एक श्राप, जिसने पूरे राजमहल का दिल चीर दिया। और एक नन्ही परी, जिसने उस श्राप को थोड़ा सा हल्का कर दिया।
बुरी परी कारिंदा ने अपनी काली छड़ी राजकुमारी अरोरा की तरफ़ हिलाई। उसकी आवाज़ पूरे राजमहल में गूँज उठी।
"सुनो, राजा-रानी! जैसे तुम मुझे भूल गए, वैसे ही ये नन्ही राजकुमारी एक दिन हम सब को भूल जाएगी। मैं इसे श्राप देती हूँ —
जिस दिन ये राजकुमारी सोलह साल की होगी, उस दिन ये एक तकले से अपनी उंगली छेदेगी। और छेदते ही — मर जाएगी।"
"मर जाएगी!"
राजा-रानी ज़मीन पर गिर पड़े। मेहमानों ने एक साथ चीख निकाली। राजमहल के दीप-दर-दीप बुझ गए।
कारिंदा ज़ोर से हँसी। उसकी हँसी पत्थर पर गिरते लोहे जैसी थी।
"मेरा श्राप सच होगा। और कोई इसे रोक नहीं सकता।"
एक पल में वो काले धुएँ में बदलकर खिड़की से बाहर ओझल हो गई। पर पीछे रह गई — एक भारी ख़ामोशी।
राजमहल के एक कोने में सबसे छोटी, सातवीं परी, अब तक छुपी हुई खड़ी थी। उसने अपना आशीर्वाद देने का मौक़ा अब तक नहीं पाया था।
वो धीरे-धीरे आगे आई। उसकी पोशाक हल्की गुलाबी, उसकी आँखों में एक नर्म-सी रोशनी।
"राजा-रानी, रोइए मत। मैं अपना आशीर्वाद देने आई हूँ। मेरी ताक़त इतनी बड़ी नहीं कि मैं कारिंदा का श्राप पूरी तरह तोड़ सकूँ। पर इतना ज़रूर कर सकती हूँ कि उसे थोड़ा बदल दूँ।"
उसने अपनी छोटी-सी सोने की छड़ी राजकुमारी अरोरा के माथे पर रखी।
"राजकुमारी, अगर तुझे कभी तकले से उंगली छिद भी जाए — तो तू मरेगी नहीं। तू बस सौ साल की एक लंबी, गहरी नींद में सो जाएगी। और एक दिन कोई सच्चे प्यार वाला आएगा — और उसके एक चुम्बन से तू फिर से जाग जाएगी।"
परी ने रानी की तरफ़ देखा।
"और इस सौ साल की नींद में बस राजकुमारी ही नहीं — पूरा राजमहल, हर इंसान, हर चीज़, सब साथ सोएँगे। ताकि जब वो जागे, तो अपनों को अपने पास पाए।"
राजा-रानी ने रोते हुए परी के पाँव छुए।
"धन्य हो, माता। आपने हमारी बेटी को मौत से बचा लिया।"
नन्ही परी मुस्कुराई। फिर वो भी बाक़ी छह परियों के साथ ओझल हो गई।
उस रात राजा अपने दरबार में अकेले बैठे रहे। वो सोचते रहे — मेरी बेटी को बचाना है तो कैसे? तकले से कैसे बचाऊँ?
सुबह उन्होंने एक भारी आदेश निकाला। पूरा राज्य चौंक गया।
"महाराज विक्रमादित्य की आज्ञा है — आज से इस पूरे राज्य में सूत कातने का तकला बनाना, बेचना, या रखना मना है। हर तकला आज ही जला दिया जाए! जो भी इस आदेश का उल्लंघन करेगा, उसे कठोर दंड दिया जाएगा।"
सिपाही गाँव-गाँव गए। हर घर से तकला निकाला। बाज़ार के बीच में एक बड़ा-सा अलाव जलाया। हज़ारों तकले उसमें झोंक दिए गए।
लोग दुखी थे। पर राजा ने सबको ज़मीन-कपड़े-अनाज से मदद का वादा किया। ताकि किसी की रोज़ी न जाए।
राज्य से एक-एक तकला हटा दिया गया। हर सूत कातने वाली बूढ़ी औरत को नया काम दिया गया। राज्य में एक भी तकला नहीं बचा।
बस एक — पर उसके बारे में किसी को नहीं पता था।
साल बीतते गए। राजकुमारी अरोरा बड़ी होती गई। हर परी का वरदान सच निकला।
वो सुंदर थी — उसका चेहरा सूरज जैसा, उसके बाल लंबे, सुनहरे। वो समझदार थी — हर बात की गहराई में जाती। उसकी आवाज़ कोयल जैसी थी — जब वो गाती, तो बाग़ के पंछी भी चुप होकर सुनते।
वो दयालु थी। पर इस सब से ज़्यादा — वो ज़िंदादिल थी। हँसती, खेलती, दौड़ती। राजमहल का हर कमरा उसकी हँसी से भरा रहता।
राजा-रानी हर पल उसे देखते रहते। पर एक डर हमेशा उनके दिल में था। सोलहवाँ जन्मदिन। बस इस एक दिन का डर।
एक के बाद एक — पंद्रह जन्मदिन बीत गए। हर साल मेला, हर साल मिठाई, हर साल नाच।
अब सोलहवाँ जन्मदिन आने वाला था। राजा-रानी की चिंता और बढ़ गई। उन्होंने सोचा — इस बार जन्मदिन पर अरोरा को राजमहल से बाहर ही नहीं जाने देंगे। हर कमरे में पहरा बिठा देंगे।
राजकुमारी ने ये सब देखा। उसे अजीब लगा।
"माँ, इस बार ये सब पहरा क्यों? मैं तो हर रोज़ बाग़ में जाती हूँ।"
रानी ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"बस, बेटा, इस बार जन्मदिन ख़ास है। एक दिन पहरा रहेगा। अगले दिन से तू फिर आज़ाद।"
अरोरा ने सिर हिलाया। पर मन में सोचा — कुछ तो है, जो माँ मुझे नहीं बता रहीं।
उस रात अरोरा अपने बिस्तर पर लेटी। चाँद खिड़की से अंदर झाँक रहा था।
उसे महसूस हुआ — उसे राजमहल का एक हिस्सा बहुत साल से बंद रखा गया है। ऊपर का सबसे ऊँचा बुर्ज। माँ-पिताजी ने कभी उसे वहाँ नहीं जाने दिया।
अरोरा ने सोचा — कल मेरा जन्मदिन है। पहरा लगने से पहले मैं उस बुर्ज को देख ही लेती हूँ।
उसने आँखें बंद कीं। पर मन में एक बेचैनी थी।
उसे नहीं पता था कि वो बुर्ज ही उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा रहस्य था।
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