एक हँसती-खेलती लड़की की ज़िंदगी एक ही दिन में कैसे बदल जाती है, जब उसके अपने ही घर में अजनबी आ जाते हैं?
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे-से सुंदर देश में एक बहुत बड़ी हवेली थी। हवेली के चारों तरफ़ बाग-बगीचा। बाग में अमरूद, अनार, गुलाब और चमेली के फूल। पक्षी आते थे, गिलहरियाँ कूदती थीं, और तितलियाँ हर सुबह बाग में मेला लगाती थीं।
उस हवेली में रहता था एक दयालु व्यापारी, उसकी प्यारी पत्नी, और उनकी प्यारी-सी बेटी — जिसका नाम था एला। एला की आँखें नीली, बाल सुनहरे, और दिल किसी बच्चे जैसा साफ़।
एला की माँ ने उसे एक ही बात सिखाई थी — "बेटा, चाहे कुछ भी हो, हमेशा दया रखना। हमेशा हिम्मत रखना। और सब का भला सोचना।"
एला ने उस बात को अपने नन्हे दिल में गाँठ बाँधकर रख लिया।
पर एक दिन — जब एला बस सात साल की थी — उसकी माँ बहुत बीमार पड़ गईं। दवाई से भी ठीक नहीं हुईं। एक रात उन्होंने एला का हाथ पकड़ा। उसकी आँखों में देखा।
"बेटा, जो मैंने सिखाया — दया, हिम्मत, सबका भला — कभी मत भूलना।"
"नहीं भूलूँगी माँ।"
उस रात माँ हमेशा के लिए सो गईं।
कुछ साल बीते। एला बढ़ती गई। बाग में काम करती, घोड़ों से प्यार करती, चूज़ों को खाना देती। उसके पिता उसे बहुत प्यार करते थे, पर उन्हें एक बड़ी हवेली अकेले संभालना मुश्किल लगता था।
एक दिन उन्होंने एला को बुलाया।
"बेटा एला, तुम्हें एक बात बतानी है। मैं फिर से शादी करने जा रहा हूँ। एक भली औरत हैं। उनकी अपनी दो बेटियाँ भी हैं। तुम्हारी हम-उम्र। तुम तीनों मिलकर बहनों की तरह रहोगी, ठीक है?"
एला मुस्कुराई। "हाँ अब्बू। मुझे तो दो बहनें मिलेंगी! कितना मज़ा आएगा।"
शादी हुई। नई माँ हवेली में आ गईं। उनके साथ उनकी दो बेटियाँ भी — अनिता और सुहाना।
शुरू-शुरू में सब ठीक लगा। एला ने अपनी अलमारी से सुंदर कपड़े निकाले, और दोनों सौतेली बहनों को बाँट दिए।
"ये देखो, ये गुलाबी वाली तुम्हारे लिए। ये नीली वाली तुम्हारे लिए।"
दोनों बहनों ने मुँह बनाकर कपड़े ले लिए। पर सौतेली माँ ने एला को ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी आँखों में कुछ कड़ा-सा था।
कुछ ही महीने बीते थे। एला के पिता एक दूर देश व्यापार के लिए गए। पर रास्ते में उन्हें भी एक बीमारी ने जकड़ लिया। ख़बर आई — व्यापारी अब इस दुनिया में नहीं रहे।
एला ने रोते-रोते दिन काटे। हवेली में अब बस वो थी, और सौतेली माँ-बहनें।
उस दिन से सौतेली माँ का असली रंग सामने आया।
"एला, तुम्हें अब बड़े कमरे में सोने की ज़रूरत नहीं। मेरी बेटियाँ वहाँ रहेंगी।"
एला हैरान। "पर वो तो मेरी माँ का कमरा था अब्बू ने मुझे..."
"बहस मत करो। ऊपर अटारी में जाकर सो जाओ।"
एला ने धीरे से सिर हिलाया। उसने अपना थोड़ा-सा सामान बाँधा, और अटारी में चली गई। अटारी ठंडी थी। फ़र्श लकड़ी का। एक छोटी-सी खिड़की थी, जिससे चाँद दिखता था।
उस रात एला ने माँ की बात याद की। दया, हिम्मत, सबका भला। उसने आँसू पोंछे। और सोने की कोशिश की।
अगले दिन से सौतेली माँ ने उसके लिए एक लंबी सूची बनाई। चूल्हा जलाओ। बर्तन धोओ। फ़र्श साफ़ करो। बहनों के कपड़े धोओ। बहनों के बाल बनाओ। बाग की निराई करो। फिर खाना बनाओ। फिर बर्तन धोओ।
एला सुबह से रात तक काम करती। बाहर खेलने का तो वक़्त ही नहीं मिलता।
शाम को थककर वो चूल्हे के पास बैठ जाती। चूल्हे की राख उसके कपड़ों पर लग जाती। चेहरे पर भी।
एक दिन सुहाना — बड़ी सौतेली बहन — ने उसे राख में बैठा देखा। ज़ोर से हँसी।
"देखो माँ! ये तो पूरी राख-वाली हो गई। हम इसे क्या बुलाएँ?"
अनिता ने ताली बजाई। "इसे सिंड्रेला बुलाते हैं! राख-राख वाली!"
दोनों बहनें हँसती रहीं। माँ ने हाथ हिलाकर हाँ कर दी।
"हाँ हाँ, अब इसका नाम सिंड्रेला है। एला नहीं।"
उस दिन से एला का नाम मिटा दिया गया। सब उसे "सिंड्रेला" बुलाने लगे।
पर एला ने मन में कहा — "मैं चाहे जिस भी नाम से बुलाई जाऊँ, मेरी असली पहचान मेरी माँ की सिखाई बातों से है। दया, हिम्मत, सबका भला।"
उसने आँसू पोंछे। काम पर लग गई।
उसे अभी अंदाज़ा भी नहीं था कि बहुत जल्द — एक राजमहल से एक दावत का निमंत्रण आने वाला था। और उस दावत में पूरे देश की हर लड़की को बुलाया जाने वाला था।
सिंड्रेला भी? या फिर वो अटारी में ही बंद रहेगी?
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