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Episode 3 10 min read 9 0 FREE

चंद्रमुखी

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Funtel
21 Mar 2026

मेघना (भयानक आवाज हंसती हुई) : कहा था ना मैंने, अपना बदला तो मैं लेकर ही जाऊंगी गोमती। पहचान तो गई हो ना मुझे। 

 

गोमती (डरी हुई कांपती आवाज़) : त त तुम, नहीं। ये नहीं हो सकता। ये सच नहीं हो सकता। 

 

मेघना (भयानक आवाज हंसती हुई) : अपनी करनी का फल तो तुझे मिलेगा, लेकिन इतनी आसानी से नहीं। जिस तरह मैं तड़प तड़प कर मरी थी। उसी तरह अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी को तड़प तड़प कर मरते हुए देखेगी तू। 

 

नैरेटर : गोमती आंखों में आंसू और डर एक साथ छलक रहा था, जैसे तो उसे कुछ याद आ रहा हो, जिसे वह सालों पहले कहीं छोड़ आई थी। 

 

गोमती (रोती हुई कांपती आवाज़) : चाहे तो मेरी जान ले लो, लेकिन मेरी बच्ची को छोड़ दो। मैं तुमसे अपनी बेटी की जान की भीख मांगती हूं। मैं नहीं चाहती जिस तरह तुम तड़पी, मेरी बेटी भी उसी तरह तड़पे। तुम मुझे मार दो। 

 

नैरेटर : ये बोलते हुए गोमती ने अपनी गर्दन पर चाकू रख लिया और उस आत्मा से अपनी बेटी की जान की भीख मांगने लगी मगर गोमती की ओर देखकर मेघना जोर जोर से हंसने लगी। 

 

गोमती डर से कांप रही थी। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे और होंठ बुदबुदा रहे थे — "ये सच नहीं हो सकता… यह नहीं हो सकता।" लेकिन सामने खड़ी मेघना की भयानक हंसी उस पर कहर ढा रही थी।

 

उस हंसी के पीछे छुपे शब्द मानो उसकी आत्मा को चीर रहे थे — "अपनी करनी का फल तुझे मिलेगा… लेकिन इतनी आसानी से नहीं। जिस तरह मैं तड़प-तड़प कर मरी थी, उसी तरह तू अपनी आँखों के सामने अपनी बेटी को तड़पते हुए देखेगी।"

 

गोमती का दिल दहल उठा। उसकी आँखों में डर और दर्द एक साथ छलक रहा था, जैसे कोई पुराना राज़ अचानक उसकी आँखों के सामने जीवित हो उठा हो। वह रो पड़ी और थरथराती हुई आवाज़ में उस आत्मा से रहम की भीख मांगने लगी।

 

वह बार-बार यही कह रही थी कि उसकी बेटी को छोड़ दिया जाए, चाहे उसकी जान ले ली जाए। वह अपनी बेटी की मौत देखने का साहस नहीं रखती थी।

 

इतना कहकर गोमती ने काँपते हाथों से अपनी ही गर्दन पर चाकू रख लिया। उसकी आँखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे। लेकिन उसकी हालत देखकर मेघना और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी और उसने गोमती से कहा 

मेघना (भयानक आवाज हंसती हुई) : खुद की बेटी को तकलीफ में देखकर बहुत तकलीफ हो रही है। भूल गई मेरे साथ क्या हुआ था। 

 

(फ्लैशबैक : महल का सीन 35 साल पहले, चंद्रमुखी नृत्य कर रही है) 

 

राजा (मन में) : इसका रूप, इसका सौंदर्य मुझ पर हावी हो रहा है। इसे देख कर अपना विवेक खो रहे हैं हम। 

 

नैरेटर : राजा एक टक बस चंद्रमुखी को नृत्य करते हुए देखे जा रहा था और रानी की नज़रें राजा पर ही टिकी थी। चंद्रमुखी के लिए राजा की आंखों में वो भाव रानी को स्पष्ट समझ आ रहे थे। 

 

रानी (मन में) : इस नर्तकी चंद्रमुखी के इरादे अच्छी तरह समझ रही हूं मैं। अपने रूप से राजा को बहलाना चाहती है, मेरा स्थान लेना चाहती है। लेकिन मेरे होते मैं ऐसा कभी होने नहीं दूंगी। 

 

नैरेटर : रात के पहर चंद्रमुखी राजमहल से अपने घर के लिए निकल रही थी तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। अचानक से वह घबरा गई, उसने पीछे मुड़कर देखा तो पीछे राजा खड़े थे। 

 

चंद्रमुखी (घबराई, कन्फ्यूज़): राजन, आप? 

 

राजा : डरो मत चंद्रमुखी, तुम्हारे लिए मैं यह नए घुंघरू लेकर आया था। तुम्हारे पांव में बंधे घुंघरू बहुत ही सुंदर लगते हैं इसलिए सोचा तुम्हें इन्हें भेंट कर दूं। 

 

चंद्रमुखी (घबराई, कन्फ्यूज़): परंतु महाराज इसकी क्या जरूरत है। 

 

राजा : अरे रख लो। प्यार से दे रहे हैं। राजा की भेंट को वैसे भी कभी अस्वीकार नहीं करते। 

 

नैरेटर : राजा अक्सर ही सबको भेंट दिया करते थे इसलिए चंद्रमुखी ने सीधे स्वभाव से भेंट स्वरूप वो घुंघरू ले लिए, मगर अपने कक्ष की खिड़की पर खड़ी रानी यह सब देख रही थी और यह सब देखकर उसका खून खोल उठा। 

 

रानी (गुस्सा और ईर्ष्या) : ये चंद्रमुखी इस तरह अपनी हरकतों से पास आने वाली नहीं है। न जाने कौन सा जादू कर दिया है इसने राजा पर जो राजा इतने मेहरबान हो रहे हैं इस पर। अपनी खूबसूरती से अपने जाल में फसाया है ना इसने राजा को, इसी के कारण राजा मेरी तरफ नहीं देखते। इसका तो मैं वह हाल करूंगी कि खुद को भी कभी आईने में देख नहीं पाएगी। 

 

नैरेटर : राजा के महल में वापस आने के बाद रानी चुपके से चंद्रमुखी के पीछे गई और उसका रास्ता रोक लिया। 

 

चंद्रमुखी : रानी सा, आप इतनी रात का यहां पर? 

 

रानी (गुस्से में) : सच-सच बताओ आखिर चाहती क्या हो तुम, इरादे क्या हैं तुम्हारे। तुम जानती हो ना गर्भ से भी हैं हम। राजा का अंश पल रहा है हमारे अंदर। 

चंद्रमुखी (कन्फ्यूज़) : मैं कुछ समझी नहीं रानी सा, आप किस बारे में बात कर रही हैं। 

 

रानी (गुस्से में) : तुम मेरी बातों को बहुत अच्छे से समझ रही हो। ज्यादा ना समझ बनने का नाटक मत करो, समझी। मेरे पति पर, राजा पर अपनी नज़रें टिकाई हुई हो तुम। अपने रूप से उनका ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहती हो, मेरी जगह लेना चाहती हो लेकिन एक बात की गांठ बांध लेना कि मेरे जीते जी ऐसा कभी नहीं होगा। अगर फिर से राजा को बहलाने की कोशिश भी की तो उसके ऊपर अफसोस करोगी तुम। 

 

चंद्रमुखी (गुस्से में) : बस बहुत हो गया रानी सा, अगर मैं कुछ कह नहीं रही हूं तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी बोलती जाओगी। मैं बस आपके महल में नृत्य करने आती हूं क्योंकि मेरे घर में मेरी मां के अलावा और कोई नहीं है और उसके लिए पैसा कमाना मेरी जिम्मेदारी है। आप जैसा सोच रही हैं मेरे मन में वैसे कुछ भी नहीं है। 

 

नैरेटर : चंद्रमुखी की बातें सुनकर रानी का गुस्सा और बढ़ गया। वो छिपते हुए रात को महल में दाखिल हुई मगर पूरी रात उसे नींद नहीं आई। इसी तरह पूरी रात गुजरी, अगले रोज़ चंद्रमुखी जब महल में नृत्य करने आई तो रानी उस कमरे में गई जहां चंद्रमुखी अपने नृत्य के वस्त्र बदला करती थी। रानी ने चंद्रमुखी के दुपट्टे से उसके कुछ टूटे हुए बाल उठा लिए। वो आधी रात को महल के एक कमरे में गई, उसने कमरे के बीचोबीच एक दीपक जलाया और उसके इर्द गिर्द चार दीपकों से एक घेरा बना दिया। रानी ने कुछ मंत्र बोलने शुरू किए और अपने हाथ में एक काले रंग की गुड़िया को पकड़ा। चंद्रमुखी के बालों को उसने उसे गुड़िया के ऊपर लपेट दिया और उसके भीतर कीलों को गाड़ दिया। 

 

रानी (ईर्ष्या और गुस्सा) : अब तू देख कैसे तेरा यह सुंदर रूप किसी मुर्दे की तरह हो जाएगा। राजा को बहकाने चली थी ना, तेरा तो अब वह हाल होगा कि तड़प तड़प कर अपनी मौत मांगेगी तू। 

 

नैरेटर : रानी ने काले कपड़े से अपना चेहरा देख लिया। वह छिपती हुई महल के पिछले दरवाजे से बाहर की तरफ निकली और चंद्रमुखी के घर की तरफ गई। महल से थोड़ी दूर चंद्रमुखी का एक छोटा सा टूटा फूटा मकान था। रानी ने उसके घर के पिछले हिस्से की मिट्टी खोदी और उस गुड़िया को वहां पर गाड़ दिया। सबसे छिपती हुई हो कुछ देर बाद महल में अपने कक्ष में आकर सो गई। अगली सुबह जब चंद्रमुखी की आंख खुली तो उसका शरीर इतना कमजोर हो गया था कि वह अपने बिस्तर से भी उठने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। 

 

चंद्रमुखी (कमज़ोर आवाज़) : ये, ये क्या हो गया मुझे। ऐसा लग रहा है कि शरीर में मानो जान ही खत्म हो गई है। बिस्तर से उठने की भी हिम्मत नहीं हो रही है मेरी। 

 

विमला (चिंता) : ऐसा क्या हो गया तुझे। कल रात तक तो तेरी तबीयत बिल्कुल ठीक थी। अचानक से क्या हो गया तुझे। देखूं जरा, कहीं बुखार तो नहीं हो गया। 

 

नैरेटर : विमला ने चंद्रमुखी के माथे को छूकर देखा तो उसका माथा बिल्कुल गर्म भट्टी की तरह तप रहा था। विमला ने कई दिन तक वैद्य जी से चंद्रमुखी का इलाज करवाया मगर उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आया बल्कि दिन पर दिन उसकी हालत और खराब होती गई। आंखों के नीचे काले गड्ढे छा गए, और शरीर ऐसा होने लगा मानो जैसे कोई सूखी लकड़ी हो। चंद्रमुखी जितनी खूबसूरत थी, उसका चेहरा अब इतना बदसूरत हो चुका था कि वह खुद को भी आईने में देख नहीं पा रही थी। उसने जब खुद को आईने में देखा तो अपना रूप देखकर उसकी आंखों से आंसू बह निकले। 

 

चंद्रमुखी (कमजोर आवाज रोते हुए) : यह क्या हो गया है मुझे, पता नहीं भगवान किस कर्म के लिए मुझे यह सजा दे रहा है। आखिर क्या बिगाड़ा है मैंने किसी का, जो मेरे साथ यह सब हो रहा है। ऐसी हालत हो गई है कि खुद अपनी मौत चाहती हूं, लेकिन मुझे तो मौत भी नसीब नहीं हो रही। मैं मरना चाहती हूं मां, मैं इस शरीर के साथ अब और नहीं जीना चाहती। मुझे मार डालो, मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। 

 

नैरेटर : चंद्रमुखी की हालत देखकर उसकी मां की आंखों से आंसू बह निकले। जब उसकी बीमारी वैद के पकड़ में नहीं आई तो उसकी मां ने तांत्रिकों का सहारा लिया, मगर कोई भी उसे ठीक नहीं कर पाया। 

 

तांत्रिक : तंत्र की क्रिया, काला जादू किया गया है तुम्हारी बेटी पर मगर इसका तोड़ सिर्फ वही कर सकता है जिसने इसे किया है। उसके अलावा कोई तुम्हारी बेटी को ठीक नहीं कर सकता। यह इसी तरह तड़पेगी और कोई इसमें कुछ नहीं कर पाएगा। 

 

विमला (रोते हुए) : मगर मेरी बेटी ने किसी का क्या बिगाड़ा है। कोई भला मेरी बेटी के साथ इतना बुरा कैसे कर सकता है। मैं कैसे अपनी ही औलाद को इस तरह अपनी आंखों के सामने तड़पते हुए देखूं। 

 

तांत्रिक : मैं तुम्हारी हालत समझ रहा हूं लेकिन मैं इसमें तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता। जिस क्रिया का प्रयोग इसके ऊपर किया गया है उसका तोड़ वो क्रिया करने वाले के सिवाय दूसरा कोई नहीं कर सकता। किसी ने अपनी ईर्ष्या में तुम्हारी बेटी के साथ ऐसा किया है, मगर तुम चिंता मत करो। एक न एक दिन उसे अपनी करने का फल भोगना ही पड़ेगा, किसी के साथ बुरा करने वाले का कभी भला नहीं होता। अपनी करनी वह खुद भोगेगा। तुम भगवान से प्रार्थना करो, शायद अब भगवान ही इसमें तुम्हारी कुछ मदद कर सके। 

 

नैरेटर : तांत्रिक बाबा भी हार कर वहां से चले गए मगर उस दिन के बाद चंद्रमुखी की हालत और बद से बदतर हो गई। चंद्रमुखी की मां उसके लिए खाना लेकर आई, वो बिस्तर पर लेटी हुई थी। उसकी मां ने उसे उठाने के लिए अपने हाथ का सहारा दिया तो उसकी मां ने अपने हाथ पर कुछ महसूस किया। जब उन्होंने चंद्रमुखी का बैठाकर उसकी पीठ की तरफ देखा तो उनके होश उड़ गए क्योंकि चंद्रमुखी की पीठ पर अनगिनत कीड़े रेंग रहे थे और उसकी कमर का मांस बिल्कुल गल चुका था। शरीर में हड्डियों के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था। विमला ने अपनी आंखों में आंसू भरे जल्दी से उन कीड़ों को उसकी कमर से झाड़ा और रोते हुए चंद्रमुखी को खाना खिलाया। वो ठीक से खाने का एक निवाला भी नहीं खा पा रही थी, सारा खाना उसके मुंह से बार-बार नीचे गिर रहा था। 

 

विमला (रोते हुए) : अब मुझसे अपनी बच्ची की ये हालत नहीं देखी जाती भगवान। अगर तू मेरी बच्ची को ठीक नहीं कर सकता तो उसे अपने पास बुला ले। और मुझे भी अपने पास बुला ले। अपनी बच्ची को इस हालत में नहीं देख सकती हूं मैं। 

 

नैरेटर : विमला ने चंद्रमुखी के शरीर पर दवाई का लेप लगाया और रोते रोते अपनी चारपाई पर लेट गई। अगली सुबह जब चंद्रमुखी ने अपनी मां को आवाज दी तो उसकी मां ने कोई जवाब नहीं दिया। चंद्रमुखी ने उठकर देखा तो उसकी मां चल बसी थी। इस दुनिया में उसकी मां के अलावा उसका और कोई नहीं था। चंद्रमुखी की आंखों से फूट फूट कर आंसू बह रहे थे। चंद्रमुखी के रोने की आवाज सुनकर पड़ोसी उसके घर में इकट्ठा हुए और उसकी मां की अंतिम क्रिया की तैयारी शुरू की गई। मां की अंतिम क्रिया के बाद चंद्रमुखी अपने घर में किसी जिंदा लाश की तरह अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी तभी रानी उसके घर में आई। 

 

रानी : सुना मैंने कि तुम्हारी मां चल बसी, बड़ा दुख हुआ सुनकर और तुम्हारी हालत देखकर भी, सब अपने कर्मों का फल भोगते हैं। तुमने भी कुछ ऐसा किया होगा जिसका फल भोग रही हो। 

 

चंद्रमुखी (कमजोर आवाज गुस्से में रोती हुई) : मुझे अच्छी तरह पता है कि मेरे साथ ये जो भी हो रहा है, तुमने ही किया है। तुम्हारी वजह से ही आज मेरी यह हालत है, और तुम्हारी वजह से ही आज मेरी मां इस दुनिया में नहीं है। 

 

रानी (ईर्ष्या और गुस्से में) : मेरी वजह से नहीं तुम्हारी खुद की वजह से। कहा था मैंने कि मेरे पति से दूर रहो, लेकिन तुम्हें तो रानी की जगह लेनी थी। अब दिखा दी ना मैंने तुम्हें तुम्हारी असली जगह। ऐसा हाल किया है मैंने तुम्हारा कि ना तो जी पाओगी और ना मर पाओगी। बहुत मजा आ रहा है तुम्हें ऐसे हाल में देखकर। अब इसी तरह भुगतो और तड़प तड़प कर अपनी मौत आने का इंतजार करो। 

नैरेटर : रानी के मुंह से जब चंद्रमुखी को सच पता चला तो उसके गुस्से का बवंडर फुट पड़ा। रानी उसकी हालत पर हंसती हुई वहां से चली गई मगर चंद्रमुखी के लिए अब उसकी पीड़ा असहनीय हो गई थी। पहले तो वो अपनी मां को देखकर जैसे-जैसे जी रही थी, मगर मां के चले जाने के बाद वह खुद को संभाल नहीं पाई। वह इस तरह दर्द में तड़प रही थी कि उसने खुद ही मौत को गले लगाने के बारे में सोच लिया। उसने कमरे में रखी छुरी उठाई और अपनी गर्दन पर रख ली। उसकी आंखों से पीड़ा के वह आंसू लगातार बह रहे थे। 

 

चंद्रमुखी (पीड़ा में रोते हुए) : तेरी वजह से मेरी हालत हुई है गोमती, तेरी वजह से मेरी मां इतने दुख में इस दुनिया को छोड़कर गई है और आज मैं तेरी वजह से अपनी जिंदगी खत्म करने जा रही हूं। शराब है यह मेरा एक दिन वापस लौटूंगी और उस दिन तबाह कर दूंगी तुझे और तेरे पूरे खानदान को। जिस तरह मैं तड़प तड़प कर अपनी जान दे रही हूं, वही दृश्य एक दिन तेरी आंखों के सामने आएगा। तू भी अपनी मौत की भीख मांगेगी। अपने परिवार की मौत की भीख मांगेगा लेकिन मौत नसीब नहीं होगी तुम्हें। 

 

नैरेटर : चंद्रमुखी ने उसी समय खुद को खत्म कर लिया। मगर जिस तरह उसने तड़पते हुए खुद की जान ली, उसकी आत्मा मुक्त नहीं हुई बल्कि बदले के लिए भटकने लगी। कुछ नहीं बात रानी के प्रसव के दिन आए, देर रात उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। शाही राजघराने की दाई को वहां पर लाया गया। रानी बुरी तरह दर्द से बिलख रही थी तभी कुछ देर बाद उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया मगर उस बच्चों को देखकर दी मां की चीख निकल गई। बच्चा मृत था और उसका पूरा शरीर नीला पड़ चुका था। उसकी देह पर तंत्र का एक निशान बना था, जिसे देखकर दाई मां बहुत कुछ समझ गई। 

 

दाई मां (डरी हुई) : बहुत बड़ी अनहोनी हुई है, यह कोई शुभ संकेत नहीं है। बात सिर्फ इतनी सी नहीं है रानी कि आपका बच्चा अमृत पैदा हुआ है बल्कि आपके जीवन में बहुत बड़ा भूचाल आने वाला है जिसकी शुरुआत यहां से हो चुकी है। कोई अतृप्त आत्मा हावी हो रही है आपके ऊपर। आपका वंश नहीं पढ़ने देगी वह, किसी बाबा को बुलाकर अपना इलाज करवा लीजिए वरना सब खत्म हो जाएगा। 

 

रानी (डरी हुई) : ये, ये आप क्या कह रही हैं दाई मां। 

 

दाई मां (डरी हुई) : मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूं। झाड़ फूंक करवा लीजिए वरना परिणाम अच्छा नहीं होगा रानी सा। 

 

नैरेटर : रानी अपने बच्चे की मौत से उभरी भी नहीं थी तभी कुछ दिन बाद एक रात उसे महल में घुंघरूओ की आवाज सुनाई दी। उस आवाज को सुनकर रानी के पूरे शरीर में डर दौड़ गया। वह पसीने से भीग चुकी थी और डर से उसका पूरा शरीर कांप रहा था। वो घबराते हुए उठी मगर जैसे ही उसने उठकर सामने की तरफ देखा तो उसके होश उड़ गए। चंद्रमुखी ठीक उसके सामने खड़ी थी मगर उसका शरीर बिल्कुल हड्डियों का ढांचा लग रहा था। चेहरा बुरी तरह सड़ चुका था और वह भयानक तरीके से हंसते हुए उसी की ओर आ रही थी। उसे देखकर रानी अपने कदम पीछे करने लगी और लड़खड़ा कर गिर पड़ी। चंद्रमुखी की आत्मा उसके ऊपर झपट पड़ी। रानी जोर से चिल्लाई, उसकी आवाज सुनकर राजा की आंख खुल गई। राजा ने रानी को बिस्तर पर बैठाया। 

 

राजा (नींद में घबराया) : क्या हुआ तुम्हें, तुम नीचे कैसे गिर गई और तुम चिल्ला क्यों रही थी। तुम ठीक तो हो ना। 

 

रानी (डरी हुई) : नहीं। वो आई थी, वो मुझे मारने के लिए आई थी। उसने मेरे बच्चे को भी मार डाला था, वह मुझे भी नहीं छोड़ेगी। 

 

राजा (घबराया) : कौन, किसने तुम्हारे बच्चे को मार डाला और कौन तुम्हें नहीं छोड़ेगी। 

 

रानी (डरी हुई) : चंद्रमुखी, चंद्रमुखी की आत्मा। वही आई थी। आप तांत्रिक बाबा को बुलाइए वरना वह किसी को नहीं छोड़ेगी। 

 

राजा (घबराया) : क्या, चंद्रमुखी की आत्मा। मगर वह तुम्हें परेशान क्यों करेगी। भला तुमने उसका क्या बिगाड़ा है। 

 

नैरेटर : डर के मारे रानी ने अपने मुंह से एक शब्द भी नहीं बोला। वो रात जैसे तैसे कट गई, अगले दिन राजा ने एक तांत्रिक को महल में बुलाया। सांझ होते ही तांत्रिक ने महल में एक घेरा बनाया और घेरे के भीतर अग्नि प्रज्वलित करके बैठ गया। उसने कुछ मंत्रों को पढ़ते हुए चंद्रमुखी की आत्मा को वहां पर आने का न्योता दिया। तभी रानी का शरीर जोर-जोर से कांपने लगा और वह जोर-जोर से हंसने लगी। 

 

रानी (चंद्रमुखी की भयंकर आवाज में) : रहने दे तांत्रिक, तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। इसने जो कर्म किया है उसका फल इसे भोगना पड़ेगा। इसकी वजह से मेरी मां और मैं तड़प तड़प कर मरे हैं। इसे भी मैं चैन से जीने नहीं दूंगी। ना इसके वंश को आगे बढ़ने दूंगी, ना इन दोनों को जीने दूंगी। 

 

तांत्रिक : ये आत्मा बहुत खतरनाक हो चुकी है राजन। इसे मैं मुक्ति नहीं दिला सकता। इसका कुछ और निवारण करना होगा। 

 

रानी (चंद्रमुखी की भयंकर आवाज में) : तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा तांत्रिक। अपना बदला मैं जरूर पूरा करूंगी। 

 

नैरेटर : तांत्रिक ने सभी को महल के बाहर खड़ा कर दिया और रानी को अपने मंत्रों की शक्ति से महल की चौखट पर खड़ा कर दिया। वह लगातार मंत्रों का उच्चारण करते जा रहे थे और रानी के शरीर पर भभूति का छिड़काव करते जा रहे थे। रानी के शरीर के भीतर चंद्रमुखी की आत्मा जोर-जोर से चिल्ला रही थी। तांत्रिक में महल के चारों ओर भभूति से एक चौकोर घेरा बना दिया, तभी कुछ देर की क्रिया के बाद तांत्रिक ने रानी के शरीर पर गंगाजल का छिड़काव किया। महल के बाहर बने घेरे के कारण चंद्रमुखी की आत्मा महल से बाहर तो नहीं निकल सकती थी और रानी के शरीर पर पड़े गंगाजल के स्पर्श से ना ही वह उसके शरीर के भीतर रुक सकती थी, इसलिए उसे रानी का शरीर छोड़कर महल के भीतर प्रवेश करना पड़ा। उसी समय रानी का शरीर कमजोर होकर, निढाल होकर महल के बाहर गिर गया। तुरंत ही मौका पाकर देर ना करते हुए तांत्रिक ने महल के दरवाजे को बंद कर दिया और दरवाजे पर अभिमंत्रित ताबीज और धागे बांध दिए ताकि चंद्रमुखी की आत्मा हमेशा के लिए महल के भीतर कैद होकर रह जाए। 

 

तांत्रिक : मैंने मंत्रों की शक्ति से उसकी आत्मा को महल के भीतर कैद कर दिया है। अभी के अभी इस महल को छोड़कर यहां से चले जाओ और इतनी दूर जाना कि कभी यहां पर वापस ना पाओ। यहां के दरवाजे अब हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं और अगर यह कभी खुल गए तो तुम्हारा विनाश का कारण बनेंगे। चले जाओ यहां से। 

 

नैरेटर : राजा के पास अब दूसरा कोई चारा नहीं था। वो रानी को लेकर दूर एक छोटे से गांव में बस गया। चंद्रमुखी के आत्मा भले ही महल में कैद हो गई थी मगर उसके श्राप से राजा दरिद्र हो गया। उसके पास ना तो अपना धन था और ना ही संपत्ति। उसकी सात संताने हुई मगर हर संतान होने के बाद ही चल बसती, तभी ग्यारह साल बाद रानी ने एक बेटी को जन्म दिया, मगर उसके जन्म लेते ही राजा की मृत्यु हो गई। उस दिन के बाद रानी मानो श्रापित हो गई। जो स्थिति चंद्रमुखी की थी वह धीरे-धीरे रानी गोमती की होने लगी। साल बीते, उसकी बेटी बड़ी हुई और एक दिन जिस महल को मंत्रों की शक्ति से बंद किया गया था, उसी महल तक गोमती की बेटी मेघना अपने दोस्तों के साथ पहुंच गई, शायद वह दरवाजा उसके वहां पर आने का ही इंतजार कर रहा था। जैसे ही वह दरवाजा खुला, मौत का खेल शुरू हो गया। चंद्रमुखी की आत्मा ने राजा के वंश को पहचान लिया था और शायद वही बार-बार मेघना के सपनों में उस महल को दिखा रही थी। 

 

मेघना (भयानक आवाज हंसती हुई) : कहा था ना मैंने, अपना बदला तो मैं लेकर ही जाऊंगी गोमती। बहुत सुकून मिल रहा है आज मुझे जब तेरी आंखों के सामने तेरी बेटी तड़प रही है और इसे देखकर तू तड़प रही है। मेरी मां भी इसी तरह तड़पी थी मुझे देख देखकर। मगर अब ये तड़प ज्यादा देर तक नहीं रहेगी। 

 

नैरेटर : गोमती फूट-फूट कर रोने लगी, मेघना इस समय निश्चित होकर वहां गिर पड़ी। अगली सुबह की आंखें खुली तो उसने देखा कि उसका शरीर हड्डियों का ढांचा बन चुका है और चेहरे की खूबसूरती अब जा चुकी है। मांस गलकर लटक चुका है और गर्दन पर कीड़े रंग रहे हैं, शरीर में असहनीय पीड़ा हो रही है। उससे अपनी ये हालत देखी नहीं जा रही थी, और ना ही वह उस पीड़ा को सह पा रही थी। चंद्रमुखी की तरह वह भी अब लाचार हो चुकी थी। उसने अपने गर्दन पर चाकू रखा तो गोमती उसे देखकर चीखी। 

 

गोमती (डरकर चिल्लाकर) : ये तू क्या कर रही है मेरी बच्ची। खुद के साथ ऐसा अन्याय मत कर। मैं अपनी आंखों के सामने तुझे मरते हुए नहीं देख सकती। 

 

मेघना (पीड़ा में रोती हुई) : मैं अब और सहन नहीं कर सकती मां, मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती। यह दर्द असहनीय है। यह पीड़ा मुझसे झेली नहीं जा रही। मैं मौत मांग रही हूं लेकिन मौत नहीं आ रही मुझे इसलिए अपनी जान देने की सिवा कोई और चारा नहीं है मेरे पास। 

 

नैरेटर : गोमती की आंखों के सामने मेघना ने अपनी जान दे दी। गोमती के किए का फल आज उसकी बेटी को भोगना पड़ा। यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर पाई, उसने भी अपने पास में रखा छुरा उठाया और खुद को खत्म कर लिया। अपना बदला लेकर चंद्रमुखी तो आज मुक्त हो चुकी थी लेकिन मेघना और गोमती की आत्माएं अब ना जाने कब तक वहां भटकती रहेंगी और अपने मोक्ष का इंतजार करेंगी।

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