मुंबई की सुबह छह बजे एक अजीब सी होती है। शहर अभी जागा नहीं होता, पर समुंदर जाग चुका होता है। मछुआरे लौट रहे होते हैं, कौवे शुरू हो जाते हैं, और एक हल्की भीगी हुई हवा आती है जो बताती है कि बारिश आज नहीं तो कल ज़रूर है।
आन्या की आँख ठीक छह बजे खुली। पाँच साल से यही आदत थी — चॉल में पाँच पंद्रह पर पानी आता था, और वो टंकी भरने के लिए उठ जाती थी। पुरानी आदतें नए कमरों में भी नहीं छूटतीं।
एक पल को वो भूल गई थी कि कहाँ है। ऊपर सफ़ेद चादर वाली जाली थी, बगल में एक ऐसी खिड़की जो उसके पुराने कमरे में हो ही नहीं सकती थी। फिर याद आया।
मल्होत्रा हवेली। पहली सुबह।
उसने उठकर ख़ुद को आइने में देखा। बाल बिखरे हुए, आँखों के नीचे काले घेरे, पुराना सूती नाइट सूट। आइने में एक अजनबी थी जो आन्या शर्मा से बहुत मिलती-जुलती थी।
बेड के पास एक intercom था — पुराने ज़माने का, काला, गोल बटनों वाला। उसके बगल में एक चिट थी, साफ़ हस्तलिखित — "रसोई के लिए 1 दबाइए। ज़रूरत के लिए मुझे — कमला बाई। नीचे, दाहिनी तरफ़।"
आन्या ने intercom छुआ नहीं। बैग से अपना पुराना कुर्ता निकाला, बाथरूम में गई। बाथरूम भी उसके चॉल के कमरे जितना बड़ा था — पीतल के नल, संगमरमर का फ़र्श, और एक खिड़की जिसमें से समुंदर दिखता था। उसने मुँह धोया, बाल बाँधे, और तैयार हुई।
बाहर निकलते ही धीरे से दरवाज़ा खोला।
गलियारे में सन्नाटा था। संगमरमर के फ़र्श पर सिर्फ़ उसकी अपनी पाँव की आहट। एक खिड़की से सुबह की पीली रोशनी आ रही थी, फ़र्श पर एक चौकोर बना रही थी।
वो धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरी।
रसोई की तरफ़ चलते हुए उसे चाय की ख़ुशबू आई। अदरक, इलायची, ज़रा-सी सौंफ़। चलते-चलते वो रुक गई — रसोई के दरवाज़े पर कमला बाई पहले से थीं, एक बड़े पतीले में चाय छान रही थीं।
"अरे बेटी! इतनी जल्दी?" बाई ने हैरानी से देखा।
आन्या को थोड़ी शर्म आई। "बस… आदत है।"
"आओ, बैठो। चाय बस तैयार है।"
रसोई बड़ी थी, पर चलाने वाले हाथ कम। दो लड़कियाँ काम पर लगी थीं — सब्ज़ी काटना, परांठे बेलना। कमला बाई ने उन्हें मराठी में कुछ कहा, और वो मुस्कुराकर आन्या की ओर देखने लगीं।
"भाभी जी, नमस्ते।"
आन्या को 'भाभी जी' सुनकर एक झटका सा लगा। पर उसने मुस्कुराकर सर हिलाया।
बाई ने एक प्याला उसके सामने रखा। "लो। पहले चाय। फिर नाश्ता।"
"बाई, मैं ख़ुद…"
"नहीं बेटी। यहाँ का नियम है — मेहमान रसोई में काम नहीं करते।"
"मैं मेहमान नहीं हूँ।"
बाई ने एक पल आन्या को देखा। फिर हल्की-सी मुस्कुराहट दी। "तो बहू भी रसोई में काम नहीं करती। पहले महीने तो बिल्कुल नहीं।"
आन्या ने चाय का घूँट लिया। चाय असली थी — दूध, चीनी, अदरक, सब बराबर। चॉल की चाय जैसी।
"कितनी अच्छी है बाई।"
"कौन सी?"
"चाय।"
बाई की आँखों में पहली बार एक सच्ची मुस्कुराहट आई। "देखो, इस घर में चालीस साल हो गए हमें चाय बनाते। आरव बाबा को भी यही पसंद है। अंदर से लखनऊ की हवा है हमारी, बेटी।"
"आप लखनऊ से हैं?"
"हाँ। तू भी?"
"हाँ।"
बाई ने अपना हाथ आन्या के गाल पर रखा। एक पल। फिर हटा लिया।
"अच्छा हुआ बेटी, तू आई। इस घर में बहुत ख़ामोशी है।"
ठीक सात बजे डाइनिंग रूम में आन्या को बुलाया गया। एक लंबी मेज़, बारह कुर्सियाँ — और दो जगहें लगी हुईं। एक छोर पर आरव, दूसरे छोर पर उसकी जगह।
आरव शर्ट और पैंट में था, बाल अभी गीले — शायद नहाकर आया था। हाथ में Financial Times, चश्मा नीचे की तरफ़, चाय का प्याला बगल में।
आन्या जब अंदर आई तो उसने ऊपर देखा। एक हल्की नज़र। फिर वापस अख़बार पर।
"good morning," उसने धीरे से कहा।
आन्या रुकी। "good morning।"
वो कुर्सी पर बैठी। एक नौकर ने प्लेट रखी — परांठे, सब्ज़ी, दही, अचार। आन्या को एक पल के लिए लगा यह एक होटल है, उसका घर नहीं। उसने धीरे-धीरे खाना शुरू किया।
कुछ देर सिर्फ़ चाकू-कांटे की आवाज़ें थीं।
फिर आरव ने अख़बार रखा। चश्मा उतारा। उसकी ओर देखा।
"पैसा transfer हो गया है। पूरा।"
आन्या के हाथ में परांठा था। उसे रख दिया।
"कब?"
"कल रात बारह बजे। सीधे Tata Memorial के billing department में। आपकी माँ का private room book है। 4-North wing। आपकी बहन को कमरे में रहने की permission है।"
आन्या के गले में कुछ अटक गया।
"धन्यवाद।"
"शुक्रिया कहने की कोई बात नहीं। यह contract का part है।"
पर आन्या ने उसे देखा। और उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ था जो contract नहीं था।
"फिर भी।"
आरव चुप रहा। फिर एक बात बोली —
"और doctor Gokhale को बोल दिया है। वो खुद operation supervise करेंगे। मुंबई के सबसे अच्छे हैं इस field में।"
आन्या को लगा साँस रुक गई।
"डॉक्टर गोखले?" उसने धीरे से कहा। "वो… वो तो six month का wait list रखते हैं।"
"रखते हैं। पर मेरे cousin हैं। एक phone call था।"
आन्या ने उसे देखा। पहली बार ध्यान से। उसके चेहरे की वो थकी हुई कठोरता वैसी ही थी, पर अब उसमें कुछ और भी था जिसे आन्या पढ़ नहीं पाई।
"क्यों?" उसने पूछा।
आरव ने भौंहें उठाईं। "क्यों क्या?"
"यह सब क्यों? आपको ज़रूरत नहीं थी इतना करने की। पैसा देना था — दे दिया। बात ख़त्म।"
आरव ने अख़बार वापस उठाया। पर पन्ना नहीं पलटा। एक पल चुप।
"आपकी माँ ज़िंदा रहेंगी तो आप अपनी बात रख सकेंगी," उसने अंत में कहा। आवाज़ बहुत समतल थी। "अगर — कुछ — हो गया, तो आप टूट जाएँगी। और एक टूटी हुई पत्नी contract नहीं चला सकती।"
बात तर्क की थी। पर आन्या को लगा यह सिर्फ़ तर्क नहीं था।
"फिर भी। धन्यवाद।"
आरव ने सर हिला दिया। अख़बार पढ़ने लगा।
आन्या ने अपना खाना ख़त्म किया। उठते वक़्त एक बात कही —
"मैं आज शाम hospital जाऊँगी। माँ के पास।"
"ड्राइवर तैयार है। ज़ब्बार। उसे बता दीजिएगा।"
"मैं रिक्शा से चली जाऊँगी।"
आरव ने पहली बार ज़रा सख़्ती से देखा। "मिसेज़ मल्होत्रा रिक्शा में नहीं जातीं। press को तस्वीर मिल गई तो कहानी अलग बनेगी।"
आन्या ने एक पल सोचा। फिर सर हिला दिया।
"ठीक है।"
दोपहर के बारह बजे आन्या अपने कमरे में थी। खिड़की के पास खड़ी थी — समुंदर देख रही थी। नीचे बगीचे में माली काम कर रहा था, गुलाब के पौधों के पास।
दरवाज़े पर एक हल्की दस्तक हुई।
"हाँ?"
कमला बाई थीं। हाथ में एक छोटा सा डिब्बा।
"बेटी, यह तेरे लिए है। बाबा ने कहा कि दोपहर तक पहुँचा देना।"
"क्या है?"
"पता नहीं।"
बाई गई। आन्या ने डिब्बा खोला।
अंदर एक चाबी थी — गाड़ी की। एक छोटी सी पर्ची भी —
"Hyundai Creta। नीली। ड्राइवर ज़ब्बार जब उपलब्ध न हो, तो आप ख़ुद चला सकती हैं। license है आपका, मेहरा साहब ने verify किया।
— आरव।"
आन्या एक पल पर्ची को देखती रही।
फिर कुर्सी पर बैठ गई।
रोई नहीं। पर रोने जैसा हो गया।
शाम चार बजे वो Tata Memorial Hospital पहुँची। ज़ब्बार ने गाड़ी मुख्य द्वार पर रोकी।
"मैम, मैं यहीं रुकूँगा।"
"धन्यवाद।"
वो अंदर गई। 4-North wing। कमरा 412।
कमरा बड़ा था, उजाला, साफ़। एक खिड़की जो बगीचे की ओर खुलती थी। माँ बेड पर बैठी थीं — पहले से थोड़ा बेहतर लग रही थीं। बगल में रिया।
"आन्या!" रिया दौड़कर लिपट गई। "तू कहाँ थी कल से? और यह कमरा? यह — "
"रिया, बैठ।"
रिया बैठी। माँ ने आन्या का हाथ पकड़ा। उनकी आँखों में सवाल था।
"बेटी, यह सब क्या हुआ? कौन ले आया हमें इस कमरे में? कह रहे हैं — सब कुछ pay हो चुका है। डॉक्टर गोखले ख़ुद आ रहे हैं। आन्या —"
आन्या एक पल चुप रही। फिर बोली —
"माँ, मैंने एक नौकरी की है। बहुत बड़ी कंपनी में। मल्होत्रा ग्रुप।"
"मल्होत्रा?" माँ की आँखें बड़ी हो गईं।
"हाँ। और… उन्होंने… एक advance दिया है। पाँच साल का contract है। मैं अब उनके साथ हूँ — उनके office में, उनकी हवेली में। बस।"
रिया ने आँखें संकरी कीं। "हवेली में?"
"private staff हूँ। personal assistant। कुछ काम घर का है, कुछ बाहर का।"
माँ ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। "बेटा… सच कह रही है ना?"
आन्या ने माँ की आँखों में देखा। और झूठ बोला। दूसरा झूठ। बड़ा झूठ।
"हाँ माँ।"
माँ ने सर हिला दिया। पर उनकी आँखों में संदेह बना रहा।
रिया कुछ बोलने ही वाली थी कि नर्स आ गई — डॉक्टर का राउंड था।
रात के नौ बजे आन्या लौटी। हवेली के दरवाज़े पर ज़ब्बार ने गाड़ी रोकी।
"मैम, बाबा ऊपर हैं study में। कह रहे थे आपसे मिलना है।"
आन्या सीढ़ियाँ चढ़ी। study का दरवाज़ा खुला था। आरव मेज़ पर बैठा था, सामने laptop, एक कप कॉफ़ी।
"आइए।"
आन्या अंदर गई।
"माँ कैसी हैं?"
"बेहतर। डॉक्टर गोखले ने ख़ुद देखा।"
"good।"
एक पल चुप।
फिर आरव ने कहा — "आज आपकी बहन ने मेहरा साहब को फ़ोन किया था। पूछ रही थी मेरे बारे में।"
आन्या के पेट में एक गाँठ बँधी।
"क्या कहा उन्होंने?"
"सच। कि मैं उनकी दीदी का employer हूँ। पाँच साल का contract है, स्टाफ का।"
आन्या ने चैन की साँस ली। "धन्यवाद।"
आरव ने laptop बंद किया। उसकी ओर देखा। चश्मा उतार दिया।
"आन्या जी, एक बात कहना चाहता हूँ।"
"जी।"
"छह महीने एक लंबा वक़्त है। बाहर की दुनिया से झूठ बोलना आसान है। पर ख़ुद से झूठ मत बोलिएगा। यह जो भी है — contract है। कोई जादू नहीं। कोई कहानी नहीं। बस एक deal। यह मत भूलिएगा।"
आन्या ने सर हिला दिया।
"मैं नहीं भूलूँगी।"
"good night।"
"good night।"
रात बारह बजे, अपने कमरे में, आन्या बेड पर लेटी थी। छत को देख रही थी।
बगल वाले कमरे से आरव की आहट आ रही थी। एक दरवाज़ा खुला। फिर बंद। फिर चुप।
आन्या ने आँखें बंद कीं।
पर आरव की आख़िरी बात कानों में गूँजती रही — "ख़ुद से झूठ मत बोलिएगा।"
जैसे वो ख़ुद से ही कह रहा हो।
बाहर समुंदर वैसा ही था। कल वाला।
— अध्याय 3 समाप्त।
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