों आप पांच साल से हमसे झूठ बोलती आई हो। क्या हो रहा है पापा के साथ।
Narration: शीतल की बात सुनकर माया थोड़ी देर चुप रही।उसकी आँखें दीवार की ओर जम गईं…माया ने गहरी साँस ली... और काँपती आवाज़ में कहा—
माया (आंखों में आंसू) : तू ठीक कह रही है, शीतल... बहुत कुछ है जो तुझे नहीं बताया गया...आज से ठीक पाँच साल पहले…
(फ्लैशबैक)
माया : ऐसा मत सोचो जी… एक नौकरी चली गई है तो क्या हुआ… कोई ना कोई रास्ता निकल ही आएगा. हमने पहले भी मुसीबत देखी है… इस बार भी देख लेंगे… बस आप टूट मत जाना…
गगन (परेशान) : चिंता नहीं करूं तो और क्या करूं माया। तुम जानती हो ना कि यह नौकरी भी मुझे कितनी मुश्किल से मिली थी। आजकल अनपढ़ लोगों को काम मिलना बहुत मुश्किल है और शीतल के इलाज के लिए मैंने जो पैसे कर्जे पर लिए थे, मुझे वह भी चुकाने हैं। अगर समय पर मैंने उनके पैसे नहीं चुकाए ना, तो वह लोग बहुत खतरनाक हैं। कुछ भी कर सकते हैं।
माया (चिंता) : तो फिर हम क्या करेंगे, आप अपने किसी दोस्त से मदद मांगिए ना। शायद कोई आपकी मदद कर दे।
गगन (परेशान) : पैसों के लिए कोई किसी का दोस्त नहीं होता माया। तुम्हें क्या लगता है मैंने क्या किसी से बात नहीं की होगी लेकिन कोई भी मदद नहीं करना चाहता।
नैरेटर : गगन परेशान होकर अंदर जाकर लेट गया। रात के लगभग ग्यारह बजे उसके पास उसके एक दोस्त का फोन आया जो बहुत समय से उसके कांटेक्ट में नहीं था।
गगन (कन्फ्यूज) : अरे, इतनी रात गए ये मुझे क्यों फोन कर रहा है।
गगन (कॉल रिसीव करके) : हेलो, कैसा है राकेश। सब कुछ ठीक तो है ना, रात के इस पहर तूने मुझे फोन किया।
राकेश : हां सब ठीक है लेकिन तेरे बारे में पता चला कि तू मुसीबत में है। मेरे पास तेरी मुसीबत हल करने के लिए पैसे तो नहीं है लेकिन एक तरीका है जिससे तेरी मुसीबत एक चुटकी में हल हो जाएगी।
गगन (शॉक्ड) : क्या, ऐसा कौन सा तरीका है। कहीं तू मुझे किसी गलत काम को करने के लिए तो नहीं कह रहा।
राकेश : अरे नहीं नहीं कोई गलत काम नहीं है। तू कल सुबह मेरे घर आजा, मैं तुझे सब बताता हूं।
गगन : अच्छा ठीक है। कल सुबह आता हूं। बाय।
नैरेटर : पूरी रात गगन यही सोचता रहा कि ऐसा कौन सा तरीका है जिससे उसकी सारी मुसीबतें एक चुटकी में हल हो जाएंगी। वो अगली सुबह उठकर राकेश के घर पहुंचा।
राकेश : मैं तेरा ही इंतजार कर रहा था।
गगन : अच्छा अब तो बता तू कैसे मेरी मदद कर सकता है। मतलब ऐसा क्या है जिससे मेरी सारी मुश्किलें हल हो जाएंगी। मेरे ऊपर पांच लाख रुपए का कर्जा है, वो उतर पाएगा ना।
राकेश : हां उतर जाएगा लेकिन तेरे पास सिर्फ एक मौका होगा, उससे कुछ भी मांगने का। मैंने उससे अपनी पत्नी की जान मांगी थी, याद है जब कोमल को जानलेवा बीमारी हो गई थी तब उसी ने उसे ठीक किया था।
गगन : किसने।
राकेश : देख भाई, कुछ चीजें ऐसी होती है जो भगवान हमें नहीं दे सकता लेकिन इस दुनिया में कुछ शक्तियां ऐसी भी हैं जो नामुमकिन को मुमकिन बना सकती हैं। पिछले साल मैं एक तांत्रिक के पास गया था। मैंने वहां से राक्षस का सौदा किया था, वो मेरी एक इच्छा पूरी कर सकता था और उसने मेरी वो इच्छा पूरी कर दी। मेरे पास अभी भी वह है, तू उसे ले जा और अपनी एक इच्छा पूरी कर ले।
गगन : इसमें कोई खतरा तो नहीं होगा ना राकेश।
राकेश : नहीं नहीं कोई खतरा नहीं है, बस उसे किसी ऐसी जगह पर रखना जहां ज्यादा कोई आता जाता ना हो। तुम्हारे अलावा उसे कोई छु न पाए।
गगन : ठीक है, मैं ध्यान रखूंगा।
नैरेटर : राकेश गगन को अपने घर के एक अंदरूनी कमरे में लेकर गया जहां गहरा अंधेरा पसरा हुआ था। उसने अपने फोन की टोर्च जलाई और वहां पर रखी एक संदूक को खोला जिस पर धूल जमी हुई थी। उस संदूक के भीतर काले कपड़े से ढका हुआ एक कलश था, उसने वह कलश उठाया और गगन की ओर बढ़ाते हुए कहा।
राकेश : आज से मैं इसे तुम्हें सौंप रहा हूं। अब तुम इसकी इच्छा पूरी करना। गगन, तुम इसे स्वीकार करो। क्या तुम अपने मन से इसे स्वीकार करते हो।
गगन : हां, मैं अपने मन से इसे स्वीकार करता हूं।
नैरेटर : गगन ने वो कलश लिया और उसे अपने झोले में रखकर वहां से निकल गया लेकिन जैसे ही वह राकेश के घर से निकला तो राकेश के चेहरे पर एक शैतानी हंसी छा गई।
राकेश (सनकी खुश) : मैंने तुम्हें बचा लिया कोमल, मैंने तुम्हें बचा लिया। अब गगन ने उसे स्वीकार कर लिया है, अब तो तुम वापस जिंदा हो जाओगी।
नैरेटर : राकेश खुश होता हुआ उस कमरे के अंदर बने एक दूसरे कमरे में गया जहां पर उसकी पत्नी का शरीर रखा था। लेकिन जैसे ही उसने उसे छुआ तो उसके छूते ही उसका शरीर बुरी तरह सड़ गया। ये देख कर राकेश के होश उड़ गए तभी कमरे में एक भयानक हंसी गूंजी। उसने पीछे मुड़कर देखा तो एक लंबे चौड़े कद का भयानक राक्षस उसकी और देखकर हंस रहा था।
राक्षस (क्रीपी हंसते हुए) : तुझे क्या लगा, तू अपनी बला किसी और पर डालेगा तो मैं इसे छोड़ दूंगा। तूने झूठ बोला उससे कि तू मुझे कहां से लेकर आया है, मुझे तो तेरी पत्नी लेकर आई थी ना इसलिए तो आज यह सब भुगत रही है और अब तो वह मारी गई। अब उसका भुगतना भी खत्म हो गया।
राकेश (डरा हुआ) : लेकिन तुमने तो कहा था कि अगर कोई तुम्हें स्वीकार कर लेगा तो तुम मेरी पत्नी को छोड़ दोगे। फिर तुमने उसे क्यों मार डाला।
राक्षस (क्रीपी हंसते हुए) : क्योंकि तुमने उससे झूठ बोला, अगर वह सच जानता और तब मुझे स्वीकार करता तब मैं तुम्हारी पत्नी को छोड़ देता। हा हा हा। मेरा पहला शिकार मारा गया पर अब मुझे अपने दूसरे शिकार के पास जाना है। अब तुम इसका क्रियाक्रम कर दो। हा हा हा।
नैरेटर : उस राक्षस ने कोमल की तरह ही गगन को भी अपने मौत के चक्रव्यूह में फंसा लिया है लेकिन क्या गगन इस चक्रव्यूह से कभी बाहर निकल पाएगा। क्या उसकी बेटी उसकी मौत और जीवन के बीच में फंसे राज को जानने के बाद अपने पिता को बचा पाएगी। जानने के लिए कहानी का अगला भाग जरूर देखिए।
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