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Episode 1 2 min read 11 0 FREE

हॉन्टेड रेलवे स्टेशन

F
Funtel
21 Mar 2026

एक रात, एक स्टेशन, एक रहस्य

"रात के दो बजे, जब पूरी दुनिया नींद में डूबी होती है… कुछ स्टेशन ऐसे होते हैं जो जागते हैं… इंतज़ार करते हैं... अपने अगले शिकार का।"

दोस्तों, ये कहानी है राजीव और शालिनी की... जो एक रात एक सुनसान स्टेशन पर उतरे... लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनका ये सफर ज़िंदगी भर का सबसे डरावना अनुभव बन जाएगा।

"शिवनाथपुर रोड… एक नाम, जो शायद नक्शों से मिट चुका है… लेकिन उन लोगों की चीखों में अब भी ज़िंदा है… जो वहां आखिरी बार देखे गए थे।"

धीरे-धीरे रात गहराती जा रही थी... और उस स्याह रात को चीरती हुई एक ट्रेन तेज़ी से दौड़ रही थी। आमतौर पर रातें शांति से भरी होती हैं, लेकिन वो ट्रेन जैसे किसी डरावने रहस्य को अपने साथ ले जा रही हो।

ट्रेन के अंदर बैठे राजीव और शालिनी बेहद बोर हो चुके थे। क्यों न होते? वो ट्रेन, जो शाम 5 बजे पहुंचनी थी, रात के 2 बजे तक भी स्टेशन पर नहीं पहुंची थी।

शालिनी झुंझलाते हुए बोली, “ये इंडियन ट्रेन भी ना... पक गई हूं राजीव यार…”

राजीव भी थक चुका था। बोला, “मैं भी पक गया हूं यार... लेकिन हमारे पास ऑप्शन क्या था?”

शालिनी ने फिर से याद दिलाया, “मैंने कहा था ना फ्लाइट ले लो…”

राजीव ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “यार 19-19 हज़ार का टिकट... बजट ही बिगड़ जाता।”

शालिनी ने खिड़की से बाहर देखा, और फिर थोड़ी असहज होकर बोली: “आज कुछ अजीब लग रहा है… डिब्बा इतना खाली क्यों है? और ये ट्रेन रुकी क्यों है इतने देर से?”

तभी... प्लेटफार्म के स्पीकर से एक आवाज़ गूंजी: (ECHO VOICE) “यात्रीगण कृपया ध्यान दें... तकनीकी खराबी के कारण यह ट्रेन आगामी सूचना तक यहीं रुकेगी। कृपया सभी यात्री प्लेटफॉर्म पर उतर जाएं।”

शालिनी (चौंकते हुए): “ये स्टेशन कौन सा है? 'शिवनाथपुर रोड'? मैंने तो कभी नहीं सुना…”

राजीव (फोन निकालते हुए): “गूगल मैप पर भी नहीं आ रहा… ना लोकेशन दिख रही है, ना इंटरनेट काम कर रहा है…”

ट्रेन रुक चुकी थी। बाहर का प्लेटफॉर्म एकदम सुनसान पड़ा था। स्टेशन की लाइटें झपक रही थीं — जैसे किसी ने उन्हें जबरन ज़िंदा रखा हो। हर दो सेकंड में एक बल्ब बुझता... और फिर कांपती हुई रौशनी वापस लौटती। ना कोई कुली, ना कोई आवाज़, ना ही किसी स्टेशन मास्टर की मौजूदगी।

चारों ओर बस घनी धुंध पसरी थी... और दूर कहीं से आ रही थी कुत्तों की मद्धम, बेचैन कर देने वाली भौंक।

राजीव ने बैग उठाते हुए शालिनी से कहा: “घबराने की ज़रूरत नहीं… शायद वाकई कोई तकनीकी दिक्कत हो… चलो नीचे देखते हैं।”

जैसे ही वे दोनों सीढ़ियों से प्लेटफॉर्म पर उतरे, एक अजीब-सी सिहरन राजीव की गर्दन के पीछे से उतरकर रीढ़ तक चली गई — ना हवा थी, ना कोई हलचल — बस जैसे किसी ने पास खड़े होकर धीरे से सांस फूंक दी हो।

अगले ही पल… ट्रेन की सारी लाइट्स एक झटके में बंद हो गईं। और जैसे कोई सपना आंखों से फिसलता है… पूरी ट्रेन अंधेरे में लीन होकर गायब हो गई।

राजीव और शालिनी एक-दूसरे को देख रहे थे… स्तब्ध, जमे हुए… और पूरी तरह अकेले। उनके पीछे अब कोई ट्रेन नहीं थी… सामने — एक सुनसान स्टेशन, जिसकी दीवारों से धुंध रिस रही थी।

शालिनी की आंखें डरी हुई थीं। उसकी आवाज़ कांपी — “राजीव… ट्रेन कहां गई...? तुमने देखा...? वो ऐसे कैसे जा सकती है...?”

राजीव ने बोलने की कोशिश की, लेकिन गले से बस सूखी हवा निकली। उसने चारों ओर देखा — “ये... ये जगह... सही नहीं लग रही...”

शालिनी (धीमी आवाज़ में): “राजीव... देखो वो क्या है… प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर पर…”

राजीव ने नज़र दौड़ाई… धुंध के बीच… एक छोटी बच्ची खड़ी थी… सफेद मैला कपड़ा पहने… उसके हाथ में एक जली हुई डॉल थी… चेहरा अधजला… और आँखें… जैसे किसी गहराई में डूबी हों…

शालिनी (काँपती हुई): “ये… ये बच्ची कौन है…? इतनी रात को… अकेली…?”

बच्ची ने एक पल के लिए राजीव और शालिनी की ओर देखा… फिर धीरे-धीरे धुंध में पीछे हटने लगी… और अगले ही पल… गायब हो गई। लेकिन उसकी डॉल… अब भी प्लेटफॉर्म पर पड़ी थी… और उसमें से धुएं की हल्की लकीरें उठ रही थीं… जैसे वो अभी-अभी जली हो…

राजीव (डर और हैरानी से): “ये क्या हो रहा है… ये सपना है… या हम किसी मुसीबत में फँस चुके हैं?”

वो दोनों हक्के-बक्के खड़े थे... कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अभी-अभी जो हुआ, वो असल था या कोई भ्रम। और जैसे ही वो सोचने लगे... स्टेशन पर एक और अजीब चीज़ हुई। अचानक से... कई लोग स्टेशन पर उतरने लगे। सूटकेस, बैग और पोटलियां उठाए हुए। लेकिन ये लोग भी कुछ अजीब थे... जैसे बिना आवाज़ के चल रहे हों... जैसे उनकी मौजूदगी हवा में ठंडक फैला रही हो।

राजीव और शालिनी स्तब्ध रह गए। इतनी देर तक तो स्टेशन वीरान था, अब अचानक इतने लोग कहां से आ गए?

राजीव उन्हें घूरता रहा... लेकिन शालिनी की नज़र एक चीज़ पर ठहर गई... एक आदमी का हाथ उसके कंधे पर पड़ा...

और जब शालिनी ने मुड़कर देखा... वो हाथ... पूरी तरह से जला हुआ था। खाल उधड़ी हुई... हड्डियां दिखती हुईं...

शालिनी के मुंह से फिर एक जोरदार चीख निकली... “नहीं...!!!!”

शालिनी की चीख के कुछ ही सेकंड बाद, एक लाल कपड़ा पहने एक कुली उनकी ओर आता है।

"क्या हुआ मेमसाब? आप चीख क्यों पड़ीं? मैं कुली हूं... आपका सामान स्टेशन के बाहर निकाल दूं..."

उसकी आवाज़ भारी थी... लेकिन उसमें अजीब सी शांति थी, जैसे वो हर चीज़ पहले से जानता हो।

शालिनी ने घबराहट में जवाब दिया, "हां... हां... ले चलिए... कितने पैसे लेंगे?"

कुली मुस्कराया, "अरे मेमसाब, रात का समय है... जो सही लगे दे देना।"

वो उनके ट्रॉली बैग को उठाने ही वाला था कि राजीव की नज़र उसके पैरों पर पड़ी — उसके पैर ज़मीन से कुछ इंच ऊपर थे… वो हवा में तैर रहा था… बिना ज़मीन को छुए।

राजीव का चेहरा सफेद पड़ गया। उसका गला सूखने लगा। उसने शालिनी का हाथ कसकर पकड़ा और धीरे से कहा —

"शालिनी... यहां कुछ ठीक नहीं है... चलो यहां से..."

शालिनी ने भी जब उसके इशारे पर कुली के पैरों की ओर देखा... तो उसकी आंखें फैल गईं। वे दोनों बिना कुछ कहे तेजी से स्टेशन के बाहर की ओर दौड़ पड़े।

लेकिन स्टेशन के बाहर भी राहत नहीं थी… घना अंधेरा और धुंध चारों ओर फैली हुई थी। न कोई टैक्सी, न ऑटो… न ही कोई इंसान।

शालिनी हांफते हुए बोली, "राजीव… बाहर कुछ नहीं है... हम कैसे जाएंगे? रास्ता भी नहीं पता…"

राजीव ने फोन निकाला, "मैं गूगल मैप ऑन करता हूं… हमें किसी भी कीमत पर यहां से निकलना होगा।"

लोकेशन डालकर वे पैदल चलने लगे। लेकिन कुछ दूर चलने के बाद… उन्हें लगा कि कोई उनके पीछे चल रहा है।

शालिनी ने मुड़कर देखा — कुछ नहीं था। लेकिन डर अब उनके हर कदम के साथ बढ़ रहा था।

और तभी… स्टेशन पर जो लोग अभी ट्रेन से उतरे थे… वे अब उनके पीछे खड़े थे।

उनकी आंखें लाल थीं… चेहरों की खाल जली हुई… और होठों पर अजीब सी मुस्कान।

वे धीरे-धीरे घेरा बनाते हुए राजीव और शालिनी की ओर बढ़ने लगे। उनके मुंह से घुटी हुई, दरार-भरी आवाज़ें आ रही थीं।

शालिनी काँपते हुए बोली, "राजीव... ये कौन लोग हैं? क्या ये हमें मार देंगे?"

राजीव ने बस उसका हाथ कसकर पकड़ा और चिल्लाया — "भाग शालिनी... भाग!!!"

दोनों जान बचाकर भागने लगे… लेकिन अचानक शालिनी का हाथ राजीव से छूट गया।

राजीव पलटा… और उसकी रूह कांप गई — वे जले हुए लोग शालिनी को खींच रहे थे। वो चिल्ला रही थी,

"राजीव... बचाओ!!"

राजीव वहीं रुक गया। शालिनी को वो किसी कीमत पर नहीं खो सकता था। उसने आंखें बंद कीं, एक गहरी सांस ली… और पूरी ताक़त से उन भूतिया चेहरों की ओर दौड़ पड़ा।

उसने एक लकड़ी का टुकड़ा उठाया और हमला किया — लेकिन हर बार जब वो हमला करता, वे लोग धुएं में बदल जाते और अगले ही पल फिर सामने आ जाते… और भी ज़्यादा डरावने रूप में।

राजीव की सांसें तेज़ हो गई थीं… चेहरा पसीने में भीगा हुआ…

तभी — एक बूढ़ा आदमी सामने प्रकट हुआ। सफेद दाढ़ी, गहरी आंखें… और चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान।

उसने गंभीर आवाज़ में कहा — "तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था..."

राजीव कुछ कह पाता, उससे पहले ही वो फिर बोला — "यह स्टेशन अभिशप्त है... जो भी यहां आता है, वो कभी वापस नहीं जाता..."

राजीव की आंखें नम हो गईं। उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा — "प्लीज़… हमें जाने दो…"

बुज़ुर्ग की मुस्कान और गहरी हो गई — "बहुत देर हो चुकी है बेटा... अब कोई नहीं बचता…"

उसने आकाश की ओर देखा और बोला: "बहुत साल पहले… इस स्टेशन का नाम था 'शिवनाथपुर जंक्शन'…"

बुज़ुर्ग आदमी की आंखों में एक अजीब-सी नमी और डर था। उसने गहरी सांस लेते हुए बोलना शुरू किया:

"बहुत साल पहले… इस स्टेशन का नाम था 'शिवनाथपुर जंक्शन'। ये एक छोटा-सा लेकिन व्यस्त स्टेशन था, जो आसपास के चार गांवों को जोड़ता था। रोज़ाना यहां सैकड़ों लोग आया-जाया करते थे – किसान, मजदूर, व्यापारी… और बच्चे भी।"

"21 मार्च 1942… वो रात जैसे इतिहास से मिटा दी गई हो। उस रात एक विशेष ट्रेन आने वाली थी – 213 डाउन 'कालरात्रि एक्सप्रेस'।"

"ट्रेन सही समय पर प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर पहुँची। लेकिन जब स्टेशन मास्टर माधव राव और कुली लोग यात्रियों को नीचे उतारने गए… तो हर डिब्बे में सिर्फ जले हुए शव मिले।"

राजीव और शालिनी स्तब्ध थे। बुज़ुर्ग की आवाज़ काँप रही थी, पर वो बोलते रहे…

"डिब्बों से धुआं निकल रहा था… अंदर से किसी और ही दुनिया की चीखें आ रही थीं। कुछ कुलियों ने बताया कि खिड़कियों पर जली हुई उंगलियों के निशान थे… जैसे कोई बाहर निकलना चाहता था, लेकिन बच नहीं पाया।"

"माधव राव ने तुरंत अधिकारियों को खबर दी। लेकिन जब जांच टीम पहुँची… ट्रेन वहाँ नहीं थी। गायब हो चुकी थी।"

"और उसके एक हफ्ते बाद… स्टेशन मास्टर माधव राव ने आत्महत्या कर ली।"

उसने अपनी डायरी में लिखा था – 'ये स्टेशन अब पवित्र नहीं रहा… अमावस्या के दिन रात दो बजे जो ट्रेन आती है, वो मौत लाती है… मैंने ही उसका दरवाज़ा खोला था… अब कोई नहीं बचेगा।'"

"स्टेशन को बंद कर दिया गया। कुछ सालों बाद सरकार ने स्टेशन को फिर से चालू किया। नाम बदलकर कर दिया गया – "शिवनाथपुर रोड" ताकि पुराने किस्से दब जाएं।

लेकिन वो आत्माएं अब भी yahi hai…

और वो हर उस यात्री का इंतज़ार करती हैं –
जो रात के दो बजे वहाँ उतरता है…

"इतना कहते ही उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान फैल गई… और फिर वो धीरे-धीरे धुंध में घुलकर गायब हो गया… सिर्फ उसकी हँसी हवा में तैरती रह गई…"

राजीव ने फिर पीछे मुड़कर देखा – शालिनी की आंखों में डर और भरोसे का अजीब सा संगम था।

उसने फिर से शालिनी का हाथ थामा और पूरी ताकत से भागने की कोशिश की।

लेकिन अब उनके पैरों में जैसे ज़ंजीरें बंध चुकी थीं।

हर कदम भारी था…

हर दिशा एक बंद रास्ता बन रही थी।

अदृश्य शक्तियों ने जैसे उन्हें जकड़ लिया था।

थोड़ी ही देर में उनकी सारी शक्ति जवाब दे गई।

राजीव और शालिनी ज़मीन पर गिर पड़े।

चारों ओर से वे भूतिया चेहरे और जलते शरीर करीब आते जा रहे थे…

उनकी आंखों में अब बस एक सवाल था – क्या ये अंत है...?

धीरे-धीरे... अंधेरा छाने लगा...

उनके होश ढीले पड़ने लगे...

और फिर…

सब कुछ शांत हो गया।


उस रात के बाद… किसी ने उन्हें नहीं देखा।

ना स्टेशन पर कोई CCTV फ़ुटेज मिली…

ना कोई सुराग…

सिर्फ़ लोकल लोगों के बीच एक और दहला देने वाली कहानी जुड़ गई –
"जो भी उस स्टेशन पर रात के समय उतरता है… वो लौट कर नहीं आता..."

आज भी, जब रात के दो बजे उस स्टेशन पर ट्रेन रुकती है…

लोग खिड़की से बाहर झांकते तो हैं…

लेकिन उतरने की हिम्मत नहीं करते।

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