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दो भाई और एक पहाड़ी जंगल

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Funtel
12 ghante pehle

एक गरीब भाई, एक अमीर भाई, और जंगल की एक चट्टान — जिसके पीछे कुछ ऐसा छुपा था, जो किसी ने सोचा भी नहीं था।

दो भाई — दो ज़िंदगियाँ

बहुत पुरानी बात है। अरब के एक छोटे-से शहर में दो भाई रहते थे। बड़े भाई का नाम था क़ासिम। छोटे भाई का नाम था अली बाबा।

दोनों के पिता एक भले व्यापारी थे। पर जब वो गुज़रे — तो उनकी थोड़ी-सी विरासत दोनों भाइयों में बँटी।

क़ासिम ने अपनी विरासत के साथ एक अमीर व्यापारी की बेटी से शादी कर ली। बहुत बड़ा घर मिला। बहुत-सा सोना मिला। वो अब शहर के सबसे अमीर व्यापारियों में से एक था।

पर अली बाबा का भाग्य अलग था। उसने एक भली पर ग़रीब लड़की से शादी की थी। उसकी विरासत जल्द ख़त्म हो गई। उसने रोज़ी कमाने के लिए लकड़ियाँ काटने का काम शुरू किया।

हर सुबह वो अपने तीन गधों को लेकर पहाड़ी जंगल में जाता। दिन भर लकड़ियाँ काटता। शाम को बाज़ार में बेचता। जो थोड़े पैसे मिलते — उन्हीं से घर का चूल्हा जलता।

क़ासिम का दिल

क़ासिम जब भी अली बाबा को देखता — मुँह बना लेता।

"मेरा भाई एक मामूली लकड़हारा। शहर के लोग क्या कहेंगे?"

उसकी पत्नी और भी बुरी थी। वो अली बाबा की पत्नी से ठीक से बात नहीं करती।

"भाभी, तुम्हारे घर इतनी ग़रीबी क्यों है? कुछ काम-धंधा सीखो।"

अली बाबा की पत्नी बस मुस्कुरा देती। उसकी आँखों में आँसू होते — पर वो उन्हें छुपा लेती। अली बाबा को कभी नहीं बताती।

"मेरा अली बाबा भले ग़रीब हो — पर उसका दिल सोने जैसा है। मैं सबसे अमीर हूँ।"

एक अनोखा दिन

एक दिन — साधारण दिन की तरह — अली बाबा अपने तीन गधों को लेकर पहाड़ी जंगल में निकला। दूर एक चट्टानी इलाक़े में पहुँचा। वहाँ बहुत मोटी-मोटी सूखी डालियाँ थीं।

उसने अपनी कुल्हाड़ी निकाली। काम शुरू किया।

दोपहर हो गई। उसने अपना पोटली खोली। एक रोटी, थोड़ा-सा अचार, थोड़ा-सा पानी। बैठकर खाने लगा।

तभी — दूर से घोड़ों की टापें सुनाई दीं।

"घोड़े? इस सुनसान जंगल में?"

अली बाबा ने जल्दी से अपना खाना समेटा। अपनी कुल्हाड़ी एक तरफ़ रखी। और एक बहुत बड़े पेड़ की डालियों पर चढ़कर छुप गया।

वो जानता था — इस सुनसान जंगल में अच्छे लोग नहीं आते। डाकू आते हैं।

चालीस घोड़े, चालीस आदमी

थोड़ी देर में आवाज़ें पास आईं।

एक नहीं, दो नहीं — पूरे चालीस घोड़े आए। हर घोड़े पर एक आदमी सवार। काले कपड़े, चेहरे पर रूमाल, हाथ में तेज़ तलवारें।

हर घोड़े के पीछे एक भारी थैला बँधा हुआ था। बहुत भारी।

अली बाबा का दिल ज़ोर से धड़का। उसने पेड़ की डाल कसकर पकड़ ली।

डाकुओं के सरदार — सबसे बड़े डाकू — ने अपने घोड़े को रोका। वो एक बड़ी पत्थर की चट्टान के सामने था। बाक़ी डाकू उसके पीछे रुक गए।

सरदार घोड़े से उतरा। पत्थर के पास गया।

उसने अपनी आवाज़ ज़ोर से उठाई —

"खुल जा, सिम सिम!"

पत्थर का जादू

तीन शब्द। बस तीन।

पर एक चमत्कार हुआ।

वो विशाल पत्थर — जो साधारण-सा दिख रहा था — अपने आप एक तरफ़ खिसक गया। पीछे एक बड़ी, अंधेरी गुफा का मुँह दिखा।

एक के बाद एक — चालीसों डाकू अपने भारी थैले लेकर अंदर जाने लगे। सरदार सबसे आख़िर में।

अंदर जाते ही — उसने एक और शब्द कहा —

"बंद हो जा, सिम सिम!"

पत्थर अपने आप वापस अपनी जगह पर आ गया। गुफा का मुँह बंद हो गया।

अली बाबा ने जो देखा — उसे यक़ीन नहीं हो रहा था।

"ये क्या जादू है?"

वो पेड़ पर ही बैठा रहा। उसकी साँस रुकी हुई।

डाकुओं का बाहर निकलना

लगभग एक घंटे बाद — फिर वो शब्द सुनाई दिए।

"खुल जा, सिम सिम!"

पत्थर खिसका। डाकू बाहर निकले। पर अब उनके थैले ख़ाली थे। उन्होंने सब कुछ अंदर रखा था।

एक डाकू ने पीछे मुड़कर कहा —

"बंद हो जा, सिम सिम!"

पत्थर वापस अपनी जगह।

सरदार ने अपने घोड़े पर बैठते हुए कहा —

"ठीक है। तीन हफ़्ते बाद फिर मिलेंगे। तब तक हम दूसरी जगह काम करेंगे।"

चालीसों डाकू एक तेज़ रफ़्तार से जंगल से बाहर निकल गए। उनकी टापों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती गई।

आख़िर में — पूरा जंगल फिर से सुनसान।

अली बाबा का साहस

अली बाबा कुछ देर पेड़ पर ही रुका। पक्का होने के लिए कि कोई वापस तो नहीं आ रहा।

फिर वो धीरे-धीरे नीचे उतरा। उसके पैर काँप रहे थे।

उसने पत्थर की चट्टान को देखा। बहुत साधारण लगती थी। पर वो जानता था — पीछे कुछ बहुत बड़ा छुपा है।

उसने हिम्मत की।

"खुल जा, सिम सिम!"

पत्थर खिसका। गुफा का मुँह खुला।

अली बाबा अंदर गया। और जो उसने देखा — उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं।

पूरी गुफा सोने से, चांदी से, हीरों से, मोतियों से भरी थी। दीवार से दीवार तक। फ़र्श से छत तक। हर कोने में।

सोने के सिक्कों के पहाड़। चांदी की थालियाँ। हीरों की थैलियाँ। मोतियों की मालाएँ। बहुत महँगे रेशमी कपड़े। चमड़े के बैग।

ये सब — सालों से डाकुओं की लूट का माल।

अली बाबा कुछ पल खड़ा रहा। उसके मन में पहली बात आई —

"भगवान! इतना सब! पर ये सब डाकुओं का चुराया हुआ है। मैं इसे कैसे ले लूँ?"

फिर उसने सोचा — "पर मैं तो ग़रीब हूँ। मेरी पत्नी ने महीनों से अच्छा खाना नहीं खाया। बस कुछ थोड़ा-सा ले लूँ। बस इतना कि घर का गुज़ारा हो जाए।"

उसने अपने तीन गधों को बाहर से बुलाया। हर गधे पर दो छोटे थैले। उसने सोने के सिक्कों से हर थैला आधा भरा। पूरे गधे पर डाला नहीं — डर था कि गधे का बोझ देखकर कोई शक न करे।

तीनों गधे लदे। अली बाबा ने ऊपर लकड़ियाँ रखीं — ताकि बाहर से कुछ भी न दिखे।

बाहर निकलकर उसने कहा — "बंद हो जा, सिम सिम!"

पत्थर बंद हुआ।

अली बाबा एक नया आदमी था। उसकी ज़िंदगी अब बदलने वाली थी।

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