1 अध्याय 1 — शिवनेरी का जन्म FREE 2 अध्याय 2 — जिजाबाई का अद्भुत आँचल FREE 3 अध्याय 3 — दादोजी कोंडदेव की पाठशाला FREE 4 अध्याय 4 — रायरेश्वर की प्रतिज्ञा FREE 5 अध्याय 5 — तोरणा की पहली विजय FREE 6 अध्याय 6 — राजगढ़ की नींव FREE 7 अध्याय 7 — बारह मावळ का संगठन FREE 8 अध्याय 8 — कोंडाणा का पुराना सपना FREE 9 अध्याय 9 — शाहजी की क़ैद का संकट FREE 10 अध्याय 10 — अफ़ज़ल खान का प्रकोप FREE 11 अध्याय 11 — प्रतापगढ़ की कथा FREE 12 अध्याय 12 — पन्हाला का घेरा FREE 13 अध्याय 13 — पवन खिंड का बलिदान FREE 14 अध्याय 14 — लाल महल की वो रात FREE 15 अध्याय 15 — सूरत की पहली लूट FREE 16 अध्याय 16 — पुरंदर की संधि FREE 17 अध्याय 17 — आगरा का दरबार FREE 18 अध्याय 18 — मिठाई की टोकरियाँ FREE 19 अध्याय 19 — वापसी और पुनर्निर्माण FREE 20 अध्याय 20 — सिंहगढ़ का बलिदान FREE 21 अध्याय 21 — दूसरी सूरत और सलहेर FREE 22 अध्याय 22 — रायगढ़ की तैयारी FREE 23 अध्याय 23 — राज्याभिषेक FREE 24 अध्याय 24 — जिजामाता की विदाई FREE 25 अध्याय 25 — अष्टप्रधान मण्डल FREE 26 अध्याय 26 — हिन्दवी स्वराज्य का शासन FREE 27 अध्याय 27 — सिंधुदुर्ग और जल-शक्ति FREE 28 अध्याय 28 — कर्नाटक अभियान FREE 29 अध्याय 29 — महानिर्वाण FREE 30 अध्याय 30 — छत्रपति की विरासत FREE
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अध्याय 3 — दादोजी कोंडदेव की पाठशाला

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दादोजी कोंडदेव कोई साधारण कारिंदा नहीं थे। वो एक पुश्तैनी ब्राह्मण थे — कोंकण के एक छोटे से गाँव से — पर जिनके बारे में लोग कहते थे, "इनकी आँख में तीन चीज़ें एक साथ रहती हैं। न्याय, हिसाब, और तलवार।" शाहजी भोसले ने जब पुणे जागीर का प्रबंध दादोजी के हाथों में सौंपा था, तब उन्होंने एक ही शर्त रखी थी — "मेरा बेटा बड़ा होगा तो आप उसके गुरु होंगे।"

शिवाजी जब बारह वर्ष का हुआ, तो जिजाबाई ने औपचारिक रूप से उसे दादोजी के सुपुर्द किया। पर औपचारिकता से ज़्यादा एक बात थी — माँ का भरोसा। जिजाबाई जानती थीं कि बच्चे को अब एक पुरुष का अनुशासन चाहिए। एक माँ हर सीख दे सकती है — पर तलवार चलाना सिखाना, घोड़े पर बैठना, किसानों से लगान वसूलना, और अदालत में फ़ैसला करना — यह काम पुरुष-गुरु का होता है।

दादोजी ने पहली ही मुलाक़ात में बच्चे को नीचे से ऊपर तक देखा।

"शिवबा," उन्होंने पुकारा। "तू सीखने आया है — या खेलने?"

"सीखने।"

"क्या सीखेगा?"

"सब कुछ।"

दादोजी हँस पड़े।

"सब कुछ बहुत बड़ा शब्द है बेटा। पहले बैठना सीख। बात करना सीख। फिर तलवार चलाना सीख।"

शिवाजी ने सर झुका लिया।

उस दिन से शिवाजी की दिनचर्या बदल गई। सुबह चार बजे उठना। ठंडे पानी से नहाना। फिर एक घंटा शास्त्र-पाठ — गीता, रामायण, महाभारत, और मराठी संत-वचन। दादोजी कहते थे — "तलवार के पहले शास्त्र पढ़ो। शास्त्र के बिना तलवार दानव बन जाती है।"

आठ बजे नाश्ता। फिर भाषाओं का अभ्यास — मराठी, संस्कृत, फ़ारसी, हिंदी। शिवाजी को फ़ारसी क्यों सिखाई जा रही है, यह बात उसकी समझ में पहले नहीं आई।

एक दिन उसने पूछा — "गुरुजी, फ़ारसी क्यों?"

दादोजी ने मुस्कुराकर कहा — "शिवबा, अपने दुश्मन की भाषा अगर नहीं जानते — तो उसकी रणनीति कैसे समझोगे? आदिलशाह, मुग़ल — सब फ़ारसी में दस्तख़त करते हैं। उनके फ़रमान फ़ारसी में होते हैं। उनके सेनापति फ़ारसी में बात करते हैं। तुझे जब उनसे लड़ना है — तो उनकी ज़बान उनकी ही ज़बान में लौटानी होगी।"

शिवाजी ने सर हिला दिया। फ़ारसी पढ़ना शुरू किया।

दोपहर शस्त्र-विद्या। तीन घंटे रोज़। तलवार चलाना — सीधी, टेढ़ी, दोनों हाथों से। भाला फेंकना। तीर चलाना। बघनखे का प्रयोग।

बघनखे — यह एक ख़ास हथियार था। एक छोटा सा धातु का दस्ताना जिसमें पाँच तेज़ नाख़ून लगे होते। हाथ में पहन लो — दिखता ही नहीं। पर एक झटके में दुश्मन का गला फाड़ सकता था। यह हथियार बाद में अफ़ज़ल खान के सामने काम आने वाला था — पर तब यह एक बच्चे के अभ्यास का एक उपकरण था।

दादोजी ने एक बार शिवाजी से कहा — "शिवबा, हथियार बड़ा होने से आदमी बड़ा नहीं होता। आदमी बड़ा होता है उसकी समझ से। समझ हो तो छुरी से किला जीत जाओ। समझ न हो तो तोप भी झुक जाए।"

यह बात शिवाजी ने जीवन भर याद रखी।

शाम चार बजे घुड़सवारी। पुणे के बाहर के मैदान में। दादोजी ख़ुद घोड़े पर बैठते। शिवाजी पीछे सीखता। दौड़ना, मुड़ना, अचानक रुकना, उछलकर उतरना, फिर चढ़ना — सब अभ्यास।

एक दिन शिवाजी ने पूछा — "गुरुजी, क्या मैं कभी पहाड़ों में घोड़े दौड़ा सकूँगा?"

"क्यों?"

"क्योंकि हमारे चारों तरफ़ पहाड़ हैं। अगर मैदान में लड़ाई हो — तो आदिलशाह की बड़ी सेना जीतेगी। पर अगर पहाड़ में लड़ाई हो — तो हम जीत सकते हैं।"

दादोजी रुक गए।

बच्चे की ओर देखा। एक लंबी नज़र।

"शिवबा, यह बात तू कब से सोच रहा है?"

"बहुत दिनों से गुरुजी।"

दादोजी ने धीरे से सर हिलाया।

"बेटा, यही असली विद्या है। मैदान में बड़ी सेना का राज होता है। पहाड़ में छोटी पर तेज़ सेना का। तू जो सोच रहा है — यह गुरिल्ला युद्ध है। हम मराठे इसी में निपुण हैं। तेरे पुरखे इसी से जीतते रहे हैं।"

उस दिन से दादोजी ने शिवाजी को पहाड़ी युद्ध की हर तकनीक सिखानी शुरू की। संकरे रास्ते में फँसाना। तेज़ हमला करना और पीछे हट जाना। दुश्मन की रसद काटना। रात को छापामार। पहाड़ी के एक तरफ़ से दिखाना और दूसरी तरफ़ से हमला करना।

रात को घर लौटकर शिवाजी माँ को सब बताता। माँ हँसती, फिर एक और कहानी सुनातीं — महाराणा प्रताप की, या शिवाजी के अपने पुरखों की।

दादोजी का एक और काम था — प्रशासन सिखाना। शिवाजी को रोज़ कुछ घंटे जागीर के दफ़्तर में बैठाते। फ़रियाद आती, हिसाब-किताब आता, गाँव से किसान आते, लगान का मामला आता।

एक दिन एक किसान आया — रोते हुए।

"मेरा बेटा बीमार है। दवाई के लिए पैसे नहीं। और इधर लगान का दिन आ गया। क्या करूँ?"

दादोजी ने शिवाजी की ओर देखा।

"शिवबा, तू फ़ैसला कर।"

शिवाजी एक पल चुप रहा। फिर बोला — "लगान माफ़।"

दादोजी मुस्कुराए।

"अच्छा फ़ैसला बेटा। पर एक बात और। सिर्फ़ माफ़ नहीं। दवाई का खर्च भी सरकार दे। क्योंकि बच्चा प्रजा का है, और प्रजा का दर्द सरकार का दर्द है।"

किसान ने पैर छुए। आँख में आँसू।

शाम को दादोजी ने जिजाबाई से कहा — "महारानी जी, इस बच्चे में गुण हैं। पर सबसे बड़ा गुण — दया। और राजा में दया नहीं हो — तो वो राजा नहीं, ज़ुल्मी होता है।"

जिजाबाई ने सर हिला दिया।

दादोजी की एक और सीख थी जो शिवाजी ने जीवन भर निभाई — किसी भी स्त्री का अनादर मत करना। चाहे वो दुश्मन की पत्नी हो, या मंदिर में पूजा करने वाली हो, या किसी गाँव की साधारण विधवा हो।

"शिवबा, हमारे यहाँ शक्ति को स्त्री-रूप में पूजा जाता है। माँ दुर्गा, माँ काली, माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी। और जो माँ नहीं हैं — वो भी किसी की पत्नी, बेटी, बहन हैं। उनका अनादर — माँ का अनादर। समझा?"

"हाँ गुरुजी।"

"और एक बात। मंदिर तोड़ना — चाहे किसी का भी मंदिर हो — पाप है। अपने भगवान की पूजा करो; पर दूसरे के भगवान का सम्मान भी करो।"

यह सीख आगे चलकर शिवाजी की एक ख़ास पहचान बन गई। उनकी सेना मस्जिदों को नहीं तोड़ती। पवित्र क़ुरआन की प्रतियाँ जब लूट में मिलतीं, उन्हें सम्मान से किसी मुस्लिम विद्वान को सौंप दिया जाता। मुस्लिम स्त्रियाँ क़ैद में नहीं रखी जातीं — सम्मान से अपने घरों को लौटाई जातीं। यह सब दादोजी की पाठशाला की देन थी।

एक रात — शिवाजी पंद्रह का होने को था — दादोजी ने उसे बुलाया।

"शिवबा, अब एक बात कहूँगा। मेरी पाठशाला ख़त्म हो रही है। तेरी अब एक नई पाठशाला शुरू होगी।"

"कौन सी गुरुजी?"

"असली ज़मीन की। बारह मावळ की। तेरे आसपास के गाँव — हिरडस मावळ, मुथे मावळ, गुंजन मावळ — इन सब के लड़के तेरे साथी होने हैं। तू उनके बीच जाएगा। उनके साथ खाएगा, उनके साथ सोएगा, उनके पहाड़ चढ़ेगा। वो लोग तेरी सेना बनेंगे। तेरी पहली सेना।"

शिवाजी ने सर हिलाया। उत्सुकता से।

"और गुरुजी, क़िले?"

"क़िले — आगे की बात। पहले लोग। लोगों के बिना क़िले बस पत्थर हैं।"

शिवाजी ने दादोजी के पैर छुए।

"गुरुजी, आपने जो दिया — वो जीवन भर रहेगा।"

दादोजी की आँखें भर आईं। पर बच्चे को नहीं दिखाईं।

"बेटा, बस एक काम कर। मेरी सीख को अपने आचरण से दिखा। शब्दों से नहीं — कर्मों से। बस वही मेरी गुरु-दक्षिणा।"

उस रात लाल महल में शिवाजी नहीं सोया। बहुत देर तक खिड़की पर बैठा रहा। सिंहगढ़ की रात की रोशनी देखता रहा।

उसके भीतर कुछ बन रहा था। एक संकल्प की पहली रूप-रेखा।

दादोजी ने पाठशाला बंद की। पर असली पाठशाला तो अभी शुरू होने को थी।

॥ जय गुरु दादोजी ॥ जय शिवबा ॥

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अध्याय 3 — दादोजी कोंडदेव की पाठशाला

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