गर्मी का मौसम था और एक टिड्डा पेड़ की छाँह में बैठकर मधुर गीत गा रहा था।
पास ही चींटियाँ अनाज के दाने लाती-ले जाती हुई व्यस्त थीं। टिड्डे ने एक चींटी को रोककर कहा, "अरे बहन, इतनी गर्मी में इतना परिश्रम क्यों? आ, थोड़ी देर मेरे साथ बैठकर गीत सुन।" चींटी ने सिर हिलाया, "हम सर्दियों के लिए अनाज जमा कर रही हैं। तुम भी कुछ इकट्ठा कर लो, समय कम है।"
टिड्डे ने हँसकर कहा, "अरे, अभी तो इतनी सारी हरी पत्तियाँ हैं, पेड़ों पर फल हैं। सर्दियों की चिंता बाद में करूँगा। तुम भी थोड़ा आनंद ले लो।" चींटी कुछ नहीं बोली और अपने काम में लग गई।
ऋतुएँ बदलती गईं। पतझड़ आया, पेड़ों के पत्ते झड़ गए। फिर सर्दी का प्रकोप शुरू हुआ। मैदानों पर बर्फ़ की चादर फैल गई। हरी पत्तियाँ कहीं नहीं दिखती थीं। फल तो दूर, सूखी डालियाँ ही बचीं।
टिड्डा भूख से तड़पने लगा। उसने आसपास खोजा — कहीं कुछ नहीं था। तभी उसने चींटियों के बिल को देखा। वहाँ चींटियाँ अपने जमा किए हुए अनाज को आराम से खा रही थीं और गाना भी गा रही थीं। टिड्डा झिझकते हुए पास गया और कहा, "बहन, मुझे भी थोड़ा अनाज दे दो। मैं भूखा मर रहा हूँ।"
चींटी ने कोमल परन्तु गंभीर स्वर में पूछा, "गर्मियों में तुम क्या कर रहे थे?" टिड्डे ने सिर झुकाकर कहा, "मैं गीत गा रहा था।" चींटी बोली, "तो अब नाच लो। हम जो जमा करती हैं, वह इसलिए कि तब हम गीत गा सकें जब बाक़ी सब रो रहे हों।"
टिड्डा रोते हुए बर्फ़ में बैठा रह गया, अपनी ग़लती पर पछताता हुआ।
इस कथा से शिक्षा यह है कि भविष्य के लिए जो आज परिश्रम और बचत नहीं करता, उसे कठिन समय में बहुत पछताना पड़ता है। आज की मेहनत ही कल का सहारा है।
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