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फूलों की डायन का बाग़

F
Funtel
12 ghante pehle

एक भली-सी डायन, एक मीठा-मीठा खाना, और गुलाब के फूल — जिन्होंने गौरी को एक भूली हुई याद दिलाई।

नदी के पार की दुनिया

गौरी की नाव बहती गई। शहर पीछे छूट गया। नदी के दोनों किनारे पहले बर्फ़ से भरे थे, फिर हरे होने लगे। जैसे-जैसे नाव आगे बढ़ी, मौसम बदलता गया।

एक दिन धूप आई। फिर हवा हल्की गर्म हुई। फिर पेड़ों पर पत्ते आ गए।

"अरे, यहाँ तो गर्मी है!"

गौरी ने अपने ठंडे हाथों को मला। शॉल थोड़ी ढीली की। उसके कपड़े अब तक ठंडे प्रदेश के थे।

आख़िर में नाव एक किनारे पर रुकी। एक छोटी-सी टूटी झोंपड़ी सामने थी। झोंपड़ी के बाहर एक बहुत बड़ा बाग़। फूलों से भरा। हर तरह के फूल — गुलाब, गेंदा, चमेली, सूरजमुखी, और अनगिनत।

गौरी ने नाव से उतरी। बाग़ में चलने लगी।

एक भली-सी बूढ़ी

तभी एक बूढ़ी औरत झोंपड़ी से बाहर आई। उसके बाल लंबे और सफ़ेद। उसकी आँखें बादामी, मीठी। उसकी पोशाक रंगीन।

"बेटी! तू कौन है? कहाँ से आई?"

"माई, मेरा नाम गौरी है। मैं अपने एक दोस्त को ढूँढ रही हूँ। वो खो गया है। शायद बर्फ़ की रानी ले गई है उसे।"

बूढ़ी ने उसे देखा। फिर मुस्कुराई।

"बेटी, अंदर आ। पहले तो खाना खा। फिर सोएगी। फिर बात करेंगे।"

गौरी थकी हुई थी। उसका पेट भी बहुत भूखा था। वो अंदर गई।

बूढ़ी ने उसे बहुत स्वादिष्ट खाना खिलाया। मीठी चेरी, ताज़ी रोटी, गरम दूध।

"बेटी, तू बहुत सुंदर है। तेरे बाल कितने लंबे, घुंघराले।"

"दादीमाँ कहती हैं — मेरे बाल मेरी असली माँ जैसे हैं।"

"बेटी, अगर तू मेरे साथ रहे — तो मैं तुझे अपनी बेटी की तरह पालूँगी। मेरे पास और कोई नहीं है। ये बाग़, ये झोंपड़ी, सब तेरी।"

गौरी मुस्कुराई। पर सिर हिलाया।

"माई, धन्यवाद। पर मुझे जाना है। मेरे कुणाल का इंतज़ार है।"

बूढ़ी ने हाथ हिलाया।

"बेटी, बस आज की रात रुक जा। कल चलिएगा।"

गौरी ने हाँ कह दी।

भूली हुई याद

बूढ़ी ने एक छोटी-सी कंघी निकाली। बहुत सुंदर — लकड़ी पर सोने का काम।

"बेटी, ज़रा बैठ। मैं तेरे बाल बनाऊँ।"

उसने गौरी के बाल बनाने शुरू किए। पर ये साधारण कंघी नहीं थी। ये जादुई थी।

हर बार जब बूढ़ी बाल बनाती, तो गौरी की एक याद हल्की होती जाती। पहले उसकी दादीमाँ की याद। फिर उसकी गली की याद। फिर उसके घर की याद।

आख़िर में बूढ़ी ने मन में सोचा — "बस एक और बाल बनाऊँगी। और इसका कुणाल भी भूल जाएगा।"

पर तभी — खिड़की के बाहर — एक हवा का झोंका आया।

उस हवा ने एक छोटा-सा गुलाब का पौधा हिलाया। गुलाब का एक फूल — खिड़की के अंदर तक देखने लगा।

गौरी ने गुलाब देखा। उसकी लाल पंखुड़ियाँ। उसकी मीठी ख़ुशबू।

एक झटका उसके मन में।

"गुलाब! कुणाल! मेरे बाग़! मेरी खिड़की!"

एक के बाद एक — सब याद आ गई। दादीमाँ, गली, बाग़, और सबसे ज़रूरी — कुणाल।

उसने झटपट कुर्सी छोड़ी।

"माई! आपने मुझे फँसाया था!"

बूढ़ी का चेहरा बदला। उसकी मीठी आँखें अब झुर्रीदार लग रही थीं।

"बेटी, मैंने तुझे प्यार से रखा है। मेरे साथ रह।"

"नहीं! मेरा कुणाल मेरा इंतज़ार कर रहा है!"

गौरी ने अपना थैला उठाया। दरवाज़े की तरफ़ भागी।

बाग़ से भागते हुए

गौरी बाग़ से बाहर निकल आई। पर अब उसे एहसास हुआ — अब तक कितनी देर बाग़ में बीत गई थी। ये बूढ़ी का जादू था कि बाग़ हमेशा गर्मी में रहता था। पर उसका शहर अब और भी ठंडा हो चुका होगा।

वो दौड़ी, दौड़ी, दौड़ी।

आख़िर में जब वो दूर निकल आई — तो उसने पीछे मुड़कर देखा। बूढ़ी की झोंपड़ी अब बहुत छोटी दिख रही थी। बाग़ अब भी हरा था।

गौरी ने अपने पैर देखे। उसके पैर अब बहुत नंगे थे। वो लाल जूतियाँ नदी में बही थीं।

उसके पैरों में काँटे चुभ रहे थे।

पर वो रुकी नहीं।

एक उत्तर की दिशा

गौरी आगे बढ़ती रही। एक दिन, दो दिन, तीन दिन।

एक दिन उसने एक बूढ़े गाँव वाले से पूछा —

"बाबा, क्या आपने एक छोटे लड़के को देखा है? उसका नाम कुणाल है।"

"नहीं बेटी। यहाँ कोई नया लड़का नहीं आया।"

"फिर बर्फ़ की रानी कहाँ रहती हैं? कोई जानता है?"

बूढ़े गाँव वाले ने सिर खुजाया।

"बेटी, बर्फ़ की रानी? वो तो बहुत उत्तर में रहती हैं। बहुत-बहुत उत्तर। जहाँ साल भर बर्फ़ रहती है। हम जैसे आम लोग वहाँ नहीं जा सकते।"

"मुझे जाना है।"

बूढ़े ने सिर हिलाया।

"बेटी, उत्तर की राह बहुत कठिन है। पहले एक बहुत बड़ा जंगल आता है। जंगल में डाकू रहते हैं। फिर एक बहुत बड़ा रेगिस्तान। फिर बर्फ़ का देश।"

"मुझे जाना है।"

बूढ़े ने उसे एक हाथ में रोटी दी, दूसरे में पानी की एक छागल।

"भगवान तेरी रक्षा करे, बेटी।"

जंगल के डाकू

गौरी ने उत्तर की दिशा में चलना शुरू किया। तीन दिन बाद वो एक बहुत बड़े जंगल में घुसी।

जंगल का नाम सुनते ही लोग डर जाते थे। पेड़ ऊँचे, पत्ते घने। दिन में भी रात जैसा अंधेरा।

गौरी ने अंदर कदम रखा। सावधानी से चलने लगी।

तभी — चारों तरफ़ से आवाज़ें।

"पकड़ो! एक छोटी लड़की! अकेली!"

दर्जन भर डाकू पेड़ों के पीछे से निकल आए। काले कपड़े, तेज़ चाक़ू, बड़े-बड़े डंडे।

उन्होंने गौरी को घेर लिया।

"लड़की के पास कुछ कीमती होगा। देखो जल्दी।"

एक डाकू ने उसका थैला झपटा। पर उसमें बस सूखी रोटी और शॉल थी।

"कुछ नहीं! बेकार!"

दूसरे ने अपना चाक़ू निकाला।

"तो इसे ख़त्म कर दो। फालतू भीड़।"

गौरी ने आँखें बंद कीं। मन में दादीमाँ का चेहरा याद किया।

तभी — डाकुओं के बीच से एक तेज़ आवाज़ आई।

"रुको!"

एक छोटी-सी, नौ-दस साल की लड़की भीड़ को चीरती हुई आगे आई। उसके बाल उलझे, कपड़े फटे, पर आँखों में आग।

"इसे मत मारो। ये मेरी होगी।"

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