By - Sanjay Kamble
लक्ष्मण जमीन पर पड़े थे और उनके गले पर किसी ने वैसा ही तेज धार वाला कोयता रखा हुआ था। अब धीरे धीरे आठ दस आदिवासी लोगों का झुंड झाड़ियों से निकलकर सामने आ गया। उनके पास पुराने जमाने के हथियार थे जैसे तीर, कोयता , कुल्हाड़ी। क्रूरता से भरे उन लोगों के चेहरे देखते हुए लक्ष्मण अपने आप को छुड़ाने के लिए छटपटाने लगे । तभी बाई तरफ से किसी की आवाज आई।
" किसी ने सच ही कहा है, लातों के भूत बातों से नहीं मानते "
लक्ष्मण को बुरी तरह जकड़ रखा था। जमीनपर पड़े पडेही उन्होंने गर्दन घुमा कर उस आवाज की तरफ देखा, एक अध नंगा इंसान जो उन आदिवासियों के झुंड का मुखिया था वो उनकी तरफ चला आ रहा था। वह लक्ष्मण के सिर के पास आकर खड़ा हो गया और अपना पैर लक्ष्मण के गाल पर रखते हुए बोला।
" क्यों बे लक्ष्या। तुझे कितनी बार बोला यह जंगल हमारा 'इलाका' है।"
( लक्ष्मण कराहते हुए बोला )
" लेकिन मैंने तो सुना है यह जंगल सिर्फ जंगली जानवरों का इलाका है,"
(अपनी दोनों आंखें गुस्से से बडी कर के लक्षण को घुरते हुए )
" जंगली जानवरों का नहीं...( अपना सिना ठोकते हुए।) इस शेर का है। और यहां से शिकार तो क्या पेड़ का पत्ता भी ले जाओगे तो तेरा हाथ जिसम से अलग कर देंगे।"
(उसकी बात सुनकर गुस्से से पर थोड़ा कराहते हुए लक्ष्मण ने कहा।)
" लेकर जाना तो पड़ेगा.... क्या करूं, बेटी से वादा किया है के आज शिकार लेकर ही वापस लौटूंगा। ”
(उसने हंसकर लक्ष्मण से कहा।)
" अफसोस है कि आज तु अपना वादा पूरा नहीं कर पायेगा। शायद आज के बाद..... कभी-भी।
(अपने साथी को आदेश देते हुए )
ऐ, इसका बाया हाथ कोहनी से....? नहीं, कंधे से काटकर अलग कर दो। "
उसके साथी ने लक्ष्मण का हाथ जमीन पर फैलाया दूसरे ने उनके हाथ के उपर पैर रखकर जकड़ लिया। लक्ष्मन छटपटा रहा था खुद को छुड़ाने की पुरजोर कोशिश कर रहा था, पर उन्होंने उसे बुरी तरह जकड़ रखा था। तभी हाथ में तेज धार वाला कोयता लेकर एक हट्टा-कट्टा, साढ़े छः फीट लंबा गुस्सैल चेहरे का आदमी चलता हुआ आगे बढ़ने लगा। उसने हाथ में पकडे तेज धार वाले कोयते पर पहले ही काफी खून लगा था जो सुख कर कल पड़ा चुका था। जमीन पर पड़े लक्ष्मण की छटपटाहट देखकर मुखिया जोर-जोर से हंसने लगा। उसे काफी मजा आ रहा था।
उसने कोयता हवा में उड़ाया ही था के तभी ऊपर पेड़ पर घात लगाए बैठे काले तेंदुए ने सिधे हंसते हुए मुखिया के ऊपर छलांग लगाई। और......
उनमें जैसे अफरातफरी, हल्ला मच गया।
उसके सारे साथी लक्ष्मण को छोड़ अपने मुखिया को बचाने में लग गए। पर उस तेंदुए ने मुखिया को बुरी तरह से घायल कर दिया। तभी लक्ष्मण खड़े हो गए और जमीन पर पड़ा अपना कोयता उठाया और सीधा उस तेंदुए के गले को निशाना बनाया। और फिर.....
मुखिया जख्मी हालत में जमीन पर पड़ा लहूलुहान होकर कराह रहा था। तेंदुआ वही ढेर हो गया था। उस तेंदुए ने मुखिया का हाथ ही कंधे से उखाड़ दिया था।
लक्ष्मण ने पेड़ों के कुछ पत्ते तोड़े और मुखिया को खाने के लिए दिए और कुछ को उसके कंधे पर बांधते हुए कहां।
"थोड़ी दूर पानी का झरना है , अपने जख्म वहां पर जाकर अच्छे से धो लो और यह जड़ी बूटी दिन में चार बार खानी है । और जल्द से जल्द किसी वैद जी को दिखाओ। "
( और तभी वहां से गुजरने वाली एक हिरण को लक्ष्मण ने तीर से जख्मी किया। मरे हिरण को अपने कंधे पर लादकर लक्ष्मण ने कहा...)
“ देखा। जिसे अपना इलाका समझ रहा था वो इन जंगली जानवरों का इलाका है। तेंदुआ हिरन पर घात लगाए बैठा था, पर तुम बीच में आ गए। और जो तेंदुए का शिकार बनने वाला था वो....... सच कहूं तो घुसपैठिए तो हम दोनों है। जो इनके इलाके में घुसपैठ कर रहे है।"
जाते-जाते लक्ष्मण रूके और मुखिया से कहा।
" खुद को शेर कहने से हम इन्सान शेर नहीं बन जाते। शेर तो एक जानवर हैं जो अपने से कमजोर का शिकार कर के अपना पेट भरता है। सच कहूं तो जानवर बनना आसान है, पर इन्सान बने रहना इतना भी मुश्किल नहीं है।"
लक्ष्मण ने हिरन को कंधे पर लिया और अपने घर के रस्ते आने लगे वही दुसरी तरफ उस दल के लोग अपने जख्मी मुखिया को उनके इलाके में ले जाने लगे।
रात हो गई थी। उस छोटी सी कुटिया के एक कोने मे जल रहे दिये की पीली धुंधली रोशनी पुरी कुटिया में फ़ैली हुई थी। सफेद मिट्टी की दीवारों पर चूने से कई जगह स्वास्तिक का निशान बना था। बच्चे तो कब के सो गए थे। उसकी नजर विमला पर गई जो आज कहानी बगैर सुने सो गई थी।
उसे देख लक्ष्मन को अपना बचपन याद आ गया....
(Mother and son conversation start.)
(नवरात्री का त्योहार शुरू हो गया था। उनकी छोटी कुटिया के भीतर एक कोने में देवी मां की प्रतिमा के सामने दिपक की जलती लौ के उपर नजरें गड़ाए अपनी मां की गोद में सर रखकर जमीन पर लेटे हुए लक्ष्मन ने पूछा। )
" मां, राक्षस इतने खूंखार होते थे ?"
" हां बेटा , बहोत खूंखार , निर्दयता से भरे , क्रूर जिन्हें बेगुनाह मासूम लोगों को बेरहमी से मारकर उनका रक्त पीने में उन्हें आनंद मिलता। मासूम लोगों को मारते वक़्त उनको रोता, बिलखता देख वे जोर जोर से हंसने लगते।"
" अच्छा हुआ सब राक्षस धरती से चले गये, "
" तुम्हें किसने कहा की सारे राक्षस धरती छोड़कर चले गए। "
" फिर कहा हैं ? बोलो ना मां ?"
(Mother and son conversation stop.)
तभी पीठ पर लगे जख्म पर कपडे में लिपटी गर्म इट को रखते ही लक्ष्मन यादों से बाहर निकले। कोने में जल रहे चुल्हे की आग अभी भी धधक रही थी। लक्ष्मण की पत्नी ने चूल्हे पर गरम की गई ईट को एक कपड़े से लपेट लिया और लक्ष्मण के जख्म को सेंकने लगी।
"क्या जरूरत थी उनके इलाके में जाने की. अगर आपको कुछ हो जाता तो हमारा क्या होता ? "
लक्ष्मण के पास कोई जवाब नहीं था । बस उन्हें अपने परिवार का पेट भरना था। किसी भी कीमत पर।
" विमला सो गई ?"
" हां, आपसे कहानी सुनाने के लिए बैठी थी, राह देखते देखते सो गई।"
तभी कुटिया का बांस की लकड़ी से बना दरवाजा खिसकने की आवाज आई। उनका सबसे छोटा भाई रंगा अंदर आया और दीवार से सटकर बैठते हुए बोला।
" वो दगडू संदेश लेकर आया था। ताई को लड़की हुई है।"
(यह सुनकर लक्ष्मण का चेहरा खुशी से खिल गया)
" अरे वाह, ये तो बड़ी खुशी की बात है।"
" हां भैया। इतवार को बेटी का नाम रखने के लिए हम सब को बुलाया है।"
" ठीक है। बच्ची के लिए कपड़े और कुछ चांदी के गहना ले आना। मैं पाटील जी से बात करूंगा। हम उनके खेत सिंचते है तो वे कुछ पैसे देंगे। पहली बेटी को कुछ नहीं ले सके थे। और हां इतवार को तड़के सुबह ही निकलेंगे। रात वही ठहरकर सुबह वापसी करेंगे।"
अपने बड़े भाई के जख्मों की तरफ देखकर वह बोला।
"भैया हम चार भाई है। फिर भी आप अकेले शिकार पर जाने की जोखिम क्यों उठाते हैं....?
" ऐसी बात नहीं..."
" आज के बाद आप अकेले कहीं नहीं जायेंगे और ना हम आपको जाने देंगे।"
इतवार का दिन.
पुरे घर मे चहल पहल थी। छोटे बच्चे नये कपडे पहनकर तयार हो रहे थे। तो एक तरफ घर की औरते भी तयारी मे लगी थी। अभी सुरज निकल ही रहा था और बारा से पंधरा मील का सफर उन्हे पैदल तय करना था। सब जाने के लिए निकले। चार शादीशुदा भाई, उनकी चार पत्नीयां, और बड़े भाई के तीन बच्चे दस साल का लड़का , उससे छोटी ८ साल की बेटी और पांच साल की एक और बेटी। दुसरे भाई के दो छोटे लड़के इस तरह तेराह लोगों का कारवां जंगल के रास्ते अपने बहन को मिलने निकला। औरतों ने सीर पर लकड़ी की कुछ टोकरियां ली थी। गांव की हद खत्म होते ही सामने एक संकरी सड़क पर से गांव के बुजुर्ग पुजारी आते नजर आये। पुजारी जी सामने आते ही लक्ष्मण ने झुक कर उनके पैर छुए और हाथ जोड़कर कहां।
" राम राम बाबा "
" राम राम, अरे लक्ष्या, इतनी सुबह...? कहा जा रहे हो। "
" जी छोटी बहन को बेटी हुई है, आज नाम रखने की रसम है। आशीर्वाद दिजिए।"
( पुजारी के पैर छुए )
" अरे वाह, ये तो अच्छी बात है। मां बेटी को मेरा आशिर्वाद बोलना। और एक बात। शाम होते होते अमावस शुरू होगी। कुछ अच्छे संकेत नहीं है। बस औरतों और बच्चों का खयाल रखना। खास कर अगर कोई औरत पेट से है तो उसका ज्यादा ध्यान रखना "
" जी बाबा।"
कहकर सब सफर के लिए निकले।
सबसे आगे बड़े भाई लक्ष्मण, फिर सारे बच्चे, उनके पीछे औरते और सबसे आखिर में तीनों भाई। हर भाई की कमर को चमड़े की बेल्ट में लगा साढ़े तीन फीट लंबा कोयता, साथ ही हाथ में एक लकड़ी का डंडा। उनके पास इस वक्त वह सारे हथियार थे जो जंगल के किसी भी खूंखार जानवर से निपटने के लिए काफी थे।
जंगल काफी डरावना था। चारों तरफ घनी झाड़ियां, पेड़ों के तने में लकडीयों के बीच बसे कीड़ों की किर्रर्रर्रर्रर्र किर्रर्रर्रर्रर्र आवाज लगातार आ रही थी। एक ऊंचे पेड की कोहनी के बीच बैठा उल्लू अपनी बड़ी बड़ी आंखों से नीचे से गुजरते उन मुसाफ़िरों को देख रहा था। जंगल का यह डरावना खौफनाक माहौल किसी भी आम शहरी इंसान के लिए काफी डरावना हो सकता था पर वे इस जंगल में पले बढ़े लोग थे। इसी जंगल से वह एक गांव से होते हुए दूसरे गांव जाया करते थे। उनके लिए यह सब आम था। बड़ा भाई लक्ष्मण बिल्कुल शांत चल रहा था तो उनके पीछे बच्चे खेलते कूदते आगे बढ़ रहे थे। घर की महिलाएं अपने पास रखी पोटलिया सर पर ढोये घर की बातें करते हुए जा रही थी। तो सबसे पीछे चलने वाले तीनों भाई खेती बाड़ी और फसल के बारे में बात कर रहे थे। सब कुछ सामान्य चल रहा था। पर सबसे आगे चलने वाला लक्ष्मण थोड़े बेचैन थे। उनके दिमाग में पुजारी की बात घूम रही थी। वे मन में सोचने लगे
' आज शाम होते होते अमावस्या शुरू होने वाली है। अमावस शुरू होने से पहले वो किसी अनहोनी के संकेत दे देती है । या अनहोनी शुरू हो जाती है। '
वे अपने विचारों में ही खोये थे के तभी पीछे से उन्हें अपने भाई की आवाज सुनाई दी।
" भैया,"
अपने कमर पर लगे कोयते पर हाथ रख कर वे झट से पीछे मुड़े तो छोटे भाई ने कहा।
" भैया बच्चे आम खाने की ज़िद कर रहे हैं।"
अपने छोटे भाई की बात सुनकर उन्होंने आसपास खड़े ऊंचे पेड़ों पर नजर डाली। वहीं पर एक ऊंचा आम का पेड़ उन्हें नजर आया।
" ठीक है, पर जरा संभल कर ऊपर चढ़ना "
सब वही पास ही दुसरे पेड़ की छांव में आसपास बैठ गए । लक्ष्मन भी एक पेड़ की छांव में बैठकर सब की तरफ देखने लगे। महिलाओं ने भी अपने सर पर ली टोकरियां जमीन पर रख दि। बच्चे थोड़ी देर खेल कूद करने लगे पर लक्ष्मण अभी भी चिंतित थे।
लक्ष्मण धीरे-धीरे अपने भाई की गर्भवती पत्नी की ओर देख रहे थे। उनकी आँखों में चिंता और बेचैनी साफ झलक रही थी। बाकी सभी महिलाएँ बातें कर रही थीं और बच्चे हँसी-खुशी आम खा रहे थे। लेकिन लक्ष्मण का ध्यान पूरी तरह से अपनी छोटी भाभी पर टिक गया था, जो चुपचाप बैठी थी। उसकी खामोशी बाकी सबकी चहलकदमी से बिल्कुल अलग और असामान्य लग रही थी।
जब किसी ने उसके सामने पके हुए आम रखे, तो उसने सिर हिलाकर मना कर दिया। उसका चेहरा बेहद शांत लेकिन अस्वाभाविक था। लक्ष्मण की छठी इंद्रिय ने जैसे खतरे का संकेत दिया। वह उसकी हर हरकत को ध्यान से देख रहे थे। तभी उसने अचानक लक्ष्मण की ओर देखा। उसकी नज़रें इतनी ठंडी और भेदती हुई थीं कि लक्ष्मण के रोंगटे खड़े हो गए।
और फिर... जैसे एक पल में सब बदल गया। उसके चेहरे पर एक अजीब, भयावह परिवर्तन होने लगा। उसकी त्वचा पहले पीली पड़ी और फिर गहरे काले रंग में बदल गई। बाल, जो अब तक बंधे हुए थे, एकदम बिखरकर उसके कंधों पर लटकने लगे। उसकी आँखें बड़ी, लाल और डरावनी हो गईं, जैसे उनमें आग जल रही हो। उसके होठों पर एक अजीब-सी कुटिल मुस्कान आई, और वह हँसने लगी—एक कर्कश, भयावह हँसी जो हर किसी के दिल में डर का संचार कर दे।
लक्ष्मण को लगा जैसे उनकी साँस रुक गई हो। वह डर के मारे अपनी जगह से हिल भी नहीं सके। उसने धीरे-धीरे खड़े होकर लक्ष्मण की ओर देखा। उसकी चाल में एक अजीब झटकेदारपन था, जैसे उसके शरीर पर अब किसी और का कब्जा हो।
और फिर, बिना किसी चेतावनी के, वह अचानक बिजली की तेजी से लक्ष्मण की ओर झपटी।
क्या हुआ था उनके भाई की पत्नी को ?
किसने उस महिला को इस कदर बदल दिया?
क्या लक्ष्मण अपनी जान बचा पाएगा? या फिर इस रहस्यमयी शक्ति का शिकार बन जाएगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या बाकी परिवार भी इस भयावह खतरे से सुरक्षित है या फिर एक एक कर हर किसी का शिकार होगा?
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