एक बंद कमरा, एक मुस्कुराती बूढ़ी औरत, और एक चमकता हुआ चकरी का तकला — जिसने राजकुमारी को अपनी ओर खींच लिया।
अरोरा का सोलहवाँ जन्मदिन आ गया। राजमहल में हर तरफ़ ख़ुशी थी। पर वो ख़ुशी असली नहीं थी। राजा-रानी मुस्कुरा रहे थे, पर उनके मन में डर था।
राजमहल के हर कमरे में पहरा था। हर सीढ़ी पर सिपाही। हर खिड़की पर पंजे ठोके हुए।
अरोरा ने नई पोशाक पहनी — हल्की पीली, सुनहरे फूलों वाली। उसने माँ के पाँव छुए।
"माँ, मेरा जन्मदिन मुबारक करिए।"
रानी ने उसे गले लगाया। आँखों से आँसू बहने लगे। पर उन्होंने जल्दी से छुपा लिए।
"मेरी बेटी, तुझे आज सब कुछ मिले — दया, ख़ुशी, हिम्मत, अच्छी सेहत।"
"और कुछ नहीं चाहिए?" अरोरा हँसी।
"बस यही कि तू हमेशा मेरे पास रहे।"
अरोरा कुछ देर रानी की गोद में बैठी। फिर उठी।
"माँ, मैं ज़रा बाग़ में जाऊँ। एक चक्कर लगाकर आती हूँ।"
"बेटा, आज नहीं। आज पूरा दिन मेरे पास रह।"
"माँ, मैं बस बाग़ तक जाऊँगी। फिर आ जाऊँगी।"
रानी ने मन के ख़िलाफ़ हाँ कर दी। उन्होंने सिपाहियों को इशारा किया — बाग़ तक तो ठीक है, पर उससे आगे नहीं।
अरोरा बाग़ में निकली। सिपाही पीछे-पीछे। पर अरोरा के मन में बुर्ज की बात बैठी हुई थी।
उसने सिपाहियों को धोखा दिया। बाग़ के एक कोने में एक पुराना झुरमुट था। वो उसके पीछे छुप गई। सिपाहियों ने उसे ढूँढना शुरू कर दिया।
उसी पल अरोरा एक छोटे-से दरवाज़े से अंदर निकल गई। ये दरवाज़ा राजमहल के पीछे की एक भूली हुई सीढ़ी पर खुलता था।
सीढ़ी ऊपर की ओर जाती थी। हर पत्थर पर धूल। मकड़ी के जाले। दीवारें सीली हुईं।
अरोरा ने एक हाथ से अपनी साड़ी का छोर पकड़ा, और दूसरे हाथ से दीवार का सहारा लेकर ऊपर चढ़ने लगी।
एक मंज़िल, दो मंज़िल, तीन मंज़िल। हर मंज़िल पर वो थोड़ा रुकती। साँस लेती। आगे बढ़ती।
आख़िर में वो बुर्ज के सबसे ऊपर पहुँची। वहाँ एक पुराना लकड़ी का दरवाज़ा था। उसे एक हल्के झटके से खोला।
अंदर एक गोल-सा कमरा था। एक छोटी-सी खिड़की, जिससे धूप अंदर आ रही थी। फ़र्श पर बस एक पुरानी कुर्सी, और कुर्सी पर बैठी थी एक बूढ़ी औरत।
उस बूढ़ी के बाल सफ़ेद। पीठ झुकी हुई। हाथ में एक छोटी-सी अजीब चीज़।
उसके सामने एक लकड़ी का बना यंत्र था। उसमें एक चकरी घूम रही थी। और उस चकरी पर सूत बन रहा था।
अरोरा अंदर आई।
"नमस्ते माई। आप कौन हैं?"
बूढ़ी औरत मुस्कुराई। उसके मुँह में दाँत ज़्यादा नहीं थे, पर मुस्कान बहुत प्यारी थी।
"बेटी, मैं इस राजमहल की एक पुरानी सेविका हूँ। बहुत साल से इसी बुर्ज में रहती हूँ। ये देख — मैं सूत कात रही हूँ।"
अरोरा ने पास जाकर देखा। उसके पूरे जीवन में पहली बार उसने ये यंत्र देखा था।
"ये क्या है माई?"
"बेटी, ये चकरी है। ऊन के टुकड़े को इसमें डालते हैं। ये चकरी घूमती है, और एक नन्हा-सा तकला उसे तार में बदल देता है।"
"तकला?"
"हाँ, ये देख। ये नन्हा-सा सुई जैसा कांटा।"
बूढ़ी ने अपना हाथ बढ़ाकर एक छोटा-सा चांदी जैसा सूई दिखाया।
अरोरा की आँखों में कौतूहल चमका। उसने हाथ बढ़ाकर तकले को छुआ।
"ये कितनी अजीब चीज़ है माई! इतनी छोटी, और इससे इतना बड़ा कपड़ा बनता है!"
"हाँ बेटी, अगर तू चाहे, तो ज़रा घुमा कर देख।"
अरोरा को कुछ अजीब-सा महसूस होने लगा। पर उसने अपनी उंगली बढ़ाई — चकरी के तकले की तरफ़।
तकला बहुत तेज़ घूम रहा था।
उसकी उंगली ने तकले को बस हल्के से छुआ — और एक छोटी-सी छिटक से उसकी उंगली में सूई जा घुसी। एक बूँद ख़ून निकला।
"आह!"
उसने अपनी उंगली खींची। पर अगले ही पल उसे एक भारीपन-सा महसूस हुआ। आँखें थकने लगीं। पैर लड़खड़ाने लगे।
उसने बूढ़ी की तरफ़ देखा। और तब उसे एहसास हुआ — वो "बूढ़ी सेविका" अब बूढ़ी नहीं लग रही थी। उसका चेहरा बदल रहा था। उसके पीछे एक काला धुआँ उठ रहा था।
उस "बूढ़ी" के होंठों पर एक भयानक मुस्कान थी।
"राजकुमारी अरोरा! मैं कारिंदा हूँ। सोलह साल बाद मैं अपना बदला आख़िर ले ली।"
अरोरा ने आँखें बंद की। उसे माँ-पिता का चेहरा याद आया। बस वो नीचे ज़मीन पर गिरते-गिरते सोचती रही —
"माँ, मुझे माफ़ कर देना। मैं आपकी बात नहीं मानी। मुझे बुर्ज पर नहीं आना चाहिए था।"
उसकी आँखें बंद हो गईं। उसका शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा।
पर वो मरी नहीं थी। वो बस सो गई थी। एक बहुत लंबी, बहुत गहरी नींद।
बुर्ज के बाहर — पूरे राजमहल में — एक अजीब-सी हवा चलने लगी। सातवीं परी, जो बहुत दूर से ये सब देख रही थीं, अपनी छड़ी हिलाने लगीं।
"मेरा वादा सच रहेगा। राजकुमारी अकेली नहीं सोएगी। पूरा राजमहल साथ सोएगा।"
एक पल में पूरे राजमहल में नींद फैल गई। राजा सिंहासन पर ही सो गए। रानी अपनी कुर्सी पर। रसोइए चूल्हे के पास। पहरेदार खड़े-खड़े। घोड़े अपनी अस्तबल में। बाग़ के पंछी पेड़ों पर।
एक भी आवाज़ नहीं बची। बस एक गहरी, मीठी ख़ामोशी।
और राजमहल के चारों तरफ़ धीरे-धीरे — काँटों का एक घना जंगल उगने लगा।
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