शिशु अशोक जी का बचपन पाटलिपुत्र के विशाल राजमहल में बीता। पर एक प्रकार से — अकेला बीता। उनके अनेक भाई-बहन थे — पर अधिकांश दूसरी रानियों के पुत्र। उनकी आपस में अधिक मित्रता नहीं हो पाई।
सबसे बड़ा कारण — सुसीम जी। बिंदुसार जी की मुख्य रानी चारुमती जी के पुत्र। आयु में अशोक जी से लगभग आठ वर्ष बड़े। और एक प्रकार से — राजकुमारों में सबसे आगे। पिता ने उन्हें भविष्य के सम्राट के रूप में देखा।
सुसीम जी एक सुंदर, लंबे कद वाले युवक। उनकी माँ ने उन्हें राजसी ढंग से पाला। हर बात में सुसीम पहले। राज्य के अनुष्ठानों में सबसे आगे।
अशोक जी — माँ सुभद्रांगी जी की एकमात्र पुत्र। माँ की रानी-स्थिति राजमहल में थोड़ी कम। इस कारण अशोक जी अधिक राज-सुविधाएँ नहीं पातीं। उन्हें अधिक सादगी से बढ़ाया गया।
एक प्रकार से — एक राज-कुमार पर एक साधारण बच्चे की तरह।
एक दिन — अशोक जी लगभग छह वर्ष के थे — उन्होंने एक रोचक प्रश्न माँ से पूछा।
"माँ, मेरी पोशाक सुसीम भैया से अलग क्यों? वे तो रेशम पहनते हैं। मैं केवल सूती।"
सुभद्रांगी जी ने मुस्कुराकर अपने पुत्र का माथा चूमा।
"बेटा, तेरे पिता बहुत अच्छे हैं। वे सब बच्चों से समान प्रेम करते हैं। पर राजमहल में कुछ रिवाज ऐसे हैं — जिन्हें वे एक रात में बदल नहीं सकते। तू बस एक बात याद रखना — पोशाक से एक राजकुमार नहीं बनता। उसके चरित्र से बनता है।"
अशोक जी ने सिर हिलाया। पर उनके मन में एक बात बैठ गई। पोशाक का अंतर। एक छोटा-सा अंतर — पर एक राजकुमार के मन में बड़ा।
राजमहल में अनेक शिक्षक थे। पर अशोक जी की शिक्षा एक छोटी-सी पाठशाला में होती थी। पाँच-सात विद्यार्थी। एक मध्यम-आयु का आचार्य।
विषय थे — संस्कृत, धर्म-शास्त्र, गणित, राजनीति, और अर्थशास्त्र। (आचार्य चाणक्य जी का प्रसिद्ध अर्थशास्त्र — अब मौर्य कुल के बच्चों की मुख्य पाठ्य-पुस्तक थी।)
एक दिन — आचार्य ने एक प्रश्न पूछा —
"बच्चो, चाणक्य अर्थशास्त्र में कहा है — एक राजा के पास साम-दाम-दंड-भेद के चार उपाय। बताओ — एक राजा के लिए सबसे अच्छा कौन-सा?"
एक छात्र ने उत्तर दिया — "साम। बातचीत सबसे अच्छी।"
दूसरे ने कहा — "नहीं, दंड। बल से सब वश में।"
आचार्य ने अशोक जी की ओर देखा।
"राजकुमार, आपका क्या उत्तर?"
अशोक जी ने कुछ क्षण सोचा।
"आचार्य जी, चारों में कोई भी अकेला सबसे अच्छा नहीं। हर परिस्थिति में अलग। पर मेरा मन कहता है — साम सबसे पहले। यदि एक राजा हर समय बातचीत से समस्या हल कर सके — तो उसका राज्य सबसे शांत। दंड — आख़िर में। तब — जब बातचीत असंभव।"
आचार्य ने सिर हिलाया।
"राजकुमार, यह उत्तर एक संत-राजा का। पर एक चेतावनी — बहुत अधिक साम — कमज़ोरी मानी जा सकती है। आपको हर परिस्थिति में चारों उपायों का संतुलन रखना होगा।"
अशोक जी ने सिर हिलाया। पर उनके मन में — साम का प्रथम स्थान — बैठ गया।
एक छोटी-सी कहानी — जो आगे चलकर अशोक जी की पहचान बनी।
एक दिन — पाटलिपुत्र के बाज़ार में — एक भिखारी एक राजकीय जुलूस के सामने आ गया। सुसीम जी और अशोक जी — दोनों राजकुमार उस जुलूस में थे। राजकीय हाथियों के पास।
एक राज-सिपाही ने उस भिखारी को धक्का दिया। भिखारी ज़मीन पर गिर पड़ा। उसका हाथ टूट गया।
सुसीम जी ने हँसकर कहा — "देखो — एक भिखारी राज-जुलूस में रास्ता काटता है।"
पर अशोक जी ने अपने हाथी को रुकवाया। नीचे उतरे। भिखारी के पास गए। उसके टूटे हाथ पर अपना रेशमी कपड़ा बाँधा।
"बाबा, माफ़ करिए। यह सिपाही ने ग़लती की।"
उन्होंने अपनी पोटली से कुछ सिक्के निकाले। भिखारी को दिए।
"इसे लीजिए। अपने इलाज के लिए।"
सुसीम जी ने पीछे से कहा — "अशोक, तू एक राजकुमार है — एक भिक्षुक से माफ़ी मत माँग। यह राजकुल की मर्यादा के विरुद्ध।"
अशोक जी ने पीछे मुड़कर देखा।
"भैया, राजकुल की असली मर्यादा — एक राजा अपनी प्रजा से माफ़ी नहीं माँगता — पर अपनी प्रजा का दर्द समझता है। मैंने माफ़ी नहीं मांगी — दया दिखाई।"
सुसीम जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। पर उनके मन में एक बात बैठ गई। यह छोटा भाई — एक चिंताजनक छोटा भाई।
शाम को राजमहल में — सुसीम जी अपनी माँ चारुमती जी के पास गए।
"माँ, अशोक मुझसे एक प्रकार से अलग है। उसका स्वभाव अधिक नर्म। पर एक बात — वह बहुत समझदार। आगे चलकर — यदि वह बड़ा हुआ — हमारे लिए एक बड़ा प्रश्न-चिह्न।"
चारुमती जी ने अपने पुत्र की बात ध्यान से सुनी।
"बेटा, यह आज की चिंता नहीं। पर एक बात — आगे की पीढ़ी में राजगद्दी पर तेरा अधिकार। तू सुनिश्चित कर — कोई भाई इसे न छीने।"
सुसीम जी ने सिर हिलाया।
राजमहल में — एक छोटा-सा अदृश्य संघर्ष आरंभ हो रहा था। दो भाई। एक पिता। एक भविष्य का सिंहासन। आगे चलकर — यह संघर्ष एक भयानक रूप ले लेने वाला था।
पर अभी — अशोक जी एक छह वर्ष का बालक। राजमहल के एक छोटे कक्ष में। अपनी माँ की गोद में। एक छोटी-सी कहानी सुनते हुए। उन्हें यह नहीं पता था — आगे क्या आ रहा है।
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