Narrator - डॉक्टर की बात सुनकर अभिजीत और निर्मला घबरा जाते हैं। अभिजीत समझ जाता है कि उसका बच्चा अब इस दुनिया में नहीं रहा। वही निर्मला की आंखों से तो आंसू गिरने लगते हैं।
SFX: हल्की सिसकियों की आवाज।
निर्मला: आप चुप क्यों है बोलिए ना ऐसी क्या बात है मेरी बहु और बच्चा ठीक तो है ना?
SFX: लंबी गहरी सांस की आवाज।
डॉक्टर: काश मैं ऐसा कह पाती गुंजन ने अपना बच्चा खो दिया है लेकिन हैरानी की बात यह है कि हमें गुंजन के गर्भ में बच्चे का एक भी चिन्ह नहीं मिला ऐसा कैसे हो सकता है!! ऐसा लग रहा है जैसे वह कभी प्रेग्नेंट थी नहीं। मुझे तो यह गुत्थी बिल्कुल समझ नहीं आ रही मुझे उम्मीद है कि आप लोग मुश्किल समय में गुंजन के साथ खड़े रहेंगे।
BGM: ward से किसी के चीखने की आवाज आती है।
अभिजीत: ये… ये आवाज कैसी, कही गुंजन!!
Narrator- सब लोग भागते हुए गुंजन के कमरे में पहुंचे तो देखा कि गुंजन पागलों की तरह बिस्तर पर रखे कंभल और तकियों को फाड़ फाड़ रही है और ज़ोर जोर से चीख रही है।
SFX: सामान फेंकने की आवाज।
गुंजन: मेरा बच्चा… मेरा बच्चा!!! मेरा बच्चा कहां है? मैं सब बर्बाद कर दूंगी। मैं अपने बच्चे को कुछ नहीं होने दूंगी।
Narrator- गुंजन की ये हालत देखकर अभिजीत की आंखों से आंसू झलक आते हैं और वो भागकर उसे गले लगाने की कोशिश करता है।
अभिजीत: गुंजन…. गुंजन शांत हो जाओ। सब ठीक हो जाओ। Please मेरी बात सुनो।
Narrator- अभिजीत के गले लगाते ही गुंजन चीख चीखकर रोने लगती है।
गुंजन: अभिजीत मेरा बच्चा… ये सब मेरे बच्चे के कातिल है। मैं इन्हें जिंदा नहीं छोडूंगी।
डॉक्टर: अभिजीत गुंजन को अभी सख्त आराम की जरूरत है। मैं इसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा देती हूं।
SFX: दरवाजा खुलने की आवाज।
Narrator- 1 नर्स कमरे में आती है और जबरदस्ती गुंजन को बेहोशी का इंजेक्शन लगा देती है। अब गुंजन शांत हो चुकी थी। सबने उसे आराम करने के लिए कमरे में अकेला छोड़ दिया।
SFX: दीवार पर मुक्का मारने की आवाज।
अभिजीत: गुंजन की इस हालत का जिम्मेदार मैं ही हूं। मुझे उसे अकेला छोड़ना ही नहीं चाहिए था।
निर्मला: ये तू क्या बोल रहा है बेटा। ये सब तेरी वजह से नहीं बल्कि उस श्राप की वजह से हो रहा है जो भीलवाड़ा को बर्बाद कर चुका है। मुझे तो लगा था कि वो सारी बातें झूठी थी मगर आज सब सच देख लिया।
अभिजीत: अब बस भी करो मां!! आप आज के जमाने में भी श्राप और भूतों जैसी बातों पर यकीन करते हो। ये सब कुछ नहीं होता। मुझे तो लगता है कि गुंजन को कोई बीमारी हुई है। इस वक्त उसकी मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक नहीं है। मुझे सावित्री को बुलाना ही होगा। वही है जो गुंजन को सम्भल सकती है।
SFX: गाड़ियों के हॉर्न की आवाज। लोगों की चहल पहल की आवाज।
Narrator- ये दिल्ली है जहां के 1 बड़े अस्पताल में सावित्री काम करती है। वो 1 मनोवैज्ञानिक है और ऐसे कई cases को साइंस की मदद से हैंडल करती है जिन्हें ये दुनिया भूत का नाम दे चुकी है। सावित्री भूतों में यकीन नहीं करती है। वो इस वक्त कुछ और मनोवैज्ञानिकों के साथ 1 मीटिंग कर रही थी कि तभी उसके पास किसी का कॉल आता है।
SFX: फोन की घंटी की आवाज।
सावित्री: क्या ये कैसे हो सकता है? भाभी कैसी है? हां आप बिल्कुल मत कीजिए मैं कल ही पहुंचती हूं।
BGM: सावित्री के चेहरे पर चिंता के भाव।
सहकर्मी: क्या हुआ सावित्री जी सब ठीक तो है न।
सावित्री: जी हां सब ठीक है। Sorry पर मुझे 1 अर्जेंट case मिला है तो मुझे जाना होगा।
[SFX: ट्रेन के पहियों की आवाज़, एक धीमा हॉर्न, और पृष्ठभूमि में पक्षियों की चहचहाहट।]
[BGM: गहरा और रहस्यमय संगीत, सावित्री के चेहरे पर चिंता के भाव दिखाते हुए।]
Narrator- सावित्री ट्रेन से उतरती है। वह अपने हाथ में एक बैग पकड़े हुए गांव की तरफ बढ़ रही है। रास्ते में लोग उसे अजीब निगाहों से देखते हैं। गांव की गलियों में गहराती खामोशी और हल्की हवाओं का शोर माहौल को और रहस्यमय बना रहा है।
सावित्री: भीलवाड़ा अभी भी नहीं बदला। वही पुरानी सड़कें, डरे हुए लोग और 1 अजीब सी खामोशी। न जाने क्यों मैं जब भी यहां आती हूं मुझे कुछ अजीब वाइब्रेशंस महसूस होते है।
Narrator: "सावित्री कई सालों बाद अपने गांव लौट रही थी। पिछली रात उसे अपने परिवार से गुंजन के अजीब बर्ताव के बारे में खबर मिली। यह खबर सुनकर उसके मन में कई सवाल उठे, जिनका जवाब वह खुद ढूंढने के लिए यहां आई थी।"
[SFX: कुत्तों के भौंकने की आवाज, साथ ही सूखे पत्तों के चरमराने की हल्की ध्वनि।]
[SFX: दरवाजा खटखटाने की आवाज। दरवाजा चरमराते हुए खुलता है।]
गुंजन (घबराते हुए): "सावित्री! तुम आ गई! मुझे पता था, तुम आओगी। तुम ही मेरी मदद कर सकती हो।"
Narrator: "गुंजन के चेहरे पर थकावट और डर साफ झलक रहा था। वह सावित्री को देखते ही गले लग गई।"
सावित्री: गुंजन, सब ठीक है। तुम बिल्कुल फिक्र मत करो मैं सब ठीक कर दूंगी मगर तुम इतनी डरी हुई क्यों लग रही हो? बात क्या है।
गुंजन (डरते हुए): "वो... वो बच्चा! वह मुझे हर जगह दिखता है। कभी वो मेरा पल्लू पकड़कर मेरे पीछे पीछे चलता है तो कभी इसी इसी दरवाजे के पास खड़े होकर मां… मां चिल्लाता है। उसी ने… उसी ने.. और मेरा बच्चा..."
[SFX: हल्की सिसकियां की तेज़ होती आवाज़।]
सावित्री: गुंजन.. गुंजन होश में आओ। यहां कोई बच्चा नहीं है।
Narrator- सावित्री गुंजन को पकड़कर जोर से हिला देती है और गुंजन की वहम टूट जाता है।
SFX: तेज़ हवाओं के चलने की आवाज।
सावित्री: ये इतनी तेज हवाओं का झोंका क्यों चलने लगा। खैर गुंजन चलो अंदर चलते है।
[SFX: घर के अंदर चूल्हे पर बर्तन खटकने की आवाज।]
सावित्री: " मां… मां।”
निर्मला: सावित्री मेरी लाडो!!! तू कैसी है बेटा?”
सावित्री: मैं ठीक हूं मां। मगर भाभी का ये हाल कब से है?"
निर्मला (चिंतित होकर): "15 दिन हो गए हैं। कभी अचानक चीख पड़ती है, कभी कहती है कोई उसे बुला रहा है। डॉक्टर को दिखाने की सोची थी, लेकिन... हमें लगा सब ठीक हो जाएगा मगर इसकी हालत तो दिन ब दिन बिगड़ती ही जा रही है।"
सावित्री: "भाई कहां हैं? कही नजर नहीं आ रहे?"
निर्मला: "अभिजीत वो बेचारा हर वैद और डॉक्टरों के चक्कर काट रहा है। उसके गले से तो रोटी तक नहीं उतरती है। तभी तो तुझे बुलाया है ताकि तू इसे ठीक कर सके।"
Narrator- निर्मला की बातें सुनकर सावित्री की चिंता और बढ़ गई। उसने घर का मोयना लेने का फैसला किया लेकिन वो बहुत थक गई थी इसलिए थोड़ा आराम करना चाहती थी।
निर्मला: मैं भी कितनी पागल हूं। पूरे 1 साल बाद मेरी लाडो घर वापस आई है और मैंने उसे खाने तक भी ना पूंछा। तू ये सब छोड़ जा जाकर अपने कमरे में आराम कर मैंने तेरी पसंदीदा दाल बाटी बनाई है लाती हु।
[SFX: कमरे में धीमी फुसफुसाहट, बाहर हवा के झोंकों की आवाज़। खिड़की पर पेड़ की टहनियां बार-बार टकरा रही हैं।]
[BGM: गहरा और रहस्यमय संगीत।]
सावित्री: मेरा कमरा!!! कितना सुकून मिलता है अपनी पुरानी चीजों को देखकर। लेकिन ये रोने की आवाज कहां से आ रही है।
Narrator: "सावित्री अपने कमरे में बैठी थी, लेकिन गुंजन के कमरे से आती सिसकियों ने उसे बेचैन कर दिया। उसने तुरंत कमरे की ओर रुख किया। दरवाजा खोलते ही उसे भीतर का भयावह दृश्य दिखा।"
[SFX: दरवाजे के चरमराने की आवाज।]
[SFX: कमरे के अंदर धीमे-धीमे फुसफुसाहट की आवाजें, खिड़की पर हवा की थपथपाहट।]
गुंजन (कांपते हुए): "सावित्री, तुम आ गई? मुझे बचा लो। मुझे कुछ हो रहा है।"
Narrator: "गुंजन पलंग पर बैठी थी, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी घबराहट और थकावट साफ झलक रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, और वह अपने हाथों को बार-बार देख रही थी, जैसे कुछ छूट गया हो।"
सावित्री: "भाभी, ये क्या हालत बना रखी है? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?
Narrator: सावित्री ने गुंजन के पास जाकर उससे बात करने की कोशिश की। लेकिन गुंजन के चेहरे पर डर और बेचैनी थी। उसके शब्द बिखरे हुए और असमंजस भरे थे।
गुंजन (धीमे स्वर में): "मेरा बच्चा... मैंने उसे देखा था। वो मुझे पुकार रहा था।”
सावित्री: गुंजन इस कमरे में कोई नहीं है। देखो यहां सिर्फ मैं हूं और तुम्हे डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं हैं। तुम खुलकर मुझे बता सकती हो, क्या तुम किसी के दबाव में आकर ये सब कर रही हो।
गुंजन: नहीं वो अभी भी यहीं है। वो तुम्हे देख रहा है। उस रात जब मैने परछाई देखी। उसने मुझे बुलाया। वह बच्चा... उसने कहा, 'मां, मेरे पास आओ।' और फिर... खून... लाल कदमों के निशान। वो आएगा वो रात को जरूर आएगा।
सावित्री (चौंकते हुए): "क्या? लेकिन भाभी, ये कैसे हो सकता है? तुमने कहा था कि तुम्हारा बच्चा... गायब हो गया। फिर ये बात—”
गुंजन (गुस्से और डर के मिश्रण से): "तुम नहीं समझोगी, सावित्री! वो मेरे साथ है... हर जगह। उसकी आवाज, उसकी परछाईं... वो हर रात आता है। कभी मुझे बुलाता है, कभी रोता है।
[SFX: गुंजन की बातों के साथ खिड़की पर तेज़ हवा का झोंका, और पास रखे एक गिलास का गिरना।]
Narrator: "गुंजन का शरीर कांप रहा था। वह अपने पैरों को घुटनों से लपेटे बैठी थी, जैसे किसी अदृश्य शक्ति से बचने की कोशिश कर रही हो। सावित्री ने उसकी नब्ज जांची।"
सावित्री: "भाभी, तुम्हें आराम की जरूरत है। मुझे लगता है, यह सब तुम्हारे दिमाग का भ्रम है। मैं यहां हूं। सब ठीक हो जाएगा।"
गुंजन (गहरी आवाज में, अचानक बदलते स्वर में): "सब ठीक नहीं होगा, सावित्री। तुम नहीं जानती, ये सब कालिंदी का काम है। वो मुझे ले जाएगी। उसने कहा है, 'तेरे बच्चे की जगह अब तुझे जाना होगा।'"
[SFX: अचानक कमरे की बत्ती झपकने लगती है। खिड़की पर टकराती टहनियां तेज़ आवाज करने लगती हैं।]
सावित्री (खुद को संभालते हुए): " कालिंदी, कौन कालिंदी… भाभी, ये सब तुम्हारे दिमाग की उपज है। तुम्हारे दिमाग पर गहरे सदमे का असर हुआ है तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए कुछ दवाई लाती हूं।"
गुंजन (सहमी हुई, धीमे स्वर में): "दवाई काम नहीं करेगी, सावित्री। मैं श्रापित हूं। यह सिर्फ शुरुआत है।"
सावित्री (शांत स्वर में): भाभी ये सब क्या बडबडा रही है। बच्चा, लाल निशान और अब ये कालिंदी कौन है?
Narrator: सावित्री समझ गई कि यह कोई साधारण समस्या नहीं है। उसने अपने बैग से अपनी नोटबुक निकाली और गुंजन के लक्षण लिखने लगी। हर छोटी-बड़ी बात वह दर्ज कर रही थी।
सावित्री: इसका मतलब गुंजन जिससे डरती है वो रात को आएगा। आज रात मुझे चौकन्ना रहना होगा, मुझे कोई न कोई सुराख जरूर मिलेगा।
[SFX: रात के समय की हल्की फुसफुसाहट, हवाओं की गूंज। उल्लुओं और चमगादों के पंख फड़फड़ाने की आवाज]
[SFX: दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर झींगुरों की आवाज।
Narrator: "रात गहरी हो चुकी थी। घर के सभी लोग सो चुके थे। लेकिन सावित्री को नींद नहीं आ रही थी। सावित्री कमरे में अपनी नोटबुक में लिख रही है, लेकिन हवाओं की गूंज और हल्की फुसफुसाहटों ने माहौल को भयानक बना दिया था कि तभी अचानक खिड़की पर दस्तक हुई।"
[SFX: खिड़की पर दस्तक की आवाज। धीमे-धीमे बढ़ती फुसफुसाहट।]
सावित्री (धीरे-से): " "ये आवाजें... इतनी देर रात खिड़की पर कौन हो सकता है?... कौन है?"
[SFX: खिड़की के बाहर तेज़ हवा का झोंका।]
Narrator: "सावित्री ने खिड़की की ओर देखा, लेकिन कुछ नहीं दिखा। उसने खिड़की के पास जाकर बाहर झांका। आंगन में हल्की-हल्की धुंध फैली हुई थी। तभी उसे वहां एक परछाईं दिखी।"
[SFX: धीमी हवा का झोंका और परछाईं के साथ कदमों की हल्की आवाज।]
सावित्री (धीरे से, खुद से): "यह कौन हो सकता है? इस वक्त बाहर कौन है?"
Narrator: "जैसे ही उसने ध्यान से देखा, वह परछाईं घर के पुराने मंदिर की ओर बढ़ने लगी। बिना किसी हिचक के, सावित्री ने दरवाजा खोला और उसके पीछे-पीछे चल दी।"
[SFX: दरवाजा चरमराते हुए खुलता है। सावित्री के कदमों की धीमी आवाज।]
Narrator: "मंदिर तक पहुंचने पर उसने देखा कि दरवाजे पर लाल कदमों के निशान थे। खून जैसा लगने वाला द्रव्य नीचे बह रहा था। सावित्री ने झुककर उसे छूना चाहा, लेकिन तभी..."
[SFX: अचानक एक बच्चे की तेज़ चीख।]
बच्चे की आवाज (गूंजते हुए): "मां... मेरे पास आओ।"
[SFX: सावित्री का घबराकर पीछे हटना। मंदिर के दरवाजे खुद-ब-खुद खुलते हैं।]
Narrator: "सावित्री ने देखा कि मंदिर के भीतर दीवारों पर खून से बने अजीब चिह्न थे। वहां एक पालना रखा था, जो धीरे-धीरे हिल रहा था।"
सावित्री (हिम्मत जुटाते हुए): "कौन है यहां? कौन यह सब कर रहा है?"
[SFX: पालने के पास अचानक गिरने की आवाज। हवा का तेज़ झोंका।]
Narrator: "जवाब में सिर्फ सन्नाटा था। सावित्री ने कदम बढ़ाया और जैसे ही उसने पालने के भीतर झांका, उसे वहां एक कंकाल दिखा। बच्चे के कंकाल का एक हाथ उसकी ओर बढ़ा हुआ था।"
[SFX: कंकाल के साथ धातु की खड़खड़ाहट, सावित्री की तेज़ चीख।]
सावित्री (घबराते हुए): "नहीं... यह सच नहीं हो सकता।"
Narrator: "सावित्री पीछे हटने लगी। लेकिन तभी मंदिर के दरवाजे जोर से बंद हो गए। वह भागने की कोशिश कर रही थी, जब उसकी आंखों के सामने लाल रोशनी चमकी।"
[SFX: दरवाजे बंद होने की जोरदार आवाज, और हवा में गूंजता हुआ अजीब मंत्रोच्चार।]
बच्चे की आवाज (धीमे स्वर में): "तुमने मेरी बात नहीं मानी। अब भुगतो।"
Narrator: "मंदिर में अचानक एक चेहरा प्रकट हुआ। यह कालिंदी का चेहरा था। उसकी आंखें गुस्से और दर्द से जल रही थीं। वह सावित्री की ओर बढ़ रही थी।"
कालिंदी (गूंजते हुए): "यह श्राप मैंने दिया है, लेकिन यह दर्द तुम सबने मुझे दिया था। अब कोई इसे नहीं रोक सकता।"
[SFX: कालिंदी के साथ हवा का तेज़ बहाव और उसकी हंसी की डरावनी गूंज।]
Narrator: "सावित्री ने अपने पूरे दम से चीख मारी और दरवाजा खोलने की कोशिश की। किसी तरह वह बाहर निकली और भागकर घर पहुंची। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं।"
[SFX: दौड़ते हुए कदमों की आवाज। घर का दरवाजा खोलने की ध्वनि।]
गुंजन (सावित्री को देखते हुए): "तुम भी देख आई, है ना? अब तुम जान गई कि यह सब सच है।"
Narrator- गुंजन के साथ घर के बाकी लोग भी बाहर आ गए। सावित्री का शरीर मानो जम सा गया हो। उसकी बोलती बंद थी।
निर्मला: क्या हुआ सावित्री तुम यहां आंगन में? क्या देखा तुमने? कुछ बोलती क्यों नहीं?
अभिजीत: सावित्री चुप क्यों हो? मां कुछ पूंछ रही है।
SFX: बिल्ली के रोने की आवाज।
सावित्री: वो कालिंदी…. कालिंदी।”
Narrator: "सावित्री को अब एहसास हो गया था कि यह घटना सिर्फ कल्पना नहीं थी। वह गुंजन की बातों पर यकीन करने लगी। लेकिन सवाल ये था कि क्या वो घरवालों को सच बता पाएगी?
[SFX: कमरे में घड़ी की टिक-टिक, और हवाओं की धीमी गूंज।]
[BGM: डरावना और रहस्यमय संगीत, जो सीन के साथ खत्म होता
आखिर कौन है ये कालिंदी और क्या श्राप दिया है उसने भीलवाड़ा? सावित्री कैसे पहुंचेगी कालिंदी तक? जानने के लिए सुनते रही कालिंदी का श्राप सिर्फ Once Upon A Time Horror Stories पर ।
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