लॉकवुड दूसरी बार वुदरिंग हाइट्स आता है — पर इस बार उसका सामना और भी अजीब लोगों से होता है। एक खूबसूरत पर रूखी युवती, एक गुस्सैल नौजवान, और एक भयानक तूफ़ान — जो उसे रात भर वहीं रोक लेगा।
पहली मुलाक़ात के एक दिन बाद — मैंने सोचा कि मुझे फिर से जाना चाहिए। शिष्टाचार बना रहे। और — सच पूछो तो — हीथक्लिफ़ का व्यक्तित्व मुझे थोड़ा कौतूहली बना रहा था। वह आदमी एक रहस्य था। और रहस्य मुझे हमेशा खींचता है।
तो मैं फिर निकल पड़ा। मूर पर बर्फ़ अब और गहरी हो गई थी। मेरे घोड़े के पाँव बार-बार धँसते। हवा आज और भी सर्द थी। पर मैंने ठान ली थी।
दोपहर के क़रीब — मैं फिर वुदरिंग हाइट्स पहुँच गया। दरवाज़े पर खटखटाने पर — एक रूखी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
"कौन है?"
"लॉकवुड। श्री हीथक्लिफ़ से मिलने आया हूँ।"
"वो घर पर नहीं हैं।"
आवाज़ अंदर से ही आई। पर दरवाज़ा नहीं खुला। मुझे बुलाया भी नहीं गया।
"क्या मैं अंदर थोड़ी देर रुक सकता हूँ? बहुत ठंडा है।"
एक लंबा सन्नाटा। फिर — भारी क़दमों की आवाज़। दरवाज़ा खुला। एक नौजवान आदमी सामने था। वही — जिसे कल मैंने देखा था। हेयरटन एर्न्शॉ। साँवला, लंबा, मज़बूत बदन का। पर कपड़े मज़दूरों जैसे — मिट्टी से सने, थोड़े फटे।
"अंदर आ जाओ," उसने रूखे स्वर में कहा।
मैं अंदर गया। और जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आया — मैं ठगा सा रह गया।
चूल्हे के सामने एक बेंच पर — एक खूबसूरत युवती बैठी हुई थी। शायद सत्रह-अठारह साल की। उसके बाल — सुनहरे-भूरे — एक जूड़े में बँधे हुए। उसकी आँखें — बड़ी, गहरी नीली, पर इतनी ठंडी कि मानो उनमें कोई भावना ही न हो। उसकी त्वचा — दूध जैसी सफ़ेद। उसके होंठ — गुलाबी, पर मज़बूती से दबे हुए।
वह कुछ बुन रही थी। लेकिन उसका चेहरा — एक मूर्ति जैसा। न मुस्कान, न उदासी, न क्रोध। बस एक खाली, थकी हुई शून्यता।
मैं ठहर गया। यह कौन है? इस कठोर हवेली में, इन क्रूर पुरुषों के बीच — यह नाज़ुक, सुंदर पंछी कैसे?
"नमस्कार," — मैंने हाथ जोड़े।
उसने एक बार मेरी तरफ़ देखा। बस एक पल के लिए। फिर अपनी बुनाई पर लौट गई। उसने जवाब नहीं दिया।
मैं उसके पास खाली कुर्सी पर बैठ गया। मैंने सोचा — यह शायद हीथक्लिफ़ की बीवी होगी। एक रईस आदमी है — कोई न कोई पत्नी होगी। मैंने एक हल्की बातचीत की कोशिश की।
"श्रीमती हीथक्लिफ़! मैं अब आपका पड़ोसी हूँ। थ्रशक्रॉस ग्रेंज पर। आज आपके पति से मिलने आया था, पर वो घर पर नहीं हैं।"
उसने मुझे एक तीखी निगाह से देखा। "श्रीमती हीथक्लिफ़?" उसकी आवाज़ में — एक चुभन थी। "मैं उसकी पत्नी नहीं हूँ।"
मैं हड़बड़ा गया। "ओह! क्षमा! मुझे लगा... तो आप — हेयरटन — आप इन सज्जन की पत्नी?"
हेयरटन — जो पास खड़ा था — चौंक गया। उसकी आँखें ग़ुस्से से लाल हो गईं। फिर एक भयानक हँसी। ज़ोरदार, खुली, कड़वी।
"मेरी पत्नी?" उसने कहा। "उसकी पत्नी? तुम बहुत मूर्ख हो, साहब! उसकी पत्नी होने की मेरी क़िस्मत कभी होगी नहीं।"
उसके स्वर में दुख था। एक गहरा, छुपा हुआ दुख। पर उसने तुरंत उसे कठोरता के नीचे दबा दिया।
मैं और भी हड़बड़ा गया। "तो... आप दोनों का क्या रिश्ता है?"
"मैं इसकी बहू हूँ," — युवती ने ठंडे स्वर में कहा। "लिंटन हीथक्लिफ़ की पत्नी। पर लिंटन — मेरा पति — मर चुका। तो अब मैं विधवा हूँ। और हेयरटन..." — उसने एक नफ़रत भरी निगाह से उसकी तरफ़ देखा — "हेयरटन मेरा 'चचेरा भाई' है। पर रिश्ते में — कुछ नहीं।"
मेरे दिमाग़ में सब घूम गया। यह एक बहुत उलझी हुई कहानी थी। श्री हीथक्लिफ़ की बहू — मतलब उनके बेटे की पत्नी? पर बेटा मर चुका। और हेयरटन — हीथक्लिफ़ का भतीजा है, पर इसका 'चचेरा भाई'? यह सब कैसे हुआ?
मैं और कुछ पूछना चाहता था। पर युवती ने स्पष्ट कर दिया था — वह बात नहीं करना चाहती थी। हेयरटन भी अपने काम में लग गया। एक भारी सन्नाटा कमरे में पसर गया।
थोड़ी देर बाद — दरवाज़ा खुला। हीथक्लिफ़ अंदर आया। बर्फ़ से लदा हुआ। उसका चेहरा सर्द हवा से लाल। पर — आज भी — उसकी आँखों में वही गहरी, उदास, क्रूर चमक।
"लॉकवुड? तुम फिर?"
"हाँ। मुझे लगा शिष्टाचार के लिए..."
"शिष्टाचार," उसने हँसकर कहा। "इस इलाक़े में शिष्टाचार ज़रूरी नहीं। पर अब आ ही गए हो — बैठ जाओ।"
उसने अपनी कुर्सी पर बैठ कर मुझे एक पल देखा। फिर युवती की तरफ़, फिर हेयरटन की तरफ़। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी अभिव्यक्ति आई — आधी ख़ुशी, आधी क्रूरता।
"देखता हूँ — तुम मेरी बहू और भतीजे से मिल चुके हो।"
"जी। पर मुझे थोड़ी हैरानी हुई — क्योंकि उन्होंने आपके बारे में कुछ नहीं बताया। मैंने सोचा था — वे आपकी पत्नी हैं।"
हीथक्लिफ़ ने ज़ोर से हँसा। पहली बार मैंने उसे सच में हँसते देखा। पर वह हँसी — कड़वी, क्रूर, मानो किसी पुराने ज़ख़्म को छेड़ने वाली।
"मेरी पत्नी? लॉकवुड, मेरी पत्नी अब इस दुनिया में नहीं है। और जो थी — वो बहुत साल पहले से नहीं है।"
उसकी आवाज़ में — एक अजीब सी कड़ुवाहट थी। एक टूटन। पर वह तुरंत संभल गया।
बातचीत आगे न बढ़ी। मैंने मौसम का बहाना किया कि अब मुझे चलना चाहिए। पर — खिड़की से बाहर देखा — और मेरे होश उड़ गए।
दिन तो दिन — दोपहर ही था — पर बाहर ऐसा अंधेरा छा गया था जैसे रात हो गई हो। बर्फ़ के तूफ़ान ने सब कुछ ढक लिया था। हवा सीटी बजा रही थी। खिड़की के शीशे थर्रा रहे थे।
"मैं वापस कैसे जाऊँगा?" मैंने अनिश्चित होकर पूछा।
हीथक्लिफ़ ने खिड़की की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। "तुम वापस नहीं जा सकते। मूरों पर ऐसे मौसम में मरना पड़ेगा। यहीं रुकना होगा।"
"क्या... क्या यहाँ कोई कमरा है?"
"कमरा कहाँ है? यहाँ हम तीन लोग रहते हैं। हर कमरा भरा हुआ। तुम्हें — एक पुरानी जगह में — वो छोटी कोठरी जो ऊपर है — रात गुज़ारनी पड़ेगी। उसमें कोई रहता नहीं।"
"क्या... कोई समस्या है उसमें?"
हीथक्लिफ़ ने मुझे एक अजीब सी निगाह से देखा। "कोई समस्या नहीं। बस — पुरानी है। बहुत पुरानी। और कोई वहाँ नहीं रहना चाहता।"
उसकी आवाज़ में कुछ था — एक चेतावनी? एक रहस्य? पर मैंने ज़ोर नहीं दिया।
हम सब साथ बैठकर खाने के लिए आए। एक बहुत बड़ी मेज़। उसके चारों कोनों पर हम चारों — हीथक्लिफ़, युवती, हेयरटन, और मैं। बीच में जोज़ेफ़ — खाना परोसता हुआ।
पर खाना खाते वक़्त — कोई बात नहीं हुई। एक अजीब, ख़ौफ़नाक चुप्पी।
हीथक्लिफ़ ने एक बार युवती की तरफ़ देखा। "कैथरीन," उसने ठंडे स्वर में कहा, "कुछ तो खा।"
"मैं भूखी नहीं हूँ।" उसने जवाब दिया।
"भूख न भूख। मरना नहीं चाहिए। तुम पहले से बहुत कमज़ोर हो।"
उसके स्वर में — एक अजीब-सा परवाह वाला तेवर था। पर साथ ही — एक धमकी। मानो "कमज़ोर हो जाना" — किसी और मक़सद के लिए ज़रूरी हो।
कैथरीन — वही नाम जो मेरे होशो-हवास में अब अंकित होने जा रहा था — चुपचाप खाने लगी। बिना मन के। बिना भूख के।
"कैथरीन" — मैंने मन में दोहराया। एक खूबसूरत नाम। पर इस घर में — यह नाम किसी ख़तरे की घंटी जैसा क्यों लग रहा था?
हेयरटन ने एक नज़र कैथरीन की तरफ़ डाली। उस नज़र में — मैंने पहली बार कुछ अलग देखा। एक छुपा हुआ प्यार? एक मायूसी? कुछ ऐसा जो उसकी कठोरता के नीचे दबा हुआ था।
पर कैथरीन ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। उसने अपने भोजन को घूरा। फिर उठकर बिना कुछ कहे चली गई।
"वह बहुत अकेली है," मैंने सहानुभूति से कहा।
हीथक्लिफ़ की आँखों में एक चमक आई। एक क्रूर, सख़्त चमक।
"उसका जो नसीब है, वही उसको मिल रहा है।"
उसने यह शब्द ऐसे कहे जैसे — कैथरीन के दुख में उसे आनंद मिलता हो। मानो वह दुख — किसी पुराने हिसाब का हिस्सा हो।
रात बहुत हो गई थी। हीथक्लिफ़ ने जोज़ेफ़ को आदेश दिया कि वह मेरे लिए ऊपर वाला कमरा खोल दे।
"वह कमरा? साहब! वह तो — वह तो उस का..." जोज़ेफ़ ने कहना शुरू किया।
"उसका जो भी हो," हीथक्लिफ़ ने उसे चुप कराया, "मेहमान को जगह तो देनी है।"
जोज़ेफ़ ने मुझे एक डरी हुई निगाह से देखा। उसने कुछ बुदबुदाया — कुछ धार्मिक बातें — फिर मेरी तरफ़ इशारा करके मुझे ऊपर ले जाने लगा।
सीढ़ियाँ संकरी और पुरानी थीं। हर क़दम पर लकड़ी चरमराती। दीवारों पर — अंधेरे में — मुझे लगा कि कुछ छायाएँ हिल रही हैं। शायद मेरा वहम। शायद नहीं।
आख़िरी सीढ़ी के बाद — एक संकरा गलियारा। उसके अंत में — एक छोटा-सा दरवाज़ा।
"यहीं," जोज़ेफ़ ने बुदबुदाया। "यहीं सोना है। और साहब! एक सलाह — रात में अगर कुछ सुनो... तो ध्यान मत दो। बस सो जाओ। समझे?"
"क्या सुनूँ?" मैंने पूछा।
पर जोज़ेफ़ चला गया।
मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर — एक बहुत पुरानी, छोटी कोठरी। एक लकड़ी का तख़्त। एक छोटी मेज़। एक खिड़की — जो ठंडी हवा के झोंकों से थर-थर काँप रही थी। और — एक अजीब, बक्से जैसा फ़र्नीचर — जो दीवार के साथ बना हुआ। यह असल में पुरानी देहाती परंपरा का एक "क्लोज़्ड बेड" था — चारों तरफ़ लकड़ी की दीवार, बीच में सोने की जगह, बंद होने पर एक केबिन जैसा।
मैंने उसके दरवाज़े को खोला। अंदर — एक तकिया, चादरें — पर सब बहुत पुराना। मानो सालों से कोई नहीं सोया।
तकिए के पास — दीवार पर — कुछ खुदा हुआ था। मैंने मोमबत्ती पास ले गया। पुरानी, खरोंची हुई — पर साफ़ — तीन नाम लिखे थे:
कैथरीन एर्न्शॉ
कैथरीन हीथक्लिफ़
कैथरीन लिंटन
तीनों नाम — एक के नीचे एक — किसी छोटी लड़की के हाथ की लिखावट। बेढंगी, अधूरी, पर इतनी सच्ची कि एक अनजान सी ठंडक मेरे शरीर में दौड़ गई।
तीन कैथरीन। एर्न्शॉ। हीथक्लिफ़। लिंटन।
क्या यह तीन अलग लोग? या एक ही — जिसने तीन नाम बदले? और क्यों?
मेरे मन में एक हज़ार सवाल उठ रहे थे। पर मैं इतना थका था कि सो जाना चाहता था।
मैंने मोमबत्ती बुझाई। तख़्त पर लेट गया। बक्से के दरवाज़े बंद किए। मैं अंधेरे, बंद, छोटे केबिन में अकेला था।
बाहर — हवा सीटी बजा रही थी। बर्फ़ के टुकड़े खिड़की पर टकरा रहे थे। और कहीं — दूर से — एक अजीब-सी आवाज़ आ रही थी।
एक रोने जैसी आवाज़।
एक स्त्री की आवाज़।
"हीथक्लिफ़..." कहीं से धीमे से सुनाई दिया।
मेरी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडक दौड़ गई। यह सिर्फ़ हवा थी — मैंने ख़ुद को समझाया। और मैंने आँखें बंद कर लीं।
पर — मुझे क्या पता था — कि उस रात, उस पुरानी कोठरी में — मेरे साथ कुछ ऐसा होने वाला था — जो मैं ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा।
"तीन कैथरीन। एक नाम। और एक भूत — जो आज भी, बीस साल बाद — खिड़की पर दस्तक दे रहा था।"
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