(तन्वी के पॉडकास्ट ‘भूत-भटकन’ का इंट्रो म्यूजिक बजता है—एक धीमी, डरावनी धुन)
“नमस्ते इंडिया! मैं हूँ आपकी होस्ट तन्वी मेहरा, और आप सुन रहे हैं ‘भूत-भटकन’। आज मैं दिल्ली के ट्रैफिक और कैफ़ेज़ को पीछे छोड़कर राजस्थान के एक ऐसे गांव के बाहर खड़ी हूँ, जहाँ की मिट्टी में रेत से ज़्यादा रहस्य घुला है। इस गांव का नाम है रतनपुरा। यहाँ लोग शादी का न्योता देने से पहले अपनी वसीयत लिखते हैं। अजीब है न? चलिए, देखते हैं इस सन्नाटे के पीछे का सच।”
तन्वी ने अपना रिकॉर्डर बंद किया और गांव की धूल भरी सड़क पर आगे बढ़ी। सामने एक बड़ा सा पुराना दरवाजा था, जिस पर सिंदूर के सात सूखे निशान थे। गांव में कदम रखते ही उसे एक अजीब सी भारीपन महसूस हुई। सामने एक घर था जहाँ शादी की तैयारी चल रही थी। दिल्ली में शादियां मतलब—शोर, डीजे, और ढेर सारा ड्रामा। लेकिन यहाँ? यहाँ का मंजर कुछ और ही था।
आँगन में गेंदे के फूलों का मंडप सजा था। दुल्हन लाल जोड़े में पत्थर की मूरत बनी बैठी थी। मेहमान भी थे, लेकिन कोई बात नहीं कर रहा था। सब फुसफुसा रहे थे। तन्वी ने अपने कंधे पर टंगे बैग को ठीक किया और सामने खड़े एक आदमी से पूछा, “एक्सक्यूज मी, यहाँ डीजे मना है क्या? या फिर दूल्हा भाग गया?”
सामने खड़ा आदमी, जो गांव का सरपंच जगदीश था, तन्वी को घूरकर देखने लगा। उसकी आँखों में एक अजीब सा खौफ था। उसने तन्वी को इशारा किया कि चुप रहे। तन्वी ने मन ही मन सोचा, ‘ग्रेट! वेलकम टू इंडियाज़ फर्स्ट साइलेंट वेडिंग!’
तन्वी को रुकने के लिए गांव के स्कूल के पास एक कमरा मिला। वहाँ उसकी मुलाकात विवान से हुई। विवान—सादे कपड़े, चेहरे पर एक स्थायी उदासी और आँखों में कुछ खो देने का गम। विवान ने तन्वी की मदद की उसका सामान रखने में।
“आप यहाँ गलत वक्त पर आई हैं तन्वी जी,” विवान ने खिड़की के बाहर देखते हुए कहा। “मिस्टर विवान, मैं पॉडकास्टर हूँ। मेरे लिए गलत वक्त ही सही कंटेंट होता है,” तन्वी ने तंज कसा।
रात हुई। तन्वी का मन नहीं माना। वह अपना माइक और हेडफ़ोन लेकर चुपके से गांव के उस पुराने कुएँ की तरफ बढ़ी जिसे लोग ‘कालरात्रि का कुआँ’ कहते थे। कुआँ गांव के एकदम छोर पर था, जहाँ बरगद के पेड़ों की छाया उसे और भी भयानक बना रही थी।
तन्वी ने अपना हेडफ़ोन लगाया और रिकॉर्डिंग चालू की। “अभी रात के 1:45 बज रहे हैं। मैं कालरात्रि के कुएँ के पास हूँ। यहाँ सन्नाटा इतना गहरा है कि मुझे अपनी ही धड़कन सुनाई दे रही है। गांव वालों का कहना है कि यहाँ एक आत्मा...”
तन्वी की आवाज़ अचानक रुक गई। उसके हेडफ़ोन में एक आवाज़ गूँजी। वह हवा की सरसराहट नहीं थी। वह किसी के रोने की आवाज़ भी नहीं थी। वह एक हँसी थी। एक औरत की खिंची हुई, पतली हँसी। जैसे कोई बरसों से अपनी हंसी रोककर बैठा हो और आज उसे आज़ादी मिली हो।
तन्वी के रोंगटे खड़े हो गए। उसने चारों तरफ देखा, कोई नहीं था। लेकिन हँसी उसके कान के एकदम पास महसूस हो रही थी। “कौन है?” तन्वी की आवाज़ में पहली बार कंपकंपी थी। वह भागकर अपने कमरे में आई और पूरी रात लाइट जलाकर बैठी रही।
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