एक राज्य, जो बरसों से एक नन्ही-सी आवाज़ की राह देख रहा था। और जब वो आवाज़ आई, तो पूरे देश में दीप जलने लगे।
बहुत पुरानी बात है। दूर एक हरे-भरे राज्य में एक बहुत बड़ा राजमहल था। राजमहल के चारों तरफ़ पहाड़, नदियाँ, और घने जंगल। राज्य की प्रजा ख़ुश थी, खाना खूब था, बारिश समय पर होती थी, खेत भरे रहते थे।
राजा का नाम था महाराज विक्रमादित्य। वो दयालु थे, न्यायप्रिय थे, और हर रोज़ अपनी प्रजा की एक-एक फ़रियाद ख़ुद सुनते थे। रानी का नाम था महारानी सुषमा। वो उतनी ही सुंदर थीं, जितनी समझदार।
दोनों ने सब कुछ पाया था। राज्य, धन-दौलत, सम्मान। पर एक बात की कमी थी — संतान। बीस साल की शादी हो गई थी, और आँगन में अब तक किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी।
हर रोज़ रानी मंदिर जातीं। दीप जलातीं। प्रार्थना करतीं।
"भगवान, बस एक बच्चा। एक नन्हा-सा बच्चा। मैं उसे आँखों का तारा बनाकर रखूँगी।"
राजा भी उतने ही दुखी थे। पर वो रानी के सामने ज़्यादा दुख नहीं दिखाते। बस मुस्कुराते।
एक दिन रानी अपने बाग़ में बैठी थीं। बाग़ के बीच एक छोटी-सी नदी बहती थी। रानी पानी पर हाथ फेर रही थीं।
तभी पानी से एक नन्ही मेंढकी निकलकर ज़मीन पर आई। उसने रानी की तरफ़ देखा।
"रानी जी, आपकी हर रात की प्रार्थना मैंने सुनी है। आपका दुख मैं समझती हूँ। एक बात कहती हूँ — एक साल के अंदर आपके आँगन में एक नन्ही राजकुमारी आएगी। उसकी आँखें माँ जैसी, और मन पिता जैसा होगा।"
रानी चौंकीं। हाथ जोड़ने ही वाली थीं कि मेंढकी पानी में लौट गई।
रानी ने सोचा — शायद ये सिर्फ़ एक सपना था। पर मन में एक उम्मीद जम गई।
एक साल बीत गया। फिर एक दिन — सच में — रानी ने एक नन्ही, गुलाबी, मुस्कुराती हुई बच्ची को जन्म दिया।
उसकी आँखें माँ जैसी नीली। उसके बाल पिता जैसे काले। उसका नाम रखा गया — "राजकुमारी अरोरा।" अरोरा माने सुबह की पहली रोशनी।
राजा ख़ुशी से नाचने लगे। रानी की आँखों से आँसू बहने लगे — पर ये आँसू ख़ुशी के थे। पूरे राज्य में सात दिन का मेला सजा। दीप जले। ढोल बजे। बच्चों ने पटाखे जलाए।
राजा ने ऐलान किया —
"हमारी राजकुमारी के नामकरण पर हम राज्य की सारी सात भली परियों को बुलाएँगे! वो हमारी बेटी को आशीर्वाद देंगी।"
नामकरण के दिन राजमहल जगमगा उठा। रंग-बिरंगे फूलों की मालाएँ। सोने की थालियाँ। हर मेहमान के लिए ख़ास तोहफ़े।
राज्य की सात परियाँ — जो हर अच्छे काम पर अपना आशीर्वाद देती थीं — एक के बाद एक राजमहल आ गईं। उनकी पोशाक हल्की रोशनी से चमक रही थी। हर परी के पास अपनी छोटी-सी सोने की छड़ी।
राजा-रानी ने उनके चरण छुए। उनका स्वागत किया। बारी-बारी से उन्हें राजकुमारी अरोरा को आशीर्वाद देने के लिए बुलाया।
पहली परी पास आईं। बच्ची के माथे पर हाथ रखा।
"मैं तुझे सुंदरता का वरदान देती हूँ। तेरा चेहरा सूरज जैसा, और तेरा शरीर चाँद जैसा होगा।"
दूसरी परी आईं।
"मैं तुझे बुद्धि का वरदान देती हूँ। तू कभी ग़लत निर्णय नहीं लेगी।"
तीसरी परी ने कहा —
"मैं तुझे संगीत का वरदान देती हूँ। तेरी आवाज़ कोयल से भी मीठी होगी।"
चौथी ने दया का वरदान दिया। पाँचवीं ने हिम्मत का। छठी ने अच्छे स्वास्थ्य का।
अब बस एक परी बची थी — सबसे छोटी, सबसे प्यारी। पर वो अभी आगे आने ही वाली थी कि...
राजमहल की बड़ी खिड़कियाँ अचानक खुल गईं। एक तेज़, ठंडी हवा अंदर आई। मेहमानों के बाल हिल गए। दीप बुझने लगे।
दरवाज़े पर एक काला-सा परछाईं उभरी।
एक काले चोगे में, हाथ में टेढ़ी-सी काली छड़ी, चेहरे पर बूढ़ी और गुस्सैल झुर्रियाँ। आँखें लाल, नाख़ून लंबे।
ये थीं — आठवीं परी। एक बुरी परी, जिसका नाम था कारिंदा। वो बहुत साल से किसी से नहीं मिली थी। राज्य के लोग उसे भूल चुके थे। राजा ने उसका न्योता भी नहीं भेजा था।
और आज — वो ख़ुद आ गई थीं।
उसने राजा-रानी की तरफ़ देखा।
"मुझे न्योता नहीं भेजा? मुझे भूल गए?" उसकी आवाज़ पत्थर जैसी कठोर थी।
"हे माता! हमने... हमने जान-बूझकर नहीं... हमें लगा आप अब इस इलाक़े में नहीं रहतीं..."
"बस! अब चुप रहो।"
उसने अपनी टेढ़ी छड़ी ऊपर उठाई। उसकी नज़र नन्ही राजकुमारी पर रुक गई।
राजा-रानी काँप उठे।
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