By - Sanjay Kamble
लक्ष्मण को ऐसा लगा जैसे उनके दिल की धड़कन एकदम से रुक गया हो। डर और घबराहट की लहर ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया था, और वह झट से अपनी जगह पर खड़े हो गए। वह जोर से आवाज देकर अपने भाइयों को आगाह करने की कोशिश करने लगे, लेकिन उनकी आवाज़ नहीं निकल पा रही थी। आँखों के सामने अंधेरा था, और दिल में एक अजीब सी अनहोनी की आहट गूंज रही थी।
" भैया, उठीये। चलते हैं।"
लक्ष्मण ने आंख खोल कर देखा तो उनका छोटा भाई उन्हें उठा रहा था। सब जाने के लिए तैयार थे। उन्होंने अपने आसपास देखा तो सब कुछ सामान्य था। लक्ष्मण भी उठकर खड़े हो गए और उन्होंने दोबारा अपने भाई की गर्भवती पत्नी की तरफ देखा। वो हंसी-खुशी सब के साथ चल रही थी। लक्ष्मण ने उठकर अपने हथियार हाथ में लिए और बिना कुछ बोले जंगल के रास्ते वे अपनी मंजिल की तरफ बढ़ने लगे।
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गांव में दोपहर का समय था। सूरज की तेज किरणें जैसे धरती को भस्म कर देने को तैयार थीं। हवा में घुटन महसूस हो रही थी। पर शायद यह सब लक्ष्मण को ही लग रहा था क्योंकि बाकी सब लोग आपस में हंसी-मजाक कर रहे थे।
घर के भीतर नामकरण की रस्म हो रही थी, छोटे से पालने में बच्ची की बुआ बच्ची का नाम रख रही थी बाकी महिलाएं भी कार्यक्रम का आनंद ले रही थी। घर में माहौल हंसी खुशी भरा था। आंगन में एक बछड़ा गाय का दूध पी रहा था। वही घर के बाहर पास ही एक आम के बड़े से पेड़ के नीचे कुछ बच्चे छुपन छुपाई खेल रहे थे। तो कुछ कंचो से खेल रहे थे। बड़े बुजुर्ग लोग, जो एक पेड़ के नीचे बैठ अपनी गप्पों में व्यस्त थे। मगर लक्ष्मण का दिल घबरा रहा था। वे मन ही मां प्रार्थना कर रहे थे कि सब कुछ ठीक हो जाए. लेकिन वह चाह कर भी चिंता और डर को नज़र अंदाज नहीं कर पा रहे थे।
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रात के करीब 8:00 बजे थे। खाना खाकर, सभी मर्द बरामदे में बैठकर पान का लुत्फ उठा रहे थे, गप्पे मारते हुए। घर मे खुशी के उस माहौल में अपने दिल में बसी डरावनी बातों को लक्ष्मण कुछ हद तक भूल चुके थे। तभी अचानक ही एक खामोशी छा गई। उस खामोशी में उन्होंने भीतर से औरतों के हल्की आवाज़ों को सुना। कुछ ठीक नहीं था। एक अनजानी घबराहट उनके दिल में समाने लगी। उन्होंने सामने दरवाजे की तरफ देखा तो उनकी पत्न जो चुपचाप बाहर आकर सिर के ऊपर पल्लू कर सिर झुकाए हुए बोली,
"काफी देर से विमला कहीं नजर नहीं आ रही है।"
उनकी आवाज में चिंता और डर साफ नजर आ रहा था
लक्ष्मण ने गुस्से में जवाब दिया।
"तो इसमें रोने की क्या बात है? जरा आसपास देखो, होगी किसी के घर में।"
उनकी पत्नी कांपती हुई आवाज में बोली।
"आस-पास सब जगह देखा, पर वह नहीं मिल रही।"
उनकी पत्नी की ये बातें लक्ष्मण के अंदर तक गूंजने लगीं। काफी देर से हंसी मजाक के माहौल में उन्होंने भुलाए हुए डर ने दोबारा उनके दिल पर दस्तक दी थी फिर गहरी सांस लेते हुए उन्होंने कहा,
"ठीक है, रोना बंद करो, हम देखते हैं।"
वह उठकर दरवाजे से बाहर निकले, उनके पीछे उनके सभी भाई और जीजा जी भी चल पड़े।
रात के काले अंधेरे ने सब कुछ निगल लिया था । गांव पिछड़ा और दूर दराज का होने के कारण वहां बिजली की कोई सुविधा नहीं थी। घर घर में केरोसिन के दिए रोशनी का एकमात्र जरिया था। किसी ने घर से एक लालटेन हाथ में लिया था। उस लालटेन की रोशनी में अब वह पूरे गांव को खंगालने में लगे थे। घर-घर, गली-गली, सड़क-सड़क, खेत खलिहान, कुंआ, नाले, हर मुमकिन जगह पर विमला की तलाश की। लेकिन काफी ढूंढने के बाद भी वह कहीं नहीं मिली। रात गहराने लगी। पूरे गांव में एक दहशत भरा सन्नाटा उन सब का पीछा कर रहा था।
रात के लगभग 10:00 बजे होंगे। वे सभी चिंतित चेहरे से थके हुए, खाली हाथ वापस लौटे। घर की महिलाओं की आँखों में एक उम्मीद और आशा थी, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटा देखकर वह उम्मीद भी टूट गई। उनकी पत्नी का चेहरा जैसे तिल-तिल कर मुरझा रहा था। दिल में डर और घबराहट का समंदर था।
वह पूरी तरह से टूट चुकी थी। जैसे उनकी हर उम्मीद धुंधली होती जा रही हो। रोते हुए वह विमला के लौटने की दुआ कर रही थी। वो उम्मीद भरी निगाहों से अपने पति लक्ष्मण की तरफ देख रही थी।
लक्ष्मण की पत्नी ने रोते हुए कहा, "मेरा दिल बहुत घबरा रहा है। आप देवी के मंदिर में जाकर कौल लगाकर देखिए, कुछ तो पता चलेगा।"
उनकी आवाज में हताशा और डर था। वह सिसकते हुए रोने लगीं, और पास बैठी औरतों ने उन्हें सहारा दिया। लक्ष्मण, चुपचाप खड़े रहे, उनकी आँखें झुकी हुईं थी। वे खुद को उस स्थिति से बाहर नहीं निकाल पा रहे थे।
एक पल के लिए, उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं। और उनकी नजर के सामने अपनी बेटी विमल का हंसता खिलखिलाता चेहरा उभर आया।
उन्होंने अपनी आँखें खोलकर एक गहरी सांस ली और बाहर की हवा में खुद को संजीवित करने की कोशिश की। वे अपनी जगह से उठकर खड़े हो गए और। तेज कदमों से घर से बाहर निकले।। उनकी धड़कनें तेज हो गई थीं, जैसे किसी ने उनकी छाती पर भारी पत्थर रख दिया हो। उनके कदम तेजी से उठ रहे थे, लेकिन दिल में एक अजीब घबराहट उभर रही थी। जैसे जैसे वे पुजारी के घर की ओर बढ़ते गए, उनके भीतर के विचार और भी विकृत हो गए थे।
"क्या किया मैंने? क्यों विमला को अकेला छोड़ दिया? क्या उसने कोई गलती की? क्या हुआ होगा उसके साथ। क्या वह कहीं खतरे में तो नहीं है। या किसी जंगली जानवर ने... ? नहीं नहीं... वो ठीक होगी..."
अनगिनत सवाल जैसे उनके दिमाग पर किसी हथौड़े की तरह चोट कर रहे थे, उन्हें साँस लेने में भी मुश्किल हो रही थी। लेकिन उन्हें खुद को शांत करने की कोशिश करनी थी, क्योंकि अब उन पर सबकी उम्मीदें थीं।
गांव के उस कच्चे रास्ते पर चलते हुए कुछ था जो खतरनाक अनहोनी जैसा महसूस हो रहा था। उन्हें वह डर नहीं था जो आमतौर पर रात को होता है, बल्कि यह एक गहरी अनहोनी की आहट थी जो उनकी पीठ में सिहरन पैदा कर रही थी। उन्हें वो घटना याद आई।
' हमारे पुजारी ने कहा था कि अमावस की रातें विशेष होती हैं, खासकर औरतों और बच्चों के लिए। ध्यान रखना और मैंने अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया।'
आखिरकार वे पुजारी के घर पहुंचे। एक छोटी सी कुटिया, जिसके भीतर हल्का सा केरोसिन का दिया जल रहा था। उस हल्के प्रकाश की तरह ही, उनकी उम्मीद भी मद्धिम सी जल रही थी। एक आदमी ने पुजारी को पुकारा, और कुछ ही पलों में पुजारी का पोता दौड़ते हुए बाहर आया। उसके कपड़े मैले थे और बाल बिखरे हुए थे, लेकिन उसकी आँखें साफ और तेज थीं।
"दादाजी घर में नहीं हैं," वह बोला। "वे पंचायत के चौराहे पर होंगे, आम के पेड़ के नीचे।"
किसी ने पूछा।
"इतनी रात को वहां?"
उस लड़के ने कहा
"हां। गांव के बड़े बुजुर्ग खाना खाने के बाद वही गप्पे लड़ाते हैं। "
"ठीक है। शुक्रिया।"
वह सब गांव के चौराहे की ओर बढ़ने लगे। दूर से उन्हें पेड़ के नीचे बैठे कुछ लोग नजर आए। पास जाकर, लक्ष्मण ने कहा, "हमें पुजारी जी से मिलना है।"
तभी साठ-पैंसठ साल के एक बुजुर्ग व्यक्ति ने उठकर उनसे पूछा, " जी कहिए, क्या काम है, और वैसे भी मैंने आपको पहचान नहीं। ?"
लक्ष्मण के जीजा श्रीपति ने आगे बढ़ते हुए कहा, "पुजारी जी, ये लक्ष्मण है मेरे बड़े साले।"
“अरे, बेटा तुम ” पुजारी ने चौंकते हुए कहा। "इतनी रात को कैसे आना हुआ?"
"थोड़ी समस्या आ गई थी," श्रीपति ने गंभीरता से कहा।
“अगर कोई परेशानी है, तो खुलकर कहो।"
जीजा ने लक्ष्मण की तरफ देखा और कहा,
" आज हमारी बेटी का नामकरण था, इसलिए मेरे साले साहब अपने परिवार के साथ गांव से आये । लेकिन अब उनकी छोटी बच्ची लापता हो गई है। पुरे गांव में काफी ढूंढा, लेकिन वह कहीं नहीं मिल रही। घर की महिलाओं का रो रो कर बुरा हाल है, हम सब भी बुरी तरह परेशान हैं इसलिए हम चाहते हैं कि आप हमारे ग्राम देवता के मंदिर में कौल लगाकर देखिए, आखिर किस दिशा में और किस अवस्था में वह है ?"
पुजारी ने सभी की तरफ गंभीर नजर डाली, उन्होंने ऊपर आसमान की तरह देखा और कुछ पल के लिए बिल्कुल खामोश खड़े रहे, फिर वह सिर झुकाए मंदिर की ओर चलने लगे। उनके पीछे लक्ष्मण और उनके सभी भाई और कुछ गांव के लोग चलने लगे। रास्ता कच्चा था, और हर कदम पर पत्तियों की सरसराहट हो रही थी, जैसे रात खुद फुसफुसा रही हो।
मंदिर में पहुंचते ही पुजारी ने देवी की मूर्ति के सामने दीप जलाया और पूजा शुरू की। बाकी लोग धीरे-धीरे जहां जगह मिली वहां पर दुबककर बैठ गए। लक्ष्मण का चेहरा सख्त था, लेकिन आँखों में गहरी चिंता झलक रही थी। उनके दिल में लगातार उधेड़-बुन चल रही थी। वह सोच रहे थे कि देवी के दरबार में सब कुछ सही हो जाएगा, लेकिन एक अजीब से डर ने उनके दिल को घेर लिया था।
(मंदिर में जलते दीपक की लौ तेज़ हवा से हिलने लगती है। दीपक की उस लौ को देखते हुए लक्ष्मण को बचपन की वह बात याद आ गई। वे अपनी मां के पास बैठे, दीपक की चमक और मां के चेहरे पर झलकते रहस्यमय भावों को देख रहा है।)
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बेटा (उत्सुकता से): मां, ये सारे राक्षस कहा चले गए। किसी भयानक राक्षस की कहानी सुनाओ ना।
मां: आज तुम्हें ऐसे राक्षसों की कहानी सुनाती हूं जिसने देवताओं को भी पराजित कर दिया था । शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज, और चंड-मुंड।
बेटा : उनके नाम में ही कितना खौफ है !
मां (धीमे स्वर में, जैसे किसी पुरानी भयावह याद को फिर से जीवित कर रही हो): " खौफ ! बेटा, ये सिर्फ राक्षस नहीं थे, बल्कि विनाश के प्रतीक थे। उनके नाम से ही धरती, स्वर्ग और पाताल कांप उठते। आज तुम्हें उनकी ही कहानी सुनाती हूं।"
(मां की आंखों में एक अजीब सी चमक थी। उसने धीमी आवाज में बोलना शुरू किया, जैसे उस समय के अंधकार को वे फिर से महसूस कर रही हों।)
मां: शुंभ और निशुंभ... दो भाई, जिनकी शक्ति का कोई अंत नहीं था। वे राक्षसों के राजा थे। कहते हैं कि उनके शरीर से हमेशा अंधकार निकलता रहता था, ऐसा अंधकार जो सूर्य की रोशनी को भी निगल सकता था। उनकी आंखें अंगारे जैसी चमकती थीं, और उनकी आवाज़ से पहाड़ों में दरारें पड़ जाती थीं। वे केवल अपनी शक्ति से स्वर्ग को जीतने निकले थे। देवताओं को उन्होंने अपमानित किया, उनकी दिव्य शक्तियों को छीन लिया। इंद्र, जो देवताओं के राजा थे, उनकी दुर्दशा देखकर स्वर्ग छोड़कर भाग गए।
जब शुंभ और निशुंभ ने स्वर्ग पर कब्जा किया, तो उनकी क्रूरता की सीमा नहीं रही। उन्होंने देवताओं को दास बना दिया। अप्सराओं को उनके दरबार में नाचने के लिए विवश किया गया। और धरती पर...? धरती पर हर रोज़ हाहाकार मचता। ऋषियों को मार डाला गया, और मासूम लोगों को बलि के रूप में चढ़ाया गया। उनकी क्रूरता ऐसी थी कि मां की गोद में सोते हुए बच्चे तक सुरक्षित नहीं थे।"
बेटा (आंखें चौड़ी करते हुए): "और रक्तबीज...? वह कैसा राक्षस था,?"
मां (गंभीर स्वर में):
"रक्तबीज... उसका नाम सुनते ही बड़े-बड़े योद्धाओं की तलवारें कांपने लगती थीं। वह राक्षस नहीं, बल्कि मौत का दूसरा नाम था। उसे ब्रह्मा जी से एक ऐसा वरदान मिला था, जिसने उसे अजेय बना दिया।
बेटा : वरदान ? वो कैसा ?
मां : जब भी उसकी त्वचा से खून की एक बूंद गिरती, वहां एक और रक्तबीज पैदा हो जाता। सोचो, बेटा, एक ऐसा राक्षस जिसे जितना मारने की कोशिश करो, वह उतना ही बढ़ता जाए। उसकी हंसी सुनकर वीर योद्धाओं के हाथ कांपने लगते।
रक्तबीज जहां भी जाता, धरती लाल हो जाती। उसने गांवों को जला दिया, नदियों को खून से भर दिया, और जंगलों को राख बना दिया। लोग उसकी परछाईं से भी डरते थे। वह सिर्फ एक राक्षस नहीं था; वह अंधकार और विनाश का प्रतीक था।"
बेटा : (गहरी सांस लेते हुए): "और चंड-मुंड? "
मां (धीरे-धीरे, जैसे हर शब्द से डर की एक नई परत खोल रही हों):
"चंड और मुंड... वे शुंभ-निशुंभ के सबसे खतरनाक सेनापति थे। उनकी क्रूरता का कोई मोल नहीं था। चंड, जिसकी आंखें हमेशा खून की तरह लाल रहती थीं, और मुंड, जो इतनी घृणित हंसी हंसता था कि सुनने वाले पागल हो जाते थे। ये दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे। चंड ने तलवार चलाना शुरू किया तो सामने वाली सेना की चीखें आसमान तक पहुंच जाती थीं। मुंड ने जब अपना हथौड़ा उठाया, तो पहाड़ भी टूटकर गिर जाते थे। वे केवल राक्षस नहीं थे, बल्कि ऐसा लगता था, जैसे वे खुद अंधकार से बने हों।"
बेटा (धीरे से, भय और जिज्ञासा में डूबते हुए): "मां, क्या उस समय कोई भी इनसे बच नहीं पाया?"
मां (गहरी सांस लेते हुए, दीपक की लौ को देखती हैं):
"बचना? बेटा, वे जहां जाते, केवल खून, चीखें और राख छोड़ जाते। धरती कांपती थी, नदियां सूख जाती थीं, और आसमान पर काले बादल छा जाते थे। लोग अपनी झोपड़ियों में छिप जाते थे, लेकिन चंड, मुंड, और रक्तबीज जैसे राक्षसों से कोई छिप नहीं सकता था। उनका हर कदम मौत का पैगाम था। और शुंभ-निशुंभ...? वे तो खुद को ब्रह्मांड के राजा मानते थे।
देवता भयभीत होकर अपनी शक्तियों को भूल चुके थे। ऋषि-मुनियों की तपस्या तोड़ी जा चुकी थी। स्वर्ग और धरती अंधकार के समुद्र में डूब गए थे। चारों ओर केवल खून, लाशें, और भय का साम्राज्य था। यह ऐसा समय था, बेटा, जब उम्मीद का सूरज भी बुझ चुका था। सब हाथ जोड़कर भगवान शिव और विष्णु के सामने इन राक्षसों से छुटकारा पाने के लिए याचना करने लगे।"
बेटा : और भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनको मौत के घाट उतारकर सबको उनके आतंक से मुक्ति दी होगी ना।"
(मां ने हंसकर कहा)
मां : नहीं बेटा.."
बेटा : फिर हमारे शिव जी ने अपने त्रिशूल से उसके कई टूकडे कर के उसको नर्क में भेजा होगा। "
मां : नहीं बेटा। बिल्कुल। भी नहीं"
बेटा : मतलब वे शिव और विष्णु जी से भी शक्तिशाली थे।"
मां : बिल्कुल नहीं। लेकिन सबसे शक्तिशाली होते हुए भी भगवान विष्णु और शिव जी उन राक्षसों को नहीं मार सकते थे। "
बेटा : वो क्यों ???"
मां : क्योंकि... उन राक्षसों को ब्रह्म जी का वरदान प्राप्त था। उनको ना कोई देवता। मार सकता ना असुर ना पशु , यक्ष गंधर्व, कोई नहीं। शुंभ निशुंभ की सेना में एक से एक खूंखार निर्दयी दानव थे, उन्ही में से एक था 'रक्तबीज'। उसे दानव को वरदान मिला था के उसके शरीर से जमीन पर गिरने वाली हर एक बूंद से रक्तबीज जैसा एक और दानव जन्म लेगा।"
बेटा : अगर भगवान शिव और विष्णु जी ही उसका वध नहीं कर सकते तो अब मासुम लोगों की रक्षा कौन करेगा...? बताओ ना मां...? अब मासूम लोगों को उनके आतंक से कौन मुक्त करेगा...? अब कहां जायेंगे वे डरे-सहमे बेबस लोग। "
मां : बेटा.... मेरे एक सवाल का जवाब दोगे...?"
बेटा : हां मां। बोलो ना "
मां : जब तुम्हें किसी से सबसे ज्यादा डर लगता है, तुम घबरा जाते हो तो तुम्हें सबसे सुरक्षित कहा महसूस होता है ?
तभी पुजारी जी की आवाज़ लक्ष्मन के कानों पर पड़ी । आंखें बंद कर देवी के सामने कुछ मंत्र बोलने लगे। हर एक इंसान के चेहरे पर तनाव था, पता नहीं पुजारी जी के मुंह से क्या निकलेगा। पुजारी जी एकदम से चुप हो गए। उन्होंने मूर्ति की तरफ देखकर हाथ जोड़े और पीछे बैठे लक्ष्मण की तरफ देखा। पुजारी जी के गंभीर चेहरे को देखकर लक्ष्मण समझ गए कि 'कुछ हुआ है। कुछ बहुत बुरा ।'
पुजारी जी ने लक्ष्मण की तरफ देखकर कहां।
" बेटा, तुम्हें थोड़ा धैर्य से कम लेना होगा। ।"
पुजारी जी की बात सुनकर लक्ष्मण का दिल भर आया।
" क्या बात है। वो जिंदा तो है ना?"
" बेटा, अब तक तो जिंदा है। पर ..."
" पर क्या...?"
" ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रहेगी "
"क्या किसी जंगली जानवर ने...... ?"
" नहीं। ये काम किसी जंगली जानवर का नही।"
" तो फिर।"
" बेटा अब मैं जो कुछ भी बताने वाला हूं उसे अपने कलेजे पर पत्थर रखकर सुनना। तुम्हारी बच्ची को ना कोई जानवर ले गया है और ना कोई इंसान ."
वो क्या चीज़ है जिससे पुजारी भी इतने खौफ खा रहे हैं ?
लक्ष्मण की बच्ची को कौन और कहां ले गया है ? और उसे बचाने के लिए लक्ष्मण क्या करेंगे ?
क्या यह किसी भयानक अनहोनी की शुरुआत है जो गांव में मौत का तांडव करेगी ?
Dosto kahani kaisi lagi please comment me batana
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