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Episode 3 12 min read 7 0 FREE

रहस्य की शुरुआत

F
Funtel
21 Mar 2026

अभिजीत: सावित्री तुम भी गुंजन की तरह कुछ भी बोले जा रही हो। तुम अपने कमरे में वापस चलो। चलो।

 

Narrator- अभिजीत सावित्री को पकड़कर वापस उसके कमरे में ले जाता है कि तभी उसकी नजर दीवार पर पड़ती है। जहां खून से लिखा था। “मेरा श्राप सब बर्बाद कर देगा। तुम किसी को नहीं बचा पाओगी।”

 

सावित्री: ये… ये मेरे कमरे में किसने लिखा। शायद गुंजन सही थी कोई तो है जो हम सब पर नजर रखे हुए है। इससे पहले कि वो किसी को नुकसान पहुंचाए मुझे उसे रोकना होगा।

अभिजीत: लगता है कोई हमारे परिवार के साथ घटिया मजाक कर रहा है। वो गुंजन को पागल साबित करना चाहता है मगर मैं ऐसा होने नहीं दूंगा।

सावित्री: नहीं भैया ये कोई मजाक नहीं बल्कि किसी बड़ी शक्ति का जाल है। मुझे कल गांव जाकर इसके बारे में पता करना ही होगा। अभी आप जाकर मां को संभालिए मैं गुंजन भाभी के पास जाती हूं। हमें उन्हें अकेला नहीं छोड़ना चाहिए।

Narrator- अभिजीत वहां से चला जाता और सावित्री गुंजन के कमरे में आकर उसके पास बैठ जाती है ताकि गुंजन आराम से सो सके। मगर रात के भयावह दृश्य ने सावित्री को झकझोर कर रख दिया था। उस कालिंदी का चेहरा, बच्चे रोने की आवाज सब कुछ इतना खतरनाक था कि उसे अब तक यकीन नहीं हो रहा था।

सावित्री रातभर सो नहीं पाई। उसकी आंखों में डर और सवालों का समंदर था। उसने गुंजन के बगल में बैठकर पूरी रात उसकी तबीयत का ख्याल रखा। लेकिन उसके मन में एक ही बात घूम रही थी—"ये सब क्या हो रहा है? और क्यों?"

[SFX: सुबह की चिड़ियों की चहचहाहट और दरवाजे पर खटखटाने की आवाज़]

निर्मला (दरवाजा खोलते हुए)

"सावित्री, बेटी, तुम रातभर  नहीं सोई। ये सब तुम्हारे बस का नहीं है। हम जिस श्राप के नीचे जी रहे हैं, उसे कोई बदल नहीं सकता।  गुंजन की किस्मत में अगर मर जाना ही लिखा है तो यही सही लेकिन मैं अपनी बेटी को मौत के मुंह में नहीं ढकेल सकती।

सावित्री: मां आप ये कैसी बात कर रही है। मैं गुंजन भाभी को कुछ नहीं होने दूंगी। आप बस मुझे ये बताइए कि क्या इस गांव में कोई है जो कालिंदी के बारे में कुछ जानता हो।

निर्मला: पुरोहित नारायण, इस कालिंदी का  हल तुम्हें पुरोहित नारायण के अलावा कोई नहीं बता सकता।"

सावित्री (चौंकते हुए)

"पुरोहित नारायण? कौन हैं वो? और उन्हें कैसे पता होगा?"

निर्मला (धीमे स्वर में)

"बेटा, नारायण बाबा इस गांव के सबसे बड़े ज्ञानी हैं। उन्होंने कालिंदी की कहानी अपनी आंखों से देखी थी। कहते हैं, उन्होंने ही कालिंदी का अंतिम संस्कार किया था। अगर किसी को इस श्राप के बारे में पता होगा, तो वो बस वही हैं। मगर आज टेनिस श्राप के बारे में उन्होंने किसी को भी नहीं बताया। जब भी कालिंदी का कहर इस गांव पर पड़ता है तो वो 1 पूजा करकर उसे शांत कर देते है। मुझे नहीं लगता कि वो तुझे इस बारे में कुछ भी बताएंगे।"

Narrator

सावित्री को यह सुनकर हैरानी हुई कि सब कुछ जानने के बाद भी वो बाबा कुछ नहीं कर रहे। खैर पुरोहित नारायण के बारे में उसने पहले कभी नहीं सुना था। लेकिन अब उसके पास और कोई रास्ता नहीं था।

सावित्री (निर्मला से)

"ठीक है, माँ। मैं आज ही उनसे मिलने जाऊंगी।"

Narrator- सावित्री जैसे ही निर्मला से बात करकर दरवाजे की तरफ कदम आगे बढ़ाती है अचानक पीछे से गुंजन हवा की तेजी से उसकी तरफ बढ़ती है और उसका गला दबा लेती है। गुंजन के बाल खुले और लाल आंखे जैसे मानो सावित्री को भस्म कर डालेगी।

[SFX: जोर से चीखने चिल्लाने की आवाज]

सावित्री: भाभी ये क्या कर रही हो। छोड़ो… छोड़ो मुझे।

निर्मला: ये क्या कर रही हो बहु छोड़ो उसे वो मर जाएगी। मैं कहती हूं छोड़ो उसे।

सावित्री (गंभीर आवाज में): मेरा श्राप तोड़ेगी। मुझसे टकराएगी। मैं तुझे नहीं छोड़ूंगी। तू होती कौन है मुझसे टकराने वाली।

Narrator- सावित्री और निर्मला जोर जोर से चीखने लगते है। वो दोनों पूरी कोशिश करते है लेकिन न जाने गुंजन में इतनी ताकत कहां से आ गई थी कि कोई उसकी उंगली भी नहीं हिला पाता। इतनी आवाज सुनकर अभिजीत और उसके बाउजी भी कमरे में आ जाते है और सावित्री को बचाने की कोशिश करने लगते है। अभिजीत गुंजन को 1 खींचकर थप्पड़ मारता है।

(BGM: SOUND OF A SLAP, और किसी के जमीन पर गिरने की आवाज)

अभिजीत: गुंजन…. होश में आओ। पागल हो गई हो क्या? सावित्री को जान से मारना चाहती हो।

निर्मला: ये हम सबको मारना चाहती है। मुझे तो लगता है कालिंदी बस 1 बहाना है ये हमारे परिवार को मारकर सारी जमीन हड़पना चाहती है।

सावित्री: बस करो मां… इसमें भाभी की कोई गलती नहीं है। इस वक्त उनका शरीर उनके कब्जे में नहीं है।

Narrator: सावित्री गुंजन को जमीन से उठाकर बिस्तर पर लिटा देती है। गुंजन इस वक्त बेहोश थी। सावित्री उसके सर पर हाथ फेरती है।

सावित्री: मुझे माफ कर दो भाभी। मगर भरोसा रखना मैं सब ठीक कर दूंगी।

[SFX: घोड़े के गले की घंटी और पगडंडी पर पैरों की आहट]

Narrator: सावित्री ने पुरोहित नारायण के मंदिर की ओर रुख किया। रास्ते में, उसे बार-बार रात की घटनाएं याद आ रही थीं। गुंजन की चीख, खून के निशान, और वो रहस्यमयी आवाजें।

मंदिर गांव के किनारे, एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे स्थित था। वहां का वातावरण रहस्यमय और शांत था। मंदिर के आसपास की हवा में कुछ ऐसा था, जो किसी अनजाने डर का एहसास करा रहा था।

एपिसोड 3: रहस्य की शुरुआत (विस्तृत संस्करण)

[SFX: हल्की हवाएं, मंदिर की घंटियां धीमी आवाज़ में बज रही हैं]

Narrator

सावित्री मंदिर में दाखिल होते हुए धीरे-धीरे पुरोहित नारायण के पास पहुंची। वहां का वातावरण गंभीर और रहस्यमय था। पुरोहित आंखें बंद करके मंत्रोच्चार में लीन थे। उनके चेहरे पर शांति का भाव था, लेकिन सावित्री के मन में सवालों का तूफान था।

सावित्री (प्रणाम करते हुए)

"प्रणाम, गुरुदेव। मुझे आपसे कुछ जरूरी बातें करनी हैं।"

[SFX: अगरबत्ती की धीमी आवाज़ और मंदिर की हलचल]

पुरोहित नारायण (आंखें खोलते हुए)

"आशीर्वाद, बेटी। कौन हो तुम? और यहां क्यों आई हो?"

सावित्री (गंभीर स्वर में)

"गुरुदेव, मैं सावित्री हूं। इस गांव में पैदा हुई थी, लेकिन पढ़ाई के लिए बाहर चली गई थी। अब यहां लौटी हूं। मेरे परिवार पर जो बीती है, उसने मुझे अंदर तक झकझोर दिया है।"

पुरोहित नारायण (धीमे स्वर में)

"गांव में हर किसी का जीवन अब श्राप से जुड़ा हुआ है। यह नई बात नहीं है। लेकिन तुम मुझसे क्यों मिलने आई हो?"

सावित्री

"क्योंकि मैं सच जानना चाहती हूं। गुंजन की हालत देखकर मुझे यकीन हो गया है कि यहां कुछ भयानक हो रहा है। माँ ने बताया कि आप कालिंदी के बारे में सब कुछ जानते हैं। कृपया मुझे बताएं कि यह सब क्यों हो रहा है।"

[SFX: पुरोहित के हाथ से माला गिरने की आवाज़]

पुरोहित नारायण (गंभीर होकर)

"कालिंदी का नाम क्यों लिया? यह नाम इस गांव में तबाही और दर्द का प्रतीक है। मैं तुम्हें कुछ भी नहीं बता सकता। यह सवाल मत पूछो।"

सावित्री (आश्चर्य और नाराज़गी से)

"गुरुदेव, आप गांव के ज्ञानी हैं। अगर आप ही चुप रहेंगे, तो फिर सच कौन बताएगा? क्या आप नहीं चाहते कि यह श्राप खत्म हो?"

पुरोहित नारायण (हिचकिचाते हुए)

"सावित्री, यह उतना आसान नहीं है। कुछ रहस्य ऐसे होते हैं, जिन्हें जानने से दुख ही मिलता है। कालिंदी की कहानी भी वैसी ही है।"

सावित्री (ज़िद्दी स्वर में)

"गुरुदेव, मुझे दुख का डर नहीं है। मैं अपनी भाभी और गांव की दूसरी औरतों को इस श्राप से बचाना चाहती हूं। अगर आप मुझे सच नहीं बताएंगे, तो मैं इसे कैसे खत्म करूंगी?"

[SFX: हवा का एक तेज़ झोंका, मंदिर की घंटी और दूर से पक्षियों की आवाज़]

पुरोहित नारायण (थोड़ी झिझक के बाद)

"तुम समझ नहीं रही हो, सावित्री। कालिंदी का नाम लेना ही अशुभ है। उसके बारे में बात करना और भी खतरनाक हो सकता है।"

सावित्री (धैर्य खोते हुए)

"गुरुदेव, अगर कालिंदी का नाम लेना अशुभ है, तो क्या उसे यादों से मिटा देना ठीक है? क्या यह सही है कि हम उस आत्मा को और दर्द दें, जो पहले ही इतना कुछ झेल चुकी है?"

पुरोहित नारायण (धीरे से उठते हुए)

"मैंने कहा ना, यह चर्चा बंद करो। कालिंदी की आत्मा इस गांव में भटक रही है। वह बहुत क्रोधित है। अगर तुमने इसे छेड़ा, तो परिणाम भयानक होंगे।"

सावित्री (कड़े स्वर में)

"क्या परिणाम भयानक हो सकते हैं, गुरुदेव? जो महिलाएं मां बनने का सपना देख रही हैं, उनके गर्भ से बच्चे गायब हो रहे हैं। यह भयानक नहीं है? अगर कालिंदी को न्याय नहीं मिला, तो क्या आप नहीं मानते कि उसका श्राप सही है?"

[SFX: अगरबत्ती के जलने की आवाज़ और हल्की हवा]

Narrator

पुरोहित नारायण कुछ पल के लिए शांत हो गए। उनकी आंखों में पछतावे और डर का अजीब मिश्रण था। सावित्री की बातों ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया था।

पुरोहित नारायण (गहरी सांस लेते हुए)

"ठीक है, सावित्री। अगर तुमने इतना ठान ही लिया है, तो सुनो। लेकिन यह समझ लो कि इस कहानी का सच तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा।"

सावित्री (धैर्यपूर्वक)

"मैं सुनने के लिए तैयार हूं, गुरुदेव। आप बस सच बताएं।"

 

[SFX: मंदिर की घंटियां, हल्की हवाओं की आवाज़, और पक्षियों का मधुर संगीत]

 

Narrator

सावित्री मंदिर के शांत वातावरण में बैठी, पुरोहित नारायण की हर बात को ध्यान से सुनने की कोशिश कर रही थी। मंदिर की घंटियों की गूंज और हवा की धीमी सरसराहट ने माहौल को रहस्यमय बना दिया था।

 

पुरोहित नारायण (आंखें बंद करके धीमे स्वर में)

"सावित्री, तुमने जो देखा और सुना है, वह इस गांव का एक दुखद अतीत है। यह केवल श्राप की कहानी नहीं, बल्कि उस औरत की कहानी है जिसने अपना सब कुछ खो दिया—अपनी खुशी, अपनी पहचान, और अपना प्रेम।"

 

सावित्री (जिज्ञासा से)

"गुरुदेव, आप कालिंदी की बात कर रहे हैं? मुझे बताएं कि वह कौन थी और उसके साथ क्या हुआ था।"

 

पुरोहित नारायण (गंभीर स्वर में)

"कालिंदी… वह केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक युग की पहचान थी। एक ऐसी औरत जो अपने समय से बहुत आगे थी। लेकिन हर दिव्यता के पीछे एक दर्द छिपा होता है, और कालिंदी का दर्द भी ऐसा ही था।"

 

[SFX: मंद हवा का झोंका, जैसे अतीत की परछाई ने दस्तक दी हो]

 

Narrator

पुरोहित ने गहरी सांस ली और कालिंदी की कहानी शुरू की।

 

पुरोहित नारायण

"कालिंदी का जन्म इस गांव के सबसे साधारण परिवार में हुआ था। लेकिन बचपन से ही वह अलग थी। उसकी आंखों में ऐसा तेज था, जैसे वह हर चीज को गहराई से देख सकती हो। वह फूलों से बात करती, पेड़ों को सुनती, और जड़ी-बूटियों के साथ ऐसे खेलती, जैसे वे उसकी सबसे अच्छी दोस्त हों।"

 

सावित्री (आश्चर्य से)

"तो वह बचपन से ही वैद्य बनने की ओर झुकी हुई थी?"

 

पुरोहित नारायण (मुस्कुराते हुए)

"हां, लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ। कालिंदी का जीवन हमेशा सुखद नहीं था। वह भी एक आम लड़की थी, जो सपने देखती थी, प्यार करती थी, और खुश रहना चाहती थी।"

 

[SFX: धीमा संगीत, जैसे किसी पुरानी याद ने दस्तक दी हो]

 

पुरोहित नारायण (आंखें मूंदते हुए)

"युवावस्था में, कालिंदी एक लड़के से प्रेम करने लगी थी। उसका नाम देवांश था। देवांश एक साधारण किसान का बेटा था, लेकिन उसकी आंखों में दुनिया को बदलने का सपना था। कालिंदी और देवांश का प्यार सच्चा था, लेकिन इस गांव की परंपराओं ने उनके रास्ते अलग कर दिए।"

Narrator- इतना कहते ही गुरुदेव की आंखों में एक अलग रोशनी झलक आई। सावित्री तो इस कहानी में ऐसी खो गई जैसे मानो वो किसी आत्मा के बारे में नहीं बल्कि 1 दिव्य प्रेम कथा सुनने आई हो।

पुरोहित नारायण: कालिंदी देवांश के प्यार में पूरी तरह पागल हो गई। वो दिन रात बस उससे शादी के सपने देखती और हर शाम इसी मंदिर के किनारे उससे मिलने आया करती। वो दोनों अपनी आने वाली जिंदगी के सपने देख करते।

सावित्री (गंभीर स्वर में)

"गुरुदेव, क्या हुआ उनके प्यार के साथ?"

 

पुरोहित नारायण: एक दिन कालिंदी के पिता इसकी भनक लग गई और उन्हें  यह रिश्ता पसंद नहीं आया। देवांश गरीब था, और कालिंदी को वह सब कुछ दिया गया था, जो किसी और लड़की के पास नहीं था। उसे लगता था कि देवांश के साथ रहकर वह सब कुछ पा लेगी, लेकिन उसके पिता ने इसे मंजूर नहीं किया।

 

सावित्री: फिर क्या हुआ क्या कालिंदी अपने प्यार के लिए लड़ी?

पुरोहित नारायण: हां… वो अपने पिता और इस पूरे समाज के आगे देवांश के लिए ढाल बनकर खड़ी हो गई। कालिंदी ने कई बार अपने पिता को समझाने की कोशिश की मगर कोई फायदा न हुआ इसलिए कालिंदी और देवांश ने गांव छोड़कर भाग जाने का फैसला किया। लेकिन देवांश के 1 करीबी मित्र ने उनकी इस चाल की खबर सारे गांव वालो को दे दी।

सावित्री: फिर… फिर क्या हुआ?

पुरोहित नारायण: फिर क्या था… कालिंदी के पिता ने उसे घर में कैद कर दिया। गांववालों ने देवांश को कालिंदी से दूर जाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्होंने उसे गांव छोड़ने पर मजबूर किया। कहते हैं, वह जाते वक्त कालिंदी को देखने आया, लेकिन गांववालों ने उसे मारने की धमकी दी।

 

[SFX: गांववालों की आवाजें, झगड़ों की गूंज]

 

पुरोहित नारायण (दुखी स्वर में)

"कालिंदी ने देवांश को जाते हुए देखा, लेकिन कुछ कर नहीं सकी। उसकी आंखों में आंसू और दिल में एक कसक थी। उस दिन उसने सब कुछ खो दिया—अपना प्रेम और अपनी खुशी।"

 

[SFX: देवांश की आवाज, (Echo) "मैं वापस आऊंगा, कालिंदी," और फिर कदमों की आवाज]

 

सावित्री (भावुक स्वर में)

"गुरुदेव, यह तो बहुत ही अन्याय था। फिर कालिंदी ने क्या किया?"

 

पुरोहित नारायण (गंभीर स्वर में)

"उस दिन के बाद कालिंदी बदल गई। उसने अपने जीवन को सेवा और पूजा में समर्पित कर दिया। उसने देवताओं की आराधना शुरू की और जड़ी-बूटियों का ज्ञान सीखने लगी। धीरे-धीरे, वह गांव की वैद्य बन गई। लोग उसे पूजने लगे, लेकिन वह कभी अपनी खुशी वापस नहीं पा सकी।"

 

[SFX: मंदिर में मंत्रोच्चार और जड़ी-बूटियों की खुशबू]

 

Narrator

कालिंदी का नाम पूरे गांव में गूंजने लगा। वह हर बीमारी का इलाज कर सकती थी। उसकी दी हुई औषधियों से लोग ठीक हो जाते, और उसकी सलाह से जिंदगियां बदल जातीं। लेकिन उसकी अपनी जिंदगी एक खालीपन से भरी थी।

 

सावित्री (धीरे से)

"गुरुदेव, क्या उसने कभी देवांश का इंतजार किया?"

 

पुरोहित नारायण (थोड़ी देर चुप रहकर)

"हां, वह हर रोज उस रास्ते को देखती थी, जहां से देवांश गया था। लेकिन वह कभी नहीं लौटा। शायद उसे कभी लौटने का मौका नहीं मिला।"

 

[SFX: धीमी बारिश की आवाज़, जैसे किसी की आंखों से आंसू गिर रहे हों]

 

पुरोहित नारायण (गंभीर स्वर में)

"लेकिन उसकी जिंदगी में एक और अंधेरा आना बाकी था।"

 

सावित्री (चौंकते हुए)

"क्या हुआ, गुरुदेव?"

 

पुरोहित नारायण (धीमे स्वर में)

"एक दिन, धरमवीर ने उसे देखा।"

 

[SFX: हवा का तेज झोंका, जैसे किसी अनदेखी शक्ति ने दस्तक दी हो]

 

Narrator

धरमवीर, गांव का सबसे ताकतवर और रईस व्यक्ति, कालिंदी की सुंदरता पर मोहित हो गया। उसने उसे पाने के लिए हर संभव प्रयास किया।

 

पुरोहित नारायण (गंभीरता से)

"धरमवीर ने कालिंदी को कई बार प्रस्ताव दिया। उसने उसे सोने-चांदी और वैभव का लालच दिया। लेकिन कालिंदी ने हमेशा मना कर दिया। उसके दिल में केवल देवांश के लिए जगह थी, और वह धरमवीर के लालच और झूठ के आगे झुकने वाली नहीं थी।"

 

सावित्री (आश्चर्य से)

"तो क्या धरमवीर ने उसे छोड़ दिया?"

 

पुरोहित नारायण (गंभीर और धीमे स्वर में)

"नहीं। धरमवीर हार मानने वालों में से नहीं था। उसने कालिंदी को पाने के लिए एक भयावह योजना बनाई।"

 

[SFX: रहस्यमय संगीत का उभार, जैसे कोई बड़ा रहस्य खुलने वाला हो]

 

आखिर धर्मवीर ने कालिंदी के साथ क्या किया होगा? क्या श्राप धर्मवीर को दिया गया था? क्या सावित्री पुरोहित जी से सब जान पाएगी? जानने के लिए dekhiye अगला episode सिर्फ Once Upon A Time Horror Stories पर।

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