एक प्यारी परी, एक कद्दू, चार चूहे — और एक रात के लिए सिंड्रेला रानी जैसी बन गई।
सिंड्रेला के सामने एक बूढ़ी-सी पर बहुत प्यारी औरत खड़ी थी। उसके बाल चांदी के तार जैसे, आँखें नीली। उसके पीछे एक हल्की-सी रोशनी थी, मानो उसके कंधों पर पंख हों। हाथ में एक छोटी-सी चांदी की छड़ी।
"त-तुम कौन हो?" सिंड्रेला ने हैरान होकर पूछा।
"बेटी, मैं तेरी परी-माँ हूँ। बहुत समय से तुझे देख रही थी। पर आज तेरा रोना मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ। आँसू पोंछ। तुझे राजमहल जाना है।"
सिंड्रेला ने धीरे से सिर हिलाया।
"पर मेरे पास कुछ नहीं... कपड़ा नहीं, गाड़ी नहीं, घोड़ा नहीं..."
परी मुस्कुराईं। "बेटी, ये सब बस छोटी-सी बातें हैं। तू बस मेरी मदद कर। पीछे बाग़ में जाकर सबसे बड़ा कद्दू ले आ।"
सिंड्रेला हैरान हुई। पर बिना कुछ पूछे भागी, और बाग़ से एक मोटा-तगड़ा कद्दू ले आई।
परी ने कद्दू को बाग़ के बीच में रखा। अपनी चांदी की छड़ी हिलाई। एक मीठी-सी धुन बजी। "बिबीदी-बोबीदी-बू!"
एक झटके में कद्दू बढ़ने लगा। उसके चारों तरफ़ रोशनी फैली। और कुछ ही पलों में — वो कद्दू एक बड़ी-सी सुनहरी गाड़ी बन गया। पहिए सुनहरे, बैठने की जगह मखमली, और छत पर चांदी की कलाकारी।
सिंड्रेला की आँखें फटी रह गईं।
"वाह!"
"अब चूहे ला, बेटी। चार चूहे।"
सिंड्रेला ने अपने पुराने पिंजरे से चार सफ़ेद चूहे निकाले। परी ने फिर से छड़ी हिलाई।
"बिबीदी-बोबीदी-बू!"
चार चूहे बढ़कर चार लंबे-चौड़े सफ़ेद घोड़े बन गए। उनके बाल रेशमी, गर्दन ऊँची, और आँखें चमकती हुईं।
"और एक मेंढक — कोचवान बनाने के लिए।"
बाग़ के तालाब से एक मेंढक उछला। परी ने छड़ी हिलाई। एक झटके में वो मेंढक एक मोटा-सा कोचवान बन गया, सिर पर ऊँची टोपी।
"और दो छिपकलियाँ — पहरेदार के लिए।"
दो छिपकलियाँ बाग़ की दीवार से निकलीं। एक झटके में वो लंबे-तगड़े पहरेदार बन गए, पीछे गाड़ी में खड़े।
"अब तेरी बारी है, बेटी।" परी ने मुस्कुराते हुए कहा।
उन्होंने अपनी छड़ी सिंड्रेला की तरफ़ हिलाई। एक हल्की रोशनी सिंड्रेला के चारों तरफ़ घूमने लगी। उसके फटे-पुराने कपड़े धीरे-धीरे बदलने लगे।
एक पल पहले तक जो लड़की राख से भरी, फटे कपड़ों में थी — अब वो एक चांदी-नीली रेशमी पोशाक में खड़ी थी। पोशाक पर हीरों के सितारे टँके। बालों में मोतियों की पट्टी। गले में नीलमणी का हार।
और उसके पैरों में — दो छोटी-सी, चमकती हुई काँच की चप्पलें।
"परी-माँ, ये काँच की चप्पल! मैं इसे कैसे पहनूँगी?"
"बेटी, ये साधारण काँच नहीं। इसे जादू से बनाया गया है। ये टूटेगी नहीं। और तेरे पैर में बिल्कुल फ़िट रहेगी।"
सिंड्रेला गाड़ी में बैठने ही वाली थी कि परी ने उसका हाथ पकड़ा।
"बेटी, एक बहुत ज़रूरी बात सुन। ये जादू सिर्फ़ रात के बारह बजे तक चलेगा। जैसे ही घड़ी बारह बजाएगी, सब कुछ अपनी असली शक्ल में लौट आएगा। गाड़ी कद्दू बन जाएगी, घोड़े चूहे, और तेरा कपड़ा फिर से पुराना।"
"बारह बजे से पहले राजमहल से निकल आना। समझी?"
"हाँ परी-माँ। वादा।"
परी ने उसके माथे पर हाथ फेरा। फिर एक नर्म-सी रोशनी में ओझल हो गईं।
गाड़ी सरपट दौड़ी। शहर की गलियाँ पीछे छूटीं। सिंड्रेला राजमहल के सामने पहुँची।
राजमहल की रोशनी से रात भी दिन जैसी लग रही थी। हज़ार-हज़ार दीप जल रहे थे। बाहर पहरेदार चमकती वर्दी में खड़े। मेहमान सोने-चांदी के कपड़ों में अंदर जा रहे थे।
सिंड्रेला की गाड़ी रुकी। पहरेदारों ने झुककर सलाम किया। उसने धीरे से उतरकर राजमहल की सीढ़ियाँ चढ़ीं।
दरवाज़े पर पहुँचते ही उसकी पोशाक की चमक चारों तरफ़ फैल गई। हर मेहमान ने पीछे मुड़कर देखा। यहाँ तक कि सौतेली माँ और बहनें भी।
पर उन्होंने उसे पहचाना नहीं। उनके लिए वो एक अनजान, सुंदर राजकुमारी थी।
"ये कौन है?" सुहाना ने अनिता से पूछा।
"पता नहीं। पर बहुत सुंदर है।"
उसी पल राजकुमार बड़े दरवाज़े के पास खड़े थे। उन्होंने मेहमानों की भीड़ से नज़र हटाकर सिंड्रेला की तरफ़ देखा।
उनकी आँखें वहीं रुक गईं।
उनका दिल — पहली बार — एक नई आवाज़ में बोल उठा।
"यही है। बस यही।"
राजकुमार ने अपने सिपहसालार को इशारा किया। सिपहसालार झुककर सलाम करते हुए सिंड्रेला के पास आए।
"मलिका, हमारे राजकुमार आपसे एक नृत्य की इजाज़त चाहते हैं।"
सिंड्रेला का दिल धक-धक करने लगा।
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