पैसे के बारे में आपकी सारी राय आपके बचपन के घर से आई है। आपने उसे चुना नहीं था — वो आपको मिली थी, और आप आज भी उसी के हिसाब से फ़ैसले ले रहे हैं।
दो लोगों को एक ही सलाह दीजिए और देखिए क्या होता है।
पहला कहेगा — "बिल्कुल सही बात है।"
दूसरा कहेगा — "आपको पता नहीं, हमारे यहाँ ऐसा नहीं चलता।"
दोनों समझदार हैं। दोनों की नीयत ठीक है।
फ़र्क़ ये है कि दोनों ने पैसे को अलग-अलग तरीक़े से देखा है — और वो देखना बचपन में हुआ था, जब उन्हें पता भी नहीं था कि वो कुछ सीख रहे हैं।
आपके घर में पैसे के बारे में क्या कहा जाता था
ये लाइनें पढ़िए। देखिए कौन-सी जानी-पहचानी लगती है।
"पैसा पेड़ पर नहीं उगता।"
"हमारी हैसियत नहीं है।"
"जोड़कर रखो, बुरे वक़्त के लिए।"
"पैसा हाथ का मैल है।"
"बैंक में रखो, बाक़ी सब जुआ है।"
"ज़मीन कभी धोखा नहीं देती।"
"सोना ही असली है।"
"पैसे से रिश्ते ख़राब होते हैं।"
"अपनों की मदद करनी चाहिए, हिसाब नहीं देखना चाहिए।"
इनमें से हर एक किसी न किसी घर में सच थी।
और हर एक आज भी किसी न किसी के फ़ैसले चला रही है — बिना उसे पता चले।
ये राय क्यों बनी थी
यहाँ एक ज़रूरी बात है, और इससे बहुत ग़ुस्सा कम होता है।
आपके माँ-बाप ने वो राय बेवक़ूफ़ी में नहीं बनाई थी। वो उनके तजुर्बे से निकली थी।
अगर आपके दादा ने अपनी ज़मीन बेचकर किसी कारोबार में लगाई और सब डूब गया — तो आपके पिता का ये कहना कि "कारोबार में हाथ मत डालो" कोई डर नहीं था। वो एक याद थी।
अगर आपके घर में कोई बीमारी आई और पैसे नहीं थे, और गहने बेचने पड़े — तो आपकी माँ का सोने पर भरोसा अंधविश्वास नहीं है। सोने ने उस दिन सच में काम किया था।
हर आदमी की पैसे वाली राय उसकी अपनी ज़िंदगी के एक-दो बड़े हादसों से बनती है।
और इसीलिए बहस बेकार जाती है। जब आप किसी को समझाने की कोशिश करते हैं, तो आप उसके तर्क से नहीं, उसकी याद से लड़ रहे होते हैं।
पर पुराना सच आज का सच नहीं होता
यही असली मुद्दा है।
बहुत सी बातें अपने ज़माने में पूरी तरह सही थीं।
जब बैंक में ब्याज ज़्यादा मिलता था, तब "बैंक में रखो" अच्छी सलाह थी।
जब नौकरी में पेंशन मिलती थी, तब बचत की उतनी ज़रूरत नहीं थी।
जब मकान इतने महँगे नहीं थे, तब "पहले मकान लो" आसान बात थी।
हालात बदल गए।
और जो आदमी बिना जाँचे पुरानी सलाह ढोता रहता है, वो एक ऐसा नक़्शा लेकर चल रहा है जिसमें आधी सड़कें अब हैं ही नहीं।
अपनी राय ढूँढने का तरीक़ा
एक काग़ज़ लीजिए और तीन सवालों के जवाब लिखिए। जल्दी में नहीं।
पहला : मेरे घर में पैसे के बारे में क्या कहा जाता था?
जो याद आए, सब लिखिए। पाँच-सात लाइनें आ जाएँगी।
दूसरा : पैसे को लेकर मेरे बचपन की सबसे तेज़ याद क्या है?
ये सवाल सबसे ज़्यादा खोलता है।
किसी को वो दिन याद आता है जब पिता ने फ़ीस के लिए किसी से उधार माँगा था और वो सामने खड़ा था।
किसी को वो दिन याद आता है जब घर में पहली गाड़ी आई थी।
किसी को वो याद आता है जब माँ ने कहा था कि "इस बार नहीं ले सकते" और उसने ज़िद नहीं की थी।
वो एक याद आज भी आपके फ़ैसलों में बैठी है।
तीसरा : ये आज भी सच है?
हर लाइन के आगे लिखिए — हाँ, नहीं, या थोड़ा-बहुत।
और यहीं ज़्यादातर लोगों को दिखता है कि वो कई ऐसी बातें ढो रहे हैं जो उनके अपने तजुर्बे से आई ही नहीं थीं।
दो तरह की गड़बड़ी
बचपन की सीख दो तरह से असर करती है, और दोनों नुक़सान करती हैं।
पहली : वही दोहराना। जिस घर में डर था, वहाँ का बच्चा हर पैसा बचाता है और कभी ख़र्च नहीं कर पाता — तब भी नहीं जब उसके पास बहुत है। उसकी अलमारी भरी है और उसका मन अब भी ख़ाली है।
दूसरी : उल्टा दौड़ना। जिस घर में तंगी थी, वहाँ का बच्चा कमाने के बाद दिल खोलकर ख़र्च करता है — घड़ी, गाड़ी, शादी, तोहफ़े। वो पैसा नहीं ख़र्च कर रहा, वो अपने बचपन को जवाब दे रहा है।
दोनों में आदमी आज की ज़रूरत से नहीं, बीस साल पुरानी याद से फ़ैसला ले रहा है।
एक लाइन में
पैसे के बारे में आपकी राय आपने चुनी नहीं थी — वो आपके बचपन के घर से आई थी, और पुराना सच आज का सच नहीं होता।
आज ये करो
तीनों सवालों के जवाब लिखिए — घर में क्या कहा जाता था, बचपन की सबसे तेज़ पैसे वाली याद क्या है, और क्या वो आज भी सच है। हर लाइन पर तीसरा सवाल ज़रूर लगाइए।
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