मुंबई की उमस भरी शाम में टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के बाहर बेंच पर बैठी आन्या के हाथों में पकड़ा हुआ काग़ज़ हल्का-हल्का काँप रहा था। काग़ज़ की भाषा सीधी थी और उतनी ही बेरहम — "बोन मैरो ट्रांसप्लांट, अनुमानित ख़र्च: रुपये पचास लाख। ट्रांसप्लांट के बिना अधिकतम जीवन प्रत्याशा: छह महीने।"
पचास लाख। आन्या के अकाउंट में सैंतालीस हज़ार थे। पिछले महीने उसने बांद्रा के बुटीक की नौकरी इसलिए खो दी थी क्योंकि माँ की कीमोथेरेपी के दिनों में वह लगातार छुट्टी पर थी। पापा को गए चार साल हो गए थे — एक रात की रेल यात्रा, और सब कुछ बदल गया था। छोटी बहन रिया अभी कॉलेज के दूसरे साल में थी, और उसकी फ़ीस का अगला किस्त भी सिर पर खड़ा था।
"आन्या बेटी?" — एक नर्स ने आकर कंधे पर हाथ रखा। "मम्मी जी ने पूछा — तुम कब आओगी अंदर?"
आन्या ने जल्दी से आँखों के कोने पोंछे और काग़ज़ बैग में रख लिया। "बस आती हूँ दीदी।"
अंदर बेड पर लेटी सुनीता शर्मा का चेहरा पीला था, बाल कीमो में झड़ चुके थे, हाथ की नसें नीली पड़ गई थीं — पर मुस्कुराहट वैसी ही थी जैसी आन्या के बचपन में हुआ करती थी। वही मुस्कुराहट जो स्कूल से लौटने पर रसोई के दरवाज़े से दिखती थी, जो बुख़ार में सिर पर हाथ रखकर कहती थी, "ठीक हो जाएगा।"
"बेटा, चिंता मत कर। जो होना है, वो होगा।"
"माँ, ऐसे मत बोलो।" आन्या ने माँ का हाथ अपने हाथों में लेकर दबाया। "सब ठीक होगा। मैं देख लूँगी।"
"सच कह रही हूँ बेटा। मेरा क्या है — मैं तो तेरे पापा के पास चली जाऊँगी। पर तू और रिया —"
"माँ, बस।" आन्या की आवाज़ काँप गई। "और सुनो, सुषमा बुआ का फ़ोन आया था?"
"हाँ, बोल रही थी कोई ज़रूरी बात है। ज़रा शाम को मिल आ उनसे।"
आन्या ने सर हिला दिया। उसके फ़ोन में सुषमा आंटी का नाम कई महीनों से था, पर बात कभी हुई नहीं थी। बुआ कोई दूर की रिश्तेदार थीं — माँ की चचेरी बहन — पर मुंबई में अकेले रहते हुए कब रिश्तेदारियाँ बचती हैं?
मल्होत्रा टॉवर्स की बयालीसवीं मंज़िल। काँच की दीवार के उस पार पूरा मुंबई पाँव में बिछा था — दूर समुंदर, पास मरीन ड्राइव की रोशनियाँ, और ऊपर एक चाँद जो धुएँ में धुँधला था। इस पार आरव मल्होत्रा अपनी कुर्सी पर पीछे टिका, एक हाथ में व्हिस्की का गिलास लिए सामने बैठे वकील को देख रहा था।
"सर, बस तीन हफ़्ते बचे हैं," वकील मेहरा ने फ़ाइल खोली। उसकी आवाज़ में वही मरियल एहतियात था जो बीस साल पुराने वफ़ादार वकीलों में होती है। "अठारह तारीख़ को आप बत्तीस के हो जाएँगे। दादी जी की वसीयत बिल्कुल साफ़ है — उस तारीख़ तक अगर आप शादीशुदा नहीं हुए, तो कंपनी का इकतालीस प्रतिशत स्टेक विक्रम जी के पास चला जाएगा। और एक बार वो हुआ —"
"— तो वो मेरी कंपनी को तीन महीने में बेच डालेगा," आरव ने बात पूरी की। उसकी आवाज़ में न ग़ुस्सा था न बेचैनी — बस एक थका हुआ ठंडापन, जो किसी इंसान की नहीं, किसी मशीन की लगती थी।
मेहरा ने उसे देखा। बीस साल पहले जब वो दस साल के आरव को घर ले जाता था अंतिम संस्कार के बाद, तब भी उसने रोते देखा था इस बच्चे को सिर्फ़ एक बार। उसके बाद नहीं। बत्तीस की उम्र में एशिया की चौथी सबसे बड़ी मीडिया कंपनी का मालिक, बंगले-गाड़ियाँ-जहाज़ — सब कुछ था इसके पास। पर आँखें ऐसी जैसे किसी ने भीतर का सब बुझा दिया हो।
आरव के माँ-बाप एक हादसे में चले गए थे जब वो दस साल का था। दादी कमला मल्होत्रा ने पाला था — और वही पिछली सर्दी में चली गई थीं। पीछे छोड़ गई थीं एक वसीयत और एक शर्त: "मेरा आरव बत्तीस से पहले बस जाए। एक घर, एक साथी। वरना मेरी आत्मा को चैन नहीं मिलेगा।"
दादी की बातें कभी टाली नहीं जाती थीं।
"मुझे एक पत्नी चाहिए," आरव ने गिलास टेबल पर रखा। "Contract. छह महीने। मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता कौन है। बस इतना — पढ़ी-लिखी हो, दिखने में presentable हो, और ज़बान की पक्की हो। NDA साइन करेगी, पैसे लेगी, तय वक़्त के बाद mutual divorce। बस।"
मेहरा ने धीरे से कहा, "सर, इस मामले में सुषमा जी से अच्छा कोई नहीं। उन्होंने पहले भी ऐसे — discreet — काम किए हैं। बहुत भरोसेमंद हैं।"
"उनको बुलाइए। कल शाम। और मेहरा साहब — contract तैयार रखिए। मैं तीसरी बार दादी की वसीयत पढ़ने नहीं वाला।"
"जी सर।"
मेहरा ने फ़ाइल बंद की और जाने को उठा। दरवाज़े पर रुककर एक पल पीछे मुड़ा। "सर, एक बात बोलूँ?"
आरव ने सर हिलाया।
"दादी जी की वसीयत में एक और शर्त थी जो आप पढ़ नहीं पाए शायद। अगर शादी के दो साल के अंदर तलाक़ हुआ — बिना ठोस वजह के — तो भी वही stake clause activate हो जाता है। यानी — बस छह महीने का contract काम नहीं करेगा अगर वो खुलकर सामने आ गया।"
आरव की आँखें संकरी हो गईं। "तो?"
"तो शादी असली दिखनी चाहिए। काग़ज़ पर ही नहीं, बाहर की दुनिया में भी।"
आरव कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, "ठीक है। दिखेगी।"
मेहरा चला गया। आरव ने गिलास उठाया, खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। नीचे मुंबई बरस रही थी पहली बारिश में। उसने काँच पर एक उँगली रखी और एक नाम लिखा — दादी का। फिर मिटा दिया।
अंधेरी ईस्ट की एक पुरानी सोसायटी के तीसरे माले पर सुषमा आंटी का दो-कमरों का फ़्लैट था। दीवारों पर साईं बाबा और कुलदेवी की तस्वीरें, सोफ़े पर हाथ की बुनी हुई चादर, टीवी के ऊपर लड़के-बहू की पुरानी शादी की तस्वीर — और हवा में इलायची वाली चाय की महक।
आन्या सोफ़े के किनारे पर बैठी थी, हाथ गोद में बँधे हुए। दुपट्टा क़रीब-क़रीब सर पर खींचा हुआ। बुआ के घर पहली बार आई थी, और बेचैनी अंदर तक थी।
सुषमा आंटी ने चाय का प्याला सामने रखा और सीधी बात पर आ गईं।
"बेटी, मैं घुमा-फिराकर बात करने वाली नहीं। तेरी माँ का हाल मुझे पता है। पैसा कितना चाहिए?"
आन्या को लगा गला बंद हो गया। उसने एक लंबी साँस ली और सच कह दिया — "पचास लाख आंटी।"
सुषमा आंटी ने एक लंबी साँस ली। फिर बोलीं, "बेटी, मैंने तुझे यहाँ इसी सिलसिले में बुलाया है। एक काम है। बहुत बड़े घर का लड़का है। उसे एक formal पत्नी चाहिए — सिर्फ़ छह महीने के लिए। काग़ज़ पर शादी, असली नहीं। न साथ रहना ज़रूरी, न और कुछ। बस उसका नाम, तेरा नाम, एक register पर। छह महीने बाद आपसी सहमति से तलाक़। मेहनताना — पचास लाख।"
आन्या को लगा कमरा घूम गया। चाय का प्याला हाथ में था, उसे रख दिया।
"आंटी… ये… मैं… किसी अजनबी से शादी?"
"बेटी, मैं तुझे बेच नहीं रही। लड़का साफ़ नीयत का है — कंपनी की कोई शर्त है, इसीलिए मजबूरी है। तेरी इज़्ज़त को कोई हाथ नहीं लगाएगा, यह मैं ज़मानत देती हूँ। और अगर तू ना कहती है, तो मैं बुरा नहीं मानूँगी। मैंने सिर्फ़ इसीलिए तुझे चुना क्योंकि तेरी मजबूरी मुझे पता है, और मुझे लगा शायद यह तेरे काम आ जाए।"
आन्या चुप थी। बाहर ट्रैफ़िक की आवाज़ें थीं, बच्चों की सीटी, किसी की मोटरसाइकिल का horn।
"लड़का कैसा है आंटी?"
"भले घर का है। कोई बुरा आदमी नहीं। थोड़ा रूखा है, पर दिल का सच्चा। और सबसे बड़ी बात — उसे तुझसे कोई वायदा नहीं चाहिए, और न ही वो तुझसे कुछ माँगेगा। सिर्फ़ कुछ public events में साथ दिखना होगा। बस।"
आन्या को माँ का चेहरा याद आया। रिया की किताबें। डॉक्टर का काग़ज़। वो सैंतालीस हज़ार रुपये जो अकाउंट में थे और जिनसे एक हफ़्ते की दवा भी पूरी नहीं होती थी।
पर फिर पापा की आवाज़ कानों में आई — "बेटा, इज़्ज़त ही सब कुछ है।"
उसकी आँखें भर आईं।
"आंटी… मुझे… एक रात सोचने दीजिए।"
"सोच ले बेटी। पर जल्दी सोच। दो दिन से ज़्यादा नहीं हैं।"
आन्या उठी, बुआ के पैर छुए, और बाहर निकल आई। बाहर रिक्शा पकड़ने तक उसकी आँखें झरती रहीं।
उस रात आन्या नहीं सोई।
चॉल की छत पर खड़े होकर मुंबई की झिलमिलाती रोशनियों को देखती रही, और सोचती रही कि ज़िंदगी यहाँ तक कैसे आ पहुँची। पापा होते तो? — पर पापा नहीं थे। और पचास लाख रुपये किसी पेड़ पर नहीं उगते थे। उसने सोचा बैंक से लोन — पर बिना नौकरी के, बिना collateral के, कौन देगा? सोने के दो ज़ेवर थे माँ के — दस लाख से ज़्यादा का नहीं। बाक़ी?
बाक़ी कुछ नहीं था।
तीन बजे रात उसने रिया के बेड के पास बैठकर देखा — बहन गहरी नींद में थी, एक हाथ माथे पर, मुँह हल्का खुला हुआ। आन्या ने उसके बालों पर हाथ फेरा।
"मैं देख लूँगी रिया," उसने धीरे से कहा। "तू पढ़, बस।"
सुबह उसने आंटी को मैसेज किया: "हाँ।"
अगली शाम। सुषमा आंटी का फ़्लैट। आन्या एक सादी क्रीम साड़ी में, बाल बँधे हुए, होंठ सूखे। उसने आइने में ख़ुद को देखा था घर से निकलते वक़्त — और पहचान नहीं पाई थी।
बाहर एक काली Audi रुकी। दरवाज़ा खुला, और आरव मल्होत्रा कमरे में चला आया जैसे कमरा उसी का हो। छह फ़ुट से कुछ ऊपर, चारकोल ग्रे का तीन-पीस सूट, घड़ी जो आन्या के तीन साल की कमाई से ज़्यादा की थी, और आँखें — काली, ठंडी, थकी हुई।
उसने एक नज़र आन्या पर डाली। आन्या को लगा जैसे किसी ने उसके भीतर तक झाँक लिया हो, और फिर कोई दिलचस्पी न दिखाई हो।
"सुषमा जी, यह ठीक हैं," आरव ने सीधे आंटी से कहा। "Paperwork तैयार करवाइए।"
आन्या के अंदर कुछ टूटा। ग़ुस्सा, अपमान, मजबूरी — सब एक साथ। उसने सर उठाया।
"माफ़ कीजिएगा, मिस्टर मल्होत्रा। मेरी कोई राय नहीं ली जाएगी?"
पहली बार आरव की आँखें ठहरीं। एक हल्की-सी हैरानी। शायद बहुत दिनों बाद किसी ने उससे ऐसे बात की थी।
"मिस…"
"शर्मा। आन्या शर्मा।"
"मिस शर्मा। मेरे पास वक़्त नहीं है। यह एक business deal है। आपकी ज़रूरत क्या है?"
"पचास लाख रुपये। मेरी माँ के इलाज के लिए।"
"मंज़ूर। पचास लाख, और मेरी ज़िंदगी में शून्य दख़ल। छह महीने। उसके बाद आपसी तलाक़, NDA, आपका पैसा। मंज़ूर?"
आन्या का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लगा सामने वाले को सुनाई दे रहा होगा। उसने माँ का चेहरा सोचा।
"एक शर्त मेरी भी है।"
आरव की भौंहें थोड़ी ऊपर उठीं। "बोलिए।"
"पैसा माँ के अस्पताल में सीधे जाएगा, मेरे अकाउंट में नहीं। मुझे पैसा नहीं चाहिए, मुझे माँ का इलाज चाहिए।"
आरव कुछ देर उसे देखता रहा। फिर पहली बार — पहली बार — उसके चेहरे पर कुछ बदला। बहुत हल्का। एक सेकंड के लिए। फिर वही ठंडा भाव।
"मंज़ूर।"
उसने अपने briefcase से एक मोटी फ़ाइल निकाली — contract पहले से तैयार था। तारीख़, धाराएँ, शर्तें — सब। उसने एक Mont Blanc पेन निकाला और टेबल पर रखा।
"यहाँ। और यहाँ। और आख़िरी पन्ने पर।"
आन्या ने पेन उठाया। उसका हाथ काँप रहा था। बाहर मुंबई की पहली मानसून की बूँदें खिड़की से टकराईं।
उसने दस्तख़त किए — पहले पन्ने पर, फिर दूसरे पर, फिर आख़िरी पन्ने पर। नाम — आन्या शर्मा। तीन बार।
आरव ने काग़ज़ उठाए, फ़ोल्डर बंद किया, और पहली बार सीधे उसकी आँखों में देखा।
"शुक्रिया, मिसेज़ मल्होत्रा। कल कोर्ट में मिलते हैं। ग्यारह बजे। मेहरा साहब आपको लेने आ जाएँगे।"
आन्या के पेट में कुछ हुआ जिसका नाम उसे पता नहीं था।
आरव चला गया। काली Audi की रोशनियाँ बारिश में धुँधलाकर ओझल हो गईं।
सुषमा आंटी ने आन्या के सर पर हाथ रखा। "सब ठीक होगा बेटी।"
आन्या ने सर हिला दिया। पर भीतर एक आवाज़ कह रही थी — कुछ ठीक नहीं है। कुछ बहुत बड़ा बदल गया है, और अब लौटना नहीं हो सकता।
बाहर बारिश तेज़ हो गई थी।
— अध्याय 1 समाप्त।
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