एक बेजान शरीर, एक बूढ़ा मोची, और एक नौकरानी मरजीना — जिसकी होशियारी ने पूरे परिवार की इज़्ज़त बचा ली।
क़ासिम गुफा के अंदर बंद था। उसे बाहर निकलने का शब्द याद नहीं आ रहा था।
बाहर — चालीस डाकू अपनी गुफा के सामने पहुँचे। सरदार ने हमेशा की तरह कहा —
"खुल जा, सिम सिम!"
पत्थर खिसका। और गुफा का मुँह खुलते ही — उन्हें अंदर एक आदमी दिखा।
क़ासिम ने एक झटके से बाहर निकलने की कोशिश की।
पर डाकुओं ने उसे रोका। उन्होंने उसे पकड़कर अंदर ले गए। उसका सब सोना देखा।
"तू कौन है? तू हमारे ख़ज़ाने में कैसे आया?"
क़ासिम कांप उठा। पर बोला नहीं।
सरदार ने तलवार निकाली।
"बोल! कौन ने बताया तुझे ये जादू?"
क़ासिम चुप।
"नहीं बताएगा? तो ठीक है। ये तेरा अंत है।"
उसी रात — जंगल में — क़ासिम का अंत हो गया।
डाकुओं ने उसके शरीर के चार टुकड़े किए। चारों टुकड़ों को गुफा के दरवाज़े पर लटका दिया।
"जो भी अगला आएगा — डर के मारे वापस भागेगा।"
फिर वो सब निकल गए।
उधर शहर में क़ासिम की पत्नी रात भर इंतज़ार करती रही। पर क़ासिम नहीं लौटा।
दूसरी सुबह — आधी पागल हो गई। दौड़ती हुई अली बाबा के घर पहुँची।
"अली बाबा! तेरा भाई कहाँ है? वो कल जंगल गया था!"
अली बाबा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"भाभी, मैंने उसे रोका था। पर वो सुना नहीं।"
"मुझे ले चल वहाँ! जल्दी!"
अली बाबा ने अपने तीन गधे तैयार किए। दोनों चल पड़े।
दोपहर तक वो गुफा पहुँचे। अली बाबा ने ज़ोर से कहा — "खुल जा, सिम सिम!"
पत्थर खिसका। और जो दृश्य अंदर था — दोनों के पाँव से ज़मीन खिसक गई।
क़ासिम के शरीर के चार टुकड़े दरवाज़े पर लटके थे।
क़ासिम की पत्नी एक चीख निकालकर ज़मीन पर गिर पड़ी।
अली बाबा रोने लगा। पर उसे जल्दी हिम्मत संभालनी पड़ी।
"भाभी, अब रोने का वक़्त नहीं। हम जल्दी से शरीर उठाएँ। वापस घर ले चलें। उसका सम्मान से अंतिम संस्कार करें।"
उसने एक मोटा कपड़ा बिछाया। शरीर के चारों टुकड़े उस पर रखे। एक बड़े थैले में बंद किए। एक गधे पर लादा।
दूसरे गधे पर थोड़ा-सा सोना लादा — ताकि भाभी और भतीजे का गुज़ारा हो सके।
"बंद हो जा, सिम सिम!"
दरवाज़ा बंद हुआ।
तीनों — अली बाबा, भाभी, गधे — रात तक शहर लौटे।
घर पहुँचकर अली बाबा ने अपनी पत्नी को सब बताया। पत्नी की आँखों में आँसू।
"अली बाबा, अब बड़ी समस्या है। अगर लोग देखेंगे कि क़ासिम के शरीर के चार टुकड़े हैं — तो सबको शक होगा। डाकुओं की कहानी सब को पता चल जाएगी। फिर वो हमें ढूँढ लेंगे।"
"तो क्या करें?"
"हमें इस शरीर को इस तरह सिलना होगा कि वो साधारण मौत जैसा दिखे। फिर हम कह सकेंगे — क़ासिम बीमार पड़ा था। बस।"
अली बाबा सोचने लगा। फिर उसकी पत्नी के दिमाग़ में कुछ आया।
"भाभी के घर एक बहुत अच्छी नौकरानी है। मरजीना। वो हर तरह से होशियार है। और हमारी राज़दार है। उसे बुलाएँ।"
मरजीना एक नौकरानी थी, पर उसकी उम्र पच्चीस-छब्बीस साल। उसकी आँखें चमकीली, उसका दिमाग़ बहुत तेज़, और उसकी हिम्मत किसी आदमी से कम नहीं।
क़ासिम की पत्नी ने उसे बुलाया। पूरी कहानी सुनाई।
मरजीना ने एक भी पल बर्बाद नहीं किया।
"मलिका, मेरी बात सुनिए। आप दोनों चुप रहिए। मैं सब काम करूँगी। एक भी इंसान को सच नहीं पता चलना चाहिए।"
उसने पहले एक हकीम को बुलाया। उससे कहा —
"मेरे मलिक — क़ासिम बेग — बहुत बीमार हैं। ज़रा कोई दवा दीजिए।"
हकीम ने दवा दी।
दूसरे दिन वो फिर हकीम के पास गई। और बहुत उदास चेहरे से।
"हकीम साहब, उनकी हालत और बिगड़ गई।"
उसने एक और तेज़ दवा माँगी।
तीसरे दिन वो फिर गई।
"हकीम साहब, मेरे मलिक अब नहीं रहे।"
हकीम ने सोचा — हाँ, मेरी दवाओं से वो ठीक नहीं हुए। साधारण मौत है।
उसके मन में एक भी शक नहीं हुआ।
पर मरजीना का असली काम अब आया था। शरीर के चार टुकड़ों को सिलना। ताकि कोई धोबी, कोई स्नान कराने वाला, कोई कब्रिस्तान का इंसान — किसी को कुछ शक न हो।
मरजीना ने शहर के एक बहुत बूढ़े मोची को सोचा। उसका नाम था बाबा मुस्तफा। उसकी आँखों की रोशनी कमज़ोर। पर उसका हाथ बहुत साफ़ था।
वो बाज़ार गई। बाबा मुस्तफा को मिली।
"बाबा, एक काम है। पर एक शर्त है — काम की जगह आपको मैं अपने हाथों से बता नहीं सकती। मैं आपकी आँखें कपड़े से बंद करूँगी। आपको लेकर जाऊँगी। काम कराऊँगी। फिर वापस लाऊँगी। बदले में आपको दस सोने के सिक्के मिलेंगे।"
बाबा मुस्तफा ने पहले मना किया। पर दस सोने के सिक्के बहुत बड़ी रकम थी।
"ठीक है, बेटी।"
मरजीना ने उसकी आँखें बाँधीं। एक पतली गली से, फिर दूसरी, फिर तीसरी — कई मोड़ लेते हुए — उसे क़ासिम के घर ले गई। ताकि उसे रास्ता याद न रहे।
घर पहुँचकर मरजीना ने आँखें खोलीं।
"बाबा, ये देख। मेरे मलिक का शरीर। बीमारी से इसमें कुछ टुकड़े हो गए हैं। आपको इसे ऐसे सिलना है कि कोई पहचान न पाए।"
बाबा मुस्तफा ने ध्यान से देखा। फिर अपना सुई-धागा निकाला।
उसके पुराने हाथों ने एक के बाद एक — सब टुकड़े जोड़े। बहुत ही साफ़, बहुत ही महीन सिलाई। ऐसी कि कोई इंसान चश्मे से भी देखे — उसे टांका न दिखे।
दो घंटे की मेहनत। शरीर तैयार।
"बेटी, मेरा काम पूरा हुआ।"
"बाबा, धन्यवाद। ये दस सिक्के।"
मरजीना ने उसकी आँखें फिर बाँधीं। उसी राह से वापस उसकी दुकान पर ले गई। आँखें खोल दीं।
"बाबा, एक काम और। ये बात किसी को भी नहीं बतानी।"
"वादा, बेटी।"
उसी दोपहर क़ासिम का अंतिम संस्कार हुआ। पूरा शहर आया। सब बहुत दुखी।
"क़ासिम साहब इतनी जल्दी चले गए। हकीम साहब ने तो दवा दी थी।"
"साहब बीमारी से लड़ते-लड़ते थक गए।"
किसी को कुछ शक नहीं हुआ।
क़ासिम की पत्नी और उसका छोटा बेटा अली बाबा के घर रहने लगे। अली बाबा ने उन्हें अपने ही परिवार जैसा अपनाया।
मरजीना भी अली बाबा के घर आ गई। उसकी होशियारी अब परिवार की रक्षक बन गई।
पर एक बात — डाकुओं को नहीं पता था कि उनके मारे गए आदमी का शरीर किसी ने उठा लिया है। पर जब उन्हें ख़बर मिलेगी — तब क्या होगा?
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