1 अध्याय 1 — मजबूरी का सौदा FREE 2 अध्याय 2 — कोर्ट और हवेली FREE 3 अध्याय 3 — पहली सुबह FREE 4 अध्याय 4 — माँ का ट्रांसप्लांट FREE 5 अध्याय 5 — नई पहचान FREE 6 अध्याय 6 — विक्रम चाचा का शक FREE 7 अध्याय 7 — ऑफ़िस का पहला दिन FREE 8 अध्याय 8 — एक रात की बारिश FREE 9 अध्याय 9 — रिया की मुलाक़ात FREE 10 अध्याय 10 — आरव का अतीत FREE 11 अध्याय 11 — तान्या की वापसी FREE 12 अध्याय 12 — ग़लतफ़हमी FREE 13 अध्याय 13 — एक प्रेस कॉन्फ्रेंस FREE 14 अध्याय 14 — विक्रम का जाल FREE 15 अध्याय 15 — दादी की डायरी FREE 16 अध्याय 16 — पहाड़ी ट्रिप FREE 17 अध्याय 17 — पहला चुंबन FREE 18 अध्याय 18 — आरव का confession FREE 19 अध्याय 19 — एक accident FREE 20 अध्याय 20 — ICU की रात FREE 21 अध्याय 21 — मंदिर की शादी FREE 22 अध्याय 22 — विक्रम का अंत FREE 23 अध्याय 23 — हनीमून, कश्मीर FREE 24 अध्याय 24 — एक नई सुबह FREE 25 अध्याय 25 — अदालत FREE 26 अध्याय 26 — रिया का राहुल FREE 27 अध्याय 27 — माँ की बातें FREE 28 अध्याय 28 — पहली किलकारी FREE 29 अध्याय 29 — एक साल बाद FREE 30 अध्याय 30 — परिवार FREE
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अध्याय 2 — कोर्ट और हवेली

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मुंबई की हाई कोर्ट के पीछे की एक छोटी रजिस्ट्रार बिल्डिंग। पुरानी पीली दीवारें, पंखे जो आधे चलते थे, बेंच जिनकी लकड़ी कई हाथों के पसीने से चिकनी हो चुकी थी। दीवार पर अंबेडकर की एक तस्वीर, एक गाँधी जी की, और एक कैलेंडर — मार्च का, जबकि बाहर मई था।

आन्या एक हल्के पीले रंग की सूती साड़ी में बैठी थी। मामा की दी हुई एक चूड़ी थी हाथ में, माँ के चश्मे की डोर गले में, और बाक़ी कुछ नहीं। न मेहंदी, न सिंदूर, न कोई फूल। शादी की कोई तस्वीर नहीं चाहिए थी — contract की तीसरी धारा यही कहती थी।

उसके बगल में आरव बैठा था। नेवी ब्लू सूट, सफ़ेद शर्ट, बिना टाई के। हाथ में फ़ोन, आँखें screen पर। पिछले बीस मिनट से एक बार भी उसकी तरफ़ नहीं देखा था।

रजिस्ट्रार साहब ने नाम पुकारा — "आरव विवेक मल्होत्रा और आन्या रामेश्वर शर्मा।"

दोनों उठे।

मेज़ पर तीन रजिस्टर थे, एक ऊँचा-ऊँचा रबर स्टांप, और दो गवाह — मेहरा साहब और सुषमा आंटी। रजिस्ट्रार ने मराठी में कुछ कहा, फिर हिंदी में, फिर अंग्रेज़ी में — एक ही बात तीन बार। दस्तख़त, उँगली की छाप, फिर एक और दस्तख़त।

जब आन्या ने अपना नाम अंतिम पन्ने पर लिखा, तो रजिस्ट्रार ने बिना मुस्कुराए कहा — "बधाई हो।"

बधाई।

आरव ने उसकी ओर देखा भी नहीं। मेहरा साहब को कुछ इशारा किया, और कमरे से बाहर निकल गया।

बाहर तेज़ धूप थी। आन्या एक पल के लिए वहीं रुक गई — सीढ़ियों पर। काँधे पर माँ का पुराना बैग, जिसमें ज़रूरत की चीज़ें थीं — एक सादा कुर्ता, चप्पल, टूथब्रश। मेहरा साहब ने एक हफ़्ता पहले बताया था कि "मैम, ज़्यादा सामान मत लाइएगा। हवेली में सब मिल जाएगा।"

हवेली।

शब्द अजीब लगा था जब उन्होंने पहली बार सुना था।


काली Mercedes थी इस बार, Audi नहीं। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला। आरव पहले बैठा, फ़ोन में डूबा। आन्या उसके बगल में बैठी — पर बीच में इतनी जगह छोड़ी कि एक तीसरा आदमी आ सकता था।

रास्ते में कोई बात नहीं हुई।

मरीन ड्राइव से वर्ली sea-link तक। समुंदर एक तरफ़, खाड़ी दूसरी तरफ़। पुल पर मई की धूप पानी पर ऐसे चमकती थी जैसे कोई काँच टूट गया हो। आन्या ने खिड़की के बाहर देखा — पहली बार उसने Bandra-Worli sea-link पर सफ़र किया था। पाँच साल मुंबई में रहकर भी।

"पानी पीना है?" आरव ने अचानक कहा।

आन्या चौंकी। "जी?"

उसने एक बोतल आगे बढ़ाई — अनछुई, ठंडी।

"नहीं, धन्यवाद।"

उसने बोतल वापस रखी। फिर फ़ोन पर। फिर चुप।


वर्ली के पीछे एक पुराने इलाक़े में, समुंदर के क़रीब, एक ऊँची दीवार के पीछे थी मल्होत्रा हवेली। दादा जी के ज़माने का बंगला — तीन मंज़िला, सफ़ेद, बीच में एक बड़ा-सा लकड़ी का दरवाज़ा। बाहर दो गार्ड, एक दरबान, और एक माली जो गुलाब की क़तार छाँट रहा था।

गाड़ी अंदर घुसी। एक लंबा driveway, बीच में एक पुराना नीम का पेड़, फिर पोर्च। आन्या के मुँह से बेआवाज़ ही एक "ओह" निकला। उसने ऐसे घर सिर्फ़ फ़िल्मों में देखे थे।

दरवाज़े पर तीन-चार नौकर खड़े थे। एक बूढ़ी औरत — साड़ी पर पुराना ब्रोच — आगे बढ़ी। आरव ने उसे "कमला बाई" कहकर इशारा किया।

"बाई, इन्हें ऊपर कमरे में ले जाओ। पूर्व का कमरा। और जो भी चाहिए, इंतज़ाम करवा दो।"

कमला बाई ने सर हिलाया। आन्या की ओर देखकर एक हल्की-सी मुस्कुराहट दी — पहली मुस्कुराहट जो उस दिन उसने देखी थी।

"आइए, बेटी।"

आरव अंदर नहीं गया। एक नज़र आन्या पर डालकर दूसरी गाड़ी की तरफ़ बढ़ गया। "मेहरा साहब, मुझे ऑफ़िस। आप सब समझा दीजिए।"

मेहरा साहब ने आन्या को देखा, फिर सर हिला दिया।


हवेली के अंदर ठंडक थी। संगमरमर का फ़र्श जिस पर पाँव रखते ही चप्पल अपने आप शोर मचाती थी, ऊँची-ऊँची छतें, झूमर जो शायद किसी पुराने महल से लाए गए थे। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें — काले-सफ़ेद, फिर रंगीन। आन्या ने एक तस्वीर पर नज़र रोकी — एक बूढ़ी सी महिला, गोरी, सादी सूती साड़ी में, गोद में दस-बारह साल का एक लड़का। लड़के की आँखें पहचानी हुई थीं। ठंडी, गहरी।

"वो दादी जी हैं," कमला बाई ने पीछे से कहा। "और आरव बाबा। बारह साल का।"

आन्या ने पहली बार उस लड़के की आँखों में कुछ और देखा — मुस्कुराहट। एक बच्चे की मुस्कुराहट। उसने नज़रें झुका लीं।

"चलिए बेटी, ऊपर का कमरा दिखा दूँ।"

लकड़ी की एक चौड़ी सीढ़ी थी, बीच में लाल कालीन। दीवार पर पुराने पीतल के दीये। आन्या ने एक हाथ रेलिंग पर रखा — पुरानी, चिकनी लकड़ी, जिसे कई पीढ़ियों के हाथों ने छुआ था।

ऊपर एक लंबा गलियारा, फिर एक दरवाज़ा, फिर एक और।

कमला बाई ने एक दरवाज़ा खोला। "यह आपका कमरा।"

कमरा आन्या के पूरे चॉल जितना बड़ा था।

एक चार-पोस्टर बेड, सफ़ेद चादर, ऊपर हल्की धूप की छन-छन आती जाली। एक dressing-table, एक writing-desk, एक armchair, और एक खिड़की जो सीधे समुंदर की तरफ़ खुलती थी।

आन्या एक पल के लिए सिर्फ़ खिड़की के पास खड़ी रही। नीचे लहरें थीं, दूर एक मछुआरों की नाव, ऊपर सीगल्स।

"और… आरव साहब?"

"बाबा का कमरा बगल में है। पर वो ज़्यादातर ऑफ़िस में रहते हैं। यहाँ देर रात आते हैं।"

आन्या ने सर हिला दिया।

कमला बाई एक पल चुप रहीं, फिर धीरे से बोलीं, "बेटी, मैं इस घर में चालीस साल से हूँ। आरव बाबा को गोद में पाला है। बहुत कम बोलते हैं। पर इतना कह दूँ — दिल बुरा नहीं है। बस उसे ख़ुद ही याद नहीं रहता ज़्यादातर।"

आन्या ने उन्हें देखा। आँखों में सच्चाई थी — और चिंता।

"आपको कुछ चाहिए हो — खाना, चाय, कुछ भी — मुझे बुला लेना। नीचे दाहिनी तरफ़ रसोई है। मेरा कमरा वहीं पास में।"

"धन्यवाद, बाई।"

कमला बाई जाने लगीं, फिर रुकीं। "और हाँ — एक बात। बाबा ने कहा है कि शाम को छह बजे study में आ जाइएगा। कुछ baat करनी है उन्हें।"


शाम साढ़े पाँच बजे आन्या बेड के किनारे पर बैठी थी। हाथ में अपना पुराना फ़ोन — एक सस्ता Android, screen पर एक crack। माँ का message आया था hospital से — "बेटी, सब ठीक है। पैसा transfer हो गया है। कल शाम operation की पहली स्टेज है।"

आन्या ने screen पर हाथ रखा। एक आँसू गिरा। उसने पोंछा।

फिर एक और मैसेज — रिया का। "दीदी, सब ठीक? तू कहाँ है?"

रिया को पता नहीं था। माँ को पता नहीं था। उसने सिर्फ़ इतना कहा था — "एक नौकरी मिल गई है, अच्छी कंपनी में। कुछ दिन हॉस्टल में रहना होगा।" झूठ। पहला झूठ अपनी बहन से।

उसने मैसेज का जवाब दिया — "हाँ रिया, सब ठीक। पढ़ाई कैसी चल रही है?"

फिर फ़ोन रख दिया।

ठीक छह बजे वो study के दरवाज़े पर खड़ी थी।


Study एक बड़ा कमरा था — दीवारों पर किताबें, फ़र्श से छत तक, बीच में एक भारी लकड़ी की मेज़, और एक खिड़की जिसमें से शाम का नारंगी सूरज अंदर आ रहा था। आरव मेज़ के पीछे बैठा था, सूट उतारकर सिर्फ़ शर्ट में। आस्तीनें मोड़ी हुई। बाल थोड़े बिखरे। आन्या को पहली बार लगा वो थोड़ा कम मूर्ति, थोड़ा ज़्यादा इंसान दिख रहा है।

"बैठिए।"

आन्या एक कुर्सी पर बैठ गई।

"कुछ नियम बता देता हूँ। एक बार। फिर दोहराना नहीं चाहता।"

उसने हाथ की उँगलियाँ मिलाईं — व्यापार मोड में।

"एक — आप इस घर की मालकिन हैं, छह महीने के लिए, कागज़ पर। नौकर आपको 'भाभी जी' या 'मालकिन' बुलाएँगे। उन्हें यह नहीं पता कि शादी contract है, और उन्हें कभी पता नहीं चलना चाहिए।"

आन्या ने सर हिलाया।

"दो — अपनी ज़रूरत की चीज़ें यहीं से ख़रीदिए। एक credit card दिलवा दूँगा। limits नहीं हैं, पर समझदारी से ख़र्च कीजिए। मैं फ़िज़ूलख़र्ची को नफ़रत करता हूँ।"

"मुझे credit card नहीं चाहिए।"

आरव की भौंहें थोड़ी उठीं। "क्यों?"

"क्योंकि मैं छह महीने में जितना ख़र्च करूँगी, उसमें से एक रुपया भी अपने ऊपर नहीं रखूँगी। माँ के अस्पताल का बिल पूरा है, बस। मेरी अपनी ज़रूरतें मैं अपने पैसे से ख़रीदूँगी।"

आरव ने उसे देखा। एक लंबी नज़र। फिर सर हिला दिया।

"ठीक है। तीन — हर दूसरे शनिवार एक public event होगा। charity, gala, family dinner। आपको साथ चलना है, मुस्कुराना है, और मेरी पत्नी की तरह व्यवहार करना है। press के सामने हाथ पकड़ना पड़े तो पकड़ लीजिए। आँखें मिलानी पड़े तो मिला लीजिए। बाक़ी, mansion में अपना कमरा, अपनी जगह।"

आन्या ने सर हिलाया।

"चार — मेरे ऑफ़िस के मामलों में दख़ल नहीं। मेरी फ़ाइलें, मेरे लोग, मेरे फ़ैसले। आप बस एक नाम हैं — Mrs. Malhotra।"

एक नाम। आन्या के कानों में यह शब्द थोड़ी देर गूँजता रहा।

"पाँच — और यह सबसे ज़रूरी — हम दोनों के बीच कुछ नहीं होगा। कोई वायदा नहीं, कोई जज़्बात नहीं, कोई उम्मीद नहीं। यह business है, और छह महीने बाद आप अपनी ज़िंदगी में, मैं अपनी में।"

आन्या ने उसे देखा। एक पल के लिए लगा शायद वो ख़ुद से ही यह नियम बोल रहा है।

"मंज़ूर है मिस्टर मल्होत्रा।"

"आरव। नौकरों के सामने कम से कम पहला नाम बोलिए।"

"आरव।"

नाम मुँह से निकलते ही आन्या को अजीब लगा।

आरव ने उठकर एक छोटी सी चाबी मेज़ पर रखी। "यह आपके कमरे की चाबी। दरवाज़ा हमेशा अंदर से बंद रखिए।" फिर वो रुका, और थोड़ा धीमा बोला — "किसी भी अजनबी को मत खोलिए। यह घर में सब अपने नहीं हैं।"

आन्या ने चाबी उठाई।

"और एक बात," आरव ने कहा। "अगर कभी कोई problem हो — किसी से, कुछ भी — मेहरा साहब को फ़ोन कीजिए। उनका नंबर dressing-table पर रखा है।"

"धन्यवाद।"

वो पलटकर खिड़की की तरफ़ देखने लगा। आन्या समझ गई — बात ख़त्म।

वो उठी और दरवाज़े की ओर बढ़ी। दरवाज़े पर पहुँचकर एक पल रुकी। पीठ पीछे आरव की आवाज़ आई —

"मिस… आन्या।"

वो रुकी।

"आपकी माँ का operation कब है?"

"कल शाम।"

"मेहरा साहब को बोल दूँगा। private ward का इंतज़ाम है। आपकी बहन भी रह सकती है साथ।"

आन्या ने एक पल के लिए कुछ नहीं कहा। गला भारी हो गया।

"धन्यवाद।"

वो बाहर निकल आई।


रात के ग्यारह बजे आन्या अपने कमरे में थी। खिड़की खुली हुई, समुंदर की हवा अंदर आ रही थी। दूर समुंदर में एक मछुआरे की नाव की रोशनी टिमटिमा रही थी।

उसने माँ को फ़ोन किया। "माँ, मैं ठीक हूँ। नई नौकरी अच्छी है। कमरा भी मिल गया है — समुंदर के पास।"

"सच में बेटी?"

"हाँ माँ। सच।"

झूठ फिर एक।

फिर रिया को message किया — "good night।"

फिर कमरे की लाइट बुझाई। चार-पोस्टर बेड पर लेटी। चादर में एक हल्की-सी lavender की महक थी।

ऊपर छत पर लकड़ी की किसी पट्टी की चरमराहट सुनाई दी। कोई कमरे में चल रहा था — साथ वाले कमरे में।

आरव।

आन्या ने आँखें बंद कीं। नींद नहीं आई।

बाहर समुंदर की लहरें टकराती रहीं — एक के बाद एक, बिना थके, बिना रुके।

— अध्याय 2 समाप्त।

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अध्याय 2 — कोर्ट और हवेली

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