दो खिड़कियों के बीच एक छोटा-सा बाग़, और दो छोटे-से दोस्त — जिनकी हँसी से पूरी गली रौशन रहती थी।
बहुत पुरानी बात है। एक ठंडे देश के एक छोटे-से शहर में एक तंग गली थी। उस गली में दो पुराने पत्थर के घर एक-दूसरे के सामने थे। दोनों घरों की खिड़कियाँ इतनी पास, कि एक से दूसरे तक हाथ बढ़ाकर पहुँचा जा सके।
एक घर में रहता था एक छोटा-सा लड़का — कुणाल। दूसरे घर में रहती थी एक नन्ही-सी लड़की — गौरी। दोनों की उम्र दस-ग्यारह साल। दोनों एक ही दिन पैदा हुए थे, इसलिए माँ-पिता ने उन्हें भाई-बहन की तरह पाला।
दोनों के बीच की दो खिड़कियों के बीच एक छोटी-सी जगह थी। वहाँ कुणाल की दादीमाँ ने एक पुराने तसले में मिट्टी डालकर एक छोटा-सा बाग़ बनाया था।
उस बाग़ में दो गुलाब के पौधे थे। एक कुणाल का, एक गौरी का। दोनों गर्मियों में फूलों से भर जाते। दोनों खिड़कियाँ खोलकर वो फूलों के ऊपर हाथ बढ़ाकर एक-दूसरे को छू सकते।
हर रात दादीमाँ दोनों को एक साथ कहानी सुनाती। कुणाल अपनी खिड़की पर बैठता। गौरी अपनी पर। दादीमाँ बीच में बैठकर बोलती।
एक रात — सर्दी की रात थी, खिड़की के बाहर बर्फ़ गिर रही थी — दादीमाँ ने एक नई कहानी सुनाई।
"बच्चो, सुनो। दूर बहुत दूर — बर्फ़ के एक देश में — एक रानी रहती है। उसका नाम है स्नो क्वीन। उसके बाल बर्फ़ जैसे सफ़ेद। उसकी त्वचा बर्फ़ जैसी ठंडी। उसकी आँखें ऐसी कि कोई उन्हें देखे, तो जम जाए।"
"वो हर सर्दी में अपनी बर्फ़ की गाड़ी में निकलती है। पूरे आसमान में उड़ती है। उसकी एक छोटी-सी फूँक से सारा शहर बर्फ़ से ढक जाता है।"
"दादी, फिर वो किसी को ले जाती है क्या?" कुणाल ने पूछा।
"कभी-कभी, बेटा। वो उन्हीं बच्चों को ले जाती है, जिनके मन में दया कम और गुस्सा ज़्यादा होता है। उन्हें बर्फ़ के महल में अपने पास रखती है।"
"पर मैं तो उसे आँख दिखा दूँगा!" कुणाल ने मुठ्ठी बनाकर कहा।
दादीमाँ हँसी।
"बेटा, छोटी मुठ्ठी से बर्फ़ की रानी नहीं डरती।"
गौरी की आँखों में डर था। उसने कुणाल का हाथ अपनी खिड़की से पकड़ा।
"कुणाल, अगर वो तुझे ले गई — तो मैं अकेली कैसे रहूँगी?"
"डर मत गौरी। मैं कभी तुझे छोड़कर नहीं जाऊँगा।"
दादीमाँ ने दोनों के सिर पर हाथ फेरा।
दादीमाँ नहीं जानती थी — पर बहुत दूर, उसी रात, एक भयानक चीज़ हुई।
आसमान के बादलों के ऊपर एक बुरा जादूगर रहता था। उसने एक बहुत बड़ा जादुई आईना बनाया था। पर ये आम आईना नहीं था। इसकी ख़ासियत थी — ये दुनिया की हर अच्छी चीज़ को बुरी, और हर सुंदर चीज़ को बदसूरत दिखाता था।
एक भले आदमी आईने में देखता, तो वो खूँखार दिखता। एक प्यारी माँ देखती, तो वो दुष्ट दिखती। एक सुंदर बाग़ देखता, तो वो उजड़ा कब्रिस्तान दिखता।
उस जादूगर को इस आईने पर बहुत गर्व था। एक रात उसने अपने शिष्यों को कहा —
"चलो, इस आईने को हम स्वर्ग तक ले चलें। भगवान को भी बुरी सूरत में दिखाएँगे।"
शिष्य आईने को लेकर बहुत ऊँचा उड़े। पर बादलों से ऊपर — आईना उनके हाथ से छूट गया।
आईना नीचे गिरा। ज़मीन पर लगते ही — एक भयानक धमाका। आईना करोड़ों छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट गया।
एक टुकड़ा रेत के दाने जितना छोटा। पर हर टुकड़े में पूरे आईने का जादू बचा हुआ। हर टुकड़ा हवा में उड़ने लगा।
हफ़्ते बीते। आईने के टुकड़े पूरी दुनिया में फैल गए। कोई किसी की आँख में, कोई किसी के दिल में, कोई किसी के बाल में जा बैठा।
एक सुबह — कुणाल और गौरी अपने बाग़ में खेल रहे थे। हवा हल्की चल रही थी।
तभी कुणाल ने अपनी आँख पकड़ी।
"आह!"
"क्या हुआ?" गौरी ने पूछा।
"कुछ मेरी आँख में चला गया। कोई धूल का दाना।"
गौरी ने झटपट उसकी आँख देखी। पर कुछ नहीं दिखा।
"शायद निकल गया।"
"हाँ, अब ठीक है।"
पर कुणाल को नहीं पता था — वो "धूल का दाना" आम धूल नहीं था। ये जादुई आईने का एक टुकड़ा था। और वो टुकड़ा अब उसकी आँख में था।
दूसरा टुकड़ा — उसी पल — उसके दिल में जा बैठा।
उसी शाम कुणाल बदलने लगा।
गौरी ने एक नया गुलाब तोड़ा। "देख कुणाल! कितना सुंदर है!"
कुणाल ने गुलाब देखा। उसकी आँखों में पहले प्यार आता। पर अब — आईने के टुकड़े के कारण — उसे वो गुलाब बदसूरत लगा।
"ये गुलाब बेकार है। पंखुड़ियाँ टूटी हुईं। काँटे ज़्यादा हैं।"
उसने गुलाब फेंक दिया।
गौरी हैरान हो गई।
"कुणाल, क्या हुआ तुझे?"
कुणाल ने अपनी ख़ुद की दादी को देखा। पहले वो दादी को सबसे प्यारी लगती थी। पर अब उसकी आँख ने बताया — दादी की त्वचा पर झुर्रियाँ। उसका चेहरा कितना बूढ़ा। कितना बेकार।
"दादीमाँ, तुम कितनी झुर्रीदार हो। मुझे देखकर अच्छा नहीं लगता।"
दादी की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने अपना सिर झुका लिया।
गौरी ने कुणाल की तरफ़ देखा। उसका दोस्त — उसका भाई जैसा कुणाल — आज पहली बार बेरुख़ी से बोल रहा था।
"कुणाल, तू माँ से माफ़ी माँग।"
"क्यों? मैं सच कह रहा हूँ।"
उस रात गौरी अपने बिस्तर पर रोई।
"भगवान, मेरा कुणाल कहाँ चला गया? कौन है ये जो उसकी जगह आ गया है?"
उसे नहीं पता था — कि बस ये शुरुआत है। आगे और बहुत कुछ होने वाला था।
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