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बर्फ़ की रानी की चाँदी की गाड़ी

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Funtel
12 ghante pehle

एक सर्द शाम, एक रहस्यमयी सफ़ेद रानी, और एक छोटी-सी हाँ — जिसने कुणाल को हमेशा के लिए घर से दूर कर दिया।

दिन-ब-दिन बदलते कुणाल

कुछ हफ़्ते बीते। कुणाल पूरी तरह बदल गया। वो अब हर बात में नुक़्स निकालता।

"दादीमाँ का खाना बेस्वाद है।"

"गौरी की हँसी बहुत ज़ोर से है।"

"बाग़ के फूल बेकार हैं।"

"पंछी उल्टा गाते हैं।"

हर बात पर वो ताना मारता। हर बात पर वो हँसता — पर उसकी हँसी ठंडी होती।

उसका दिल पत्थर होता जा रहा था। आईने का टुकड़ा अंदर बढ़ता जा रहा था।

एक दिन वो अपनी छोटी पतंग लेकर बाहर गया। बहुत बड़े बच्चों के साथ खेलने। वो बच्चे शहर के चौराहे पर बर्फ़ की स्लेज पर खेलते थे।

गौरी ने उसके पीछे जाने की कोशिश की। पर कुणाल ने उसे रोका।

"तू नहीं आएगी। ये बड़े लड़कों का खेल है। तू छोटी है।"

"पर कुणाल, हम तो हमेशा साथ खेलते हैं।"

"अब नहीं। मैं बड़ा हो गया हूँ। तू अपनी गुड़ियों के साथ खेल।"

गौरी की आँखों में आँसू आए। उसने बहुत कोशिश की — पर कुणाल नहीं रुका। वो अकेला निकल गया।

एक चाँदी की गाड़ी

शहर के चौराहे पर बच्चे एक बड़े-से बर्फ़ के ढलान पर अपनी स्लेज दौड़ा रहे थे। तेज़ हँसी, तेज़ चीख़ें। कुणाल ने अपनी छोटी-सी स्लेज ले ली। उसमें बैठा।

तभी — दूर से एक सफ़ेद चमक दिखी।

एक बहुत बड़ी, चमचमाती चाँदी की गाड़ी आ रही थी। सफ़ेद घोड़े उसे खींच रहे थे। पर ये साधारण घोड़े नहीं थे। इनकी अयाल बर्फ़ जैसी सफ़ेद, उनकी आँखें हल्की नीली, और उनकी टापों से शोर नहीं होता था।

गाड़ी के अंदर एक स्त्री बैठी थीं। उनकी पोशाक पूरी सफ़ेद, बर्फ़ के क्रिस्टल जड़े हुए। उनके बाल चांदी के तार जैसे। आँखें — आसमान से भी ठंडी।

स्त्री ने अपनी गाड़ी के पास से कुणाल की स्लेज को धीरे से रस्सी से बाँधा। और हल्के से कहा —

"बेटा, चल मेरे साथ। थोड़ी देर के लिए।"

कुणाल ने रानी की आँखों में देखा। उन आँखों में कुछ ऐसा था कि उसका मन भर गया।

"हाँ। चलो।"

उसकी एक छोटी-सी "हाँ" — और चाँदी की गाड़ी आगे बढ़ी। उसके पीछे कुणाल की स्लेज भी।

आसमान में उड़ती गाड़ी

घोड़े दौड़ने लगे। पहले शहर के चौराहे से बाहर, फिर शहर के बाहर, फिर पहाड़ों के बाहर।

तभी — एक बहुत अजीब बात हुई। घोड़ों के पैर ज़मीन से ऊपर उठने लगे। चाँदी की गाड़ी हवा में उड़ने लगी।

नीचे शहर छूट गया। पहाड़ छूट गए। बादलों के ऊपर निकल गए।

कुणाल को पहले डर लगा। फिर उसने रानी का चेहरा देखा।

"देवी, आप कौन हैं?"

स्त्री ने धीरे से सिर घुमाया। उसके होंठ हल्के नीले। उसने कुणाल के माथे को छुआ। एक बर्फ़ की ठंड कुणाल के पूरे शरीर में फैल गई।

"मेरा नाम है — स्नो क्वीन। बर्फ़ की रानी।"

कुणाल को पहले याद आना चाहिए था। दादी ने तो उसे कहानी सुनाई थी। पर उसके दिल में आईने का टुकड़ा था। उसका दिमाग़ उन कहानियों को भूल चुका था।

"आप मुझे कहाँ ले जा रही हैं?"

"बहुत दूर। मेरे बर्फ़ के महल। मेरे पास एक काम है। तू बहुत समझदार लड़का है। तू मेरी मदद करेगा।"

"पर मेरी दादीमाँ? मेरी गौरी?"

स्त्री मुस्कुराईं। उन्होंने अपनी सर्द उंगली कुणाल के होंठों पर रखी।

"उन्हें भूल जा, बेटा। उन्हें भूल जाना ही अच्छा है।"

उन्होंने कुणाल का माथा फिर से चूमा। एक और ठंडी लहर। और एक झटके में — कुणाल अपनी दादीमाँ को भूल गया। अपनी गली को भूल गया। अपनी गौरी को भूल गया।

उसके मन में बस एक चीज़ रह गई — स्नो क्वीन।

शहर में सूनापन

उधर शहर के चौराहे पर बच्चे शाम को घर लौटने लगे। पर कुणाल नहीं लौटा। एक दूसरे लड़के ने बताया —

"मैंने देखा। एक चाँदी की गाड़ी आई थी। वो उसमें बैठ गया। उसकी स्लेज भी रस्सी से बंधी थी। पर वो गाड़ी हवा में उड़ गई।"

लोगों को यक़ीन नहीं आया। पर सच ये था — कुणाल ग़ायब था।

दादीमाँ ने अपने पोते का नाम पुकारा। शहर के हर कोने में ढूँढा। पर कुछ नहीं मिला।

गौरी अपनी खिड़की पर बैठी, बाग़ में देखती रही। पूरी रात।

तीन दिन बाद लोगों ने कह दिया — "बच्चा कहीं बर्फ़ में फँस गया होगा। शायद डूब गया, शायद किसी जानवर ने खा लिया। वो अब इस दुनिया में नहीं है।"

गौरी ने ये बात नहीं मानी।

"नहीं! मेरा कुणाल मरा नहीं है। वो ज़िंदा है। मुझे पता है।"

दादीमाँ ने उसे सीने से लगाया।

"बेटी, तेरी हिम्मत बहुत है। पर वो कहाँ होगा, हम कैसे ढूँढेंगे?"

गौरी की हिम्मत

उसी रात गौरी अपनी खिड़की पर बैठी थी। बाहर बर्फ़ बहुत थी। दूर आसमान में चाँद चमक रहा था।

उसने मन में पक्का कर लिया।

"मैं ख़ुद उसे ढूँढने जाऊँगी। चाहे जितना भी दूर हो, चाहे जितना भी ख़तरनाक। मैं अपने कुणाल को वापस लाऊँगी।"

दादीमाँ सोई हुई थीं। गौरी ने अपने कुछ पुराने कपड़े बाँधे। एक रोटी अपने थैले में रखी। एक छोटा-सा शॉल। अपनी सबसे प्यारी लाल जूतियाँ।

दरवाज़े के पास उसने सोचा — क्या मैं दादीमाँ को बताऊँ?

नहीं। दादीमाँ रोकेंगी। मैं चुपचाप जाऊँगी।

गौरी ने एक छोटी-सी चिट्ठी लिखी —

"दादीमाँ, मैं अपने कुणाल को ढूँढने जा रही हूँ। आप घबराइए मत। मैं उसे लेकर ही वापस आऊँगी। आपकी, गौरी।"

उसने चिट्ठी अपने तकिए पर रखी।

दरवाज़ा खोला। बाहर ठंड बहुत थी। पर उसके दिल में आग जल रही थी।

एक नदी पास ही बहती थी। गौरी ने सुना था — नदियाँ हर जगह जाती हैं। शायद इस नदी ने कुणाल को कहीं देखा हो।

उसने अपनी प्यारी लाल जूतियाँ उतारीं। नदी के किनारे रखीं।

"नदी, अगर तू मुझे मेरे कुणाल तक ले जाएगी — तो ये जूतियाँ मैं तुझे भेंट करूँगी।"

उसने जूतियाँ नदी में बहा दीं।

नदी ने जूतियाँ एक हल्के से झाग में लपेटीं। फिर पास खड़ी एक छोटी-सी नाव की तरफ़ लेकर गईं। नाव अपने आप किनारे से छूटने लगी।

गौरी ने झटपट उस नाव में बैठने की कोशिश की। उसका पैर फिसला — और वो नाव के अंदर गिर पड़ी।

नाव बहने लगी। नदी की धारा में।

एक लंबी, अजीब यात्रा शुरू हो गई।

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