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सातवें दिन का सच

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Monika Agarwal
22 Mar 2026

 

सूरज की पहली किरण के साथ तन्वी की नींद खुली, लेकिन उसके दिमाग में वही हँसी गूँज रही थी। वह तुरंत स्कूल पहुँची जहाँ विवान पढ़ा रहा था। क्लास खत्म होने के बाद उसने विवान को कैंटीन में पकड़ा।

“विवान, कल रात मैंने कुएँ के पास कुछ सुना। लोग कहते हैं कि यहाँ से लोग गायब हो जाते हैं। क्या ये सच है?” तन्वी ने अपनी सार्कास्टिक टोन को थोड़ा कम करते हुए पूछा।

विवान ने अपनी चाय का कप टेबल पर रखा और तन्वी की आँखों में झाँका। “तन्वी, इस गांव में कुंडली नहीं, कुएँ की दिशा देखी जाती है। पिछले 25 सालों में 63 लोग गायब हुए हैं। मेरी मंगेतर, नीलम... वो भी सातवें दिन गायब हो गई थी।”

तन्वी को लगा जैसे किसी ने उसकी रीढ़ की हड्डी पर बर्फ का टुकड़ा रख दिया हो। “सातवें दिन? मतलब?”

विवान ने बताया, “यहाँ शादी के बाद सात दिन तक उत्सव नहीं, मातम की तैयारी होती है। सातवें दिन की रात, कुआँ अपना हक मांगता है। लोग कहते हैं कि चंद्रकला, जिसकी शादी के दिन उसके पति ने उसे कुएँ में धक्का दे दिया था, वो अब किसी की शादी पूरी नहीं होने देती।”

तन्वी को ये सब एक ‘कलेक्टिव ट्रॉमा’ लगा। उसे लगा कि गांव वाले किसी पुरानी घटना की वजह से इतने डरे हुए हैं कि उन्हें मतिभ्रम (hallucination) हो रहा है। वह अपनी जांच को आगे बढ़ाना चाहती थी। उसने सरपंच जगदीश के घर जाने का फैसला किया।

सरपंच का घर गांव में सबसे बड़ा था, लेकिन वहाँ भी सन्नाटा पसरा था। तन्वी ने सरपंच से सवाल किए, लेकिन उसने हर बात को दबाने की कोशिश की। “शहर की लड़की हो, यहाँ की कहानियों को फिल्म मत समझो। वापस चली जाओ,” सरपंच ने उसे चेतावनी दी।

तन्वी ने हार नहीं मानी। उस दिन उस शादी का सातवां दिन था जिसे तन्वी ने पहले दिन देखा था। गांव में अजीब सी दहशत थी। सूरज ढलते ही लोग अपने घरों में कैद हो गए। तन्वी ने अपने कमरे को अंदर से लॉक किया और अपना ऑडियो एडिटर खोला।

अचानक, सन्नाटे को चीरती हुई एक चीख सुनाई दी। तन्वी खिड़की की तरफ भागी। आवाज़ उसी घर से आई थी जहाँ शादी हुई थी। वह और विवान भागकर वहाँ पहुँचे। घर का दरवाजा खुला था। कमरे में दुल्हन बदहवास बैठी थी। दूल्हा गायब था।

कमरे में न तो कोई संघर्ष हुआ था, न ही कोई सामान टूटा था। खिड़की बंद थी। तन्वी ने अपना कैमरा निकाला और फर्श की तरफ झुकी।

“विवान, ये देखो,” तन्वी ने इशारा किया। ज़मीन पर गीले पैरों के निशान थे। जैसे कोई पानी से निकलकर सीधा यहाँ आया हो। वे निशान कमरे के बीच से शुरू होकर दरवाजे की तरफ जा रहे थे।

तन्वी ने उन निशानों का पीछा किया। वे निशान आँगन पार करते हुए, गांव की गलियों से होते हुए, सीधे उसी कुएँ की तरफ जा रहे थे। कुएँ के मुंडेर पर जाकर निशान अचानक खत्म हो गए।

विवान ने कांपते हुए कहा, “64वाँ।”

तन्वी ने कुएँ के काले पानी में झांका। उसे लगा जैसे नीचे से कोई उसे देख रहा है और फिर वही हँसी गूँजी। तन्वी ने अपना माइक कुएँ की तरफ किया, लेकिन इस बार रिकॉर्डर पर कुछ और ही शब्द उभर रहे थे।

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