राजमहल का दूत हाथ में सुनहरी चिट्ठी लेकर आया, और हवेली में एक तूफ़ान आ गया।
एक सुबह बाज़ार में बहुत शोर हुआ। ढोल बजने लगे। लोग गलियों में निकल आए। राजमहल का एक दूत सुनहरे घोड़े पर सवार होकर बाज़ार के बीच में आया। उसके हाथ में एक सुनहरी चिट्ठी थी।
उसने चिट्ठी खोली, और ज़ोर से पढ़ी —
"सुनो सुनो, सुनो! महाराज की तरफ़ से एक बड़ी ख़बर है! हमारे प्यारे राजकुमार अब बड़े हो गए हैं। उनकी शादी का समय आ गया है। पर उन्होंने कहा है — मैं सिर्फ़ उसी से शादी करूँगा, जिसे देखकर मेरा दिल कह दे — हाँ, यही मेरी जीवनसंगिनी है।"
"इसलिए पूरे देश की हर लड़की को राजमहल में दावत के लिए बुलाया जाता है। तीन रातें तक राजमहल में नाच-गाना होगा। हर लड़की आ सकती है। राजकुमार ख़ुद चुनेंगे — और जिसे चुनेंगे, वही इस देश की भावी रानी बनेगी!"
पूरा बाज़ार ख़ुशी से चिल्ला उठा। हर तरफ़ बातें होने लगीं। लड़कियाँ हाथ में हाथ डालकर नाचने लगीं।
ख़बर हवेली तक पहुँची। सिंड्रेला उस वक़्त चूल्हे के पास बैठकर तरकारी काट रही थी। सौतेली माँ अंदर आईं। उनके चेहरे पर अजीब-सी चमक थी।
"अनिता! सुहाना! जल्दी आओ! बहुत बड़ी ख़बर है।"
दोनों बहनें भागती हुई आईं।
"राजमहल का निमंत्रण आया है! तीनों रातों के लिए। तुम दोनों में से एक राजकुमार की पत्नी बनेगी!"
सुहाना की आँखें फट गईं। अनिता ज़ोर से चीखी।
"मैं रानी बनूँगी! मैं ही!"
"नहीं, मैं!"
दोनों लड़ने लगीं। माँ ने हाथ उठाकर रोका। "बस! दोनों जाओगी। अब बढ़िया कपड़े चुनो। दर्ज़ी को बुलवाती हूँ। सबसे महँगा कपड़ा सिलवाया जाएगा।"
सिंड्रेला ने धीरे से सिर ऊपर किया।
"क्या मैं भी जा सकती हूँ?"
तीनों ने एक साथ उसकी तरफ़ देखा। फिर तीनों ज़ोर से हँस पड़ीं।
"तू? राजमहल? तू तो राख वाली है। तेरे पास तो कोई ठीक कपड़ा भी नहीं।"
"पर निमंत्रण में तो लिखा है — हर लड़की आ सकती है।"
सौतेली माँ ने एक पल रुककर कुछ सोचा। फिर मुस्कुराईं — पर वो असली मुस्कान नहीं थी।
"ठीक है। अगर तू अपनी पुरानी अलमारी से कोई कपड़ा खोजकर सिल ले, और सारा घर का काम भी निपटाकर तैयार हो जाए, तो आ सकती है।"
सिंड्रेला की आँखों में चमक आई। "सच में?"
"हाँ, बिल्कुल सच।"
पर सुहाना और अनिता एक-दूसरे की तरफ़ देखकर मुस्कुरा रहीं थीं। उन्हें पता था — माँ कुछ चाल चल रही हैं।
सिंड्रेला अटारी में गई। एक बक्से में बहुत पुराना एक कपड़ा रखा था — उसकी असली माँ का। हल्का गुलाबी रंग, चांदी के सितारे, और कमर पर एक रिबन। बहुत सुंदर था, बस थोड़ा पुराना और कई जगह से फटा हुआ।
उसने कपड़ा पकड़ा। आँसू निकल आए।
"माँ, ये तुम्हारा है। मुझे पता है तुम चाहोगी, मैं ये पहनकर ख़ुश हो जाऊँ।"
उसने सुई-धागा निकाला। पूरे दिन के काम के बाद, रात-रात भर बैठकर वो कपड़े को सिलने लगी। फटे हिस्से जोड़े। जहाँ रिबन ढीला था, वहाँ नया लगाया। चांदी के सितारों को नए सिक्के से चमकाया।
एक हफ़्ते बाद कपड़ा बिल्कुल नए जैसा लगने लगा।
आख़िरी दिन आया। सौतेली माँ और बहनों के लिए सिंड्रेला ने सब कुछ किया। बाल बनाए, कपड़े पहनाए, गहने सजाए, इत्र लगाया।
शाम होते-होते उसने अपना भी कपड़ा पहना। बाल बनाए। और दर्पण के सामने खड़ी हो गई।
आज सिंड्रेला नहीं — आज एला नज़र आ रही थी। माँ की एला।
वो धीरे-धीरे नीचे उतरी। उसकी सौतेली बहनें और माँ बैठी हुई गाड़ी के लिए तैयार थीं।
उसे देखकर तीनों चुप हो गईं।
सुहाना की आँखें जल उठीं। "ये कपड़ा! ये तो... मैंने अपनी अलमारी में रखा था!"
"ये मेरा रिबन है!" अनिता ने झपट्टा मारा।
"ये मेरा सितारा है!"
दोनों ने सिंड्रेला पर हमला कर दिया। उसके कपड़े को नोच डाला। रिबन तोड़ डाला। सितारे ज़मीन पर बिखर गए।
एक मिनट में वो सुंदर कपड़ा फटा-चिथड़ा लग रहा था।
सौतेली माँ ने ठंडी आवाज़ में कहा —
"देख सिंड्रेला, अब तेरे पास कोई ढंग का कपड़ा नहीं। तू नहीं जा सकती। हम जा रहे हैं।"
तीनों गाड़ी में बैठीं। गाड़ी निकल गई।
सिंड्रेला धीरे-धीरे पीछे के बाग़ में गई। एक पुराने पेड़ के पास बैठ गई। उसके चेहरे पर आँसू बहने लगे। पहली बार। पहली बार पूरे दिल से।
"माँ, मैंने हिम्मत रखी। मैंने दया रखी। मैंने सबका भला सोचा। पर माँ, मेरा दिल अब टूट रहा है।"
उसकी आँखें बंद हो गईं। आँसू टपकते रहे।
तभी अचानक — एक नर्म-सी रोशनी बाग़ में फैलने लगी।
एक बहुत ही प्यारी-सी आवाज़ आई —
"बेटी, आँखें खोल। मैं आ गई हूँ।"
सिंड्रेला ने आँखें खोलीं। और जो देखा — वो उसके पूरे जीवन में सबसे अनोखी चीज़ थी।
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