1 पाटलिपुत्र में एक राजकुमार का जन्म FREE 2 राजमहल का बचपन FREE 3 युवावस्था और शिक्षा FREE 4 तक्षशिला विद्रोह — पहला अभियान FREE 5 उज्जैन का राज्यपाल FREE 6 विदिशा की देवी से प्रेम FREE 7 बिंदुसार की मृत्यु और उत्तराधिकार-संकट FREE 8 चार वर्ष का संघर्ष FREE 9 चण्डाशोक का काल FREE 10 साम्राज्य का विस्तार FREE 11 कलिंग का स्वतंत्र राज्य FREE 12 कलिंग-युद्ध की तैयारी FREE 13 कलिंग का भयानक संग्राम FREE 14 दया-नदी पर पश्चाताप FREE 15 बौद्ध-धर्म की दीक्षा FREE 16 धम्म की सोच FREE 17 राज्य में धम्म का प्रचार FREE 18 शिलालेख और स्तंभ-लेख FREE 19 पाटलिपुत्र की तीसरी बौद्ध संगीति FREE 20 संघमित्रा और बोधि-वृक्ष FREE 21 एक धम्म-राजा का दैनिक जीवन FREE 22 परिवार और संतानें FREE 23 सांची स्तूप और धम्म-निर्माण FREE 24 साम्राज्य की कमज़ोरी आरंभ FREE 25 दान का सीमा-काल FREE 26 बूढ़े राजा का अकेलापन FREE 27 देहांत-काल का आगमन FREE 28 232 ईसा-पूर्व — अशोक का देहांत FREE 29 मौर्य साम्राज्य का पतन और एक नई पीढ़ी FREE 30 विरासत — अशोक चक्र, धम्म, और एक अमर नाम FREE
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युवावस्था और शिक्षा

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अशोक जी की आयु जैसे-जैसे बढ़ती गई — उनकी प्रतिभा भी सामने आने लगी।

दस वर्ष की आयु — संस्कृत के अधिकांश ग्रंथ कंठस्थ। चाणक्य के अर्थशास्त्र की पहली पाँच अधिकरण।

बारह वर्ष की आयु — तलवार में निपुणता। घुड़सवारी में कुशलता। धनुर्विद्या में एक तेज़ निशानेबाज़।

पंद्रह वर्ष की आयु — एक पूर्ण युवक। कद ऊँचा। चेहरे पर दृढ़ता। आँखों में एक तेज।

एक छोटा-सा रोचक प्रसंग — उनके पंद्रहवें वर्ष में।

राजमहल में एक तलवारबाज़ी की प्रतियोगिता। सब राजकुमार। सब उच्च-कुलीन। सुसीम जी सबसे आगे — उनकी आयु तेईस। एक अनुभवी योद्धा।

दूसरी ओर — अशोक जी। पंद्रह वर्ष का एक युवक। पर उनकी कलाई में एक स्थिरता।

प्रतियोगिता की अंतिम लड़ाई — सुसीम जी और अशोक जी के बीच।

आरंभ में — सुसीम जी ने अपनी अनुभव और कद का लाभ उठाया। पर अशोक जी ने एक चालाक रणनीति। वे सीधे प्रहार से बच निकले। उन्होंने सुसीम जी को थका दिया।

तीस मिनट की लड़ाई। आख़िर — एक छोटी-सी चाल। अशोक जी ने एक छलांग लगाई। सुसीम जी को कमर के पास गिरा दिया। अंतिम प्रहार — सुसीम जी की तलवार उनके हाथ से छूट गई।

विजय — अशोक जी की।

दरबार में सब चकित। एक पंद्रह वर्ष के युवक ने एक तेईस वर्ष के राजकुमार को हराया।

सुसीम जी ने एक मुस्कुराहट के साथ अपना हाथ बढ़ाया।

"शाबाश, छोटे भाई। तेरी कलाई में एक तेज है।"

अशोक जी ने सिर झुकाकर पाँव छुए।

"भैया, यह केवल एक खेल। आपके अनुभव से मैं बहुत कुछ सीखता हूँ।"

सुसीम जी ने ऊपर से एक मुस्कान दी। पर उनके मन में — एक छोटी-सी जलन। यह छोटा भाई — कुछ ज़्यादा बढ़ता जा रहा है।

उनकी माँ चारुमती जी ने उन्हें बाद में कहा — "बेटा, अशोक से सावधान रहना। उसकी प्रतिभा बढ़ रही है। एक दिन — यह सिंहासन के लिए तेरा प्रतिद्वंद्वी बनेगा।"

सुसीम जी ने सिर हिलाया।

उधर — सम्राट बिंदुसार जी अशोक जी की प्रगति देख रहे थे। उनके मन में एक संतोष — पर एक चिंता भी।

एक दिन — उन्होंने अपने मुख्य मंत्री से पूछा — "मेरे पुत्रों में सबसे योग्य कौन?"

मुख्य मंत्री ने ध्यान से सोचा। फिर एक चतुर उत्तर दिया।

"महाराज, हर पुत्र की अपनी विशेषता। सुसीम जी — ज्येष्ठ। पारंपरिक रूप से सिंहासन के अधिकारी। अनुभव में अधिक।

"पर अशोक जी — एक विशेष चमक। उनकी सोच — एक राजा से आगे की। बुद्धि अद्भुत। निर्णयों में स्थिरता।"

बिंदुसार जी कुछ क्षण मौन रहे।

"मेरी पसंद — अशोक। पर पारंपरिक नियम — सुसीम। एक भारी प्रश्न।"

"महाराज, अभी निर्णय की कोई जल्दी नहीं। दोनों राजकुमार युवा। समय बताएगा।"

बिंदुसार जी ने सहमति दी। पर उनके मन में एक बीज बो गया था।

एक और महत्वपूर्ण घटना — अशोक जी के अठारहवें वर्ष में।

उज्जैन — अवंती प्रांत की राजधानी — में एक छोटी-सी अशांति आरंभ हुई। कुछ स्थानीय व्यापारी सरकारी कर के विरुद्ध। कुछ छोटे-छोटे झगड़े।

बिंदुसार जी ने अपने मंत्रियों से चर्चा की।

"उज्जैन में एक नए राज्यपाल की आवश्यकता। एक ऐसा युवक — जो स्थिति को संभाल सके।"

एक मंत्री ने सुझाव दिया — "महाराज, राजकुमार अशोक जी की आयु अब अठारह। यह अनुभव लेने का समय। उन्हें उज्जैन भेजिए। यह उनके भविष्य के लिए लाभ में।"

बिंदुसार जी ने सहमति दी।

उन्होंने अशोक जी को बुलाया।

"बेटा, मैं तुझे एक भारी कार्य सौंपना चाहता हूँ। उज्जैन — हमारा एक प्रमुख पश्चिमी प्रांत। वहाँ अब अशांति। मैं चाहता हूँ — तुम वहाँ राज्यपाल बनो।"

अशोक जी हैरान। एक राज्यपाल — अठारह वर्ष की आयु में।

"पिताजी, क्या मैं तैयार?"

"बेटा, तेरी प्रतिभा हमने देखी। अब इसे व्यावहारिक रूप से सिद्ध करने का समय। तुझे उज्जैन में अपनी पूरी टीम चुनने का अधिकार। हमारे केंद्रीय सलाहकार तुम्हारी सहायता करेंगे। पर असली निर्णय तुम्हारे।"

अशोक जी ने सिर हिलाया।

"पिताजी, यह मेरा सम्मान। मैं अपना पूर्ण प्रयास करूँगा।"

उनकी माँ सुभद्रांगी जी ने यह सुना। वे ख़ुश थीं — पर एक चिंता भी।

"बेटा, उज्जैन यहाँ से बहुत दूर। पंद्रह सौ कोस। तू अकेले जाएगा?"

"माँ, अकेले नहीं। मेरे साथ कुछ विश्वसनीय सरदार और मंत्री।"

"और एक बात बेटा — तू वहाँ एक राज्यपाल बन रहा है। पर एक राजा का असली पाठ — प्रजा से। उज्जैन के साधारण लोगों से बातचीत करना। उनके दुख समझना। यही तेरा असली प्रशिक्षण।"

अशोक जी ने सिर हिलाया।

एक हफ़्ते में तैयारी पूर्ण। एक छोटा-सा कारवाँ — पाँच सौ सैनिक, तीस अधिकारी, दस मंत्री-स्तर के सलाहकार।

विदाई का दिन। सुभद्रांगी जी ने अपने पुत्र के माथे पर तिलक लगाया।

"बेटा, उज्जैन में ध्यान से। और एक बात — तेरी एक नई ज़िंदगी आरंभ हो रही है। शायद वहाँ — तू एक नई स्त्री से मिले — जो तेरा साथी बने। मेरा आशीर्वाद।"

अशोक जी मुस्कुराए। फिर अपने घोड़े पर बैठे। निकल पड़े।

उन्हें यह नहीं पता था — उज्जैन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ बनने वाला था।

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