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सोने का तराज़ू और एक छोटी-सी चूक

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12 ghante pehle

एक उधार लिया तराज़ू, एक छोटा-सा सोने का सिक्का — और क़ासिम के मन में जलता हुआ शक।

घर पर ख़ुशी

अली बाबा अपने तीन गधों को लेकर शाम तक घर पहुँचा। उसने दरवाज़ा बंद कराया। फिर अपनी पत्नी को सब कुछ बताया।

"पत्नी! आज जो हुआ — सोचकर भी नहीं समझ में आता।"

उसने थैले खोले। पूरा घर सोने की चमक से जगमगा उठा।

पत्नी की आँखें फट गईं।

"अली बाबा, ये कहाँ से?"

उसने पूरी कहानी सुनाई। डाकू, जादुई पत्थर, खुल जा सिम सिम, गुफा।

पत्नी का चेहरा कभी ख़ुशी से, कभी डर से बदलता रहा।

"मेरे प्यारे, ये बात किसी को नहीं पता चलनी चाहिए। एक भी इंसान को नहीं। नहीं तो वो डाकू हमारी जान ले लेंगे।"

"हाँ। वादा।"

"अब हम इन्हें कहाँ रखेंगे?"

"पीछे आँगन के नीचे एक गड्ढा खोदेंगे। वहीं छुपाएँगे।"

पत्नी ने सिर हिलाया।

तराज़ू उधार लेने जाना

पर एक बात पत्नी के मन में थी।

"अली बाबा, मुझे एक काम करना है। ये सिक्के देखकर मुझे लगता है — हम पहले इन्हें गिनकर रख लेते हैं। ताकि हमें पता हो कितने हैं।"

"पर इतने सिक्के गिनना तो मुश्किल है।"

"तौल लेते हैं।"

"तौल? पर अपने पास तराज़ू नहीं।"

"भाभी से माँग लेती हूँ। वो जुड़े-घर वाली। उनके पास तो हर तरह के तराज़ू।"

अली बाबा को थोड़ा अजीब लगा।

"पर भाभी को क्या बताएँगे — हम क्या तौल रहे हैं?"

"कुछ नहीं बताऊँगी। बस तराज़ू ले आऊँगी।"

पत्नी अगले दिन क़ासिम के घर पहुँची। दरवाज़े पर क़ासिम की पत्नी खड़ी थी।

"भाभी, नमस्ते। एक छोटा-सा काम था। ज़रा अपना तराज़ू उधार दे दीजिए। शाम तक लौटा दूँगी।"

क़ासिम की पत्नी ने तंग होकर देखा।

"तराज़ू? तुम्हारे ग़रीब घर में तराज़ू की क्या ज़रूरत?"

"भाभी, बस एक छोटा-सा काम है।"

"क्या काम?"

"बस... कुछ।"

क़ासिम की पत्नी का शक बढ़ गया।

"ठीक है। तराज़ू दूँगी। पर अभी रुक।"

उसने अंदर जाकर एक तरकीब निकाली। तराज़ू के तले पर — जहाँ आम तौर पर कुछ नहीं चिपकता — उसने थोड़ा-सा शहद लगाया। फिर तराज़ू अली बाबा की पत्नी को थमाया।

"बहन, ले। शाम तक वापस।"

अली बाबा की पत्नी को कुछ शक नहीं हुआ। वो धन्यवाद कहकर लौट गई।

एक चिपका हुआ सिक्का

घर आकर पति-पत्नी ने सोने के सिक्के तौलना शुरू किए। एक थैला, दो थैले, तीन थैले।

तौल पूरी हुई। पत्नी ने तराज़ू साफ़ किया। ख़ुशी-ख़ुशी क़ासिम के घर लौटाने पहुँची।

"भाभी, तराज़ू वापस। बहुत-बहुत धन्यवाद।"

क़ासिम की पत्नी ने तराज़ू ले लिया। दरवाज़ा बंद हुआ।

दरवाज़ा बंद होते ही — उसने तराज़ू को घुमाकर देखा। तले पर जो शहद लगा था — उसमें कुछ चिपका था।

एक छोटा-सा, चमकता हुआ सोने का सिक्का।

उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।

"सोने का सिक्का? वो ग़रीब अली बाबा सोने के सिक्के तौल रहे हैं?"

उसने तुरंत क़ासिम को बुलाया। सिक्का दिखाया।

"ये देख! भाभी ने जो तराज़ू उधार लिया — उसमें ये चिपका हुआ है।"

क़ासिम के चेहरे का रंग बदला।

"क्या? सोना? सोने का सिक्का?"

क़ासिम का गुस्सा

क़ासिम तुरंत अली बाबा के घर गया। बिना दरवाज़ा खटखटाए अंदर घुसा।

"अली बाबा! तू मुझसे झूठ बोल रहा है!"

अली बाबा हैरान।

"भाई! क्या हुआ?"

"तू अपने आप को ग़रीब बताता है? और तेरे घर में सोने के सिक्के तौले जा रहे हैं?"

उसने वो छोटा-सा सिक्का दिखाया।

अली बाबा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने अपनी पत्नी की तरफ़ देखा। पत्नी ने सिर झुका लिया।

क़ासिम चिल्लाया —

"बता! ये सोना कहाँ से आया? सच बोल! नहीं तो मैं आज ही सिपाहियों को बुलाऊँगा। तुझे चोर ठहराऊँगा।"

अली बाबा ने सोचा। उसका भाई था। चाहे कैसा भी हो। और सच छुपाने का अब कोई रास्ता नहीं था।

उसने पूरी कहानी सुनाई।

क़ासिम सुनता रहा। उसके मन में पहले हैरानी, फिर लालच जागा।

"और वो जादुई पत्थर — कौन-से शब्दों से खुलता है?"

"भाई, मैं तुम्हें बता तो दूँगा। पर वहाँ मत जाना। बहुत ख़तरनाक है।"

"बस! बता शब्द।"

"खुल जा, सिम सिम। बंद हो जा, सिम सिम।"

क़ासिम ने वो शब्द कई बार दोहराए। याद कर लिए।

"ठीक है। मैं जा रहा हूँ। तुझसे ज़्यादा तो मैं ले आऊँगा।"

क़ासिम जंगल जाता है

अगले दिन क़ासिम ने दस गधे लिए। हर एक पर बड़े-बड़े ख़ाली थैले। पत्नी को कहा कि वो शाम तक लौट आएगा।

वो जंगल पहुँचा। पहाड़ी रास्ते से चढ़ते-चढ़ते उस चट्टान तक।

उसने ज़ोर से कहा —

"खुल जा, सिम सिम!"

पत्थर खिसका। गुफा खुली।

क़ासिम अंदर गया। और जो देखा — उसकी आँखें फैली रह गईं।

"अली बाबा! ये तू मुझे बता ही नहीं रहा था ठीक से! ये तो असीम है! बहुत-बहुत असीम!"

उसने तुरंत अपने थैले भरने शुरू किए। एक के बाद एक — सोने के सिक्के, हीरे, मोती, चांदी की थालियाँ।

दस गधों के सब थैले — एक-एक करके भरते गए।

लालच में उसका पेट भरा ही नहीं। आख़िर में उसने और भी सामान अपनी पोशाक के अंदर भर लिया। जेबों में सोने के सिक्के। बेल्ट के अंदर हीरे।

आख़िर में उसने सोचा — चलो अब बाहर निकलूँ।

वो दरवाज़े के पास पहुँचा।

"बंद हो जा, गेहूँ!"

दरवाज़ा नहीं हिला।

"बंद हो जा, चना!"

नहीं हिला।

"बंद हो जा, बाजरा!"

क़ासिम ने हर अनाज का नाम लिया। पर वो असली शब्द भूल गया।

उसके मन में डर बैठ गया।

"सिम सिम! ये क्या शब्द था? सिम क्या?"

उसने हर तरह से कोशिश की। पर शब्द याद नहीं आया।

दिन ढलने लगा।

तभी — बाहर से घोड़ों की टापों की आवाज़।

क़ासिम के पाँव से ज़मीन खिसक गई।

"डाकू!"

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