लगभग 304 ईसा-पूर्व का वर्ष। मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र। चन्द्रगुप्त मौर्य के संन्यास को लगभग दस वर्ष बीत चुके थे। उनके पुत्र बिंदुसार अब सम्राट थे — एक स्थिर, अनुभवी शासक।
आचार्य चाणक्य जी की दी गई व्यवस्था अब पूरी तरह काम कर रही थी। साम्राज्य की सीमाएँ हिमालय से लेकर दक्षिण भारत तक। पंजाब से लेकर बंगाल तक। एक विशाल भू-भाग। एक संगठित प्रशासन। एक शांत व्यवस्था।
उसी काल में — बिंदुसार के राजमहल में — एक नई हलचल थी। उनकी एक रानी — जिनका नाम था सुभद्रांगी (कुछ ग्रंथों में उन्हें धर्मा भी कहा गया) — गर्भवती थीं। राजमहल का प्रत्येक कोना उनकी देखभाल में सजग। दर्जनों दासियाँ। राज-वैद्य। ज्योतिषी।
एक रात — पूर्णिमा से कुछ दिन पहले — सुभद्रांगी जी ने एक पुत्र को जन्म दिया। बच्चे का सिर थोड़ा बड़ा था, माथा चौड़ा। आँखें — एक अद्भुत स्थिरता के साथ बंद। शरीर पर कुछ छोटे-छोटे चिह्न — जो कुछ ज्योतिषियों ने एक राजकीय चिह्न माना।
राज-पुरोहित आए। जन्म-पत्रिका बनाई। उन्होंने एक रोचक भविष्यवाणी की।
"महाराज, यह बालक एक भविष्य का सम्राट। पर एक विशेष बात — इसका जीवन दो भागों में बँटेगा। पहला भाग — कठोरता, युद्ध, संग्राम। दूसरा भाग — करुणा, धर्म, शांति। दोनों एक ही व्यक्ति में। एक चमत्कारी परिवर्तन।"
सम्राट बिंदुसार ने यह सुना। वे कुछ क्षण मौन रहे। एक राजा के पुत्र के बारे में — दो विरोधी भविष्यवाणियाँ। यह क्या?
"पुरोहित जी, इसका नाम क्या रखें?"
"महाराज, इस बालक के अंदर एक बड़ी आग है। पर साथ-साथ एक गहरी शांति की क्षमता भी। एक ऐसा नाम चाहिए — जो दोनों को समाहित करे।"
एक क्षण रुककर पुरोहित ने आगे कहा —
"अशोक। 'अ' — रहित। 'शोक' — दुख। जो शोक से रहित। पर एक दूसरा अर्थ भी — जो दूसरों के शोक को मिटाए।
"दोनों अर्थ इस बालक के लिए। पहले अपने जीवन में अनेक दुख देगा। फिर अंत में — हज़ारों के दुख मिटाने वाला।"
नाम तय हुआ — अशोक। राजकुमार अशोक मौर्य।
(आगे चलकर — इस नाम से जुड़ी एक गहरी सच्चाई इतिहास में आई। पहले "चण्डाशोक" — क्रूर अशोक। फिर "धर्माशोक" — धर्म वाले अशोक। एक ही व्यक्ति में दो अंत।)
राजकुमार अशोक जी के बचपन में अनेक भाई-बहन भी थे। बिंदुसार जी की एक बड़ी रानी — जिनका नाम था चारुमती — के एक पुत्र थे। उनका नाम था सुसीम। सुसीम जी आयु में अशोक जी से बड़े थे। राज्य के नियम के अनुसार — वे भविष्य के सम्राट के दावेदार माने जाते थे।
पर अशोक जी की माँ सुभद्रांगी जी की स्थिति — राजमहल में थोड़ी कम थी। वे एक बड़े राज-कुल से नहीं — पर एक भले ब्राह्मण कुल से थीं। बिंदुसार जी ने उनसे प्रेम-विवाह किया था।
राजमहल की कुछ अन्य रानियाँ — विशेष रूप से चारुमती जी — सुभद्रांगी जी को थोड़ा कम सम्मान देती थीं।
"वे तो ब्राह्मण-कुल की हैं। राज-कुल की नहीं। फिर भी रानी।"
सुभद्रांगी जी इसे सुनकर भी चुप रहती थीं। उनका स्वभाव शांत। उन्होंने अपना पूरा ध्यान — अपने पुत्र अशोक जी पर लगाया।
शिशु अशोक जी एक प्रकार से एक अलग बच्चे थे। वे बहुत कम रोते थे। पर उनकी आँखें — सब को देखती रहती थीं। एक स्थिरता से।
एक दिन — एक राज-दासी ने सुभद्रांगी जी से कहा — "रानी जी, इस बच्चे की आँखें बहुत अजीब। एक छोटे-से बच्चे की नहीं — एक बड़े मनुष्य की।"
सुभद्रांगी जी मुस्कुराईं। "मैं भी यही देखती हूँ। यह बालक कुछ ख़ास है।"
राजमहल में — अशोक जी की कुछ ख़ास आदतें भी थीं। तीन-चार वर्ष की आयु में — जब अन्य बच्चे खिलौनों से खेलते थे — अशोक जी अकेले बैठते। एक छोटी-सी पगडंडी पर। आँखें खुली रखकर।
उनकी माँ ने एक दिन पूछा — "बेटा, तू अकेले क्या सोच रहा है?"
नन्हे अशोक जी ने एक छोटी-सी बात कही — "माँ, मैं चींटियों को देख रहा हूँ। वे अनेक हैं। वे एक साथ चलती हैं। वे एक-दूसरे को नहीं छोड़तीं।"
सुभद्रांगी जी चकित। एक चार वर्ष का बच्चा — चींटियों का अवलोकन?
एक और दिन — एक छोटा सा बंदर एक पेड़ से गिरा। उसका हाथ टूट गया। राजमहल के अन्य बच्चे हँसने लगे। पर अशोक जी — वे दौड़कर बंदर के पास गए। एक राज-वैद्य को बुलाया। बंदर का हाथ बँधवाया।
एक चार-पाँच वर्ष का बालक — एक घायल बंदर की रक्षा।
उनके पिता बिंदुसार जी ने यह देखा। उन्होंने अपनी रानी से कहा — "सुभद्रांगी, हमारा यह बेटा कुछ अलग है। उसकी आँखों में एक करुणा है — जो मेरे अन्य बच्चों में नहीं।"
सुभद्रांगी जी मुस्कुराईं। "महाराज, यह आपकी अपनी विशेषता। आप भी एक करुण-हृदय व्यक्ति। आपके पिता — चन्द्रगुप्त मौर्य — भी जैन-धर्म से प्रभावित होकर अहिंसा की राह पर गए। यह कुल का संस्कार है।"
बिंदुसार जी ने सिर हिलाया। पर उनके मन में एक चिंता भी — पुरोहित की पुरानी भविष्यवाणी।
"पहले कठोरता — फिर करुणा।" क्या मेरा यह छोटा बेटा — जो आज इतना दयालु — एक दिन कठोर बनेगा? और फिर वापस करुण?
उनके मन में अनेक प्रश्न। पर उनके सामने केवल एक छोटा-सा बालक — जो बड़ी आँखों से उन्हें देख रहा था।
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